प्रभात त्रिपाठी की कविताएं
साहित्य
प्रभात त्रिपाठी
की कवितायें
शहर के लोग
इस शहर के लोगों को एक ही कष्ट है यारों!
कि यह शहर सिरे से भष्ट्र है यारों!
लोग यह बात इस तरह कहते हैं
जैसे यहाँ नहीं, कही और रहते हैं।
वह
उसकी डबडबाई आँखों में
खिलते हैं कामना के फूल
वह आती है करीब
स्मृति के रंध्र-रंध्र में रचती
गंध का आकार
लाती है साथ,
एक आत्मीय अँधेरा
समय
इस पृथ्वी पर लिखता है
एक काली लड़की का नाम।
एक आदमी
एक आदमी सिर पर पत्थर रखकर जा रहा था
उसका दूसरा मतलब यह भी है
कि वह सिर पर ईश्वर रख कर जा रहा था
तीसरा मतलब भी है
कि वह जा रहा था बाजार
भगवान की मूरत बेचने
एक आदमी जेठ की तीखी धूप में
पत्थर के टुकड़ों से भरे भागते ट्रक में
सोया था चुपचाप
दूसरा मतलब यह भी है
वह एक विशाल पत्थर को
टुकड़े- टुकड़े करता रहेगा
जीवन- भर
एक छोटी सी शांत नींद के लिए
ईश्वर निर्मित पत्थर के नीचे
पत्थर निर्मित ईश्वर के नीचे
सदियों से दबा एक आदमी
लिखता है अपने पुण्य, अपने पाप
इसका जो चाहे वो मतलब
आप खुद निकालें माईं बाप!
16.03.2009,
12.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशित