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हम भी मंदी-मंदी खेलेंगे

बात पते की

 

हम भी मंदी-मंदी खेलेंगे

जिया कुरैशी

 

मंदी का असर है कि देश भर के विभिन्न संस्थानों, कंपनियों में कॉस्ट कटिंग यानी कटौती का अभियान चल पड़ा है मीडिया भी इससे नहीं बचा है. कारोबार से जुड़ी बड़ी कंपनियां हर तरीके से खर्चों में कमी के उपाय कर रही है इसमें कर्मियों की तनख्वाह भत्ते और अन्य सुविधाओं में कटौती के साथ-साथ नौकरी से निकाल देने जैसे तरीके शामिल हैं. इस पूरी प्रक्रिया का प्रभाव उपर से शुरू होकर क्रमशः नीचे की ओर जाता दिख रहा है, और यही वजह है कि क्षेत्रीय या कस्बाई पत्रकारिता भी इससे अछूती नहीं रह पाई है.

मीडिया में कथित मंदी


अगर हम अपने इलाके छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य की बात करें तो यहां भी कमोबेश ऐसे हालात बनते जा रहे है. प्रेस, मीडिया कर्मियों की जेब काटने की तैयारी प्रबंधन की ओर से की जा रही है. यही नहीं, कांट-छांट के दूसरे औजारों की धार तेज कर ली गई है. कुछ संस्थान तो कर्मियों की वेतन कटौती, परेशान करने की नियत से तबादले, इंक्रीमेंट पर रोक से लेकर बाहर का रास्ता दिखाने जैसे काम कर रहे हैं.

एकाध अखबारों में तो पीड़ित पत्रकार अदालत की शरण में जा चुके हैं और उन्होंने पूरी तरह संघर्ष का रास्ता अख्तियार कर लिया है. ऐसे में सवाल यह है कि क्या मंदी धीरे-धीरे बहुत से लोगों को अपना शिकार बना लेगी ? सवाल यह भी है कि क्या वाकई क्षेत्रीय स्तर के मीडिया संस्थानों पर मंदी का इतना ज्यादा असर पड़ रहा है कि वे अपने कर्मियों को निकाल बाहर करने पर मजबूर हो जाएं ? कहीं ऐसा तो नहीं है कि सबके सब ऐसे किसी समय की प्रतीक्षा में थे और अब मंदी की आड़ में, खर्च कटौती के नाम पर लोगों को जबरदस्ती निकाला जा रहा है ,उनको मिलने वाली तनख्वाह, सुविधाओं में कमी की जा रही है?

इन सवालों पर विचार से पहले यह देखना और समझना उचित होगा कि क्षेत्रीय पत्रकारिता से जुड़े लोग इस मंदी से पहले भी किन स्थितियों, किस तरह की सुविधाओं-असुविधाओं के बीच काम कर रहे थे, उन्हें ऐसा क्या और कितना मिलता था, जिससे अब उन्हें वंचित करने का उपक्रम किया जा रहा है.

आम तौर पर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अखबारों के स्थानीय संस्करणों में काम करने वाले संवाददाता, विशेष संवाददाता, उप संपादक और कई मामलों में तो संपादक स्तर पर भी नियुक्ति, सेवा शर्त और नौकरी से निकालने का कोई तय पैमाना ही नहीं है. ऐसे कर्मियों का वेतन भी संस्थान की अपनी आर्थिक क्षमता के आधार पर होता है. यह बात सीमित पूंजी वाले अखबारों के संदर्भ में साफ दिखती है.

ऐसे अखबार जो खुद को पहले और दूसरे नंबर पर दिखाने और प्रसार के बड़े-बड़े आंकड़े दावों सहित पेश करते हैं, वहां पत्रकारों को दैनिक मज़दूरों से भी कम तनख्वाह मिलती है. रायपुर, भोपाल और दिल्ली तक अपना संस्करण निकालने वाले कई अखबारों में आज भी पत्रकार 15 सौ रुपये की पगार पा रहे हैं. फिर काम करने के बेहिसाब घंटे तो नीम पर करेले की तरह ही हैं. दूसरों के शोषण के खिलाफ लिखने वाले पत्रकारों की इससे बुरी हालत नहीं हो सकती.

लाखों में अपनी प्रसार संख्या बताने वाले अखबारों में भी वेज बोर्ड की अनुशंसायें मालिकों ने ठेंगे पर रखी हैं. हालांकि बड़े कारोबारियों के यहां सिर्फ दिखावे के लिए कुछ गिने चुने लोगों को वेज बोर्ड के अनुरूप वेतन दिया जाता है बाकी ज्यादातर लोग उसी वेतन पर काम करते हैं, जो प्रबंधन उनके लिए तय करता है. ऐसी स्थिति में नौकरी के स्थायित्व का तो कोई सवाल नहीं होता. यह पूरी तरह प्रबंधन पर निर्भर होता है कि वे कब तक नौकरी में बने रह पाएंगे.

अलावा इसके ,अखबारों में जिला, ब्लॉक तहसील या गांव स्तर तक भी संवाददाता, एजेंट का नेटवर्क काम करता है. इनकी स्थिति और भी बदतर है. वेतन, पारिश्रमिक तय करने की व्यवस्था जैसी कोई चीज ही नहीं है. इन लोगों को महज विज्ञापनों की उगाही के लिए रखा जाता है और एजेंट केवल कमीशन पर निर्भर रहते हैं. अधिकांश मामलों में अखबार का संवाददाता ही अखबार का एजेंट भी होता है. ज़ाहिर है, विज्ञापन जुटाने का काम भी उसी के हिस्से का काम होता है.

अब देखने वाली बात है कि अखबारी संस्थान इन्हीं लोगों पर कटौती की तलवार किस तरह चला रहे हैं. छत्तीसगढ़ में कई अखबारों ने मंदी का रोना रोते हुए सबसे पहले पत्रकारों की सुविधाओं में कमी करनी शुरु की. पहले फोन कटे, फिर हर रोज मुफ्त मिलने वाला अखबार बंद कर दिया गया. फिर मिलने वाले दूसरे भत्ते खत्म कर दिये गये.

एक बड़े पत्र समूह ने मंदी की आड़ में सबसे पहले कर्मियों के इंक्रीमेंट में 5 प्रतिशत की कमी की घोषणा की. जब पत्रकारों ने इसका विरोध किया तो उनके तबादले कर दिये गये. पत्रकारों ने फिर अदालत की शरण ली और अदालत ने इन तबादलों पर रोक लगा दी. मामला अब उच्च न्यायालय में है. फिलहाल उस अखबार के पत्रकार अखबार के दफ्तर के बजाए अदालत और अपनी पैरवी के लिए वकीलों के चक्कर लगा रहे हैं.

क्षेत्रीय स्तर पर की जा रही कांट-छांट और कटौती को लेकर माना जा रहा है कि स्थानीय स्तर पर ये जो तरीके प्रबंधन अपना रहा है, असल में वह उन बड़े कारोबारियों, का अनुसरण लगता है, जिनकी बड़ी कंपनियां हैं, बड़े नाम हैं और साथ ही शेयर बाजार में जिनकी पूंजी लगी है.

शेयर बाजार के धराशायी होने के साथ ही जिन मीडिया कंपनियों की पूंजी सीमित रह गई है, उनकी परेशानी नजर अंदाज नहीं की जा सकती. इस संक्रमण से पहले तक वे अपने कर्मियों को बेहतर वेतन, भत्ते व अन्य सुविधाओं के साथ सुरक्षा का माहौल भी दे रहे थे, अब अगर मंदी की मार में ,इन्होंने कटौती का रास्ता अपनाया है, तो इसे एकबारगी नाजायज नहीं ठहराया जा सकता.

आसन्न लोकसभा चुनाव को लेकर भी अखबार और स्थानीय चैनल अभी से योजनायें बना रहे हैं. सरकार भी चुनाव को देखते हुए अखबारों और दूसरे मीडिया संस्थानों पर अतिरिक्त उदारता बरत रही है.


लेकिन इसके ठीक उलट क्षेत्रीय पत्रकारिता में जहां वेतन भत्ते और सुविधाओं का कोई मापदण्ड नहीं है, नौकरी की असुरक्षा समेत दूसरे खतरे भी हैं, वहां मिलने वाली रकम की कटौती करना या उन्हें नौकरी से बाहर करने की बात समझ में नहीं आती. ऐसे अधिसंख्य संस्थानों का शेयर बाजार से कोई लेना देना नहीं है. न ही उनकी पूंजी उसमें फंसी, न घाटा उठाना पड़ा है, फिर भी कटौती क्यों?

प्रबंधन की ओर से यह कहा जाना कि मंदी के कारण राजस्व में कमी आई है, यह बात भी पूरी तरह गलत नहीं है. इस बारे में विज्ञापन एजेंसियों से बात करने पर पता लगता है कि निजी क्षेत्र के विज्ञापनों में कमी आई है, उसका दायरा 15 से 20 प्रतिशत तक हो सकता है.लेकिन ज्यादातर अखबार सरकारी विज्ञापनों पर भी निर्भर हैं और उनमें कोई कमी नहीं आई है. हालत ये है कि हिंदी प्रदेशों में विधानसभा चुनाव में अखबारों और स्थानीय चैनलों ने दोनों हाथ से विज्ञापन बटोरे हैं और साल भर की कमी पूरी कर ली है. आसन्न लोकसभा चुनाव को लेकर भी अखबार और स्थानीय चैनल अभी से योजनायें बना रहे हैं. सरकार भी चुनाव को देखते हुए अखबारों और दूसरे मीडिया संस्थानों पर अतिरिक्त उदारता बरत रही है.

ऐसे में यह कटौती का दौर उन लोगों के लिए मुश्किल भरा है जो क्षेत्रीय पत्रकारिता से जुड़कर अपनी रोजी रोटी चला रहे हैं. जिन्हें पहले ही उंट के मुंह में जीरे जैसी रकम मिल रही थी, अब मीडिया का धंधा करने वाले चाहते हैं कि ये उंट अब जीरे को भी भूल जायें. स्थानीय अखबारों और चैनलों में काम करने वालों के लिए शायद यह अब तक का सबसे कठिन दौर है, जहां उनकी जेब भी कट ही रही है और गरदन पर तलवार भी लटक रही है.

 

27.02.2009, 13.48 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

praveen pathak (praveen.pathak1980@gmail.com) raipur

 
 जिया भाई, आपने जिन वास्तविकताओं को रेखांकित किया है.. वास्तव में वे सही है... मगर कहीं आपके इस लेख से पत्रकारिता की शुरुआत करने वाले नवयुवको का मनोबल तो नहीं टूट रहा। 
   
 

omprakash jaiswal (romprakash.2008@gmail.com) New Delhi

 
 This is really a good article, but i want to say, everyone should have capacity to handle this type of problem. because up and down is also a part of our life. that is why feel comfortable absence of money. and if someone want, they can join other job like teaching, i mean join coaching and home tuition etc. for coaching, home tuition etc, anybody can talk to me by mail. speacially, who stay in Delhi. 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 सट्टा और शराब भट्टी पुलिस इत्यादि जगहो से इन पत्रकारो को महीना भी आता है और इनके लिये कोई मंदी नही है. खबर छापने और ना छापने के ब्लैकमेलिंग के पीछे भी पत्रकार पैसा बनाते है इसलिये पत्रकार अब ज्यादा विश्वनीय नही रहे !!

चाहे अखबार का मालिक हो या अखबार में काम करने वाला पत्रकार दोनो को पैसा बनाना है चाहे ऐसे या वैसे ॥

वैसे क्या पत्रकारिता सिर्फ़ पैसे के लिये की जाती है ?
 
   
 

Ramesh reddy Noida

 
 Communication technologies have played a pivotal role in creating an information-rich society. But in the rat race for information, knowledge and wisdom have become scarce, bringing to mind George Eliot’s words: Where is the life we have lost in living? Where is the knowledge we have lost in information? Where is the wisdom we have lost in knowledge? Communication technologies can be considered a true success only when they contribute to more love, affection, bonding and peace in the world. Or else we would be forced to admit that a digital home is a poor substitute for love and care. As communication technologies move ahead in leaps and bounds man becomes more and more dependent on these equipments. 
   
 

Srikant Paliwal New Delhi

 
 Times are changing. The old style newspaper which was read by the entire family, from grandpa down to grandson seems passé. We have entered into a Brave New World with segments adhering to different standards and different needs and a media only too willing to meet them. And, one might as well ask, why shouldn’t the media do so? Business is business.

 
   
 

Mukesh Kumar tiwari Gorakhpur, U.P.

 
 क्षेत्रीय पत्रकारिता में आज भय का माहौल है. लेकिन सबसे बड़ा संकट अपनी अस्मिता का है. जिया भाई, आपको यह सवाल भी उठाना चाहिए था कि आखिर हिंदी का पिछलग्गू बन कर हमें क्या मिला.क्षेत्रीय अखबार अंग्रेजी की नकल कर रहे हैं. हिंदी के अखबार हैं और भाषाई दरिद्रता ऐसी कि उसके पन्नों के नाम अंग्रेजी में रखे जा रहे हैं. कल तक हिंदी और अंग्रेजी के अखबारों के मुद्दे और सरोकार अलग-अलग थे, अब दोनों ही पूंजीपतियों की दलाली में लगे हुए हैं. 
   
 

Sanjoy ghosh London

 
 This is the real face of journalism. A recent study in the state of Victoria, Australia, by a senior journalist found that many journalists feel stressed and frustrated because of their continuous struggle to meet the needs of their employers, and yet not being appreciated for the contribution they make to their employers' bottom-line.

"Newspapers are going through a transitional phase and it is not clear, for instance, what this product or this office will look like in five or 10 years' time. There are fewer members of staff, fewer resources and the paper itself is shrinking," according to one of the 100 journalists surveyed between mid-2007 and early 2008.

The survey found that an average journalist in Victoria is in his/her 30s, with around 40 per cent of them being women, and about 66 per cent with a university degree.
 
   
 

Neelmani Sahu (sahu.neelmani@gmail.com) Jagdalpur

 
 आपने जिस समस्या का रेखांकन किया है, वह गंभीर एवं समसामायिक है, वास्तव में इसके निराकरण के लिए ठोस उपाय किए जाने की जरूरत है. इस दिशा में पत्रकारिता से संबंधित संघों को ठोस कायदा कानून बनाते हुए पहल करनी चाहिए.  
   

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