पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

माफ़ी की वह माँग तो भाव-विभोर करने वाली थी

संघर्ष को रचनात्मकता देने वाले अनूठे जॉर्

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

अंतिम सांसे लेता वामपंथ

प्रतिरोध के वक्ती सवालों से अलग

गरीबी उन्मूलन के नाम पर मज़ाक

जनमत की बात करिये सरकार

नेपाल पर भारत की चुप्पी

लोहिया काल यानी संसद का स्वर्णिम काल

स्मार्ट विलेज कब स्मार्ट बनेंगे

पाकिस्तान आंदोलन पर नई रोशनी

नर्मदा आंदोलन का मतलब

पूर्वोत्तर व कश्मीर में घिरी केंद्र सरकार

भीड़ के ढांचे का सच खुल चुका

रिकॉर्ड फसल लेकिन किसान बेहाल

युद्ध के विरुद्ध

किसके साथ किसका विकास

क्या बदल रहा है हिन्दू धर्म का चेहरा?

मोदी, अमेरिका और खेती के सवाल

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > मध्यप्रदेशPrint | Send to Friend | Share This 

कैसे कहें सुजलाम् सुफलाम्

मुद्दा

 

कैसे कहें सुजलाम् सुफलाम्

अजय बी सिंह सागर से

 

पिछले कुछ सालों से सब कुछ बदला हुआ है.

जिस बुन्देलखण्ड में कुंओं की खुदाई के समय पानी की पहली बूंद के दिखते ही गंगा माई की जयकार गूंजने लगती थी, वहां एक अरसे से कुंओं बावड़ियों से गंगा माई नदारद हैं. जिस गऊ की, माता कहकर पूजा की जाती थी,चारे पानी के अभाव में उसको तिलक करके घरों से रूख्सत करना पड़ रहा है. सूखे खेतों में ऐसी मोटी और गहरी दरारें पड़ गई हैं, जैसे जन्म के बैरियों के दिलों में होती हैं.

बुंदेलखंड में पानी के लिए हाहाकार


पूरे साल पानी से लबालब जलाशयों , नदियों और नालों वाले इस इलाके में जेठ का महीना खत्म होते ही लाखों कातर निगाहें मेघराज की ओर टकटकी लगाये देखने लगती हैं और पिछले एक दशक से मेघराज यूं ही झूठमूठ बरसकर चले जाते हैं. लेकिन कुदरत की इस लम्बी बेवफाई से करोड़ों लोगों और प्राणियों का सब्र अब छलकने लगा है. पूरे इलाके के हर शहर, कस्बे, गांव और हर घर आंगन में गरीबी का असंतोष, भूख और प्यास अब व्यापने लगी है, खटकने लगी है.

मध्यप्रदेश,खासकर बुन्देलखण्ड के जलसंकट की यह एक बानगी भर है, हकीकत तो कहीं अधिक खून के आंसू रूला रही है. लेकिन इस हकीकत से बा-खबर होने के बावजूद सत्ता में सबसे ऊपर बैठा तबका मिनरल, बॉटल में मस्त है. सैकड़ों करोड़ रूपये की योजनाएं बनी, फाइलों में जलसंग्रहण हुआ, मेघराज बरसे, प्यारे लाल, अच्छेलाल की खुशहाली की कहानी भी छपी. बस इतने भर से सरकारी योजनाओं का क्रियाकर्म संपन्न होता रहा. जमीन पर जो हुआ वह ऊंट के मुंह में जीरे के बराबर है.

दिलचस्प यह है कि मध्यप्रदेश की औसत वर्षा करीब 11 सौ मिलीमीटर है, लगभग इतना ही बुन्देलखण्ड का भी है. अगर इतने पानी को रोक लिया जाये तो पूरा बुन्देलखण्ड एक साल तक पांच मीटर पानी में डूबा रहे.

कवियों ने “ इत चम्बल उत ताप्ती” कहकर बुन्देलखंड का भौगोलिक परिचय दिया है, जहां केन ,बेतवा, सोन , मंदाकिनी , धसान , सुनार , कोपरा , व्यारमा , बेबस जैसी कई छोटी-बड़ी नदियां हैं. फिर भी अगर यह धरती प्यासी है तो व्यवस्था की कोई तो कमी रही होगी.

केन्द्रीय जल आयोग के आंकड़ों पर भरोसा करें तो चंबल और मालवा क्षेत्र के 11 जिलों में खारे पानी की तो मंडला समेत इन्हीं दोनों क्षेत्रों के करीब दस जिलों में फ्लोराइड की विकट समस्या है. इससे निजात पाने के लिए करोड़ों रूपये खर्च हुए लेकिन नतीजा ढाक के वही तीन पात.

आयोग के आंकड़े बताते हैं कि करीब 24 विकासखण्डों में भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन हो रहा है, 5 की स्थिति अति गंभीर है और 19 की गंभीर. इसका यह मतलब भी हुआ कि भूमिगत और नदी जल के विवेकपूर्ण इस्तेमाल के लिए 1986 में बने मध्यप्रदेश पेयजल परिरक्षण अधिनियम का इस्तेमाल करने में सरकारी मुलाजिमों को दिक्कतें पेश आ रही हैं. यानी यहां भी लाठी वालों को भैंस ले जाने से नहीं रोक पाई सरकार.

इस साल महाकौशल प्रांत भी जलसंकट से हाहाकार कर रहा है. आयोग के मुताबिक नर्मदा नदी में इस साल क्षमता का करीब साढ़े 40 प्रतिशत भराव ही हुआ है. जो पिछले साल की तुलना में नौ प्रतिशत कम है. यही हाल यहां बड़े बांधों का है. गांधीसागर , बरगी, तवा,बाणसागर और इन्दिरा सागर बांध अपनी क्षमता से काफी कम भर पाये हैं. गांधीसागर अपनी वास्तविक भराव क्षमता 6.827 बीसीएम के मुकाबले मात्र 0.831 भर पाया.

राज्य में जहां औसत वार्षिक भूमिगत जल उपलब्धि 34.33 है, वहीं इसका दोहन मात्र 17.12 है. यानी भूमिगत जल के अंधाधुंध दोहन में मप्र अभी भी पंजाब, हरियाणा , राजस्थान और उप्र जैसे राज्यों से पीछे है.

योजना आयोग ने अपनी दसवीं योजना की मध्यावधि समीक्षा रिपोर्ट में भी मप्र को अत्याधुनिक दोहन से मुक्त माना है. लेकिन किसी अच्छे नतीजे पर पहुंचने से पहले यह भी देखना होगा कि इन राज्यों में जल और योजना दोनों आयोगों ने अकूत भूमिगत जल स्त्रोत माने हैं. उस अनुपात से मप्र में जो दोहन हो रहा है वह बहुत है. हां इतना अवश्य है कि विंध्य क्षेत्र में चूना पत्थर की विशाल श्रृंखला के नीचे अकूत मात्रा में शुध्द जल की सैकड़ों किलोमीटर लम्बी चौड़ी धाराएं हैं, जिनका दोहन अगर किया जाये तो पूरे राज्य की पेयजल की आवश्यकता सालों तक पूरी की जा सकती है. लेकिन जितना धन इसमें लगेगा उतना कोई भी सरकार कम से कम पानी के लिए तो नहीं खर्च कर सकती है.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

भोला भगत (bholabhagat@hotmail.com) मुंगेर, बिहार

 
 पूरे भारत की यही दुर्दशा है। एक ओर बाढ की तवाही तो दूसरी ओर भंयकर सूखा। और इन आपदाओं से राहत देने के नाम पर सरकारी खजाने की ळूट। चीन या अन्य देशों की तरह यदि वर्षी की कीमती जल को नदियों द्वारा बेकार बहकर समुन्द्र में जाने से रोकने का सही ढग से जल प्रबंधन कर दिया जाय तो सदा के लिए इन विपदाओं से देश को निजात मिलेगा । खेतों और लोंगों को पीने के लिए पर्याप्त पानी तथा जल विद्युत मिल पाएगा। 
   
 

abhijeet (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Water should be subject of central Government. 
   
 

Kumar Kartik New Delhi

 
 Last year there was a news in HT that after 5 years of drought, the peo- ple of Bundelkhand have had enough. Riots have broken out in the region with people resorting to looting and violence in a desperate quest for water. On the night of May 6, two tankers used by Jal Sansthan were looted in Mahoba. Residents of the Kasbathai area of the district beat up one of the drivers. The next morning, tanker drivers went on strike and returned eight hours later only after the district administration as- sured them of adequate security.

Water scarcity in many villages of Bundelkhand has badly affected the life of boys of marriageable age, as nobody wants to marry off his or her daughter in any family here due to existing water problem.
Several villages here are facing severe water crisis for five years due to no rainfall.
 
   
 

यादवेंद्र चंद्र सिंह गाजियाबाद

 
 आप जब बुंदेलखंड और पानी की बात कर रहे हैं तो आपको इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि कथित जनता की सरकार का इस मुद्दे पर क्या रुख है. उत्तर प्रदेश की सरकार ने तो सरकारी जल स्रोतों कुआं, बावड़ी, नदी, नहर से पानी लेने पर जेल भेजने की बजाप्ता घोषणा की थी. 
   
 

Dr H.N. Gautam Khammam, Andhra Pradesh

 
 One recent study, The Economics of Ecosystems and Biodiversity, estimates annual losses of natural capital at two to three times the value of recent stock market declines. We need to address the real and lasting damage that’s being done to the environment. 
   
 

सुब्रत राय Kanpur

 
 आज पानी को लेकर दुनिया भर में जिस तरह की बहस छिड़ी हुई है, उसे देखने की जरुरत कोई महसूस नहीं कर पा रहा है. खास तौर पर बुंदेलखंड में जो हालत है, वह किसी से छुपी हुई नहीं है. दुखद ये है कि इन समस्याओं को लेकर हम सब अपनी आंख-कान बंद करके नहीं जानने का ढोंग कर रहे हैं. इसका परिणाम हम सबको भुगतना ही पड़ेगा. 
   
 

Dr. Satyabhama Awasthi (satyabhama2000@yahoo.com) Bilaspur C.G.

 
 अजय जी ने एक ज्वलंत विषय पर बात की है.
जहां तक राजीव गांधी मिशन की बात है, यह एक बहुत सटीक योजना रही है. मैंने स्वयं यह योजना संचालित की है और आज 8-10 सालों बाद एक सकारात्मक और फलदायी परिणाम हमारे सामने है. अजय जी इस पर भी कुछ लिखें.
तालाब अगर परफोलेशन टैंक है तो पानी सोखने का काम भी करता है, विशेष रुप से मुरुम के खदानों या रेतीले स्थानों में इसे बनाया जाता है.
दुख की बात तो यही है कि एक ओर तीसरा युद्ध पानी पर होने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर परंपरागत ढ़ांचे भू माफिया और बिल्डर्स का हित साध रहे हैं.
एक संवेदनशील नागरिक और विशेष तौर पर पत्रकार होने के नाते इस दिशा में भी पहल करें.
 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.in