आ अब लौट चलें
मिसाल बेमिसाल
आ अब लौट चलें
प्रशांत कुमार दुबे
भोपाल
से
आंध्रप्रदेश के शरनापल्ली के 12 साल के राजू पद्मशाला को इसके अलावा कोई रास्ता नहीं
सुझा. आखिर कोई कब तक हर रोज मार खाता रहे. मां ने किसी और के साथ घर बसा लिया था
और पिता के लिए दारु पीना दुनिया का सबसे बड़ा सुख था. पिता दारु पी कर आते और अपना
गुस्सा राजू पर निकालते.
रोज की मारपीट से तंग आ कर एक दिन राजू ट्रेन में बैठा और निकल पड़ा. कहां, इसका पता
तो उसे भी नहीं था लेकिन जब ट्रेन रुकी तो उसके सामने एक नई दुनिया थी. प्लेटफॉर्म
की दुनिया. मध्यप्रदेश के कटनी प्लेटफॉर्म पर ही तेलुगु बोलने वाले राजू ने अपनी
दुनिया बसाई और मांगते-खाते अपनी जिंदगी गुजारने लगा. भीख मांगना और ट्रेनों में
झाड़ू लगाने का काम राजू के लिए यह एक नरक से निकल कर उससे बड़े नरक में आने की तरह
था. लेकिन राजू के पास इस नरक से निकलने की कोई जुगत नहीं थी.
आखिर एक दिन भोपाल की एक संस्था के लोगों के संपर्क में वह आया और उसे उम्मीद
की एक किरण नजर आई. फिर शुरु हुआ राजू के परिजनों से संस्था के लोगों के संपर्क
का सिलसिला. और एक दिन ऐसा भी आया, जब राजू को पता चला कि उसे घर ले जाने के
लिए उसके दादा आये हुए हैं.
राजू पद्मशाला को जब मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री केजी
पटनायक ने एक समारोह में उसके परिवारजनों को सौंपा तो वह फूट-फूट कर रो पड़ा.
परिजनों की आंखें भी भर आयी. हालत ये हुई कि हॉल में उपस्थित कई लोग रोने लग गये.
अब राजू अपने दादा के साथ अपने घर रह रहा है.
आकाश की कहानी भी राजू की तरह ही है. इसे भी भोपाल की नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ वीमन
चाइल्ड एंड यूथ डेव्लपमेंट नामक संस्था ने इस नरक से निकाल कर परिजनों को
पहुंचाया. राजू, आकाश, अज्जू...और इन जैसे प्लेटफॉर्म पर अपनी जिंदगी गुजारने
वाले सैकड़ों बच्चों को इस संस्था ने बकायदा परियोजना बचपन के तहत ''आ अब लौट
चलें'' नामक कार्यक्रम चला कर इनके परिजनों तक पहुंचाया है.
नेशनल इंस्टीटयूट ऑफ वीमन चाइल्ड एंड यूथ डेव्लपमेंट के शाखा सचिव राजीव भार्गव
इस प्रक्रिया को औचक नहीं बताते हैं. राजीव के अनुसार इसके पीछे एक सुगठित
अध्ययन करने के बाद तय किया गया कि बच्चों की बेहतरी उनके घर वापस जाने में ही
है. उसके बाद परियोजना बचपन के तहत ''आ अब लौट चलें'' की शुरुवात हुई. पिछले
तीन वर्षों में 850 बच्चों को उनके घरों तक पहुंचाने की पहल संस्था ने की है.
प्लेटफॉर्म पर रह रहे 131 बच्चों पर किये गये एक स्वतंत्र अध्ययन में यह तथ्य
सामने आया कि घर से प्लेटफॉर्म पर पहुंचने वाले बच्चों की उम्र 6 से 18 तक होती
है. इनमें से भी 11 वर्ष के 25.95 प्रतिशत तथा 12 से 14 वर्ष के 48.85 प्रतिशत
बच्चे थे. यह बच्चे ऐसी अवस्था में थे, जब उन्हें अत्याधिक सुरक्षा की जरूरत
पड़ती है.
|

बच्चों के अधिकारों का संरक्षण घर में ही हो सकता है
राजीव भार्गव |
बच्चों के भागने के कारणों की पड़ताल करें तो हम पायेंगे कि सबसे ज्यादा मामले परिजनों
द्वारा मार-पीट (14.5 प्रतिशत) के सामने आये हैं, वहीं घर की गरीबी और काम की तलाश
में भी लगभग 13 प्रतिशत बच्चे घरों से भागकर सड़कों पर आ गये.
दोस्त के बहकावे में आकर या फेल होने के डर से या दुनिया को जानने, पहचानने, दोस्तों
के साथ घूमने-फिरने के शौकीन होने के कारण भी बच्चे घरों से भाग जाते है. लेकिन
निरंतर प्लेटफॉर्म पर रहने के कारण 30 से 40 प्रतिशत बच्चों का एक गिरोह तैयार हो
जाता है. यह गिरोह प्लेटफॉर्म पर आने वाले नये बच्चों को अपने में शामिल करता है.
अधिक दिनों तक बच्चों के प्लेटफॉर्म पर होने का मतलब है नशा, असुरक्षा व अपराध के
कुचक्र में फंसना. अगर कोई बच्चा 5 दिन से ऊपर प्लेटफॉम पर रह जाता है तो वह नशे की
शुरुवात कर देता है, जो बाद में आदत में बदल जाती है.
धुम्रपान से शुरू होने वाली यह आदत शाल्यूसन, आयोडेक्स, कफ सीरप और व्हाईटनर के
गंभीर नशे में तब्दील हो जाती है. यह नशा फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाता है. शोझ
के अनुसार भोपाल प्लेटफॉर्म पर रहने वाले 20 बच्चे सालुसन का सेवन करते है एवं 30
बच्चे व्हाईटनर का सेवन करते हैं.
राजीव भार्गव कहते हैं- “ इन सब स्थितियों के मद्देनज़र ही हमने यह तय किया कि बच्चों
के समस्त अधिकारों का संरक्षण उसके घर में ही हो सकता है. हमने रायचूर में काम कर
रही ‘साथी’ संस्था के साथ मिलकर इन बच्चों की घर वापसी का कार्यक्रम शुरू किया.”
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घर से
भागने का कारण |
संख्या |
% |
|
जबरदस्ती स्कूल भेजना |
7 |
5.3 |
|
गरीबी/काम
की तलाश |
16 |
12.21 |
|
रिश्तेदार द्वारा
बहकावा |
2 |
1.5 |
|
दोस्त द्वारा बहकावा |
17 |
12.9 |
|
घर में पिटाई |
19 |
14.5 |
|
घर वालों की फटकार |
11 |
8.3 |
|
रिश्तेदारों द्वारा
मारपीट |
5 |
3.8 |
|
डर के कारण |
9 |
6.8 |
|
गुम हो जाना |
6 |
4.5 |
|
काम के लिए बाध्य करना |
10 |
7.6 |
|
घुमना |
9 |
6.8 |
|
मानसिक असंतुलन |
1 |
0.7 |
|
अन्य |
19 |
14.5 |
हालांकि यह काम इतना आसान नहीं है. भार्गव बताते हैं कि पहले बच्चे को प्लेटफॉर्म
से शेल्टर पर लेकर आते हैं. शेल्टर पर इनके रहने, खाने और खेलन की बेहतर व्यवस्था
की जाती है. 15 दिन से 1 माह में इन बच्चों के साथ परार्मश सेवा शुरू की जाती है.
इस दौरान ही इनका डेटाबेस तैयार किया जाता है.
इस डेटाबेस के आधार पर ही पुलिस मुख्यालय से नजदीकी पुलिस स्टेशन का नंबर लेकर वहां
पर बातचीत कर उनकी मदद ली जाती है. यदि परिवार का पता चल जाता है तो फिर उससे यहां
पर बच्चे को ले जाने हेतु बातचीत की जाती है. यदि परिवार का पता नहीं चलता है तो
फिर हमारे यहां से कार्यकर्ता बच्चे को साथ लेकर उसके परिवार तक पहुचते हैं और वहां
पर बच्चें को परिजनों को सौंपते हैं. इसके बाद स्थानीय पुलिस के साथ बातचीत करते
हुये इसका अनुवर्तन करते हैं.
राजीव भार्गव का दावा है कि एक बार घर लौटने के बाद कमसे कम 80 प्रतिशत बच्चे दुबारा
अपने घर से नहीं भागते. अगर ऐसी कोई स्थिति आती भी है तो हम संपर्क में आने के बाद
उन बच्चों का पुनर्वास करते हैं.
जिन बच्चों का घर नहीं पता चल पाता है वे शेल्टर में ही रहकर पढ़ाई का काम भी करते
हैं. राज्य सरकार के सर्व शिक्षा अभियान के सहयोग से भोपाल प्लेटफॉर्म के बच्चों के
लिये ही दिशा परियोजना का संचालन किया जा रहा है. इस आवासीय ब्रिज कोर्स में बच्चों
को 10 महीने तक रखा जाता है. इसके बाद उसे मुख्यधारा की शिक्षण व्यवस्था में लाया
जाता है.
दिशा परियोजना में काम कर रहे दुर्गश ठाकुर का कहना है कि इन बच्चों का शिक्षण बहुत
बड़ी चुनौती है. आज हमने जिस बच्चे को भर्ती किया है, हो सकता है कल वह किसी और
प्लेटफॉर्म पर चला जाये. इसलिये शिक्षा को रोचक बनाये रखने की ओर हमारा अधिक ध्यान
रहता है.
''आ अब लौट चलें'' कार्यक्रम एक सराहनीय कदम है, भटके बच्चों को उनके घरों तक लौटाने
का लेकिन इससे भी बड़ी चुनौती है उन बच्चों के लिये, जिनके पास लौटने के लिये कोई
घर नहीं है. इससे भी बड़ा सवाल यही है कि आखिर ये बच्चे घरों से भागते क्यों हैं?
ज़ाहिर है, इसके लिए परिवार भी जिम्मेवार है व समाज भी और इसका हल सबको मिलजुल कर
निकालना होगा.
06.02.2009,
09.16 (GMT+05:30) पर प्रकाशित