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कृषि क्रांति बनाम कृषि भ्रांति

बात पते की

 

कृषि क्रांति बनाम कृषि भ्रांति

देविंदर शर्मा

 

ऊपरी तौर पर यह प्रतीत हो सकता है कि दुनिया भर के कृषि वैज्ञानिक अपने तौर-तरीकों में बदलाव ला रहे हैं. प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए वे किसानों से सीख ले रहे हैं ताकि कार्यक्षमता, पैसा और पर्यावरण बचाया जा सके. लगा कि 2008 के पूर्वा‌र्द्ध में अभूतपूर्व वैश्विक खाद्यान्न संकट और भारत में अब भी जारी कृषि संकट सोच में इस परिवर्तन का कारक बना.

कृषि क्रांति बनाम कृषि भ्रांति


लेकिन मुझे यह स्वीकार करने में अधिक समय नहीं लगा कि मैं गलत था. भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने कृषि संकट से कोई सीख नहीं ली. न ही वे टिकाऊ कृषि के मूल संकट से निपटने में गंभीर हैं. सही शब्दावली का इस्तेमाल किया जाए तो उन्होंने अब नया शिगूफा छेड़ा है, जिसे 'कृषि संरक्षण' कहा जा रहा है. यह इतना उपयुक्त और समीचीन लगा था कि यह कहे बिना नहीं रहा गया कि देर से अंधेर भली, किंतु ऐसा है नहीं.

कृषि संरक्षण से आशय है 'टिकाऊ कृषि' को सघन बनाना. गहन खेती को दीर्घकालीन कहना हैरानी की बात है. ऐसे में अगर वे 'दीर्घकालिक कीटनाशक प्रयोग' के नाम पर रासायनिक कीटनाशकों को प्रोत्साहन देना शुरू कर दें तो हैरानी नहीं होगी. गहन कृषि में सुधार के लिए नई मशीनों से कोई लाभ नहीं होगा.

वापस लौटें तो क्या महान कृषि क्रांति से आशय गहन कृषि से नहीं था? क्या इसका उद्देश्य फसल संवृद्धि यानी प्रति इकाई उत्पादकता में वृद्धि करना नहीं था? इसलिए संरक्षित कृषि और हरित कृषि क्रांति में फर्क ही क्या है?

संरक्षित कृषि से आशय है जुताई से छुटकारा. यह अवधारणा न्यूनतम मिट्टी ह्रास, जैव अवशिष्ट कायम रखना और फसल विविधीकरण पर आधारित है. इसका विचार है कि जुताई न करने या न्यूनतम जुताई से मिट्टी खराब नहीं होगी और इस प्रकार प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण हो पाएगा. एक ऐसे देश में जहां केंचुए मिट्टी का अभिन्न अंग हैं, मैं सोचता था कि वे प्रकृति के खेतिहर हैं. भास्कर सावे बताते हैं कि छोटे से जीवनचक्र में केंचुआ छह टन मिट्टी भुरभुरी कर देता है. तो फिर, भारतीय परिप्रेक्ष्य में जुताई रहित कृषि एक अजनबी शब्द नहीं लगता.

जुताई से छुटकारे के अपने उद्योग हैं. कृषि वैज्ञानिकों का प्राथमिक हित ये उद्योग ही हैं. नई संरक्षण प्रौद्योगिकियों में शामिल है लेजर विधि से भूमि समतल करना. फिलहाल यह लेजर मशीन आयात की जा रही है, किंतु इसके कुछ कलपुर्जे भारत में भी बनाए जाने लगे हैं. जुताई रहित प्लांट, जमीन की खुदाई के बिना ही बीज बोने वाले सीडर्स व टर्बो सीडर्स, मिट्टी तैयार करने वाले डिस्क ड्रिल और कीटनाशकों के इस्तेमाल के लिए विभिन्न प्रकार के उपकरण भी किसानों का इंतजार कर रहे हैं.

जब तक आप इनके बहुआयामी परिचालन को समझ पाएंगे, आपके सामने डेढ़ सौ से अधिक उपकरण पेश कर दिए जाएंगे. यह समझ से परे है कि कृषि वैज्ञानिक महंगे उपकरणों और रसायनों से आगे क्यों नहीं सोच पाते हैं? वे अपने घर में क्यों नहीं झांकते और उन प्रौद्योगिकी पर भरोसा क्यों नहीं करते हैं जो बरसों के अनुभव से निखरी हैं?

इसका जवाब यह है कि वे वास्तव में किसानों के लिए कार्य नहीं कर रहे हैं. किसान तो बस दुर्घटनावश मशीनों, रसायनों, हाईब्रिड अथवा जीएम बीजों के प्रमोशन के बीच में आ जाते हैं. अगर कृषि वैज्ञानिक धैर्य से किसानों की सुनें और उनके अनुसार अपनी संरक्षित कृषि व्यवस्था में सुधार करें तो भारत की कृषि हमेशा मुस्कराती रहेगी. साथ ही प्राकृतिक संसाधन आधार भी सुरक्षित और संरक्षित रहेगा.

हमें ऐसी कृषि की जरूरत नहीं है जो बाहरी निवेश पर निर्भर हो. हमें ऐसी खेती नहीं चाहिए जो मिट्टी की उर्वरता व खनिजों को नष्ट करे और भूमिगत जल व पर्यावरण को प्रदूषित करे. हमें ऐसी कृषि नहीं चाहिए जिसमें किसान भिखारी बन जाएं और सेवा प्रदाता चांदी कूटें. हमें ऐसी संरक्षित कृषि व्यवस्था चाहिए जिसमें कम लागत आए और पैसा किसानों की जेब में जाए. हमें ऐसी खेती चाहिए जिसमें किसान खेती छोड़ने की न सोचें.

कुछ ही सप्ताह में सरकार द्वारा टिकाऊ कृषि का राष्ट्रीय अभियान शुरू करने की उम्मीद है. 83 हजार करोड़ रुपये की यह परियोजना देश के सौ जिलों में शुरू की जाएगी. इसके दस्तावेजों को ध्यान से पढ़ने पर पता चलता है कि इसमें पुराना राग ही अलापा गया है. इसमें संरक्षित कृषि के नाम पर नई प्रौद्योगिकी और मशीनें पेश करने की तैयारी है.


यह एक यथार्थ है कि देश में 60 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि सूखे की मार झेल रही है. इससे निपटने के लिए वही घिसे-पिटे तौर-तरीके अपनाए जा रहे हैं जो विफल हो चुके हैं. सूखे इलाकों में कृषि के लिए 54 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं. इसमें जोर जटिल प्रौद्योगिकी अपनाने और जीएम बीजों के इस्तेमाल पर दिया गया है. दूसरे शब्दों में, टिकाऊ कृषि का राष्ट्रीय अभियान बड़े पैमाने पर जीएम फसलों और रासायनिक खादों के इस्तेमाल की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए शुरू किया जा रहा है.

 

ऐसे समय जब दुनिया भर में यह सोच विकसित हो रही है कि रासायनिक खेती ने मिट्टी की सेहत बिगाड़कर रख दी है और कृषि को विनाश के कगार पर पहुंचा दिया है, यह समझ से परे है कि भारत के योजनाकार एक दोषपूर्ण प्रौद्योगिकी से भारतीय कृषि का पुनरुद्धार करने की आशा कैसे पाल रहे हैं?

जिस उपसमिति ने इस दीर्घकालीन कृषि अभियान का मसौदा तैयार किया है उसमें ऐसे लोगों की भरमार है जो उस तंत्र का हिस्सा थे, जिसने हरित क्रांति के पिछले 40 सालों के दौरान कृषि को पूरी तरह अस्थिर करने का काम किया है. 11वीं योजना के कृषि संबंधी दस्तावेज भी उन विशेषज्ञों द्वारा तैयार किए गए हैं, जो वर्तमान कृषि संकट के जिम्मेदार हैं. ऐसे लोगों से सही समाधान की उम्मीद कैसे की जा सकती है? अगर वे इतने ही अच्छे होते तो भारत को गंभीर कृषि संकट देखना नहीं पड़ता.

हमें जिस चीज की फौरी जरूरत है वह है नजरिए में बदलाव लाना और किसानों व गैर-सरकारी संगठनों की बात पर ध्यान देना, जो कृषि के पुनरुद्धार के लिए जीजान से जुटे हैं. टिकाऊ कृषि का राष्ट्रीय अभियान तो संकट को और गहराएगा.

 

27.02.2009, 13.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ramji mishra (ramjimishra53@rediffmail.com) gonda

 
 THIS IS A GOOD ARTICLE, GOVT DEPTT DO NOT WANT PROMOTE AGRICULTURAL. 
   
 

jugnu shardeya (jshardeya@gmail.com) tala,umaria,madhyapradesh

 
 देवेंद्र शर्मा जी की बात सही है. कृषि वैज्ञानिक को सबकी समझ है, सिवा कृषि के. पर हमारे देश में ‘लालच बुरी बला है ’ एक कहावत भर ही है. किसान भी अपनी लालच का मारा है और सरकार के लिए खेती और किसान सिर्फ किताब की बात है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है. किसान भी तो रासायनिक खाद का दिवाना है, जबकि पिछले दिनों रासायनिक खाद वालों ने कहा कि भारत की ज़मीन उपजाउ नहीं रहेगी- मतलब उपजाउ जमीन चाहते हो तो और खाद डालो. जय हो ! 
   

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