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सुदर्शन जी, देश आगे जाए या पीछे ?

मुद्दा

 

सुदर्शन जी, देश आगे जाए या पीछे ?

एल एस हरदेनिया, भोपाल से

 

तो क्या देश 10वीं या 11वीं सदी में जाने को तैयार है ?

कम से कम राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक तो यही चाहते हैं. इस महीने अपने भोपाल प्रवास में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघ चालक कुप्पहल्ली सीतारमैय्या सुदर्शन ने जो कुछ सुझाव दिये हैं, यदि उन पर अमल किया जाए तो हमारा देश 21वीं सदी के स्थान पर टाईम मशीन में बैठकर 10वीं या 11वीं सदी में पहुंच जाएगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ


संघ प्रमुख ने संपूर्ण देश को जोड़ने वाली एक भाषा की आवश्यकता निरूपित की. उनका सुझाव था कि संस्कृत यह भाषा होनी चाहिए और संस्कृत को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिया जाना चाहिए.

संघ प्रमुख श्री सुदर्शन शायद इस बात को भूल गए कि संस्कृत कभी भी आम आदमी की भाषा नहीं रही. वह तो ‘देवभाषा’ थी. इतिहास में कई बार संस्कृत के स्थान पर किसी अन्य भाषा को आम आदमी की भाषा के रूप में विकसित करने का प्रयास किया गया. एक समय ऐसा था जब दलितों के लिए संस्कृत भाषा पूरी तौर से प्रतिबंधित थी. भगवान बुध्द ने संस्कृत को अपने विचारों के प्रचार का माध्यम नहीं बनाया. प्राकृत-पाली आदि भाषाएं संस्कृत के विकल्प के रूप में पैदा हुईं. हमारे देश की सभी भाषाओं का उद्गम संस्कृत से है. इस तरह, संस्कृत के सहारे अन्य भाषाएं तो विकसित हुईं परन्तु संस्कृत स्वयं आम लोगों की भाषा नहीं बन सकी.

हिन्दू धर्म के सबसे बड़े प्रतीक भगवान राम की गाथा जब आम लोगों की भाषा में लिखी गई तो उसके बाद राम घर-घर के आदर्श बन गए. तुलसीदास ने यह अद्भुत काम किया. यह कहा जाता है कि जब उन्होंने रामचरितमानस जनता की भाषा में लिखना प्रारंभ किया तो संस्कृत के विद्वानों ने उनका बहिष्कार किया, जिसके परिणामस्वरूप, जैसा कि उन्होंने स्वयं लिखा है, उन्हें अपना जीवन-यापन भीख मांगकर और मस्जिद में रहकर करना पड़ा.

उन्होंने अवधी में लिखा है “ मांग के खईबो, मसजिद में रहिबौ, लैबे को एक न देबे को दोऊ”. अगर तुलसी रामचरितमानस न लिखते तो शायद राम-राम हमारे देश का सबसे लोकप्रिय अभिवादन न होता और सबसे महत्वपूर्ण यह कि भाजपा राम मंदिर का सहारा लेकर दिल्ली की सत्ता तक नहीं पहुंच पाती. श्री सुदर्शन को तो गोस्वामी तुलसीदास का ऋणि होना चाहिए कि उन्होंने वाल्मिकी के राम को जन-जन का राम बनाया और इन्हीं राम के सहारे संघ परिवार की भाजपा सत्ता की सीढ़ियां चढ़ सकी.

आज भी यह स्थिति है कि हिन्दुओं के कर्मकांड संस्कृत भाषा के माध्यम से ही संपन्न होते हैं. उदाहरणार्थ, विवाह के दौरान पढ़े जाने वाले मंत्रों को लें. पंडितजी क्या पढ़ रहे हैं, यह न तो दांम्पत्य सूत्र में बंध रहे वर-वधू को समझ में आता है और न ही अन्य उपस्थित लोगों को. कदाचित पंडितजी स्वयं भी बहुत से मंत्रों का अर्थ न जानते हों.

ऐसा समझा जाता है कि संस्कृत में लिखित ग्रंथों को पढ़ने का अधिकार केवल ब्राहम्णों को था. संस्कृत की वकालत करके क्या श्री सुदर्शन वास्तव में वर्ण व्यवस्था को मजबूत करना नहीं चाहते हैं? स्पष्टत:, वर्ण व्यवस्था में ब्राहम्ण ही सर्वोपरि है.

सुदर्शन जी ने यह सुझाव भी दिया कि शिक्षण कार्य मातृभाषा में ही होना चाहिए और अंग्रेजी को पढ़ाई के माध्यम के रूप में समाप्त कर देना चाहिए. इस मुद्दे पर कुछ हद तक उनसे सहमत हुआ जा सकता है.

आजकल हमारे यहाँ हर गली-कूचे में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल गए हैं. इन स्कूलों में नर्सरी से ही अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाया जाता है. नतीजे में बच्चे अंग्रेजी तो सीख जाते हैं परंतु अपनी मातृभाषा ठीक से नहीं सीख पाते. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इससे बच्चों के बौध्दिक विकास में बाधा पड़ती है. एक वास्तविकता यह है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ाने वाले सक्षम शिक्षक भी सहज सुलभ नहीं हैं. होना यह चाहिए कि कम से कम आठवीं कक्षा तक सभी विषयों की पढ़ाई मातृभाषा में ही हो परन्तु साथ में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान भी प्रारंभ से दिया जाए.

हमारे जैसे बहुभाषी देश में त्रिभाषा फार्मूला लागू किया जाना था. इस फार्मूले के अन्तर्गत प्रत्येक बच्चे को मातृभाषा, एक अन्य भाषा व अंग्रेजी का ज्ञान प्रारंभ से ही कराया जाना था. इस तरह आठवीं तक छात्र सभी विषय मातृभाषा में पढ़ता, साथ ही वह देश की एक अन्य भाषा भी सीखता और अंग्रेजी का ज्ञान तो अर्जित करता ही.

चूँकि हिन्दी भाषी छात्र-छात्राएं देश की एक अन्य भाषा सीखते और अहिन्दी भाषी क्षेत्र के छात्र-छात्राएं हिन्दी सीखते, इससे देश की भावनात्मक एकता मजबूत होती और इसके चलते एक समय ऐसा आता जब अहिन्दी भाषी लोग हिन्दी भाषा को एक सेतु भाषा के रूप में स्वीकार कर लेते और साथ ही उन्हें अंग्रेजी भाषा का पर्याप्त ज्ञान भी हो जाता.

आम तौर से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विशेषकर वर्तमान सरसंघ चालक हमारे देश के संविधान के कटु आलोचक हैं. वे अनेक बार कह चुके हैं कि संविधान रद्दी की टोकरी में फेंकने लायक है. शायद इसलिए उन्होंने अपने भाषण में कहा कि यह संविधान भारत की आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं करता. उन्होंने डॉ. अम्बेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि वे स्वयं संविधान को जला देना चाहते थे.

डॉ. अम्बेडकर ने ऐसा कब कहा और कहाँ कहा यह एक अनुसंधान का विषय है, परंतु जिन डॉ. अम्बेडकर ने अपनी सारी प्रतिभा, क्षमता और ज्ञान को संविधान के निर्माण में झोंक दिया उन्होंने ऐसा कहा होगा इस बात पर सहसा विश्वास नहीं होता.

यहाँ विचारणीय प्रश्न यह है कि आखिर श्री सुदर्शन क्यों संविधान को रद्दी की टोकरी में फेंकना चाहते हैं और वे क्यों इस बात का उल्लेख करते हैं कि डॉ. अम्बेडकर स्वयं अपनी कोख से जन्में शिशु (श्री सुदर्शन का कहना है कि डॉ. अम्बेडकर ने संविधान जलाने की बात 1953 में कही थी. उस समय संविधान को बने हुए चार वर्ष और लागू हुए तीन वर्ष ही हुए थे अर्थात संविधान की आयु शिशु की ही थी) को नष्ट करना चाहते थे? शायद इसका उत्तर यह है कि श्री सुदर्शन की यह मान्यता होगी कि संविधान के प्रावधान उनके हिन्दू राष्ट्र के सपने के पूरा होने की राह में सबसे बड़ा रोड़ा है. संविधान के माध्यम से हमने बहुधर्मी, बहुभाषी एवं बहु संस्कृति वाला देश बनाया है. छुआछूत को समाप्त कर संविधान ने सबसे भारी चोट वर्ण व्यवस्था को पहुंचाई है, जिस पर संघ की आज भी आस्था है.

न तो मुगलों और न ही शिवाजी का धर्म से कोई विशेष लेना-देना था. उनका साम्राज्य धर्म की रक्षा के लिए नहीं था बल्कि उनका धर्म अपने साम्राज्य की रक्षा करना था.


संघ की मान्यता है कि मुसलमान व ईसाई तथा अन्य अल्पसंख्यक देश के प्रति वफादार हो ही नहीं सकते. एक समय संघ की सोच थी (शायद अब भी है) कि मुसलमान इस देश में रह तो सकते हैं पर एक दूसरे दर्जे के नागरिक की हैसियत से. संघ की इस सोच के विपरीत संविधान ने मुसलमानों व ईसाईयों को बराबर का नागरिक माना है. संविधान ने उन्हें अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता तो दी ही है, उन्हें अपनी शिक्षण संस्थाओं को संचालित करने का अधिकार भी दिया है. और इससे भी बड़ी बात यह है कि इस संविधान ने भारत को एक धर्मनिरपेक्ष देश बनाया है. इन सब कारणों से संघ व सुदर्शन के मन में संविधान को जलाने की इच्छा होना स्वाभाविक है.

सुदर्शन जी को एक और शिकायत है. उनका आरोप है कि केन्द्र सरकार द्वारा प्रकाशित एक पाठयपुस्तक में मुगलों के संबंध में जानकारी 80 पृष्ठों में दी गई है जबकि शिवाजी के बारे में जानकारी सिर्फ 10 पृष्ठों में दी गई है. मुगलों ने लगभग 325 वर्षों तक इस देश पर शासन किया था जबकि शिवाजी का संपूर्ण जीवन ही इससे कई गुना कम था.

सुदर्शन भूल जाते हैं कि मुगल भी राजा थे और शिवाजी भी राजा थे. शिवाजी ने अपनी लड़ाई हिन्दुओं के लिए कतई नहीं लड़ी थी. उनके द्वारा लड़ी गई लड़ाईयों का मुख्य उध्देश्य अपने राज्य का विस्तार करना या उसकी रक्षा करना था.

यही लक्ष्य मुगलों का भी था. दोनों के राज्यों में गरीबों की स्थिति दयनीय थी. यदि संघ शिवाजी को हिन्दुओं का रक्षक और मुस्लिम विरोधी मानता है तो उससे यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि फिर क्यों शिवाजी ने अपनी फौज और अपने प्रशासन में मुस्लिमों को ऊंचे ओहदे दिए थे? मुगल और शिवाजी हर अच्छे शासक की तरह योग्य, प्रतिभावान और सक्षम लोगों को ही जिम्मेदारी के पद सौंपते थे. व्यक्तियों की योग्यता के आधार पर उनका चयन होता था न कि उनके धर्म के आधार पर.

इतिहास गवाह है कि अकबर के सबसे बड़े सिपासालार मानसिंह थे और महाराणा प्रताप के मुख्य सैन्याधिकारी मुसलमान थे. न तो मुगलों और न ही शिवाजी का धर्म से कोई विशेष लेना-देना था. उनका साम्राज्य धर्म की रक्षा के लिए नहीं था बल्कि उनका धर्म अपने साम्राज्य की रक्षा करना था.

हमारा सुदर्शन जी से अनुरोध है कि वे राजा-महाराजाओं के झगड़े में न पड़ें और गरीब हिन्दुओं का भला करने में अपनी शक्ति लगाएं. वर्तमान में वे ऐसा नहीं कर रहे हैं.

 

20.03.2009, 04.15 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Pradeep Rana (pradeepbharat@yahoo.co.in) Bijnor

 
 you are misguided intelligent....can you explain why other nation are so much progressive because they have their own mother tounge...Mother tounge give self pride....thats leads to patriotism....and emotions for nation.... 
   
 

RAVAT SATISHKUMAR r. (satishravat@yahoo.com) AHMEDABAD

 
 आपके लेख के माध्यम से कुछ तथ्यपरक जानकारी मिली| हिंदी के अलावा कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा हो हीं नहीं सकती| आर.एस.एस को अंग्रेजी भाषा से द्वेष है तो जब भा.ज.पा की सरकार थी या अब भी जहाँ है, सभी विद्यालयों, विश्वविद्द्यालयों, सारे सरकारी गैरसरकारी कार्यालयों, न्यायालयों सभी जगह हिंदी को अनिवार्य कर देना चाहिए था| और अब जब संस्कृत को बनाना चाहते तो हिंदी पर पाबन्दी लगा दें| कमसे कम सभी आर.एस.एस के सदस्यों को अब संस्कृत में बात करनी चाहिए, और उनके सदस्य बनने की अनिवार्यता तो ज़रूर होनी चाहिए|
भाषा, धर्म, संस्कृति, जाति, क्षेत्र, हर बातों में ये जनता को गुमराह करते हैं, और अंग्रजों की भांति "फ़ुट डालो राज करो" का सिद्धांत अपनाना चाहते हैं|
 
   
 

जेन्नी शबनम (jenny.shabnam@gmail.com) नई दिल्ली

 
 आपके लेख के माध्यम से कुछ तथ्यपरक जानकारी मिली| हिंदी के अलावा कोई भी भाषा राष्ट्र भाषा हो हीं नहीं सकती| आर.एस.एस को अंग्रेजी भाषा से द्वेष है तो जब भा.ज.पा की सरकार थी या अब भी जहाँ है, सभी विद्यालयों, विश्वविद्द्यालयों, सारे सरकारी गैरसरकारी कार्यालयों, न्यायालयों सभी जगह हिंदी को अनिवार्य कर देना चाहिए था| और अब जब संस्कृत को बनाना चाहते तो हिंदी पर पाबन्दी लगा दें| कमसे कम सभी आर.एस.एस के सदस्यों को अब संस्कृत में बात करनी चाहिए, और उनके सदस्य बनने की अनिवार्यता तो ज़रूर होनी चाहिए|
भाषा, धर्म, संस्कृति, जाति, क्षेत्र, हर बातों में ये जनता को गुमराह करते हैं, और अंग्रजों की भांति "फ़ुट डालो राज करो" का सिद्धांत अपनाना चाहते हैं|
 
   
 

J.L. Gupta (penmanbooks@yahoo.co.in)

 
 Thank you very much for this initiating this dialogue relating to the making of Sanskrit as a national language. I don't want to go in any controversy what Shri Sudarshan opines about Sanskrit. But I am sure to assert that Sanskrit should be included in our national languages. Sanskrit forms the most integral language of India. It is called divine. It is Sanskrit wherein lies the soul of India. It is Sanskrit that makes a firm footing to this country. It is Sanskrit where the most precious texts of this country containing the Supreme wisdom of our great ancient masters are preserved. It is Sanskrit where the great wisdom of Ayurveda (the ancient Indian medicinal wisdom), Yoga and Indian philosophy is contained. Indians should realize this fact as early as possible. We are known world over for the great wisdom of saints and savants of anciency. We are recognized due to this great knowledge of Vedas and Upanishads. How can we ignore Sanskrit that carries such a marvelous and vast literature. The more said the less will be. Sanskrit should be preserved and promoted. If somebody does not know the values contianted therein, they have no right to damage the language which enshrines into it the core of Indian culture. 
   
 

बालसुब्रमण्यम अहमदाबाद

 
 सुदर्शन की बातों पर इतना उद्वेलित होने की आवश्यकता नहीं है। सब जानते हैं, वे कोई विद्वान नहीं हैं, और उलटा-सीधा कहते रहते हैं। स्वयं संघ ने उनकी जुबान पर कई बार लगाम लगाया है।

इसलिए मैं सुदर्शन की बातों पर टिप्पणी नहीं करूंगा, वे इस लायक ही नहीं हैं। आपकी लिखी हुई कुछ बातों पर दो एक शब्द कहना चाहूंगा।

हिंदी, मराठी, आदि भाषाएं, संस्कृत से नहीं निकली हैं। यह एक आम गलतफहमी है, जिसे डा. रामविलाश शर्मा ने बड़ी मेहनत से अपनी पुस्तकों में (भारतीय भाषा परिवार और हिंदी भाषा, भाषा और समाज, इत्यादी, जो राजकमल प्रकाशन/वाणी प्रकाशन, दिल्ली से निकली हैं)सिद्ध किया है कि संस्कृत, हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली आदि भाषाओं के बीच वही संबंध है जो खड़ी बोली, भोजपुरी, मैथिली, ब्रज आदि के बीच हैं। वे सब जनपदीय भाषाएं हैं। राजनीतिक कारणों से उनमें से एक, यानी संस्कृत सर्वोपरि हो गई, वैसे ही जैसे दिल्ली-आगरे की भाषा होने के कारण खड़ी बोली अवधी, भोजपुरी, ब्रज, मैथली आदि से ज्यादा प्रमुख हो गई। इसलिए हिंदी आदि का संस्कृत से संबंध बहनों का है, न कि मां-पुत्री का।

आपकी जिस दूसरी बात से मैं असहमत हूं, वह है कि देश भर में बरसाती मेंढ़कों की तरह निकल आए अंग्रेजी माध्यम के नर्सरी स्कूलों के छात्र अंग्रेजी सीख पाते हैं। सचाई यह है कि उनमें जो लोग अंग्रेजी पढ़ाते हैं, उन्हें भी ढंग की अंग्रेजी नहीं आती होती है, वे क्या बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाएंगे। होता यह है कि इन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे न अंग्रेजी सीख पाते हैं, न हिंदी ही। बच्चे पांच वर्ष की उम्र तक अपनी 99 प्रतिशत भाषाई क्षमता अर्जित कर लेते हैं। इसीलिए भाषाविद और वैज्ञानिक इतना जोर देते हैं कि शिक्षण का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए, विशेषकर प्राथमिक शिक्षण में। यदि शुरू के पांच वर्षों की पढ़ाई उसी भाषा में हो जो बच्चा घर में बोलता है, तो बच्चा भाषा और उसके व्याकरण पर अच्छा अधिकार जमा लेता है, और उस भाषा में अन्य विषयों की पढ़ाई करने में उसे सुविधा रहती है। पर हमारे यहां विज्ञान और भाषाविज्ञान को ताक पर रखकर माता-पिता अपने ही बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में भेजकर भाषाई दृष्टि से पंगु बना डालते हैं। न उनके बच्चे अंग्रेजी ढंग से सीख पाते हैं, न ही हिंदी। कोई भी भाषा ठीक से सीखने के लिए वह भाषा बोलने वालों के मध्य रहना आवश्यक होता है। चूंकि भारत में अंग्रेजी कहीं भी नहीं बोली जाती, भारतीयों के लिए अंग्रेजी सीखना असंभव है। अंग्रेजी सिखाने वाले प्रतिष्ठान इस सचाई को बड़ी मेहनत से छिपाते हैं। इसलिए चाहे जितने भी अंग्रेजी स्कूल खुलते जाएं, यह सोचना कि वे अंग्रेजी बोलनेवाले छात्र-छात्राएं भी तैयार कर पाएंगे, यह नामुमकिन बात है। यदि इसका प्रमाण चाहिए, तो किसी भी अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले पांचवी-छठी कक्षा के छात्र के अंग्रेजी ज्ञान की जांच कर लें। हमारे देश में बहुत कम लोग मातृ भाषा के स्तर पर अंग्रेजी बोल पाते हैं। जो बोल पाते हैं, उनमें से भी कई ऐसे होते हैं, जिन्होंने लंबा समय अंग्रेजी बालनेवाले देशों में बिताया होता है। अंग्रेजी को बस एक हव्वा के रूप में फैला दिया गया है। इससे देश का अपार नुकसान होता है, पर थोड़े से निहित स्वार्थवालों का फायदा भी होता है। ये ही सत्ता, व्यवसाय, न्यायतंत्र, शिक्षणतंत्र् आदि पर काबिज हैं। आम आदमी का अंग्रेजी से नुकसान ही होता है। यह सब जानी-मानी बात है। पर हमारा समाज इतना सिनिकल हो गया है कि मां-बाप अपने बच्चों को अंग्रेजी सिखाने का व्यर्थ प्रयास करते हैं क्योंकि वे देख रहे हैं कि अंग्रेजी की डिग्री होने से उनके बच्चों को कम से नौकरी तो मिलेगी, भले ही उन्हें अंग्रेजी न आए।

क्योंकि अंग्रेजी का टिका रहना सत्ता का मामला हो गया है, उसे बलपूर्वक ही हटाया जा सकता है। हमें ऐसे किसी नए राजनीतिक दल की आवश्यकता है जिसका घोषित ध्येय हो हिंदी भाषा को शासन, शिक्षण, न्याय, व्यावसाय आदि में स्थापित करना। यदि यह बहुमत से चुनाव जीतकर आए और केंद्र में सरकार बना सके, तो वह एक ही अध्यादेश से तमाम आईआईटी, आईआईएम, विश्वविद्यालय, कालेज, प्राइमरी स्कूल आदि का माध्यम हिंदी और अन्य भारतीय भाषाएं करवा सकता है। इसे एक ही झटके में ही करना होगा, धीरे-धीरे करने की नीति पर हम पिछले 60 साल से चल चुके हैं, और कुछ नहीं हुआ है।

इस तरह का राजनीतिक दल गठित करना उतना कठिन भी नहीं है, जितना आपको लग सकता है। भाषा अपने स्वभाव से ही लोगों को जोड़ती है। उदाहरण के लिए हिंदी को मुसलमान भी बोलते हैं, हिंदू भी, सिक्ख भी, ईसाई भी, बूढ़े भी, जवान भी, महिलाएं भी, मजदूर भी उद्योगपति भी, अमीर भी, गरीब भी। इसलिए हिंदी के मंच पर इन सबको बड़ी आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है। यह लोगों को बांटने वाले धर्म, जाति, इलाका, वर्ग आदि के आधार पर लोगों को जोड़ने की कोशिश से कहीं बेहतर है। यदि ऐसी कोई हिंदी पार्टी बन जाए तो वह हरियाणा से लेकर झारखंड तक और जम्मू से लकर नागपुर तक के विशाल भूभाग को एक कर सकती है। यदि यह पार्टी तमिल, मलयालम, गुजराती, आदि अन्य भाषाओं के बोलनेवालों को आश्वासन दे कि देश भर से अंग्रेजी समाप्त किया जाएगा और सभी कामकाज भारतीय भाषाओं में होगा और हिंदी केवल संपर्क भाषा के रूप में रहेगी, तो वे भी साथ देंगे, क्योंकि अंग्रेजी के कारण उनकी भी हालत बुरी है।

डा. रामविलास शर्मा ने भारत की भाषा समस्या आदि अपनी कई पुस्तकों में उपर्युक्त विचारों को काफी विशद रूप से समझाया है। आश्चर्य यही है कि यद्यिप उनकी ये किताबें 1965-75 के दौरान ही छप चुकी थीं, हिंदी भाषियों ने उन पर गौर नहीं किया है।

अब समय आ गया है कि डा. शर्मा के विचारों का गंभीरता से अध्ययन किया जाए, और उन्होंने सच्चे राष्ट्र-निर्माण के लिए जो ढेर सारे अत्यंत व्यावहारिक और सर्वहितकारी सुझाव दिए हैं, उन पर अमल किया जाए।
 
   
 

Omprakash pal (pal.omprakash1@gmail.com) Allahabad

 
 रजनीश जी, संस्कृत जन-जन की भाषा बनेगी यह बात सोचना दिन में तारे देखने जैसी बात है. भगवा मंडली की अपनी डफली अपना राग है. उसे वो कभी कभी बजा लेते हैं, उसके चक्कर में अब देश को पड़ने की जरूरत नहीं है. जिस तरह से संस्कृत भाषा हाशिये पर धीरे धीरे पहुँच रही है उसी तरह आरएसएस भी राजनीतिक रूप से हाशिए की तरफ बढ़ रहा है. 
   
 

Deepak (Deepak) kuwait

 
 Wake up India. Wake up !! How long we will bound up with language, religion etc. Silly things. Chinese are even hard workers but are unable to survive in international market compared to indians due to their language limitation only.

Being an Indian you know hindi, Thats good !! But don't take flag and start march. Be Free like a human and just avoid such type of conservative people & thoughts.....
 
   
 

rajneesh mangla (rajneesh.mangla@gmail.com) germany

 
 लेकिन एक बात है। संस्कृत एक राष्ट्रभाषा के रूप में संपूर्ण भारत, खासकर दक्षिण भारतीयों को भी स्वीकार होगी, वो भी देवनागरी में। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा कभी नहीं मानेंगे। जहां तक जन जन की भाषा का सवाल है तो हो सकता है कि संस्कृत का पर्याप्त ज्ञान होने पर यह भी जन जन की भाषा बन सके। 
   

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