तरुण भारतीय की कवितायें
साहित्य
तरुण भारतीय
की कवितायें
पारिवारिक फोटो
एक
पिता ग़र रोए
सुनाई दे जाएंगी
सलाखों वाली खिड़कीनुमा तस्वीरें
( कल तक जो थीं दीवालों पर टंगी )
आंगन फिर लौट आएगा
वर्जिश करता, जड़ें फेकता
पेड़ पीपल का
जल जाएगी सब्जी
माँ की
थम जाएँगी चौखट पे
ऋचाएँ
आयतें
सहगल के गीत भी
क्या होगा ख़बरों का?
फोटो कौन-सी होगी
पहले पन्ने पर?
करवट ही बदलेगा सौदागर
प्यासा
दूसरे पहर
सपने में दाशर्निक
सेकेंगे रोटियाँ सावधानी से
ओस की संभावनाएँ
चीखी जाएंगी
तैंतीस साल से बन्द कमरों में
पिता के आँसू
मानो गलतियों के छूटे अवसर
दो
दरवाजों को मजबूत बनाने की फिक्र में माँ संग प्रकाश वर्षों दूर तक यात्रा की है और
अचानक
पाया है दुपट्टे पर सितारे टांकते हाथ और आसपास उगती
रसीली कंटीली झाड़ कुतरती बकरियाँ चितकबरी
माँ यात्राओं से डरी नहीं, एक चूल्हे से दूसरे - एक पुत्र से पुत्री - पुत्री से
फिर पुत्र - ज्ञान एक से ज्ञान दो -
एक अक्षर से दूसरे अक्षर तक यात्रा करती रही, हम अकेले में बाबूजी के संग रजाई में
दुबके उनकी
थकी सांसों में सुनते माँ का अतिविलम्बित आलाप, अंह्योरे सुरंग में जैसे भाग रही हो
तेज हवा,
धीरे से पूछते, “ बाबूजी माँ के आने के बाद खाएंगे ना हम
किशमिश वाली खीर?”
सफेद बालों को भूल माँ केवल दरवाजे मजबूत करने के लिए खरीद लाती है सैकड़ों रंग, आज
उसने
कल के लाल दरवाजे को रंग दिया काले से- इतने रंग, इतनी परतें, शायद इंद्रधनुष से ही
बना हो दरवाजा
चार किताबों की भूख के बाद बाबूजी ठकठकाते हैं दरवाजा, उन्हें क्या पता रंगों और
सूरज का खेल,
झाड़ते हैं अपने काले हाथ
माँ दौड़ती है, रंगों को कोसती है, फिर कनखियों से रंगों के डिब्बों में ढूंढती है
मजबूती का कोई और रंग,
अपने आंचल से पोछती है हाथ बाबूजी के, इतनी कोमलता से कि रेखाएँ बची रहें और वे दौड़
पाएँ
उन घाटियों में उड़न तश्तरियों तक और पूछें तीन कान वाले परदेसी से
“ आपके यहाँ होते हैं दरवाजे? ”
02.02.2009,
00.59 (GMT+05:30) पर प्रकाशित