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मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

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रविवार | Raviwar | एक अनूठा विवाह समारोह | देविंदर शर्मा

मिसाल-बेमिसाल

 

एक अनूठा विवाह समारोह

देविंदर शर्मा

 

वे एक शादी में शामिल होने आए थे. वर-वधू को आशीर्वाद देने के बाद बड़े इत्मीनान से कुर्सियों पर जम गए. यहां तक कि पंडाल में लगी खाने की मेज की तरफ देखना भी उन्होंने गवारा नहीं किया. कृषि संकट पर अपने विचार प्रकट कर रहे विद्वजनों की बातों को वे बड़े ध्यान से सुन रहे थे. क्या आप कभी इस तरह की अनोखी शादी में शामिल हुए हैं या फिर इसके बारे में सुना तक है? अगर नहीं तो कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले के होसदुर्ग गांव में आपका स्वागत है. निश्चित तौर पर इस गांव ने एक नई मिसाल कायम की है.

यह अनूठी शादी खेती के विमर्श के साथ संपन्न हुई


यह विवाहोत्सव शहरों में होने वाली शादियों में शानो-शौकत का भद्दा प्रदर्शन करने वाले नवधनाढ्य वर्ग को शर्मसार करने वाला है. इस असाधारण शादी में हुए नवीन प्रयोग ने उत्प्रेरक का काम किया. चित्रदुर्ग और पास के अन्य जिलों के हजारों किसान रविशंकर और शकुंतला की शादी में शामिल होने होसदुर्ग गांव पहुंचे. लोगों द्वारा विवाह में धूमधाम न करने का कारण मुंबई हमलों से विषादग्रस्त मन:स्थिति नहीं थी, बल्कि कर्नाटक में भयावह कृषि संकट के कारण उनकी बदहाली ने उन्हें ऐसा करने को मजबूर किया.

कोई दो हजार मेहमान तब हैरान रह गए जब मेजबान ने उन्हें बताया कि कृषक समुदाय के ज्वलंत मुद्दों पर प्रकाश डालने के लिए उन्होंने चार विशेषज्ञों को आमंत्रित किया है. इस अभियान के संयोजक कर्नाटक राज्य रैयत संघ के महासचिव सिद्दवीरप्पा के अनुसार, ''मैं जानता था कि लोग चौंक जाएंगे, लेकिन मैं उन्हें शानदार दावत के साथ-साथ दिमागी खुराक भी देना चाहता था. और इससे अच्छा क्या हो सकता था कि लोग अपनी दु:ख-तकलीफों और संघर्र्षो के बारे में बताएं.''

लोगों ने भी उन्हें निराश नहीं किया. वे बड़े धैर्य और रुचि के साथ रात दो बजे तक वक्ताओं के विचार सुनते रहे. इस बातचीत में वे इतने खो गए थे कि खाना खाने का कार्यक्रम बार-बार टालना पड़ा. आखिर रात के दो बजे लोगों ने भोजन किया. सुबह 11 बजे से रात तीन बजे तक चले इस कार्यक्रम में मेहमानों के साथ-साथ वर-वधू भी डटे रहे. इसमें तभी व्यवधान पड़ता था जब कोई वर-वधू को आशीर्वाद देने के लिए वहां पहुंचता था.

लोगों ने हरित क्रांति के कारण पर्यावरण के विनाश, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग के कारण बंजर हो रही धरती को बचाने और निरंतर जलदोहन के कारण भूमिगत जलस्तर में आ रही गिरावट के बारे में सवाल किए. उन्होंने आर्गेनिक खेती के फायदों के बारे में बात की. प्राकृतिक कृषि पद्धति के विविध पहलुओं पर सवाल किए. वे इस बात को लेकर चिंतित थे कि क्या इस पद्धति से खेती करने पर पैदावार गिर जाएगी और उनकी आमदनी घट जाएगी?

आर्गेनिक कृषि व्यवस्था के संबंध में बेंगलूर से आए चंद्रशेखर ने ग्रामीणों की जिज्ञासा शांत की. तिप्तुरु के ग्रामीण कालेज में प्राध्यापक कृष्णमूर्ति ने किसानों को उन चुनौतियों से निपटने के उपाय बताए जिनसे वे जूझ रहे हैं. उन्होंने कर्नाटक के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों द्वारा आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं और इन्हें रोक पाने में सरकार की विफलताओं पर भी प्रकाश डाला.

सिद्दवीरप्पा ने बताया कि उनका उद्देश्य किसानों को यह अहसास कराना था कि वे कृषि के नाम पर व्यवसाय के शिकार हैं. कृषि और संस्कृति में बड़ा विभेद पैदा हो गया है. किसान भूल गए हैं कि कृषि एक व्यवसाय न होकर संस्कृति है. हम गलत तरीके से व्यापार करने की कीमत चुका रहे हैं. इसीलिए किसान मर रहे हैं.

 

तिप्तुरु से ही एक पत्रकार उज्जाजी राजन्ना ने विशेष आर्थिक क्षेत्र की प्रकृति पर प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि विकास के नाम पर जमीन हड़पी जा रही है. इस त्रुटिपूर्ण नीति के सामाजिक, राजनीतिक और राजनीतिक दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं. बड़े पैमाने पर किसान जमीन से बेदखल हो रहे हैं और उनके पुनर्वास की सरकार को चिंता नहीं है.


बेंगलूर स्थित यूनिवर्सिटी आफ एग्रीकल्चर साइंस में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर ने सूखाग्रस्त इलाकों में जैव-विविधता के संदर्भ में भूमि की उर्वरा शक्ति कायम रखने में बाजरे की खेती के महत्व पर प्रकाश डाला. डा. प्रकाश ने कहा कि कभी चित्रदुर्ग जिले में ज्वार-बाजरे की खेती बहुतायत से होती थी. बाजरे की सोरगुम, रागी, कोडू आदि किस्मों की पैदावार होती थी. अब किसानों ने न केवल बाजरा, बल्कि सब्जियों की खेती करना भी बंद कर दिया है. टिकाऊ कृषि व्यवस्था के लिए सब्जियों की खेती बहुत जरूरी है. बातचीत के दौरान महिलाओं ने फिर से सब्जियों की खेती करने की रुचि दिखाई.

भूमि की उर्वरता बढ़ाने पर लोगों की रुचि देख एक प्रस्ताव पारित किया गया कि जिले के प्रत्येक घर में किचेन गार्डन तैयार किया जाएगा. इस पर भी सहमति बनी कि प्रत्येक किचन गार्डन में मोटे अनाज की कम से कम एक फसल जरूर बोई जाएगी. डा. प्रकाश ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा कि क्या विवाहोत्सव में इस तरह के प्रस्ताव की बात सुनी है? आल्हादित होकर वह बोले, ''मैं सपने में भी ऐसा नहीं सोच सकता था.''

उत्साहित सिद्दवीरप्पा ने कहा कि अगर हम सब्जियां और मोटे अनाज की पैदावार करें तो प्राथमिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में निश्चित तौर पर आत्मनिर्भरता हासिल कर सकते हैं. यह निर्णय लिया गया कि केआरआरएस, महिला संगठन और गैर-सरकारी संगठन मिलकर प्रयास करें कि एक साल में प्रत्येक घर में एक किचेन गार्डन हो.

उक्त अवसर पर यह प्रस्ताव भी पारित किया गया कि भविष्य में होने वाली शादियों में परोसी जाने वाली सब्जियों में से कम से कम आधी सब्जियां परंपरागत होनी चाहिए. यह एक ऐसा सबक है जो न केवल कर्नाटक, बल्कि पूरे देश के किसानों के लिए महत्वपूर्ण है. अगर किसान शहरी संभ्रांत वर्ग का अनुसरण करने के बजाय अपने अस्तित्व की चिंता करें तो उन्हें सही राह आसानी से मिल जाएगी.

 

15.01.2009, 16.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjay nayyar (snjn123@gmail.com) raipur(cg)

 
 काश कि हमारे देश के दूसरे लोग भी ऐसा सोचते. 
   
 

shree prakash (samvadik@gmail.com) indore

 
 great and good report.... and initiative too!!! 
   
 

Vikas Singh Siligudi

 
 हमारे समाज का संकट है कि वह आलतू-फालतू दिखावे में लगा रहता है लेकिन उसे अपने समय की चिंताओं से कोई लेना-देना नहीं होता. हमारे सामने देश की 70 करोड़ आबादी एक समय के भोजन के लिए तरसती है लेकिन हम रोज अरबों रुपये का खाना नालियों में फेंकते हैं.
इस तरह के आयोजन अगर हों तो फिजूलखर्ची पर भी रोक लगेगी और हमारी समस्यायें भी सुलझेंगी.
 
   

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