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मीडिया के मारेः नौकरियां फिर आएंगी पर...
बात पते की
मीडिया के मारेः नौकरियां फिर आएंगी पर...
आस्तीन का अजगर
लेखक एक
मशहूर ब्लागर हैं. अखाड़े का उदास मुगदर पर उनकी दूसरी रचनायें पढ़ी जा सकती हैं.
जब
अनापशनाप भर्तियों का दौर था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि छंटनी का वक्त कैसा
होगा? कोई नहीं सोचता. पर सिर्फ नहीं सोचने से आप उसे टाल नहीं सकते. मीडिया का धंधा
ही परजीवी है. अगर बाज़ार अच्छा चलेगा, तभी विज्ञापन आएंगे, अगर नहीं चलेगा, तो नहीं
आएंगे.
अब जब छंटनी का वक्त है, तो यकायक बाज़ारवाद बुरा हो गया है. बाजारवाद को बुरा
कहने से कोई समाधान निकलने वाला है, ऐसा भी नहीं है. कोई भी धंधा मुनाफे के
सिद्धांत पर चलता है, और पत्रकारिता के पेशे में आने वाले वे लोग जो खुद को
प्रोफेशनल कहते हैं, यहां न खैरात खाने आए थे, न खैरात बांटने. उनका काम ऐसा
कुछ करना था, कि जिस पन्ने, रिपोर्टिंग बीट, जिस प्रोग्राम को वे अंजाम दे रहे
हों, उस पर पाठक या दर्शक का ध्यान जाता हो, और एकबारगी वह वहां ठिठक जाए, ताकि
वहां पर विज्ञापन आ सके, और विज्ञापनदाता को ग्राहक मिल सके, और मीडिया के उस
पन्ने या प्रोग्राम को मुनाफा और इस पत्रकार को इंक्रीमेंट या तरक्की. एक सफल
बिजनेस मॉडल में ये पारस्परिक निर्भरताएं अंतरनिहित थीं. और एक का असर दूसरे पर
पड़ना लाजिमी था.
नौकरी से निकाले जाने की किसी को खुशी नहीं होती, पर 2009 में हम सातवें दशक के
समाजवाद की अगर दुहाई देंगे, तो वह न समाज, न उद्योग और न समय के साथ इंसाफ होगा.
हम सुख के वक्त अमेरिका और दुख के वक्त सोवियत संघ नहीं हो सकते. अब विज्ञापन
वैसे नहीं हैं, जैसे पहले थे. अखबारों में पन्ने कम हो रहे हैं. उनका मुनाफा भी
कम हो रहा है. लोग भी, जाहिर है कम होंगे. तरक्कियां और इंक्रीमेंट- बोनस पर भी
असर पड़ेगा.
हम जिस अर्थव्यवस्था के हिस्से हैं, वह बहुत सारे अनुमानों पर चलते हुए बहुत
तेज़ी से विस्तार कर रही थी, क्योंकि आगे बढ़ने का यही सही रास्ता समझा जा रहा
था कि तेज़ चलो. वे अनुमान गलत निकल रहे हैं तो नजला सिर्फ पत्रकारों पर ही नहीं
झड़ रहा है. इंडस्ट्री पर हर तरफ पड़ रहा है. विज्ञापन लाने वाले पर, जगह बेचने
वाले पर, मुनाफे पर, रिकवरी पर. इतनी बड़ी और व्यापक तस्वीर को सिर्फ पत्रकारों
के खिलाफ साजिश और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले की तरह पेश किया जाना सही नहीं
है कामरेड. अब जब बहुत सारी नौकरियां जाने की बात हो रही हैं, तो ये सवाल करना
बुरा तो है, पर ज्यादती नहीं कि उत्कृष्ठ पत्रकारिता की ऐसी कौन सी मिसालें
कायम हो रहीं थीं, जिनके न रहने का समाज को अफसोस होने वाला है.
जिन लोगों को निकाला जा रहा है, उन्हें हम पत्रकारों की बिरादरी तो मिस करेगी,
पर क्या यह समय, समाज, उद्योग भी मिस करेगा. अगर हां तो फिर सचमुच यह त्रासदी
है. पर किसी पत्रकार के नौकरी से निकाले जाने की दुर्भाग्यपूर्ण घटना, किसी कार
फैक्ट्री या बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी से निकाले गये आदमी से ज्यादा
दुर्भाग्यपूर्ण है, ऐसा मानना मुश्किल है.
समाज मीडिया के जरिये खुद से बात करता है. इस वक्त उसके पास बात करने को बहुत
ज्यादा औऱ बहुत अच्छा नहीं है. सबसे दर्दनाक तो बिजनेस के अखबार हैं- जो
फुलटाइम स्यापे में लगे हैं. मीडिया की अपनी तकलीफें हो सकती हैं, पर अपनी बात
को दिलचस्प तरीके से सामने रखना उसकी जिम्मेदारियों का हिस्सा है. आर्टीकुलेशन
की चुनौती हमेशा है, अभी और भी ज्यादा, जहां बदलते हुए वक़्त को, उसकी जटिलताओं
को सिर्फ कुछ नौकरियों के आने–जाने से देखना एक तरह का सरलीकरण है.
ये समय दिलचस्प है क्योंकि वे सारे लोग जो उथलपुथल का हिस्सा हैं, अगर वे सचमुच
सूझबूझ से भरे लोग हैं, तो वे कोई रास्ता जरूर निकालेंगे. अगर वे सचमुच अपने
अपने मीडिया में ऐसी प्रॉपर्टीज खड़ी कर रहे होते, जिन पर लोगों का ध्यान जाता,
तो शायद नौकरी जाने के आसार अपने आप ही कम हो जाते. जिन्हें नौकरियों से निकाला
गया और जो इस वक्त कतार में हैं- क्या उन्होंने उत्कृष्ठ पत्रकारिता का कोई
उदाहरण पेश किया. इस सारे स्यापे के बीच कि नौकरियां जा रही हैं, क्या आइने में
झांककर ये नहीं देखा जाना चाहिए कि जब वक्त अच्छा था तब क्या हो सकता था. हम
अपने आसपास ऐसा क्या खास देख रहे हैं कि कुछ लोगों के नौकरी पर नहीं रहने से नहीं
दिखलाई देगा.
प्रिंट हो या टेलीविजन, बकौल श्रीकांत वर्मा- कोसल में विचारों की बहुत कमी है.
अच्छी और पेशेवर पत्रकारिता की जरूरत एक संक्रांत समय में समाज को और भी ज्यादा
होगी. जिनके पास सूझबूझ होगी, जिनके पास विचार होंगे, उनकी जरूरत समाज को भी
होगी और मीडिया उद्योग को भी.
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दिक्कत उस मनोदशा की बहुत अधिक है, जहां ध्यान काम पर नहीं, नौकरी पर था, जहां हर
नौकरी को हमेशा के लिए तयशुदा मान लिया गया था. हम उस दौर में हैं, जो हमारे पिताओं
और माताओं की तरह एक जिंदगी में एक नौकरी वाली नियतियों में नहीं है.
एक सवाल इसके ठीक उलट है. जिन लोगों को नौकरी से निकाला गया, क्या वे बेहतर भविष्य,
तनख्वाह, बेहतर सुविधाओं के लिए अपनी नौकरी नहीं बदलते. अगर नहीं बदलते, तो आश्चर्य
का विषय होता.
पिछले लगभग दो दशकों से मीडिया का चश्मदीद गवाह होने के कारण ये कह सकता हूं कि ये
स्यापा हमेशा के लिए नहीं है. दूसरा ये समय एक ऐसी उथलपुथल का है, जहां मोटे तौर पर
फिटेस्ट सरवाईव करेंगे. इस नौकरी में नहीं तो, किसी और काम में. टाइपराइटर के प्रति
मेरा सम्मान कम नहीं है, पर खुद को अपग्रेड करने की जरूरत हमेशा थी. अब पहले से
बहुत ज्यादा.
तीसरा ये कि मीडिया स्कूल के कर्ताधर्ताओं को अपने तौर तरीके बदलने की जरूरत पड़ेगी
क्योंकि वे बहुत सारे नौजवानों का समय और उनके मां-बाप का पैसा और दोनों के सपनों
से खिलवाड़ कर रहे हैं. वे ऐसी फसल तैयार नहीं कर रहे, जो मीडिया के बहुत काम की
हो. मसलन मीडिया स्कूलों में पढ़ रहे बहुतेरे डिग्री धारकों को जानता हूं,
जिन्होंने न तो कोई गंभीर स्तर पर पढ़ाई की है और न ही लिखाई. बहुतों की तो भाषा ही
गड़बड़ है. वे क्वार्क एक्सप्रेस चलाने के अलावा बहुत माहिर नहीं लगते. सबसे बुरी
बात तो ये है कि वे मीडिया कोर्स करने के कारण ये बहुत तयशुदा मानते हैं कि उन्हें
नौकरी मिल ही जाएगी (जबकि मैंने ये पाया कि भाषा, इतिहास या अर्थशास्त्र की पढ़ाई
किए हुए लोग अक्सर ज्यादा बेहतर होते हैं, हालांकि मैंने खुद एक मीडिया स्कूल में
दाखिला और वहां से डिप्लोमा लिया था. बहुत तयशुदा होकर अब नहीं कह सकता कि वहां
पढ़ाई की थी और जो की, वह किसी काम आई) और नौकरी मिल ही जाएगी, तो उन्हें निकाला
नहीं जाएगा. ये कमाल का और बहुत खतरनाक दुराग्रह है.
इन नौजवानों को अब तक नौकरियां मिलती रहीं तो सिर्फ इसलिए कि मीडिया बहुत तेजी से
विस्तार कर रहा था, पर जाहिर है अब ऐसा नहीं होगा. और छंटनी जब होगी, तो उन लोगों
के बचने का चांस ज्यादा होगा, जो क्वार्क एक्सप्रेस से ज्यादा कुछ जानते होंगे.
उनकी डिग्रियां शायद सरकारी नौकरियों के लिए दरख्वास्त लगाने के काम आएं.
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कई ऐसे लोग हैं, जो इस जटिल होते वक़्त में नौकरियां छोड़
रहे हैं. इसलिए कि उन्हें नौकरियां मिल रही हैं. इसलिए नहीं कि वे किसी खास जात,
जीपीआरएस या चमड़ी के हैं. |
चौथी बात यह कि जिन पत्रकारों की पैनी नज़र भविष्य की तरफ गड़ी होंगी, वे देख सकते
हैं कि हम अपने जन्म में ही कागज पर छपे अखबार को खत्म होता हुआ देख सकेंगे. भविष्य
इंटरनेट और मल्टीमीडिया का होगा, सिर्फ टैक्नोलॉजी का नहीं बल्कि इस बात का कि किस
चतुराई से आप उनका इस्तेमाल अपने ग्राहकों के लिए करेंगे. हर संक्रमण पत्रकारों के
लिए शुभ समय होता है और ऑनलाइन मीडिया के साथ सबसे अच्छी बात यह है कि उसके लिए आपको
धन्ना सेठ होने की जरूरत नहीं है. अगर आपके पास लिखने के लिए ऐसा कुछ है, जो लोग
पढ़ना चाहते हैं, तो उसे बेचने का रास्ता निकाला जा सकता है.
पांचवी बात यह कि यह संकट उन बहुत से लोगों के लिए वरदान होगा, जो जिंदगी में कुछ
करने के लिए किसी चुनौती का इंतजार कर रहे थे. वे अपनी किताब लिखेंगे, वे छोटा मोटा
ही सही पर अपना धंधा शुरू करेंगे, वे सोचेंगे कि कैसे वे इस तरह के समय में ज्यादा
मुस्तैद, तैयार और चतुर हो सकेंगे, वे सिनेमा की स्क्रिप्ट लिखेंगे, वे आलस को अपनी
हड्डियों से झाड़ेंगे. मीडिया के सुपरस्ट्रकचर्स के खतरे छोटे, हल्के और जैव विविध
प्रयोगों को जगह देंगे, जिनकी जरूरत हमेशा से थी, पर तब तक किसी को पड़ी नहीं थी.
छठी बात- जो नौकरी से निकाले जाने के बाद कुछ नहीं करेंगे, अपने को पहले से ज्यादा
माहिर बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, अपनी प्रतिभा को टटोलकर नये प्रयोग नहीं करेंगे,
समाज के लिए अपनी उपयोगिता को साबित करने का कोई प्रयास नहीं करेंगे और इंतजार
करेंगे कि उनके साथ हुए अन्याय का उन्हें मुआवजा मिले, वे ज्यादा बड़े अफसोस के
हकदार हैं.
कई ऐसे लोग हैं, जो इस जटिल होते वक़्त में नौकरियां छोड़ रहे हैं. इसलिए कि उन्हें
नौकरियां मिल रही हैं. इसलिए नहीं कि वे किसी खास जात, जीपीआरएस या चमड़ी के हैं.
इसलिए वे हमेशा एक ऐसा मौका तलाश रहे थे, कि उन्हें किसी की नौकरी न करनी पड़े.
इसलिए कि वे हर दिन को चुनौती मान रहे थे. क्योंकि उन्हें अपने काम से प्यार है.
क्योंकि अख़बार (मीडिया) का काम ही बदलते हुए वक़्त को दिलचस्प तरीके से रेखांकित
करना है, वे खुद को रोज रिइन्वेंट करते हैं.
चुनौती सिर्फ नौकरियों को लेकर नहीं है. ज्यादा बड़ी चुनौती विभिन्न मीडिया संगठनों
के लिए यह है कि वह कैसे इस संक्रमण के समय और समाज के प्रति प्रासंगिक बना रहे और
एक सफल बिजनेस मॉडल भी. नौकरियों का गणित इसी समीकरण से तय होगा.
23.02.2009,
13.38 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | ira jha (irajha2@gmail.com) new delhi | | | | भई गे रे दद्दा. मंदी के बहाने से छंटनी तो चलही पर पत्रकार पॉलिटिक्स के बन आए है.अब्बड़ तनखा के नाम पर बड़े मीडिया में जो घल्लू घरा चलत हे, ओखर बारे में का बिचार हे ? मे हर परोन शनिचर के रोज प्रधानमंत्री तक से पूछ डालेंव कि ए जबरिया इस्तीफा आउर सउकर मन के बेलआउट पैकेज में सरकार का करथे, पर ओखर मेर कोई जवाब नईं रिहिस.मोर से चिट्ठी मांगिस हे. | | | | | |
| | mukesh chourase (mukeshchourase@yahoo.com) new delhi | | | | आपने बेहतर लिखा है. मगर आज की वैश्विक मंडी में मीडिया को जबरन घाटे में दिखाया जा रहा है. जबकि ऐसा है नहीं. | | | | | |
| | राजीव रंजन (yourrajeev2006@gmail.com) दिल्ली | | | | बढि़या विचारेत्तेजक लेख है। समस्या का सम्यक विश्लेषण है। जो इस समय को चुनौती के रूप में लेंगे, वे बचेंगे और जो लकीर पीटते रहेंगे, पीछे छूट जाएंगे। | | | | | |
| | udayprakash (udayprakash05@gmail.com) Vaishali, GHAZIABAD (U.P.) | | | | Is it right that the journalism as a profession, and journalist as a professional, joins a print or a tv media company just to allure and attract a target group of its readers and consumers, which can add to the revenue and profit of the company through advertising? If, for an example, a reporter assigned to cover rural agrarian sector, comes out with conclusions holding certain seed, pesticide, fertilizers selling companies hoodwink behind farmers suicides (more than 1,50,000 in just 10 years)do you think that those marked and singled out companies are benevolent enough to pump in their advertisements in those pages? Or, as in Bundelkhand area, where 69 farmers commit suicide in a year in consequence of buying tractors and finding themselves unable to repay the loan and unable to stop their means of survival getting auctioned by the Banks in lieu with tractor dealers and companies, can Escorts, Massy Fergussion, International, Eicher brands and ICCI, City Bank and others are liberal enough to give an award to the reporter and advertisements to the said news group? N.Vartika is possibly right. Recent global recession might have had, naturally, hit this fourth 'Estate' too, but channels and corporate newspapers have succeeded ingeniously retaining their profits etc. And for this, one can see, they have degraded the quality and content of their stuff. Finally, retrenchment of journalists is done not always on the only raison d'être of 'shrinking market' and 'downward profit margins'. Facts are contrary, in fact. | | | | | |
| | आशुतोष कुमार सिंह (z21002003@yahoo.co.in) नई दिल्ली | | | | बात पते की सच में है . यह तो होना ही था . जिस तरीके से यहां पर छटनी चल रही है यह स्वभाविक ही है . मुझे लगता है कि मीडिया में बढ रहे मीडियागिरी का ही यह परिणाम है . अच्छे मीडियाकर्मी को कब तक दूर रखा जा सकता है ? आशुतोष कुमार सिंह महुआ टीवी 91-9891798609 | | | | | |
| | sumit singh (sumitvirk@gmail.com) sirsa (haryana) | | | | आपने बहुत अच्छा लिखा है. मैं आपकी बातों से बिलकुल सहमत हूं. आप ने मीडिया स्कूलों के बारे में जो कुछ लिखा है, वो काफी हद तक सही है. मैं भी एमए मास कम्युनिकेशन का छात्र हूं. अगर आप मुझे कुछ औऱ सुझाव भेज सकें तो अच्छा लगेगा. | | | | | |
| | Archana (archanarsingh@gmail.com) Chandigarh | | | | So far, the market model of media had overpowered everything, but now, we might enter an era when only the best survives. Media has already grown in numbers, now the time is ripe for it to grow in quality. I am not talking about technological advancement, I am refering to the maturity of thoughts and ideas which was being overshadowed by the ever breaking news! As regards, media schools, since i belong to one, I would like to defend them. This is a place that prepares you for life in media. In order to train and teach our students, we have to be on our toes all the time and keep ourselves up to date. Quark Express has been cited as a symbol of the techno savvy youth that enters the media market. However, this youth also needs to have something to say. With the concept of news changing at such a fast rate, he has to not only learn to write and report but also to research and analyse. The challenges are many and the only way is to either augment or perish. Fortunately, over the years, media has learnt to augment! | | | | | |
| | Suresh Sinha (suresh.sinha@gmail.com) Delhi | | | | बहुत अच्छा लिखा है आपने.इस पर हम सब को नये तरीके से विचार करना चाहिए. | | | | | |
| | विशाल कुमार डोंगरे बैकुंठपुर, जिला- कोरिया, छत्तीसगढ़ | | | | बिजनेस स्टैंडर्ड में ही एक और खबर छपी है कि मंदी की वजह से जहां ज्यादातर घड़ी कंपनियों के लोकप्रिय ब्रांडों की बिक्री में गिरावट देखी जा रही है, वहीं प्रीमियम और लक्जरी सेंगमेंट की बिक्री में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसकी वजह से अंतरराष्ट्रीय आभूषण निर्माता और घड़ी निर्माता भारत की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
टाइटन का सस्ता, लेकिन लोकप्रिय ब्रांड सोनाटा की बिक्री दिसंबर 2008 की तिमाही में घटी है, वहीं कंपनी के महंगे और फास्टट्रैक ब्रांड की ब्रिकी में इजाफा हुआ है। इससे कंपनियों की मार्जिन में भी सुधार हुआ है।
यही वजह है कि टाइटन ने चालू वित्त वर्ष में 'हिलियस' नाम से पहला मल्टी ब्रांड शोरूम की शुरुआत बेंगलुरु में की। हिलियस के स्टोर में नामी-गिरामी 35 ब्रांडों को शामिल किया गया है, जिनमें फोसिल, इस्प्रिट, टॉमी हिलफिगर आदि शामिल हैं।
इन ब्रांडों की घड़ियों की कीमत 5,000 रुपये से लेकर 75,000 रुपये तक है। टाइटन के उपध्यक्ष और ग्लोबल बिानेस हेड अजय चावला का कहना है कि अगर यह स्टोर कंपनी की उम्मीदों पर खरा उतरता है, तो टाइटन अगले पांच सालों में इस तरह के करीब 50-75 स्टोर और खोलेगी।
घड़ी उद्योग करीब 2,500 करोड़ रुपये का है, जो 5 फीसदी सालाना की दर से विकास कर रहा है। जहां तक प्रीमियम और लक्जरी घड़ी बाजार की बात है, तो इसका कारोबार 300 से 500 करोड़ रुपये का है और यह 30-35 फीसदी की दर से विकास कर रहा है।
चावला का कहना है कि लक्जरी घड़ी का कारोबार अगले 6-7 सालों में बढ़कर 1,500-2,000 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है। | | | | | |
| | विशाल कुमार डोंगरे बैकुंठपुर, जिला- कोरिया, छत्तीसगढ़ | | | | बिजनेस स्टैंडर्ड में एक खबर छपी है कि मंदी के इस दौर में भी मुकेश अंबानी की अगुआई वाली रिलायंस रिटेल ने पिछले साल 485 नए स्टोर खोले. कंपनी के मुताबिक, नए स्टोरों के खुलने से कंपनी के कारोबारी क्षेत्रफल में 20 लाख वर्गफीट की बढ़ोतरी हुई.
इस तरह, रिटेल कंपनियों के विस्तार के मामले में रिलायंस रिटेल किशोर बियाणी के फ्यूचर समूह के बाद दूसरे नंबर पर रही. फ्यूचर समूह का रिटेल क्षेत्रफल इस बीच करीब 50 लाख वर्गफीट बढ़ा है.
दिसंबर 2007 में रिलायंस रिटेल के स्टोरों की संख्या 465 थी, जो दिसंबर 2008 में बढ़कर 950 हो गई. रिलायंस रिटेल के मुताबिक, पिछले एक साल में उसने 58 नए शहरों में दस्तक दी है.
आप अगर इसे मंदी कहते हैं तो फिर क्या कहना. खुदा पूरी दुनिया में ऐसी मंदू फैला दे. | | | | | |
| | P M Tiwari Kolkata | | | | As newsrooms restructure to adapt to the digital age, journalists are being hit hard by the world economic crisis. While experienced reporters are being laid off, journalists entering the profession face an ever-tightening job market.
Even the Associated Press, a safe haven for foreign correspondents, recently announced it is planning to cut 10 percent of its global staff over the next year because of low revenues and the decline of newsrooms, according to AP CEO Tom Curley. | | | | | |
| | sukant animesh Patna | | | | अजगर महाराज, यह आपको किसने कह दिया कि यह मंदी का दौर है. थोड़ा आंख खोल कर देखें- किस अखबार का प्रसार कम हो गया. किस चैनल पर विज्ञापन कम हो गये. आपको पता चलेगा कि यह तो मंदी के बहाने गाज गिरायी गई है और कुछ नहीं. | | | | | |
| | N. vartika New Delhi | | | | Not at all mr/miss ajagar !
Advertising grew at 22.1 per cent in India in 2007. MPA thinks this will slow down to 17.1 per cent this year, and 12.1 per cent in 2009. Profit margins of broadcast firms, it predicts, will drop. Agency Faqs meanwhile reports that broadcasters are contemplating reducing the carriage fees paid to cable operators for better placement of channels. It named E24, News24, INX Media, Sony Entertainment television and UTV among broadcasters which told Afaqs.com that they were reviewing what they paid out in this category. The website quoted "a company insider", to say that INX Media will implement a 40-60 per cent cut in the existing carriage fees.
All this is in addition to the woes caused by the film workers' strike, which has channels running reruns because no fresh episodes are being canned.
Company results for the second quarter for listed media companies are not cheery, NDTV reported a net loss of Rs 119 crore, HT Media's profits were down by 49 per cent. Sun TV Network, the highest valued TV company with a market cap of Rs 6234 crore reported a modest rise in profits. TV Today's profits were down from the last quarter.
TV news as well as entertainment companies are losing value sharply in the stock market, more so than print media companies, with the exception of Midday multimedia whose market cap was just Rs 69 crores. Sun TV Network was down to 162 today from a 52 week high of 442. TV Today was 62 against a 52 week high of 199, HT media touched its 52 week low today with 60, its 52 week high being 266. NDTV's stock was at 87 against a 52 week high of 511. In terms of market cap newspaper companies like HT Media and Jagran Prakashan had far stronger market valuation at 1417 crore and 1406 respectively, than NDTV at 513 crore, and TV Today at 334. The strong TV news company was IBN18Broadcast with a valuation of Rs 1324 crore. | | | | | |
| | Sujay (sujaykr@gmail.com) Gaya | | | | अजगर ने जो सवाल उठाये हैं, उससे लगता है कि अजगर ने हमेशा प्रबंधन की ओऱ से किये जाने वाले काम ही किये हैं, रिपोर्टिंग वगैरह से इनका साबका कम ही पड़ा है. जो लोग फिल्ड में काम करते हैं, उनसे पूछिये क्या होती है पत्रकारिता. सब लोग केवल करियर के लिये नहीं आते.अपनी जान लगा कर जो लोग काम करते हैं, उनकी बात भी करिये साहब. आप तो केबिन में बैठ कर पत्रकारिता करने वालों की बात कर रहे हैं. और ये टेबल पर बैठकर जुगाली करने वालों की नौकरी सुरक्षित है, उनका कुछ नहीं हुआ. जो गये, वे ऐसे लोग थे, जिन्होंने अपनी तलवे घिस दिये, बिना यह देखे कि उनके अपने घर का क्या हाल है. | | | | | |
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