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चीनी मील का कड़वापन

मुद्दा

 

चीनी मिल का कड़वापन

राजीव यादव, आजमगढ़ से


तो क्या चीनी मिल बेच दी जाएगी ?

सठियांव चीनी मिल की दीवारों और गेट के पास बैठे-खड़े मज़दूरों के दिन की शुरुवात इसी वाक्य से होती है. वे हर रोज़ सुबह सात बजे इस उम्मीद में वहां आते हैं कि शायद आज का सूरज उनके लिए कोई अच्छी ख़बर लेकर उगा होगा. लेकिन बंद पड़ी चीनी मील की थोड़ी-सी कड़ुवाहट हर रोज़ उनकी ज़िंदगी में घुल जाती है और हर शाम उन्हें निराश लौटना पड़ता है.

सठियांव चीनी मिल


यह 1974 की बात है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले में जब द सहकारी चीनी मिल, सठियांव खुली तो लोगों को उम्मीद थी कि यह चीनी मिल लोगों के जीवन में भी मिठास घोल देगी. हुआ भी ऐसा ही. लेकिन जिस मिल के सहारे लोगों ने अपनी जिंदगी गुजारने का सपना देखा था, उस ने 34 साल में ही दम तोड़ दिया. पिछले दो सालों से आजमगढ़ जिले के एक मात्र औद्योगिक प्रतिष्ठान ' दि सहकारी चीनी मिल सठियाँव' की मशीनें बंद पड़ी हैं.

बनकट के रामनिहोर बताते हैं- ''बाबू उख के बेला में काम मिले क कमी ना रहत रही, भले जाड़ा-पाला में रात दिन जागे के पड़त रहा पर कटाई, छोलाई, लदाई अउर मिल तक पहँचाए में कमाई होइ जात रही.''


पड़ोस के गाँव बैठौली की जुगरी मिल में सफाईकर्मी थी. लेकिन मिल बंद होने के बाद से उसके सामने आजीविका का संकट पैदा हो गया है. अपना दुखड़ा रोते हुए वे कहती हैं- ''साहब हमरे पास कौनों जमीन ना बा, मिल के सहारे दू रोटी मिल जात रही पर अब उहो के कौनो आसा ना बा, हम गरीबन के सुने वाला कोइ ना बा.''

राष्टीय-अन्तराष्टीय बहसों में रहने वाला आजमगढ़ वर्ष 2005 की आर्थिक जनगणना के अनुसार प्रदेश में 41वें पायदान पर है जो मिल बन्द होने के बाद और गर्त में चला गया है.

6 दिसम्बर 07 को जब मिल के कर्मचारियों और गन्ना किसानों ने सठियाँव बाजार को जाम कर सब कुछ ठप्प कर दिया तो इसी क्षेत्र से विधानसभा पहुँचे लघु उद्योग राज्य मंत्री चन्द्रदेव राम यादव करैली ने तीन दिनों के भीतर मिल चलवाने का वादा किया था. इस बात को साल गुजर गये लेकिन मिल की अघोषित तालाबन्दी कब खत्म होग, इसका जवाब खुद लघु उद्योग के मंत्री के पास नहीं है. गौरतलब है कि चन्द्रदेव राम यादव ने चीनी मिल सुचारु रुप से चलवाने के मुद्दे पर ही पिछला विधानसभा चुनाव लड़ा था.

वरिष्ठ समाजवादी नेता तेज बहादुर यादव बीते दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि तमाम आन्दोलनों के बाद 1974 में जब मिल बनी तो हमलोगों में बड़ी उम्मीद जगी. इसके खुलने के बाद ऐसा लगा था कि हमारा जिला भी सहकारिता के औद्योगिक इतिहास में सुनहरा अध्याय लिखेगा. पर खुशहाली और सम्पन्नता का यह सफर महज 34 सालों में टूट जाएगा, ऐसा किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था.

पिछली सरकार में एक करोड़ रुपए वेतन भत्ते के लिए और सवा करोड़ रुपए रखरखाव के लिए आवंटित कराया गया था. लेकिन इस सरकार ने पिछले साल जो 35 लाख रुपये आये थे, उसे भी मंगवा लिया.


गौरतलब है कि मिल को चलाने की आधारभूत संरचना में गन्ना क्षेत्र की अहम भूमिका होती है जो इस मिल के आस-पास की मिलों की तुलना में सबसे अधिक है.लेकिन पहले समाजवादी पार्टी और बाद में बसपा की सरकार ने इस मिल को बेचने की लगातार कोशिश की. बसपा सरकार ने तो एक साथ राज्य के 28 चीनी मिलों को बेचने का निर्णय लेकर पूरे चीनी उद्योग को ही निजी कंपनियों को सौंपने की अघोषित योजना पर अमल शुरु कर दिया.

सहकारिता क्षेत्र के संवर्धन में सहायता के लिए 1995 में संचालक मण्डल का गठन किया गया था. इसके उपसभापति आनन्द कुमार उपाध्याय मिल की दुर्दशा के लिए प्रदेश सरकार को जिम्मेवार बताते हुए कहते हैं- " प्लांट और भवन जर्जर नहीं है फिर भी इसे जर्जर बताकर सरकार निजीकरण करने की फिराक में बैठी है. हमने मिल को चलवाने के लिए पिछली सरकार में एक करोड़ रुपए वेतन भत्ते के लिए और सवा करोड़ रुपए रखरखाव के लिए आवंटित कराया था. पर वर्तमान सरकार ने पिछले साल जो 35 लाख रुपये रखरखाव के लिए आया था, उसे भी वापस मंगवा लिया."

सीपीआई नेता हामिद अली कहते हैं कि जब सरकार प्रदेश चीनी मिलों के निजीकरण पर उतारु है तो वह क्यों चाहेगी कि मिल चले. इस निजीकरण के गोरखधंधे में जिले के कई बसपा सरकार के मंत्री भी शामिल हैं जो चाहते हैं कि जल्द से जल्द मिल का निजीकरण हो जाए और वे उसमें शेयर होल्डर बन जाएं.

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