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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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विश्व कविता से एक चयन

विश्व कविता से एक चयन

अंगरेजी से अनुवादः पीयूष दईया

 

 

एक कोविद प्रेयसी

इज़ोबेल केम्पबेल

आइरिश कवि

बताओ उसे यह सब एक झूठ है
मैं उसे अपने जीवन जितना प्यार करती हूं ;
उसे मुझसे जलने की ज़रूरत नहीं-
मैं उसे प्रेम करती हूं और उसकी पत्नी है रक़ीबा
अगर वह मुझे मार दे अब डाह के कारण
उसकी पत्नी द्वेष से मर जाएगी ,
वह मर जाएगा अपनी पत्नी के लिए दुख के चलते-
एक रात में हम तीनों मृत.
सारी आशीषें पृथ्वी से स्वर्ग तक
माथे पर औरत के जिससे मुझे है घृणा,
और मरद मैं जिसे प्यार करती अपने जीवन जैसा,
अचानक मौत हो उसका भाग्य .

पीयूष दईया

 

विरोध

केनेको मित्सुहारू

जापानी कवि, 1895-1975

 

अपनी जवानी में
मैं पाठशाला के विरुध्द था.
और अब, वापस,
मैं काम करने के विरुध्द हूं.
सबसे उपर यह आरोग्य
और है आचारसंस्कार जिससे मुझे चिढ़ है भरसक.
आरोग्य और ईमानदारी से ज्यादा क्रूर
मनुष्य के लिए कुछ और नहीं.
बेशक मैं ' जापानी आत्मा ' के विरुध्द हूं
और कर्तव्य व मानवीय संवेदना से मुझे उल्टी आती है.
मैं किसी भी सरकार के पक्ष में नहीं , कहीं की क्यों न हो भले
और लेखकों और कलाकारों की बिरादरी को तो अपना चूतड़ दिखाता हूं.
जब मुझसे पूछा जाय कि मैं किसलिए पैदा हुआ
बिना झिझक , मैं जवाब दूंगा , '' विरोध करने को. ''
जब मैं पूर्व में हूं
मैं जाना चाहता हूं पश्चिम में.
बायीं पर मैं अपना कोट ढीला करता हूं , मेरे जूते दायें और बायें.
अपना पायजामा मैं पीछे से आगे पहनता हूं और घोड़े पर सवारी उसके पिछवाड़े की ओर चेहरा किये करता हूं.
अन्य सब जिससे घृणा करते हैं मैं पसंद करता हूं
और मेरी सर्वोपरि घृणा वे लोग हैं जो महसूसते हैं वही एक
मैं यह विश्वास करता हूं : विरोध करना
जीवन में अकेली शानदार चीज है.
विरोध करना जीना है.
विरोध करना अपने आपे पे पकड़ बनाना है.

 

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kumar mukul (kumarmukul07@gmail.com) delhi

 
 कविताएं अच्छी लगीं , अलग मिजाज की. 
   
 

अनिल अञि (attri_journalist@yahoo.com) नई दिल्‍ली

 
 जितनी अच्‍छी कविताएं हैं, अनुवाद भी उतना बेहतर किया है पीयूष ने
.......एक अरसे बाद आपका नाम दिखाई दिया है कहीं पर.....मेरे पास आपका संपर्क सूञ नहीं लेकिन आपके पास तो है कभी तो याद कर लिया होता भाई पीयूष.....
 
   

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