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फिर तेरी कहानी याद आई

बात पते की

 

फिर तेरी कहानी याद आई

देविंदर शर्मा

 

चुनाव सिर पर हैं. हर बार की तरह इस बार भी कृषि और कृषकों की समस्याओं को मुद्दा बनाया जाएगा, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होगा, सारी बातें फिर से भुला दी जाएंगी.

आने वाले दिनों में आप देखेंगे कि ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों के चुनावी घोषणा पत्र में कृषि, पानी, किसानों की दशा और उनके जीवन स्तर की चर्चा होगी. लगेगा कि राजनीतिक दल कृषि और किसानों की बदहाली को लेकर गंभीर हो गए हैं, लेकिन यथार्थ यह है कि कृषि और किसान राजनीतिक दलों के एजेंडे में है ही नहीं.

किसानों की उपेक्षा


प्रश्न उठता है कि किसान और उनके संगठन कृषि को एक बड़ा राजनीतिक एजेंडा बनवा पाने में क्यों विफल रहते हैं? इस बारे में वे कोशिश जरूर करते हैं, लेकिन इसे परिणति तक नहीं ले जा पाते. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चुनावों के नजदीक आते ही किसान कृषि को भूल कर अन्य चर्चित राजनीतिक मुद्दों, स्थानीय मामलों को तरजीह देने लगते हैं. ऐसे में कृषि का मुद्दा जातीय समीकरणों के बीच कहीं खो जाता है.

अगर किसान यह सोच लें कि उन्हें राजनीतिक परिदृश्य से भुलाया नहीं जा सकता तो मुझे इस बात की कोई वजह नजर नहीं आती कि क्यों और कैसे राजनीतिक पार्टियां कृषि को राजनीतिक और राष्ट्रीय मुद्दा बनाने से बच पाएंगी? यह काफी दु:खद है कि विश्व की कुल कृषक आबादी की एक चौथाई आबादी भारत में है, लेकिन वह अपने लाभ के लिए अपने राजनीतिक अधिकारों का प्रयोग नहीं कर पाती. यदि किसानों को अपनी सामूहिक राजनीतिक शक्ति का अहसास हो जाए तो वे अभी से ही देश पर शासन करने लग जाएंगे.

जाहिर है, किसानों की इस दशा के लिए हम बार राजनीतिज्ञों को ही जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते. काफी हद तक किसान भी इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं. कोई आश्चर्य नहीं कि उन्हें एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत कर दिया गया. 2004 के आम चुनावों में स्पष्ट तौर पर इंडिया शाइनिंग के जुमले के संदर्भ में ग्रामीण भारत की नाराजगी ही थी जिसने संप्रग को सत्ता में आने का मौका दिया.

सत्ता में आने के कुछ दिन बाद ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कृषि के पुनरुत्थान की बात की. उन्होंने यह भी कहा कि कृषि बहुत ही संकट की अवस्था से गुजर रही है और इसके पुनरुत्थान के लिए जल्द ही आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है, लेकिन आखिरकार उन्होंने उद्योगों को ही वरीयता दी और उनकी सरकार ने कृषि को पीछे छोड़ते हुए उद्योगो के विकास पर ध्यान केंद्रित किया. इसी के तहत कारपोरेट फार्मिग के नाम पर कई उपाय किए गए है.

दुर्भाग्य से ये सुधार मुख्य रूप से किसानों को कृषि से दूर करने वाले थे. भारतीय किसान यूनियन, जिसका उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन था, भी सत्ता पक्ष का ध्यान उन कारणों की ओर आकर्षित करने में विफल रही जो कृषि की गिरती हुई दशा के लिए जिम्मेदार थे.

सरकार की इस उपेक्षा का ही परिणाम था कि देश भर में किसानों ने आत्महत्याएं कीं. एक अनुमान के मुताबिक 1997 के बाद से लगभग एक लाख अस्सी हजार से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं. किसानों का यह बलिदान देश ही नहीं, विश्व के किसी भी अन्य राजनीतिक मुद्दों से बड़ा था, लेकिन सरकार का ध्यान किसानों की ओर नहीं गया. केवल मौखिक सहानुभूति दिखाने के अलावा किसी भी राजनीतिक दल ने कृषक समुदाय की इस दशा को सुधारने के लिए कोई कदम नहीं उठाया. आगामी चुनाव में भी राजनीतिक परिदृश्य में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला है.

इसकी मूल वजह यह है कि कृषक समुदायों के ज्यादातर नेता राजनीतिक दलों का ध्यान कृषि की ओर आकर्षित करने में विफल रहे हैं. देश के कई भागों में मैं ऐसे कृषक नेताओं से मिला हूं जो इस बात के लिए उत्सुक हैं कि चुनाव लड़कर वे कृषक समुदायों के हित में कोई सार्थक योगदान कर सकें.

उदाहरण के लिए कर्नाटक को लें, जहां पिछले कुछ दशकों में कर्नाटक राज्य र्योता संघ एक बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आया है. कर्नाटक में हुए पिछले विधानसभा चुनावों में इस पार्टी ने 40 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए और वे सभी हार गए. यद्यपि पार्टी नेतृत्व का कहना है कि किसानों की समस्याओं पर तभी गौर किया जा सकता है जब उन्हें विधानसभा या फिर संसद में प्रतिनिधित्व मिले, लेकिन मैं इस धारणा से सहमत नहीं हूं.

14वीं लोकसभा में ग्रामीण इलाकों से चुने गए लगभग 350 से अधिक प्रतिनिधि दावा कर रहे थे कि वे किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, लेकिन वे कभी भी कृषि संबंधी मुद्दों पर अपनी बात रखते नहीं दिखे. लगभग 57 सांसदों ने कोई बहस नहीं की और लगभग 78 सांसदों ने कोई प्रश्न नहीं पूछा. पहले भी मुश्किल से ही सांसदों को कृषि संबंधित मुद्दों पर विचार व्यक्त करते हुए देखा गया है. यहां तक की संसद में जब भी डब्लूटीओ समझौते पर बहस हुई है, मैंने सदन में किसानों के कथित प्रतिनिधि दस से अधिक सांसद कभी नहीं देखे.

आगामी आम चुनाव कृषि को राष्ट्रीय विमर्श का सबसे बड़ा मुद्दा बनाने का सही अवसर है. ज्यादातर पार्टियों के पास चुनावी रैलियों में बोलने लायक कोई महत्वपूर्ण मुद्दा नहीं है. इस समय चुनावी मुद्दों का टोटा है और सभी राजनीतिक पार्टियां मुद्दों के लिए जोर लगा रही हैं. मेरे विचार में जो भी राजनीतिक पार्टी कृषक समुदाय के हितों को मुद्दा बना लेगी वह आसानी से खुद को प्रचारित कर लेगी, क्योंकि देश के ग्रामीण इलाकों में 60 करोड़ किसान ऐसे नेतृत्व के इंतजार में हैं जो उन्हें उनकी भयावह और कष्टप्रद स्थिति से उबार सके.


इसके लिए सबसे पहले स्पष्ट सोच और राजनीतिक दूरदर्शिता की जरूरत है, जो किसानों को उस कीचड़ से निकाल सके जिसमें वे खुद ही धंसे हुए हैं. इसके लिए दृष्टिकोण में स्पष्टता होना बहुत जरूरी है. हमें वर्तमान आर्थिक नीतियों से हटकर पूरी तरह नया सोचना होगा-काफी कुछ विजन 2020 की तरह. इस प्रकार की किसी भी पहल का मकसद यह होना चाहिए कि किसानों को हर महीने कुछ निश्चित आमदनी हो सके. इसके साथ ही कृषि को दीर्घावधि में टिकाऊ तथा लाभ का व्यवसाय बनाने के लिए एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन भी छेड़ना होगा.

अगर कोई राजनीतिक दल साहसपूर्ण कदम उठाते हुए कृषि को ऐसी दिशा दे सके कि इसमें किसानों को लाभ कमाने का मौका मिले तो निश्चित रूप से गांवों से शहरों की ओर जो पलायन हो रहा है उसमें बदलाव आएगा. जो भी राजनीतिक दल अपना ध्यान कृषि और किसानों की समस्याओं पर केंद्रित करेगा उसे सत्ता से हटने की तकलीफ भी नहीं झेलनी पड़ेगी. यदि कोई राजनीतिक दल किसानों के हित में खड़ा होता है तो मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूं कि देश के 60 करोड़ किसान हमेशा उस दल के पक्ष में रहेंगे.

बीते 60 सालों में राजनीतिक व्यवस्था ने केवल किसानों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया है. किसानों को शिद्दत से किसी ऐसे दल का इंतजार है जो उनके हितों के बारे में सोचे. राजनीतिज्ञों के सामने दोनों ही विकल्प हैं-किसानों को मुश्किलों के दलदल में उनके हाल पर छोड़ दें और हमेशा राजनीतिक अनिश्चितता में रहें या फिर किसानों के हितों को मुख्य मुद्दा बनाएं. जो भी दल दूसरे रास्ते को चुनेगा उसे अगले चुनाव में सहयोगी दलों की मदद पर आश्रित नहीं रहना पड़ेगा.

 

16.03.2009, 18.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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