| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Virendra Agarwal (virendra_ag@yahoo.com) Agra | |
| | ये तो होना ही था. मीडिया ने व्यवसायिक रुप से धन कमाने के लिए जितना खबरों के साथ उल्टा-पुल्टा किया जा सकता था, किया. अब जब विश्वव्यापी मंदी चल रही है तो पैसे के प्रवाह विज्ञापन के रुप में कम होते गये. सब तरफ से कटौती शुरु हो गई. रही बात पत्रकारों को निकालने की तो वो पूर्ण रुप से गलत नहीं है. क्योंकि मेरी नजर में जो पत्रकार सही हैं, उसका दुबारा आकलन होना चाहिए. | |
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| | sarvesh dutt tripathi | |
| | अभिषेक, आप साधुवाद के पात्र हैं. for strengthening democratic system such a bold criticism of so called fourth state is the need of the time. thus their frightening face is being unveiled. | |
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| | Pushpendra Rawat (push_rawat2003@yahoo.co.in) Bhopal | |
| | “मंदी का तो बहाना है” यह बात उतनी आसान नहीं है जितनी दिखती है. मंदी का असर वास्तव में उन संस्थानों पर पड़ा है जिनका निवेश स्टॉक मार्केट में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप में था. धन की कमी की बात को भी सच मानने में भी कोई आपत्ति नहीं है, शेयर मार्केट से जुड़े लगभग हर व्यक्ति का पैसा ब्लाक हो गया है क्योंकि सेंसेक्स में अभूतपूर्व 65 प्रतिशत. की गिरावट हुई थी.
महत्वपूर्ण यह है कि बड़े पैमाने पर जोखिमपूर्ण निवेश क्यों किया गया? कंपनियों के पास वाकई ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी? इस मंदी से निपटा नहीं जा सकता था क्या ? कुछ संस्थानो ने तो बाकायदा ढोल पीट के कर्मचारियों की छंटनी की और कई ने तो कानों कान खबर भी नहीं होने दी. जिन कर्मचारियों को व्यवसाय प्रबंधन में संगठन की सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति माना गया है, उनको बाहर करने का निर्णय क्षण भर में ले लिया गया. जबकि अन्य विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता था.
यह मानना भी गलत है कि यह छंटनी केवल मीडिया संगठनों में है, इसका प्रभाव लगभग सभी उद्योगों पर है. मंदी के प्रभाव को व्यापक बनाने में भी मीडिया संगठनों ने कोई कमी नहीं छोड़ी, जबकि ऐसी परिस्थिति में मीडिया एक रचनात्मक मार्गदर्शक की भूमिका निभा सकता था. सियार आया की कहावत बिल्कुल सटीक है. अधिकांश संगठनो ने तो अपनी स्थिति बेहतर होते हुए भी छंटनी की. मध्यम वर्ग ने भी इससे घबराकर खर्च करना कम कर दिया है. | |
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| | mohan honap (honapmohan@gmail.com) bilaspur (c.g) | |
| | मैं आपके इस लेख से काफी प्रभावित हुआ हूं. आपके द्वारा लिखे इस निर्भिक और निष्पक्ष लेखन की मैं सराहना करता हूं. मीडिया के अंदरुनी बातों को जनता के सामने लाना आज बहुत जरुरी है, क्योंकि जो लोग सच्चे हैं, उन्हें भी बेईमान होने पर मजबूर किया जा रहा है. आपका धन्यवाद. | |
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| | mohammad arif ansari (www.ratlamdarshan@gmail.com) ratlam m.p. | |
| | ये तो होना ही था जिस तरह देश में अखबारों और न्यूज़ चैनलों की बाढ़ आई हुई है जिससे कॉम्पीटीशन के चलते ये चौथा स्तंभ कमजोर होता जा रहा है. | |
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| | pravi singh (journalist.freelance@rediff.com) gandhidham | |
| | अभी दो साल और ऐसा कहा जा रहा है. हिंदी भारत में शुरु से ही निचले दर्जे की भाषा मानी जाती थी उनके लिए जो लोक इंग्लिश में पढ़े हैं और जिनका काम अंग्रेजी में चलता है. | |
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| | animesh nachiketa (animesh.scribe@gmail.com) ranchi | |
| | सही लेख है... मीडिया ने ही इस मंदी शब्द को सबसे ज्यादा लहराया है. इसका खामियाज़ा तो इसे देर सबेर भुगतना ही था. अखबार और चैनल के पूंजीपति मालिकों को तो बस बहाना भर चाहिए. | |
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| | anup (anupsethi@gmail.com) | |
| | संकट का समय है. एकजुट होकर सामना किया जाए. | |
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| | Rakesh Pathak (pathak.gaya@gmail.com) Beawar,Ajmer | |
| | जनाब, शोषण के खिलाफ लिखने वालों का ही शोषण...आपने मौलिक मुद्दे उठाये हैं. बड़ी अजीब बात है कि मंदी की हवा फैलाकर मीडिया मुगल अपनी मनमर्जी चला रहे हैं. इसके लिए सरकार को सोचने की जरुरत है. क्या जिस तरह से एयरलाइंस कंपनी के कर्मचारियों के लिए सरकार ने हस्तक्षेप किया था, उसी तरह पत्रकारों के लिए भी सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए. | |
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| | Parivesh (pariveshm@gmail.com) Sarangarh | |
| | बहुत अच्छा. आम तौर पर खबर देने वालों की खबरें कम ही मिलती हैं. वर्णन में ईमानदारी झलकी. | |
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| | satyendra Delhi | |
| | very nice. आपने पत्रकारों की बात उठा दी. हकीकत ये है कि पत्रकार उठ जाते हैं, लेकिन हकीकत या उनकी बात सामने नहीं आती. | |
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| | सौरभ कुमार (patna20202gmail.com) आईआईएमसी | |
| | अभिषेक जी , मीडिया के इन स्वंयभूओं को भी अपने गिरेबान में झांकना चाहिए. दुनिया का कूड़ा-कबाड़ा आदमी, जो किसी लायक नहीं था, वह मीडिया में आ गया है. भ्रष्टाचार से लेकर जातिवाद तक की बुराइयों को ढोंने वाला मीडिया समाज का सबसे बड़ा दानव है. | |
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| | zeb akhtar (z_eemkaan@yahoo.co.in) ranchi | |
| | लेख अच्छा है. मंदी के बहाने बहती गंगा में हाथ धोया जा रहा है. | |
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| | RAMESH MISHRA CHANCHAL (sabhardarshan@gmail.com) NEW DELHI | |
| | नई दुनिया के संपादक और मालिक दोनों ही पद्म पुरस्कारों से सम्मानित किए गए हैं. दूसरी ओर, चुनाव नजदीक आते जाने के साथ ही अखबार कांग्रेस की खबरों से पटता जा रहा है.आने वाले समय में भारतीय मीडिया में भी सत्यम की झलक दिख ही जाएगी. एक बार भी किसी समूह के साथ यदि ऐसा हुआ, तो फिर यह लहर रुकेगी नहीं. पूरी गुंजाइश है कि गुब्बारा फूट जाएगा और कीमती वर्क में लिपटा चौथा खंभा बेनकाब हो जाएगा.
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| | Vina (uditvinayak@gmail.com) Bhopal | |
| | Well deserved treatment for journalists. For far too long I had witnessed, and personally suffered, the completely wrong and biased reporting that many of our journalists did. Especially jarring was the holier than thou attitude that most of them adopted. To some of them being shown the door for completely cussed reasons one can only say: god's justice. | |
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| | Rector Kathuria (rectorkathuria@gmail.com) Ludhiana (Punjab) | |
| | It is time to learn lesson & start a move to review contract based employments & journalistic works under the name of non journalistic or subordinate posts.......... | |
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| | Amit Gandhi (amitgandhi85@gmail.com) Delhi | |
| | आपने सब की पोल खोल दी मैं इंडिया न्यूज़ में एसोसिएट प्रड्यूसर था. एकाएक मुझे बाहर का रास्ता दिखा दिया. मीडिया पर बाज़ारवाद हावी हो गया है. पत्रकारों की क्या हालत है सब जानते हैं. | |
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| | abhijeet Raigarh | |
| | Every journalist should provide coverage under insurance scheme as it was given by Hon. Supreme court to school teachers of private school recently. | |
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| | sanjay new delhi | |
| | आपने ठीक लिखा. दरअसल अब पत्रकारिता में वह बात नही. झारखण्ड के एक नामी अखवार में कार्यरत हूं मंदी जैसी कोई बात नही दिखती. हमारे ऊपर वाले स्टाफ की कटौती इसलिए करना चाहते है क्योंकि बाकि अखबार कर रहे है. ऐसा ऑफिस के अंदर खुलेआम कहा जा रहा है. एक व्यक्ति को कई लोगो का काम करवाया जा रहा है. लेकिन आपको हैरानी होगी कि मेरे जानने वाले कई पत्रकार इस पेशे को ही छोड़ने का मन बना चुके है. और वे किसी भी स्थिति से निपटने के लिए तैयार है वे मान कर चल रहे है कि उनकी नौकरी सुरक्षित नही है. | |
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| | dinesh shakya (dinesh.sahara@gmail) etawah | |
| | ऐसा लगता है कि मंदी की मार के नाम पर मीडिया जगत से जुड़े हुए मठाधीश ही ऐसा करने में लगे हुए हैं. जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है, सिर्फ मंदी का बहाना बना कर कटौती की जा रही है. क्या संस्थान के प्रमुख वाकई में अपने खर्चों में कोई कटौती कर पाया है ? ये सवाल अहम है, इसकी भी जांच होनी जरुरी है, तभी मंदी की मार का नाटक बंद होगा. | |
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| | Ashok Madhup (ashokmadhup@gmail.com) BIJNOR UTTER PRADESH | |
| | इस सबका कारण पत्रकारों की एकता का न होना है. हमारी ट्रेड यूनियन नहीं है. जो है उनमें पत्रकार सदस्य बनना नही चाहते. वर्किग जर्नलिष्ट यूनियन मे नान वर्किग जर्नलिस्ट ज्यादा नजर आते हैं. | |
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| | Prashant Dubey (prashantd1977@gmail.com) Bhopal | |
| | अभिषेक जी आपसे सहमत हुआ| अभी कुछ दिनों पहले हम लोग बांधवगढ़ मैं मीडिया संवाद मैं विकास पत्रकारिता पर जिरह करने के लिए जुटे थे, तब भी ये बहस उठी थी | इस पूरे तमाशे मैं सोचनीय यही है कि समाज के हर वर्ग कि बात उठाने का हुनर रखने वाले लोग अचानक तमाशबीन क्यों हो जाते हैं | मुझे लगता है इसका पुरजोर विरोध होना चाहिए | सवाल फिर वही कि करे कौन .......? इस बहस मैं एक यह बहस भी सामने आती है कि आखिर हम अपने यहाँ कब श्रम कानूनों की बात करेंगे, या नहीं ही करेंगे ..............? भोपाल मैं भास्कर मैं यही प्रक्रिया चली और लोगों से यह कहा जा रहा है की अपना इस्तीफा स्वयं लिख कर दें | यह दर्दनाक है| लेकिन इससे भी ज्यादा दर्दनाक वह है कि आपके बाजू मैं बैठकर रिपोर्टिग करने वाला व्यक्ति आपके साथ आवाज बुलंद कने कि बजाये टेबल मैं सर घुसाना ज्यादा फायदे का सौदा मान रहा है लेकिन मुझे लगता है कि ये मुगालता है, क्योंकि यदि आप यह मान रहे हैं कि एइसे मैं बच जायेंगे तो यह ग़लतफ़हमी है | बरबस "मैं चुप रहा" शीर्षक से लिखी कविता याद आती है | आपको साधुवाद कि कम से कम आप इस पर लिख तो रहे हैं, मीडिया संस्थानों मैं तो इस विषय पर कानाफूसी पर भी पहरा है | दुःख इस बात का है चौथा स्तम्भ भी गिडगिडाने को मजबूर है | एक शेर याद आता है जुबान कहती है कि, सारा कसूर उसका था | जमीर कहता है कि, कुछ जिम्मेदार हम भी तो हैं || | |
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| | सुरेंद्र किशोर नई दिल्ली | |
| | यह तो होना ही था. आखिर पत्रकारिता में उद्योग या दूसरे धंधों की तरह की ही पूंजी लग रही है और आवारा पूंजी के तेवर हमेशा ऐसे ही होते हैं. इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. | |
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| | vinod tiwari (vinod_tiwari101@yahoo.com) bhopal | |
| | मंदी की मार सिर्फ पत्रकारों पर ही क्यों पड़ी है सरकार को इसकी हकीकत का पता लगाना चाहिए | |
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| | लाल बहादुर ओझा आइआइएमसी दिल्ली | |
| | अच्छा आलेख है। बल्कि भयावह कहना ठीक रहेगा। पूरी परिस्थितियां एक बार फिर से ट्रेड यूनियन की महत्ता को रेखांकित करती हैं। आश्चर्य यह है कि दुनिया भर की समस्याओं के प्रति सरोकार रखनेवाली पत्रकार बिरादरी की इस दुर्गति पर कहीं से कोई प्रतिरोध का स्वर नहीं दिखाई/सुनाई दे रहा है। सिर्फ हाहाकार है। शायद इस चुप्पी वजह यह हो कि बाकी लोग इंतजार कर रहे हैं कि आग की आंच अभी उन तक नहीं पहुंची है। एक बात और आपने सियार आया सियार आया का उपयोग व्यंजना में किया है या चूक हुई है। मुझे जहां तक पता है इस मुहावरे को भेडि़या आया भेडि़या आया के रूप में जाना जाता है। | |
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| | राजेश अग्रवाल (agrrajesh@gmail.com) | |
| | आपकी दृष्टि महानगरों में भारी भरकम तनख्वाह पाने वाले उन पत्रकारों की दुर्दशा पर गई जो पता नहीं कितने दिन में कलम उठाते हैं और क्या लिखते हैं. यहां देश भर के छोटे-छोटे क्षेत्रीय अख़बारों का तौर-तरीका इससे भी ज्यादा ख़राब है. सालों काम करने के बाद भी न उन्हें नियुक्ति पत्र मिलता, न सेलरी रजिस्टर में ली जाती, श्रम न्यायालय में भी जाने की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता और वेतन अकुशल दैनिक मजदूरों से भी कम है.हमें उनकी चिंता ज्यादा है. उदयन शर्मा पुरस्कार के बारे में आपकी टिप्पणी से सहमत नहीं हुआ जा सकता. इसमें कुछ तथ्यों की भी गलतियां हैं. | |
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