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हम इंतजार ही तो कर रहे हैं...

मुद्दा

 

हम इंतजार ही तो कर रहे हैं...

अभिषेक, पटना से

 

'जवाब', पटना के कार्यकर्ता सूचना के अधिकार के मुद्दे को लेकर गांवों में कार्यशाला करते हैं. यह रिपोर्ट उसी कार्यशाला की एक झलक है.

 

सरकारी योजनाएँ जिस तरह का कागजी सफ़र करती हैं, जहानाबाद का क्षेत्र भी उससे अछूता नहीं है. बल्कि उग्रवाद और आर्थिक पिछ्ड़ेपन का दंश झेल रहा यह जिला प्रशासनिक तंत्र के विफल होने के कारणों की सबसे अच्छी तस्वीर हमारे सामने रख देता है.

जहानाबाद के बच्चे


जहानाबाद जिले में काको प्रखंड एक सामान्य नमूना है जिससे हम बिहार के इस अतिपिछ्ड़े जिले के ग्रामीण जीवन स्तर की एक आम धारणा बना सकते हैं. जातिगत राजनीति और आम जनजीवन के हर स्तर पर राजनीति का एक आम प्रभाव इस क्षेत्र की विशिष्ट शैली है.

काको के नोनही, अमथुआ, बढ़ौना, दौलतपुर और तिताईबिगहा गाँवों का जब सूचना के अधिकार के माध्यम से विकास पर नागरिक हस्तक्षेप के लिये चयन हुआ तो हमें लगा कि ये गाँव पारदर्शिता की माँग और नागरिक हस्तक्षेप से विकास का एक नमूना दे सकेंगे, और जब हमने इन गाँवों का पहला दौरा किया तो हमें इन गाँवों में अज्ञान, ठगी और टूटे हुए भरोसों के नायाब नमूने मिले. ये नमूने हमारी आँख खोल रहे थे और हमसे इस सारी कवायद के बारे में बस यही संदेश दुहरा रहे थे कि राही कहाँ ठिकाना, अंधेर है जमाना- मुश्किल है दूर जाना…

नोनही कार्यशाला: मुखिया भरत प्रसाद जी से बातचीत, अभिवादन और औपचारिक बातचीत के बाद विकास के कार्यक्रमों पर नजर, चेहरे पर परेशानी लेकिन आवाज में सहयोग और स्वीकृति का पुट.

नोनही के 1988 वाले दंगे में गई 17 जानें और और फ़िर आश्रितों को दिए गए इन्दिरा आवासों की बदहाली का बयान. टूटती हुई छतें, ढ़हती दरार पड़ी दीवारें, शायद हमारे आने की खबर से मुस्तैद स्कूल की अध्यापिका और बगल में ही नए बने उपस्वास्थ्य केन्द्र में बगैर कुर्सियों के खडी ए एन एम कार्यकर्ता कुमारी ममता, यानि कुल मिलाकर यह गाँव अपना सबसे अच्छा चिथड़ा पहने हमें अपना परिचय दे रहा था.

यहाँ के सकल विद्यालय को लेकर कोर्ट में मामला चल रहा है और अधबनी इमारत बच्चों की जगह अदालत के फ़ैसलों का इंतजार कर रही है. लोगों ने बताया कि उपस्वास्थ्य केन्द्र में कोई व्यवस्था नहीं है. कार्यकर्ता सप्ताह में दो दिन आती है. पोलियो के टीके के अलावा किसी ग्रामीण का किसी और सुविधा से परिचय नहीं है. मुखिया जी ने एक कुर्सी का इन्तजाम और आगे केन्द्र के फंड से खरीद की सलाह देकर हमारी तरफ़ देखा.

सनोज कुमार ने 3 माह तक रोजगार गारंटी के तहत काम किया है और उसे अबतक पूरे पैसे नहीं मिले हैं. आँगनबाड़ी केन्द्र यहाँ नोनही गढ़ टोले में स्वीकृत है और उसे ज्ञानी बिगहा टोले में सेविका पुष्पा कुमारी और सहायिका सविता कुमारी की देखरेख में चलाया जा रहा है. आगे यह एक प्राथमिक विद्यालय का निर्माणाधीन भवन है, बच्चे अभी अभी मध्याह्न भोजन कर के निकले हैं और एक कमरे में बना चूल्हा नया लग रहा है साथ ही गोबर से लीपे उस कमरे में चार गायों के खूँटे गड़े हैं, स्कूल के उपयोग का अंदाजा हमारी बुद्धि पर है.

गांव की उपमुखिया का मानना है कि सारी जाँच और मेहनत के बाद भी नतीजा सिफ़र ही रहता है. लोगों की अपेक्षाएँ पूरी ही नहीं की जा सकतीं.


यहाँ पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा है ,प्रभारी प्रबंधक मनोज कुमार के पास आँकड़े हैं- 37लाख के लगभग की कर्ज माफ़ी, 160 किसान क्रेडिट कार्ड , जिनमें से 150 को राशि बढ़ा कर कार्ड तथा 50 नए कार्ड भी, फ़िर ट्रैक्टर के लिए कर्ज के चार पाँच आवेदनों को नवम्बर तक निपटाने की बात और तब आते हैं गाँववालों की दबी जुबान से दूसरे आँकड़े- हर प्रकार के कर्ज पर 12 प्रतिशत की घूस और कुछ खास अनुदान वाली योजनाओं पर यह कमीशन 30 प्रतिशत तक है, यानि यह जमीन पर योजनाओं के ना आने देने की पूरी व्यवस्था है.

अविश्वास होता है और फ़िर इन शिकायतों पर विश्वास भी जब लोगों की आँखें दिखती हैं- मजबूरी और बेकारी में कर्ज जोहती आँखें. गाँव वालों की शिकायतों का पुलिंदा हमारे सामने और हम कुल पाँच लोग उन सारी शिकायतों में लोकतंत्र की तबाही का मजर देख रहे हैं. लोगों को सूचना का अधिकार आकर्षित कर रहा है पर वे उपयोग के मसले पर थोड़े आशंकित हैं, शायद आतंकित भी.

अमथुआ कार्यशाला: उपमुखिया चिंता देवी और उनके पति भूषण जी से बातचीत हुई है. वह कहते हैं कि सारी जाँच और मेहनत के बाद भी नतीजा सिफ़र ही रहता है. लोगों की अपेक्षाएँ पूरी ही नहीं की जा सकतीं. हर सम्भव स्तर से मदद का वायदा है.

गौतम ठाकुर का घर गिरा हुआ है आय का कोई जरिया नहीं और गरीबी की सूची में 13 अंक पाकर वह अपनी अमीरी का सबूत खोज रहे हैं. पास ही धनमन्तिया देवी खड़ी हैं लालदेव महतो की माँ- उनके परिवार का नाम वोटर लिस्ट में तो है पर वे एपीएल और बीपीएल दोनों से बाहर हैं. कल जब हम यहाँ थे तो किसी को हमारे आने की खबर नहीं थी और किसी ने कल तक मिड डे मील नहीं खाया था पर आज उन्हें हमारे आने की खबर है और बच्चों ने आज पहली बार उर्दू स्कूल और प्राथमिक विद्यालय में खाना बनते देखा है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sumit Kumar Singh (invincibleidea@gmail.com) New Delhi

 
 Nice story. It's happening across the nation but it's goes unreported. Good keep it up boss. Great job 
   
 

anish ankur () patna

 
 अभिषेक ने काफी तफसिल में जा कर अच्छी रिपोर्ट की है. आजकल ऐसी रिपोर्ट देखने को नहीं मिलती.आप आगे भी इसी तरह की रिपोर्ट प्रकाशित करते रहें. 
   

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