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जरा खुल कर जय हो

बात पते की

 

जरा खुल कर जय हो

विनोद खेतान

 

हम उत्सवधर्मा हैं, पर हमें खुशी मनाने में मुश्किल होती है. खुशी के पलों में अचानक हम पहले गंभीर हो जाते है, फिर आलोचक और फिर थोड़े उदास, थोड़े कुंठित. हम सोचने लगते हैं कि हम बेवजह खुश हो रहे हैं, जबकि कायदे से तो यह गंभीर विमर्श का मौका है. सोचते-सोचते फिर हमारा मन बोझिल हो जाता है और हम गहरी उदासी में उतरने लगते हैं.

हमारे साथ कुछ ऐसा ही हुआ हाल में. हमें ऑस्कर मिल गया. अंग्रेजी के एक हिंदुस्तानी लेखक और राजनयिक विकास स्वरूप ने एक उपन्यास लिखा. किसी अंग्रेज निदेशक को उसका कथानक जमा. एक पटकथा लिखी गयी. फिर एक जटिल फिल्म बनी, जिसमें गंदगी और गरीबी के माहौल में भी एक फंतासी रची गयी. कहानी के एक मोड़ पर भाग्य के पट खुले और एक नाकुछ करोड़पति बन गया.

स्लमडॉग मिलेनेयर


उस पर शक भी किया गया-मानो जो गरीब और वंचित है वह ज्ञान के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता. कुछ ऐसे सरलीकरण और कुछ अद्भुत फिल्मीकरण, कुछ फार्मूले और कुछ नए अंदाज -इन सबको एक फिल्म का स्वरूप मिला. इसमें कोई एक बंबइया अनिल कपूर तथा लंदन में होने के बावजूद एक औसत स्कूल विटमोर हैरो का एक साधारण युवक देव पटेल आमने सामने बैठ कर "कौन बनेगा करोड़पति" खेलने लगे. इन दोनों में से कोई भी अभिनय की दुनिया के दिलीप कुमार नहीं है.

जैसा कि सब जानते हैं, फिल्म वैसे भी एक संश्लिष्ट, दुरूह एवं बहुविधात्मक कला माध्यम है- उसमें तकनीक भी है और कला भी, ग्लैमर भी है और संवेदना भी, चाक्षुष भी है और श्रव्य भी, शब्द भी हैं और सुर भी, और अभिनय तो है ही. अब 'स्लमडॉग मिलियनेयर' में भी यह सब ब्रिटिश और भारतीय कलाकारों तथा कामकारों के संयुक्त संयोजन में हुआ है. रेसूल पुकुट्टी का स्वर संयोजन तकनीक और कला का एक उत्कृष्ट बिंदु है, वरना अनुराग कश्यप की आधुनिक फिल्म 'नो स्मोकिंग' में अर्थमय गानों और प्रभावी संगीत होने के बावजूद साउंड ट्रैक में कुछ रुखड़ा-सा फंसा-फंसा- सा लगता है.

वहाँ भी गुलजार ने कई अनोखे प्रयोग किए थे- "लंबे धागे धुएँ के, साँस सिलने लगे हैं, प्यास उधड़ी हुई है, ओठ छिलने लगे हैं" या फिर ऐश-ट्रे में "बहुत से आधे बुझे हुए दिन पड़े हैं इसमें, बहुत सी आधी जली हुई रातें गिर पड़ी है." और भी जैसे " धुआँ लिपटता है बाजीगर की तरह हवा से, वो बल पे बल खा के उठ रहा है, तमाम करतब दिखा रहा है, ये ऐश-ट्रे भरती जा रही है." इतने खूबसूरत कविता-तत्व फिल्म की सफलता-असफलता के धुएँ में धुंधले हो गए और उन गीतों का वह असर न हो सका, जो होना चाहिए था.

स्लमडॉग में इन्हीं गुलजार ने " रत्ती-रत्ती सच्ची मैंने जान गंवाई है, नच-नच कोयलों पे रात बिताई है, अखियों की नींद मैंने फंकों से उड़ा दी, गिन-गिन तारे मैंने उँगली जलाई है" जैसे बिम्ब जरीवाले नीले आसमान के तले बिखेरे हैं और पूरी दुनिया में इसका जादू सर चढ़ कर बोल रहा है.

यह कोई नहीं कहता कि "स्लमडॉग" गुलजार का सर्वश्रेष्ठ है, पर यह भी उनकी रचनात्मक का एक ऐसा योगदान है जिसने रहमान के संगीत में हिंदुस्तानी लफ्ज दिए. जिसकी वजह से एकेडमी अवार्ड के मंच पे सबने एक स्वर में कहा- जय हो! रहमान के सरगम की उमगती चढ़ाई पर गुलजार की कविता ने कुछ ठोस पड़ाव दिए और इस अदभुत समां को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर उद्घोष मिला-जय हो! हमारे मंदिरों, चौपालों, गोष्ठियों से उठ कर एक रोजमर्रा की अभिव्यक्ति गूँज उठी- जय हो!

तो मुद्दा यह नहीं कि 'लगान', 'ब्लैक' या 'तारे जमीं पर' को ऑस्कर क्यों नहीं मिला? मिलना चाहिए था. यदि 'लगान' को मिल जाता तो भाई लोग उसमें भी गुगली फेंकते कि कबड्डी और गुल्ली-डंडा खेलने वालों के बीच क्रिकेट का बुखार फैले, इसलिए 'लगान' को ऑस्कर मिला. न मिलने पर कहने वाले कहते कि अमेरिका का ऑस्कर बेसबॉल या फुटबॉल पर आधारित कहानी पर मिल सकता था, क्रिकेट तो वहाँ का पॉपुलर खेल है नहीं. ' ब्लैक' या 'तारे जमीं पर' भी उम्मीद की लौ जलाने वाली फिल्मे हैं, फिर क्यों स्लमडॉग की उम्मीद को ही ऑस्कर से नवाजा गया?

मुद्दा इन सवालों का नहीं हैं, दरअसल मुद्दा यह है कि ऑस्कर मिलने पर हम खुशी क्यों न मनाएँ? पप्पू के पास होने पर चाकलेट खाएँ या लड्डू, कुछ मीठा तो होना चाहिए न. हो सकता है कि इसे ऑस्कर नहीं मिलता तो फिर भी हम रहमान के सुर में सुर मिलाकर ’जय हो’ तो गाते ही, क्योंकि यह खूबसूरत रचना बन पड़ी है. या फिर जैसा मैंने शुरुआत में कहा कि हम उदास हो कर एक बोझिल विमर्श करने लगते कि फिल्मों में किस थीम पर लिखा जाना चाहिए और किस पर नहीं.

जिस तरह पपुलर होना हमेशा श्रेष्ठ होने का पर्याय नहीं, उसी तरह सिर्फ गंभीर होना हमेशा रचनात्मकता का पर्याय भी नहीं. फिर सिनेमा जैसे माध्यम में कौन चाहेगा कि वह पपुलर और सफल न हो.


दरअसल फिल्में बनाते समय कोई इतना दूरदर्शी नहीं हो पाता होगा कि वह ऑस्कर की जीत को दिमाग में रख कर फिल्म बनाए. फिल्म बनने के बाद जरूर अपेक्षित श्रेणी में नामांकन की कोशिश होती होगी और जीतने की ख्वाहिश. 'स्लमडॉग' को ऑस्कर मिला तो क्यों मिला, और भी बेहतर फिल्में बनती हैं? न मिला तो क्यों न मिला, इतनी अच्छी फिल्म थी- यह रोना निदा फाजली के खयाल को पुख्ता करना है-" दुनिया जिसे कहते हैं, जादू का खिलौना है, मिल जाए तो मिट्टी है, खो जाए तो सोना है." तो दोस्तो, हर वक्त का रोना भी बेकार का रोना है.

यह मौका पॉपुलर बनाम गंभीर के विवाद का भी नहीं. जिस तरह पॉपुलर होना हमेशा श्रेष्ठ होने का पर्याय नहीं, उसी तरह सिर्फ गंभीर होना हमेशा रचनात्मकता का पर्याय भी नहीं. फिर सिनेमा जैसे माध्यम में कौन चाहेगा कि वह पॉपुलर और सफल न हो. वैसे भी रहमान 'रोजा' के जमाने से और गुलजार 'बंदिनी' या 'काबुलीवाला' के जमाने से जो कुछ लगातार रच रहे हैं, वह सिर्फ पॉपुलर होना नहीं है. पुकुट्टी ने भी जो ध्वनि संयोजन किया है, वह जाहिर है कि पूना इंस्टीट्यूट के दिनों से उनकी सतत साधना का ही परिणाम है.

यह अलबत्ता संयोग है कि एकेडमी अवार्ड के मापदंडों पर बनी और अमेरिका में प्रदर्शित एक अंग्रेजी फिल्म में होने की वजह से इन सबको ऑस्कर मिला, वरना हिंदुस्तानी संदर्भ में सब मानेंगे कि रहमान या गुलजार की पहचान पुरस्कारों की मोहताज नहीं.

तो आइए, जो हुआ उसका जश्न मनाएँ और जो होना चाहिए उसके लिए आगे कोशिश करें. किसने रोका है इससे बेहतर लिखने से, इससे बेहतर संगीत की रचना करने से, और इससे बेहतर फिल्म बनाने से. न तो ऑस्कर का यह आखिरी साल है, न ही ऑस्कर इकलौता सम्मान है और न ही जिंदा शामियाने के तले लफ्जों, धुनों, इंसानी हुनर और दानिशमंदी की महफिल अभी खत्म हुई है.

फिलहाल दबे मन से नहीं, सुखविंदर की तरह खुले गले से रहमान, गुलजार, रेसूल पुकुट्टी, लवलीन टंडन, राज आचार्य, रूबीना, इस्माइल, आयुष, तनय, तन्वी, इरफान खान, अनिल कपूर तथा डेनी ब्वायल के लिए कोरस में बोलने का वक्त है- जय हो!

 

04.03.2009, 23.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

rajneesh mangla (rajneesh.mangla@gmail.com) germany

 
 फ़िल्म तो बहुत अच्छी बनी है। आपने लिखा भी बहुत अच्छा है। अगर इस फ़िल्म से हमें भारतीय समाज से इन बुराईयों को हटाने में कुछ मदद और प्रोत्साहन मिलता है तो फ़िल्म की प्रशंसा की जानी चाहिए। 
   
 

jagat mohan (jagatmohan@gmail.com) delhi

 
 खेतान साहब ऑस्कर के आने का दुख नहीं है. जिन तीन बंधुओं को इससे नवाज़ा गया है उनकी श्रेष्ठता में कोई कमी नहीं है, विश्व के किसी भी योग्य व्यक्ति से इनकी तुलना कर सकते है. चर्चा फिल्म के विषय की है, जिसने भारत की छवि को धूमिल किया है. हम ये कह सकते हैं कि जो समाज में घट रहा है वही दिखलाया गया है, क्या परिवार के किसी सदस्य ने कोई अपराध किया है कि क्या हम इसे पोस्टर छाप कर लोगों को दिखलाते हैं, यदि हमारे समाज की कोई बुराई है तो उसकी प्रचरित करने से अच्छा है उसे समाज से समाप्त करें. डैनी बॉयल ने जान बूझ कर ऐसे संदर्भों को फिल्म में दर्शाया है जिससे भारत का पिछड़ापन नज़र आए.
अगर इस बात की खुशी मनाना चाहते हैं तो खुशी से मनाइए, लेकिन इतना ध्यान रखिए भारत के इस पिछड़ेपन में हम भी दोषी हैं, फिर बधाई चाहिए तो जय हो !
 
   
 

ashutoshkapila@yahoo.com ()

 
 I have read with interest almost all the views expressed as above within the RAVIWAR. Is there any creative Indian Producer - Director who can venture and take up some of the burning issues that is effecting the foreigners in the developed countries? May be Mr. Bharat Kumar or Mr. Yash Chopra or Mr. Subhash Ghai or may be someone form the blue. Something must be done to obliterate the one sided projection of the progressive India. The theme and topic is Indian, treatment is Indian but according to the Director Danny Boyle 'it is a British film' and the UK PM expresses his happiness saying the 'we have won nine Oscars!' Jaago India Jaago, we are self sufficient Now and do something to Overcome SCAR of such a treatment in the international gallery.  
   
 

Ghanshyam (development@medialab.co.in) Durg

 
 It is a beginning of the bollywood in the hollywood........ 
   
 

शमशेर अहमद खान (ahmedkhan.shamsher@gmail.com) दिल्ली

 
 खुले दिल और दिमाग से की गई टिप्पणी का उसी रूप में स्वागत है।  
   
 

anand bharti (anandbharti@rediffmail.com) mumbai

 
 आपकी बेबाक टिप्पणी से कुछ लोग असहमत हो सकते हैं लेकिन आपके सवाल को बहस से बाहर नहीं किया जा सकता. ऑस्कर मिलने से ही कोई फिल्म महान नहीं हो जाती. हम इस फिल्म में कहां हैं, ये देखना बेहद महत्वपूर्ण है.
विनोद खेतान कहीं आप डॉक्टर खेतान तो नहीं हैं ?
 
   
 

Shashi Purohit (purohit1983@gmail.com) Manali

 
 खेतान जी, सुनंदा जी के विचार सामयिक हैं. वास्तव में हमारी ईर्ष्या और कुंठा खुशी को पास आने ही नहीं देती. कभी खुशी बहाने से आती है तो कभी बहानों के पीछे खुशी छुपी होती है, बस स्वीकार करने की हिम्मत होनी चाहिए.इस सुंदर लेख के लिए आपको धन्यवाद, साधुवाद. 
   
 

Himanshu (patrakarhimanshu@gmail.com) Raipur, Chhattisgarh

 
 The film is beautifully crafted. Even when surrounded by trash and squalor, the slums burst forth with colors. Each home has it’s own shade of blue, red, orange or green, each one shining out from under a tin roof. The clothing worn by the town people is just as colorful, as if the brightness is a placebo to help them get through their dreary days. 
   
 

Md Nasir Khan Gaya, Bihar

 
 Slumdog Millionaire is the worst kind of exploitation. Far beyond paternalism, its racism invites the marginalization of an entire culture, relegating India to this feel-good pastiche delivered in a gaudy, candy-coloured package promising the literal deus ex machina of Faith as the path to hot chicks and cold cash. Bollywood produced over 800 movies last year--this one, directed by an Englishman with European backers, is what the West has as its 2008 glimpse of the second-most populous place on the planet. A movie designed around questions, love and poverty, Slumdog Millionaire doesn’t actually answer big questions. It may not be much deeper than its strategically placed Bollywood production number. There’s no denying, though, that it’s bravura entertainment. 
   
 

Abhishek Kashyap Tatanagar, Jharkhand

 
 I was reading Abha Adam last week. she told that the hysteria that is Slumdog Millionaire is beginning to die down. We have followed the allegations of abuse and lawsuits against the foreign film-makers with the jangling jingoism that passes for pride over the fact that two Indians have been awarded prizes by workers in a Western industry.
The same politicians who have done so little to alleviate the disgusting conditions that our slum dwellers endure, and who do next to nothing to stamp out torture in our police stations, are now citing the film made by the British as an example of so-called achieving India.
The film is a fantasy. Jamal (the slumdog of the title) is abused and humiliated by almost all those who have received far more formal education than him. The film is made more fantastical not by the number of violent episodes shown, but because it pretends that the social exclusion and powerlessness we reserve for our poor is not as complete as it really is.
We all know that an unschooled chaiwalla from the slums would not be invited on Kaun Banega Crorepati in the first place. We know that if that unlikely event ever happened, it is far more probable in real life that he would summarily be thrown off the programme if there were suspicions he was cheating. He is undereducated, he is poor, why bother with his human rights?
 
   
 

Sunanda New Delhi

 
 नहीं खेतान साहब, हम सब एक कुंठित समय में जी रहे हैं. खुशी में भी अपने लिए कुंठा की तलाश करना हमारी आदत में शुमार हो गया है. दुख में तो दुखी हैं ही. स्लमडॉग को आस्कर क्या मिला, लोगों को उसमें छेद नजर आने लग गया. ऐसे लोगों से खुदा बचाए. आपने सुंदर लिखा है, मेरी बधाई. 
   

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