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भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

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यह सबके लिये चेतावनी है

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पहाड़ जैसी मुश्किलों वाली लड़ाई

मुद्दा

 

पहाड़ जैसी मुश्किलों वाली लड़ाई

संदीप नाईक , भोपाल से

 

यह दो साल पुराना मामला है, जब बैतूल जिले के डोंगराई पंचायत की भूतपूर्व सरपंच उर्मिलाबाई ने कलेक्टोरेट परिसर में इसलिए सल्फास की गोलियां खाकर आत्महत्या कर ली क्योंकि उनके साथ हुए बलात्कार और हिंसा की कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही थी.

पंचायती राज में महिलायें


मध्यप्रदेश के मुल्ताई के एक छोटे से पंचायत की सरपंच रही महार जाति की उर्मिलाबाई ने अपनी पंचायत में जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाई तो वर्तमान सरपंच को यह नागवार गुजरा. पहले सरपंच ने जादू टोना का आरोप लगा कर उर्मिलाबाई के पूरे परिवार को गांव से बेदखल करने की कोशिश की. फिर बात नहीं बनी तो सरपंच के बेटे ने बदला लेने की नियत से 21 जून 2003 को उनके साथ बलात्कार किया. उर्मिलाबाई ने हिम्मत करके अपने पति के साथ जाकर थाने में शिकायत की लेकिन कुछ नहीं हुआ. उल्टे कार्रवाई नहीं होने से बलात्कारियों के हौसले बढ़े और उर्मिलाबाई को परेशान किया जाने लगा.

थक हार कर उर्मिलाबाई गांव छोड़कर अपने मायके आ गईं. लेकिन जब दुबारा पति के घर लौटीं तो भी परेशानियों ने पीछा नहीं छोड़ा. भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाने का परिणाम ये हुआ कि 25 सितंबर 2006 को जब उर्मिला के पति अपने घर में नहीं थे तब सरपंच के बेटे ने उर्मिला के घर घुसकर फिर से बलात्कार किया. एक बार फिर उर्मिलाबाई ने थाने की शरण ली. जिला मुख्यालय जा कर जिम्मेवार अधिकारियों से फरियाद की लेकिन उर्मिला की आवाज़ अनसुनी कर दी गई और बलात्कारी धमकियां देते घुमते रहे.

आखिरकार उर्मिलाबाई टूट गईं और आरोपियों के खिलाफ एफआईआर तक दर्ज नहीं होते देख 21 नवंबर 2007 को उन्होंने बैतुल कलेक्टोरेट में आत्महत्या कर ली. पंचायती राज और महिलाओं को अधिकार देने का दावा करने वाले हमारे समाज और लोकतंत्र की बेशर्मी, क्रूरता और विफलता की किताब में एक और काला पन्ना जुड़ गया.

गांव-गांव में एक-से हाल
उर्मिलाबाई हमारी घुन लगी हुई व्यवस्था का एक उदाहरण भर हैं. राज्य के गांव-गांव में हालात एक जैसे हैं. भ्रष्टाचार और महिलाओं के प्रति उपेक्षा एक स्थाई भाव बन गया है और महिला पंचों, सरपंचों को हर रोज इनसे जुझना पड़ता है, गोया इस व्यवस्था से लड़ना उनकी नियती हो.

सतना जिले की रामपुर बघेलान ब्लॉक की अधिकांश महिला पंच-सरपंच शासकीय योजनाओं के क्रियान्वयन के तरीकों से व्यथित है. सतना के बिहरा पंचायत की सरपंच गीता वर्मा बताती हैं- “ जब भी किसी योजना की जानकारी लेने के लिए ग्रामसभा के प्रस्तावों के बारे में हम संबंधित अधिकारियों से बाते करते है तो हमें सिवाय उपेक्षा के कुछ नहीं मिलता.”

झाबुआ की फुन्दीबाई एक दबंग आदिवासी सरपंच हैं परन्तु अपनी पंचायत के विकास कार्यों को वह मूर्त रूप नहीं दे पा रही है, क्योंकि बकौल फुन्दीबाई उनकी सुनने वाला कोई नहीं है.

समाज के वंचित वर्गों से आये हुये वे जनप्रतिनिधि सबसे ज्यादा प्रताड़ित होते हैं, जो पहली बार आरक्षण से चुनकर सत्ता में भागीदारी करने आये हैं.


सीधी जिले की मुन्नीदेवी हो या सिवनी की राधाबाई, आष्टा की जयकुंवरबाई हो या हरदा जिले की बसकरबाई, ये सभी महिला जनप्रतिनिधि पिछले पांच वर्षों से अपनी-अपनी पंचायतों में पंचायती राज की कल्पना और ग्रामस्वराज को मूर्त रूप देने में जी-तोड़ प्रयास कर रही हैं परन्तु उनके महिला होने को उनकी सबसे बड़ी विफलता के रुप में सामने खड़ा कर दिया जाता है.

किसका ये पंचायती राज
मध्यप्रदेश देश का पहला राज्य था जिसने 1993 में संविधान के 73वें संशोधन को अमलीजामा पहनाया था और देश में पंचायती राज का झण्डा बुलन्द किया था. पिछले पन्द्रह वर्षों में पंचायती राज अपनी किशोरावस्था तक पहुंचा है और इस दौरान इस व्यवस्था ने कई सपनों को चरितार्थ भी किया है लेकिन कई सपनों को बुरी तरह से रौंदा भी है.

पंचायती राज व्यवस्था में सुधार और कमियों की गुंजाइश सदा बनी रहती है. परन्तु जिस तरह से हमारी व्यवस्था ज़मीनी स्तर पर लोकतंत्र की अंतिम इकाई पंचायत को उपेक्षा और हिकारत से देखती है, वह शोचनीय है.

इस पूरी व्यवस्था में समाज के वंचित वर्गों से आये हुये वे जनप्रतिनिधि सबसे ज्यादा प्रताड़ित होते हैं, जो पहली बार आरक्षण से चुनकर सत्ता में भागीदारी करने आये हैं. अशिक्षा, जातिवाद, सामन्तवाद, गरीबी, भूखमरी, बेहाली की ज़िन्दगी जीते हुये भी ये सत्ता में पंचायतों के माध्यम से एक बेहतरीन समाज के नवनिर्माण में शिद्दत से लगे हुये है. इनमें से बड़ी संख्या उन लोगों की है जो महिला हैं, दैनिक मजदूरी करती हैं और तमाम जिल्लतों को सहते हुये अपना वजूद कायम करने की पुरजोर कोशिश कर रही हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Sandeep Bhatt Indore

 
 इसे नियति कहना बेहद शर्मनाक है, लेकिन हालात यही हैं कि आज भी हिंदुस्‍तान में न सिर्फ महिलाएं बल्‍कि करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनकी नियति यही है। सरकार के लाख प्रयासों के बाद भी, कानूनों के सहारों के बाद भी, दूर किसी गाँव में जहाँ सड़क नहीं जाती वहाँ कोई कमजोर किसी ताकतवर का शिकार हो रहा होता है। मीडिया ऐसी सच्‍चाइयों से भागता है, दिखाना नहीं चाहता, लोग देखना नहीं चाहते, अगर कोई दिखाता है या आवाज उठाता है, तो सरकार ऐसे जागती है, जैसे किसी नींद में सोए आदमी को जगाया जाता है। थोड़े दिना जाँच चली, फिर सब ठंडे बस्‍ते में, आवाज उठाने वालों के पास फिर से उसी बात को कहने की फुर्सत नहीं और सरकार तो पहले से ही व्‍यस्‍त। ऐसे में इन लोगों की यही नियति बनी हुई है। इसे मान लेना चाहिए कि अभी वक्‍त लगेगा हालात बदलने में। कितना वक्‍त लगेगा कोई नहीं जानता और कोई बता भी नहीं सकता, लेकिन अगर बहुत से लोग एक साथ उठकर खड़े होंगे तो शायद आवाज बुलंद होगी और सफर आसान।
महिलाओं ,खासकर दलित और कमजोर वर्ग की महिलाओं को सरेआम नंगाकर घुमाया जाता है, उनके साथ सामूहिक बलात्‍कार होते हैं, इस तरह के मुद्दों पर गर्मागर्म बहस करना, लिखना बड़ा असान सा लेकिन फिर भी साहस का काम तो है, पर असल काम उनके हक में उठ खड़ा होना भी है। मध्‍यप्रदेश ही नहीं मुल्‍क भर में ऐसे किस्‍से आए दिन होते हैं। कानून को वहाँ पहुंचने की भी जरूरत है जहाँ सड़कें नहीं पहुँचती, रौशनी नहीं पहुँचती।
 
   
 

अनिल कर्णे (anil_karne@yahoo.com) Jabalpur MP

 
 वाह संदीप जी ... वाह... 
   
 

भोला प्रसाद भगत (bholabhagat@hotmail.com) मुंगेर (बिहार)

 
 आज भारत की राजनीतिक आजादी के 62 वर्ष बाद भी गरीब और कमजोर वर्ग के लोगों पर उसी तरह के जुल्म ढाए जा रहे हैं, जैसा कि देश की गुलामी के समय ढाया जाता रहा है.केवल रूप और नारा बदल गया है. देश की कार्यपालिकाओं, व्यवस्थापिकाओं एवं न्यायपालिकाओं पर आम तौर पर दबंग और स्वार्थी तत्वों का बोलबाला हो गया है क्योंकि संवेदनशील, ईमानदार, योग्य सज्जन नागरिक आज असंगठित हैं तथा अपने कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति उदासीन हो गए हैं। जब तक ये संगठित होकर ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था के विरूद्ध क्रांति नहीं करते तब तक देश में शोषण एवं कुव्यवस्था का ताण्डव चलता रहेगा और दलित जन पिसाते रहेंगे. 
   
 

Kumar Kewal Rohtak

 
 हम जिस समाज में जी रहे हैं, वहां इस तरह की घटनाएं आम हैं. आप पंचायत की छोड़ें, घरों में देखें. मैंने तो प्रथम श्रेणी की महिला अधिकारियों को भी घरों में पतियों के हाथों प्रताड़ित होते देखा है. हमारा देश अभी भी स्त्रियों के मामले में बेहद गंदे तरीके से सोचता है. स्त्री उसके लिए आज भी जरखरीद गुलाम से अधिक कुछ नहीं है. 
   
 

Dinanath singh Daltonganj, Jharkhand

 
 महिला दिवस केवल रस्म अदायगी भर है. जिस दिन भारत समेत दुनिया भर के देश पुरुष दिवस मनाएंगे, महिलाओं की असली मुक्ति उसी दिन होगी. हम असल में महिलाओं को भ्रम में रखने के लिए ऐसे दिवस मनाते हैं.  
   
 

Prashant kumar dubey (prashantd1977@gmail.com) Bhopal

 
 देखा यह जा रहा है की महिला दिवस पर अब रस्म अदायगी हो रही है और ऐसे में संदीप जी द्वारा महिला नेतृत्व और उसी चुनौतियों पर प्रकाश डाला, इसके लिए साधुवाद
रविवार भी सामाजिक सरोकारों को प्रमुखता से स्थान देता रहा है उसे भी बधाई.
 
   
 

Suresh Kumar Chaubey Narayanpur, Bastar, Chhattisgarh

 
 केवल सिमोन द बोवुआर की बात क्यों, स्टुअर्ट मिल ने भी तो ऐसा ही सोचा था-”जब हम पृथ्वी की आधी आबादी के ऊपर अनचाही विकलांगता मढ़ने के दोहरे दुष्प्रभावों को देखते हैं तो एक तरफ उनसे जीवन का सबसे सहज, स्वाभाविक और ऊंचे दर्जे का आनंद छिन जाता है और दूसरी तरफ जीवन उनके लिए उकताहट, निराशा और गहरी असंतुष्टि का पर्याय बन जाता है। फिर इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि पृथ्वी पर एक बेहतर जिंदगी के मानवीय संघर्ष में स्त्रियों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता एक प्रमुख और महत्वपूर्ण लक्ष्य होना चाहिए। इस संबंध में पुरुषों के खोखले भय सिर्फ स्त्रियों को नहीं बल्कि पूरी मनुष्यता को बंधनग्रस्त किए हुए हैं। क्योंकि मानवीय प्रसन्नता के आधे झरनों के सूखने से पूरे वातावरण के स्वास्थ्य, सम्पन्नता और सौंदर्य पर प्रभाव पड़ता है।”
यह हमारे समय की सबसे बड़ी त्रासदी है कि हम सब अपनी बनाई हुई दुनिया में केवल स्त्रियों के प्रति हिंसा की भावना ले कर बैठे हुए हैं. इससे मुक्ति जरुरी है.
 
   
 

सुनंदा तिवारी मुजफ्फरपुर, बिहार

 
 सिमोन द बोवुआर की सेकेंड सेक्स में आखरी वाक्य कुछ इस तरह है-”नि:संदेह एक दिन स्त्री और पुरुष आपसी समता और सह-अस्तित्व की जरूरत को स्वीकार करेंगे।”
कौन जाने यह स्थिति कब आएगी. पंचायतों में स्त्रियां आज भी हाशिये पर हैं और आपने सही लिखा है कि उनके स्त्री होने को ही विफलता का प्रतीक मान लिया जाता है.
 
   
 

Suresh kumar chandrakar dehradun, India

 
 महिला दिवस के दिन आपने यह रिपोर्ट प्रकाशित करके आंखें खोल दी.
हमारी पुरुष मानसिकता मान ही नहीं सकती कि कोई महिला भी व्यक्ति की तरह बरताव करे. हम उसे हमेशा चुल्हे-चौका और बच्चों में ही खुश देखना चाहते हैं. सबकुछ बहुत शर्मनाक है.
 
   
 

Shiv Das (shivsarika@gmail.com) Robertsganj

 
 लेख में जिस प्रकार से महिलाओं की स्थिति बयां की गई है वह काबिल-ए-तारीफ है। वास्तव में वतर्मान परिवेश में महिलाओँ को वो हक नहीं मिल पाया है जो समानता के अधिकार को चरितार्थ कर सके। उत्तर प्रदेश के सबसे नक्सल प्रभावित और पीछड़े जनपद सोनभद्र की महिलाओँ की स्थिति आप द्वारा उल्लेखित समस्याओं से कम नहीं है। आदिवासी महिलाएँ आज भी अमीरों के हवस का शिकार बनकर दम तोड़ रही हैं। आपने अपने लेख में जो पहल की है, कृपया उसे जारी रखें। धन्यवाद 
   
 

Ambuj K Soni (ambuj_Ksoni@yahoo.com) Dewas

 
 This kind of articles really needs encouragment.Nice efforts.But a request to the Raviwar that pls do not leave it in between.thanks.
 
   

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