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उठ गए चौसठ हाथ | शिरीष खरे | महाराष्ठ्र के तिरूमली

मिसाल बेमिसाल

 

उठ गये चौसठ हाथ

शिरीष खरे, बीड़ से


महाराष्ट्र के जिला बीड़ के मुख्यालय से कोई 110 किलोमीटर दूर है कनाडी गांव. वहां जाने वाली उबड़-खाबड़ सड़क आधे रास्ते पर साथ छोड़ देती है. फिर लोग अपनी सहूलियत से पगडंडियां बनाते चलते हैं. कनाडी से डेढ़ किलोमीटर पहले एक मुहल्ला आता है. एक ऐसा मुहल्ला, जिसके बारे में न तो पहले कभी सुना था, न कभी देखा था. यह तिरूमली मोहल्ला है. कुल 274 लोगों का मोहल्ला.

बीड़ के तीरूमली परिवार

 

नंदी बैल पर फटे-पुराने कपड़ों से लिपटी गृहस्थी लटकाना और गाना-बजाना तिरूमली बंजारों की पहचान है. यह दर-दर रोटी मांगकर पेट भरना अपना काम समझते हैं. विभागीय कर्मचारियों के लिए लापता रहने वाले ऐसे नाम मतदाता सूची से नहीं जुड़ते.


तिरूमली बंजारों ने घर, बिजली, पानी, राशन, स्कूल और अस्पताल की बातों पर कभी सोचा ही नहीं. इनकी सुनें तो सोचने से सब मिलता भी नहीं. शासन को नागरिकता का सबूत चाहिए, जो इनके पास है नहीं. इसलिए हक की बात करना नाजायज होगा. गांव वाले इन्हें चार दिन से ज्यादा न तो ठहरते देखते हैं और न ही ठहरने देते. इसलिए इस आबादी का पूरा पता राज्य-सरकार भी नहीं जानती. इस हालत में तिरूमली मोहल्ला होना किसी हेरतअंगेज समाचार जैसा लगता है.

 

कनाड़ी गांव के तिरूमलियों ने 118 एकड़ बंजर जमीन से बीज उगाए और कानून को पढ़कर पंचायत से कई काम करवाए. यह ऊंची जाति की ज्यादतियों के खिलाफ लम्बे संघर्ष का नतीजा रहा. 1993 में छिड़ी इस लड़ाई को यह लोग आजादी की पहली लड़ाई से कम नहीं मानते. तब 32 जोड़ों के 64 हाथ एक जगह जीने के लिए उठ गए थे.

 

वोट की राजनीति

यहां घास-फूस से बंधी झोपडियों के मुंह एक-दूसरे से सटे और आमने-सामने है. यह आपसी और घुली-मिली जीवनशैली की ओर इशारा है. इनके पीछे हू-ब-हू वैसी ही झोपड़ियां गाय, कुत्ता और बकरियों के लिए तैयार हैं. इन 15 सालों में तिरूमली परिवारों की संख्या बढ़कर 45 पहुंच चुकी है और हालत ये है कि 9 सदस्यों वाली पंचायत में 3 सदस्य इसी इलाके के हैं.


लेकिन 10 साल पहले स्थिति एकदम उल्टी थी. तब तिरूमलियों का 1 भी वोटर नहीं था, इसलिए उनकी सुनवाई नहीं होती थी. इन दिनों बस्ती के सभी 26 बच्चे पढ़-लिख रहे हैं. 32 परिवारों के हाथ में राशनकार्ड हैं. इनमें से कुछ बीपीएल में भी हैं. अब यह अस्पताल में बीमारियों का इलाज और सहकारी बैंक से लोन ले सकते हैं. बस पास में 50% की छूट भी मिल गई है. लेकिन इन सबसे ऊपर है इज्जत, आत्मनिर्भर और बराबरी की दुनिया में मिलना. कमसे कम ग्राम-सभा का इनकी रजामंदी से चलना यही जाहिर करता है.

'चाईल्ड राईटस एण्ड यू' और 'राजार्षि शाहु ग्रामीण विकास' बीते एक दशक से इस क्षेत्र में तिरूमली, पारधी, भील और सैय्यद मदारी जैसी घुमन्तु जनजातियों के लिए काम कर रही हैं. सामाजिक कार्यकर्ता बाल्मिक निकालजे के मुताबिक- “ दान देने-लेने के रिवाज को कमजोर किए बिना किसी जमात को ताकतवर बनाना नामुमकिन है. इन भटके लोगों को उनका हक देना सरकार का फर्ज है. वोट-बैलेंस की राजनीति से अछूते होने के कारण एक भी पार्टी का ध्यान उनकी तरफ नहीं जाता. तिरूमली जनजाति के लिए हम लड़े. अब वह आगे की लड़ाई खुद लड़ रहे हैं.”

भूरा गायकबाड़ पूरी लड़ाई के मुख्य सूत्रधार हैं. भूरा कहते हैं- “ तब नंदी का खेल दिखा-दिखाकर जिंदगी तमाशा बन चुकी थी. लेकिन हम और हमारी पुरखे कहीं भी जाएं घूम-फिरकर यहीं आते थे. जब कोई गाय-भैंस पेट से होती तो 15 हजार में उसे खरीदकर बड़े बाजार में 25-30 हजार तक में बेच देते. लेकिन बेचने से पहले उन्हें इसी जमीन पर चराते. यहीं से चारे का धंधा भी करते. कोई-न-कोई यहां जरूर बना रहता. मतलब ये कि इस जमीन से हमारा रिश्ता लगातार बना रहा.''

 

एक नई कहानी
महाराष्ट्र का 'गायरन जमीन कानून' कहता है कि 14 अप्रैल 1991 के पहले तक जो लोग ऐसी जमीनों का इस्तेमाल कर रहे हैं, उन्हें इसका पट्टा दिया जाए. तिरूमलियों ने संस्था की मदद से इसकी एक अर्जी कलेक्टर को भेजी.

लेकिन सवाल वही था कि आखिर जमीन का किया क्या जाये. एक रोज पत्थरों को हटाकर खेत बनाने का काम तय किया गया.


बाबू फुलमारी के अनुसार- “पत्थर बीनने में ही हालत खराब हो गई. हमारे पास बीज, हल, बैल, कुदाड़ी और फावड़ा नहीं थे. खेत में फसल रोपना या कुदाल या हल चलाना नया काम था. यह सब पड़ोस के खेतों में जाकर सीखा. संस्था की मुहिम से 32 कुदालियां और 64 क्विंटल ज्वार के बीज इकट्ठा हो गए.”


इस तरह हर हाथ के लिए 1 कुदाली और 2 क्विंटल बीज मिले. कड़ी मेहनत के बाद खेत बने और उनके बीच से कुछ रास्ते. लेकिन मुश्किल तो आनी ही थी.


बकौल बाबू फुलमारी “ जुताई को 15 दिन भी नहीं गुजरे कि एक सुबह ऊंची जाति के 500 लोगों ने हल्ला बोला. उनके हाथों में लाठी, सुलई, कुल्हाड़ी और कोयता थे. 60 साल के बापू गायकवाड़ को रस्सी से बांधकर दूर तक खींचा. सबको इतना मारा कि एक भी उठने लायक नहीं बचा.”


लेकिन उसमें से छोटा बच्चा रवि जगताप नजर बचाकर निकल भागा. अब वह बड़ा हो चुका है. उसने बताया- “ भागते-भागते 5 किलोमीटर दूर के शिराठ गांव पहुंचा. वहां से 20 किलोमीटर दूर संस्था के आफिस फोन लगवाकर इस मारपीट की खबर सुनाई. जब तक कार्यकर्ता पुलिस के साथ यहां पहुंचते तब तक घायलों की हालत गंभीर हो चुकी थी. उन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.”

बीड़ के तीरूमली परिवार की महिला अपनी बच्ची के साथ


इसके बाद 'जाति अत्याचार प्रतिबंध कानून' के तहत केस दायर करके सत्याग्रह छेड़ दिया गया. इसमें बाकी जनजातियों के हजारों लोग शामिल हुए. इससे संगठन की ताकत कई गुना बढ़ी. दबाव में पुलिस ने 7 पिंजरा गाड़ी मंगवायी और करीब 150 आरोपियों को हिरासत में लिया. सभी को जिला मजिस्ट्रेट ने रिमाण्ड पर भेजा और 21 दिनों तक जमानत नहीं दी.


अखबारों ने इन खबरों को चारों तरफ फैला दिया. इससे पूरे इलाकों को कानून का पाठ समझ आ गया. शिराठ गांव के कई दलित तिरूमली मोहल्ला आकर रात को रखवाली करने लगे.


आखिरकार आपसी समझौता हुआ, जिसमें सवर्णों ने फिर कभी न सताने का वादा किया, जिस पर आज तक वो कायम हैं.

हौसला, जज्बा और...
साहिबा फुलमाली कहती हैं- “ हम निडर, ताकतवर, पढ़े-लिखे, अपनी बात पर बोलने और दिल्ली-बम्बई तक लड़ने वाले बन गए हैं.”


उनके साथ बैठे संस्था के समन्वयक सतीश गायकवाड़ की चिंता है कि पिछले 15 सालों की लड़ाई के बाद भी इनके हक की जमीन इनके नाम नहीं हो सकी हैं. अब यही लड़ाई लड़नी और जीतनी है.


“ चाईल्ड राईटस एण्ड यू ” ने स्कूली शिक्षा के लिए यहां 'गैर औपचारिक केन्द्र' खोला. वहां अपनी पढ़ाई शुरु करने वाले बच्चे अब कालेज की दहलीज पर खड़े हैं. वह रमेश और रामा मुलवारी से भी आगे जाना चाहते हैं. तब तीसरी में पढ़ने वाला रमेश फुलमारी अब 'विशेष सुरक्षा बल' में है. इसी तरह रामा फुलमारी राज्य परिवहन बस का कण्डेक्टर है.


जिले के बड़े नक्शे पर तिरूमली मोहल्ला नजर नहीं आता. पूरी तिरूमली आबादी का छोटा सा हिस्सा यहां बसा है. असल में यह बदलाव का एक छोटा उदाहरण भर है. ज्यादातर तिरूमली लोग नंदी बैल के सिर पर महादेव-बाबा की मूर्ति, गले में घण्टी और कमर में रंग-बिरंगा कपड़ा बांधने के बावजूद मटमैली जिंदगी जीते हैं.


बिस्मिल्लाह खां ने जिस 'सवई' को बजाकर देश-विदेश नाम कमाया उसे तिरूमली लोग कई पीढ़ियों से बजाते आ रहे हैं. लेकिन इन्हें न नाम मिला न दाम. मांगी रोटियां मिल-बांटकर खाते हैं. खाने के लिए अन्न नहीं पकाते इसलिए बर्तनों को भी नहीं रखते. बरसात में रेल्वे-पुलों के नीचे सोते हैं. उसके बाद यह 500 किलोमीटर दूर पुना, मुम्बई, सोजारी, उस्मानाबाद, भूम, पारण्डा, शोलापुर और बारसी के इलाकों में भटकते हैं. हर रोज कम से कम 20 से 40 किलोमीटर की यात्रा. इनका हर परिवार 10-15 बच्चों से भरा है. जिन्हें यह कमर, कंधों और सिरों पर ढ़ोते हैं. इससे पैरों में होने वाली तकलीफ बढ़ जाती है.


ऐसे अनगिनत पैरों की तकलीफ दूर करने के लिए 'उठ गए चौसठ हाथ' की कहानी जगह-जगह दोहरानी होगी.

 

25.01.2009, 12.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Keith Bombay

 
 very nicely written, sensitive and indicative of everyday realities we often choose to ignore 
   
 

amit (amittyagee@gmail.com) delhi

 
 बहुत अच्छा प्रयास है. ऐसा हर जगह होना चाहिए. 
   
 

Sunanda barnwal Siligudi

 
 In the year 1950, the list of Scheduled Castes and Scheduled Tribes was released. The Criminal Tribes Act was repealed in 1952. Though the Criminal Tribes Act Enquiry committee had categorically made the recommendations to the Central Government regarding these tribes they were deprived of the Constitutional safeguards due to both the acts of commission and omission. Thereafter the issue was swept aside due to the conflicts of the state formation on the linguistic pattern and these tribes in Maharashtra became victims in the process. 
   
 

sarvesh dutt tripathi (sarveshdt@yahoo.co.in) delhi

 
 Story is encouraging for other downtrodden people dwelling in various areas of the nation. Replication of such movements is urgently required for the virtual development of the nation. Your effort of dissemination of such greivances of grassroot level people and the redressal by themselves is really a laudable effort. 
   
 

mihir goswami (mgmihirgoswami@gmail.com) bilaspur c. g.

 
 woha subha aa gai. 
   
 

Sandeep Chaudhary New Delhi

 
 देश भर में ऐसी जनजातियां हैं, जिन्हें अपराधी या घुमंतु होने की सजा भुगतनी पड़ती है. ऐसे समय में इन्हें क्राई जिस तरह का सहयोग दे रही है, वह सुखद है. 
   

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