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देश को आडवाणी के योगदान और हमारी जिंदगियों के निजी मामले...

बात पते की

 

देश को आडवाणी के योगदान और हमारी जिंदगियों के निजी मामले

आस्तीन का अजगर

लेखक एक मशहूर ब्लागर हैं. अखाड़े का उदास मुगदर पर उनकी दूसरी रचनायें पढ़ी जा सकती हैं.

 

उसके बच्चे थे और वह इतिहास की मरम्मत के लिए नहीं, बल्कि हादसों के टालने का तरफदार था. वह चाहता था कि उसके बच्चे एक अच्छे हिंदू के बजाय एक अच्छा मनुष्य बनने में यकीन रखें. जैसे उसके मुसलमान दोस्त थे और उनका परिवार उसके परिवार की तरह था. नफरत उन्हें हिंदू या मुसलमान बना सकती थी. नफरत जिस असुरक्षा से आती थी, वह उस असुरक्षा का शिकार नहीं था और न ही चाहता था कि उसके बच्चे एक ऐसे देश और एक ऐसी पृथ्वी पर बड़े हों, जहां नफरत और असुरक्षा सियासी करंसियों की तरह न हों.

लालकृष्ण आडवाणी

 

जब हम बच्चों के लिए छोड़े जाने वाली दुनिया की बात करते हैं, तब वह हमेशा खूबसूरत और मानवीय होती है. कोई है जो ऐसा नहीं करने देना चाहता. वह इतिहास को सुधारने की जिद में जो कुछ लिखना चाह रहा है, उसकी सियाही खून है और उसकी इबारत नफरत भरी और उसके इरादे खौफनाक.

पिछले दशहरे को उसने बहुत से दोस्तों को एसएमएस पर दशहरे की राम राम लिख कर भेजा, जो कि उसके बचपन में उसके गांव के लोग कहते थे. तब बाबरी मस्जिद थी और राम राम एक शिष्ट, विनम्र अभिवादन था. उसके नाना की हवेली में जो बढ़ई मुसलमान आता था, उसे मामा कहना उसके लिए जरूरी था. एक दिन नहीं कहा तो नानी ने गर्मी की दोपहर उनके घर भेजा माफी मांगने के लिए. उन बढ़ई मामा की चाय का कप शायद अलग था, पर चाय थी, वे आते थे और उसके बचपन में धुलाई की थपकी की तरह जो क्रिकेट का बल्ला था, वह उन्होंने ही बना कर दिया था ये कहते हुए कि किरकेट से हॉकी ज्यादा बड़ा खेल है.

इस एसएमएस के दो तरह के जवाब आये. एक तो इस तरह का कि- सेम टू यू. दूसरा जय श्रीराम. राम को बख्तरबंद नारे में बदलने का सीधा योगदान दो लोगों का है- एक तो दूरदर्शन पर रामायण सीरियल दिखाने वाले रामानंद सागर का. दूसरा लालकृष्ण आडवाणी का. रामानंद सागर अब पता नहीं कहां हैं. आडवाणी फॉर पीएम का इश्तेहार वर्ल्ड वाइड वेब पर इस वक्त हर कहीं है.

पोर्नोग्राफिक वेबसाइट्स में लालकृष्ण आडवाणी को वोट देने के विज्ञापन नहीं आते होंगे (क्योंकि वे मैंने देखे नहीं), पर बाकी हर कहीं आते हैं. पाकिस्तान से लेकर अरब, यूरोप से लेकर अमेरिकी साइट्स तक (गूगल एडसेंस के साभार). क्या वर्चुअल रियलिटी में उनका फोटोशॉप किया गया चेहरा वह बदल सकता है, जो मेरी और तुम्हारी हकीकत में है.

83 साल के इस बुजुर्गवार के पास यह शायद आखिरी मौका है प्रधानमंत्री बन पाने का और इसलिए इस बार कोई भी लुकाछिपी या संकोच नहीं. लालकृष्ण आडवाणी की शिक्षा भले ही संदिग्ध हो (यहां लिखा है कि वे न तो ग्रेजुएट हैं, न एलएलबी, जैसा कि बताया जाता है), पर दीक्षा को लेकर कोई संदेह नहीं है.

 

जब इतिहास को ठीक करने वालों का इतिहास लिखा जाएगा, तो पता नहीं उनके कौन से योगदानों को स्वर्णाक्षर नसीब होंगे. आडवाणी का इस देश के लिए क्या योगदान है. मनमोहन सिंह कहते हैं कि बाबरी मस्जिद तुड़वाना उनका इकलौता योगदान है. मनमोहन सिंह थोड़े विनम्र हैं. स्वराज माज्दा नाम के ट्रक को रथ कहलवाने और राम के नाम पर कितने हजार लोगों को मरवाने में श्री आडवाणी जी का सीधा योगदान है.

 

गुजरात दंगों के दौरान देश के गृहमंत्री की हैसियत से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहना, कुछ न करना भी बड़ी बात है. (फोन किया तो था, उनकी बायोग्राफी बताती है. ये भी कि नरेन्द्र मोदी ने कहा सब कंट्रोल में है). और ये आडवाणी के ही बूते है कि वे एक हाथ से नरेंद्र मोदी की पीठ थपथपाते रहे, और नरेन्द्र मोदी की सरकार खुले आम लोगों को चुन चुन कर मारती रही और दूसरे हाथ से आडवाणी जी अपनी आंख से छलकते आंसू पोंछते रहे, जो उनके लिए खास तौर पर स्क्रीन किये गये 'तारे जमीं पर' शो के दौरान निकल रहे थे. आमिर खान जिनकी फ़ना गुजरात में बैन कर दी गई थी, आडवाणी की इस भावविह्वलता से हतप्रभ रह गये थे. अपनी खबरनवीसी के जमाने में आडवाणी जी फिल्म रिव्यू लिखा करते थे. यथार्थ और फिल्मों का रिव्यू एक जैसा कैसे हो सकता था.

आडवाणी का ये योगदान काफी संजीदगी से फिलहाल नहीं देखा गया है, पर बाद में भाषाविद, स्क्रीनप्ले लेखक और राजनीतिशास्त्र के माहिर लोग देखेंगे कि किस तरह से उन्होंने भाषाई तुक्कड़बाजी, अनुप्रास अलंकारों और बातों की बाजीगरी को एक टुच्ची आर्ट में बदल दिया.

 

बाबरी मस्जिद के गिरने पर यह कहकर कि- हम दुखी है, पर शर्मिंदा नहीं हैं. बाबरी मस्जिद के ध्वंस उनकी जिंदगी का सबसे दुःखद दिन था, उनकी आत्मकथा बताती है.

हिंदू की कई परिभाषा है. जब भाई बंदी की बात होती है तो देश में रह रहा मुसलमान भी हिंदू है. जब भाई बंदी की बात नहीं होती तो पड़ोस में नगर निगम की नौकरी कर रहा मुसलमान भी तालिबान है. फिर जिस हिंदू का खून न खौले, खून नहीं वह पानी है- ये नारा भी दीवारों पर तभी आया, जब आडवाणी का स्वराज माज्दा सड़क पर नफरत फैला रहा था.

जैसे अब वे कह रहे हैं कि पिंक चड्ढी फेम मुतलिक का उनकी पार्टी से कोई लेना देना नहीं है. जैसे उनका कोई भी सीधा रिश्ता साध्वी प्रज्ञा, डॉ प्रवीण तोगड़िया, साध्वी ऋतंभरा, मोहम्मद अली जिन्ना, दारा सिंह, बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाले कारसेवकों से नहीं रहा. कहानी पूर्णतः काल्पनिक रही और चरित्र- घटनाओं का वास्तविकता से मेल पूरी तरह से संयोगवश रहा.

एक समय उन्हें जिन्ना में वह दिखलाई दिया, जो एक विभाजनकारी ही देख सकता है. ये अलग बात है कि ये बात उल्टे उन्हीं के गले पड़ी. न संघ को मजा आया, न गांधी का कद कम हुआ.

चचचच अनुप्रास- चालचलनचोगाचरित्र... इस तरह के कई अनुप्रास उनके नारों, नीतियों में जबरने ठेले और पेले गये.

जब लखनऊ में मेरे मुसलमान दोस्त की बेटी स्कूल जाती है, तो मैं चाहता हूं कि उसकी बेटी और मेरी बेटी के सपनों में कोई कतरब्योंत न हो. मैं चाहता हूं वे भी हमारी तरह दोस्त रहें


जब उड़ीसा में ईसाइयों को मारा और एक नन का बलात्कार किया जा रहा था, आडवाणी जी उत्तर पूर्व में अफसोस जाहिर कर रहे थे, जैसे हमलावर किसी और विचारधारा के हों. जब मालेगांव धमाकों में साध्वी प्रज्ञा का नाम फंस रहा था, तो वे प्रधानमंत्री से उसे तंग न करने की मानवीय हिंदू अपील करने दौड़े गये और उस एसआईटी की शिकायत लगाई, जिसके बहादुर अफसर 26-11 के हमलों में मारे गये. हिंदू ताकतों द्वारा सामुहिक बलात्कार की शिकार बिलकीस बानो के बारे में आडवाणी मुंह में दही जमाए बैठे रहे, जो उनके प्रिय मुख्यमंत्री नरेंद्र भाई मोदी की सरकार, हिंदुत्व और विचारधारा की सबसे घिनौनी मिसाल है.

आडवाणी जी की एक और खास बात यह भी है कि वे तथ्यों को लेकर बहुत सीरियस नहीं है, जब तक उनका उद्देश्य हल हो रहा हो. उनकी किताब में इमरजेंसी की तारीख भी गलत लिखी है, जब वे खुद जेल में थे. और यह अकेली गलती नहीं. वे कहते हैं इमरजेंसी भारत के इतिहास का सबसे स्याह हिस्सा थी.

 

आडवाणी जी का सबसे बड़ा योगदान यह भी है कि दुनिया में और कहीं भी- सिवा हिटलर के जर्मनी के- बहुसंख्य वर्ग को असुरक्षित नहीं महसूस करवाया जा सका. जहां से भी सीखा है, वे इतिहास के गलत को ठीक करने के लिए उन लोगों का इस्तेमाल करना चाहते हैं, जो उसके लिए जिम्मेदार नहीं थे. वे अतीत के काल्पनिक दोषों को ठीक करने के लिए वर्तमान को सबक सिखाना चाह रहे हैं.

 

जब अहमदाबाद में मेरी मुसलमान दोस्त को किराये का मकान नहीं मिल पाता है, तो ये योगदान लालकृष्ण आडवाणी का ही है, भले ही वे इसकी जिम्मेदारी न लें. जब लखनऊ में मेरे मुसलमान दोस्त की बेटी स्कूल जाती है, तो मैं चाहता हूं कि उसकी बेटी और मेरी बेटी के सपनों में कोई कतरब्योंत न हो. मैं चाहता हूं वे भी हमारी तरह दोस्त रहें (मैं मिला हूं अहमदाबाद की एक ही गली में रहने वाले लोगों से जिन्होंने कहा- हम साथ में क्रिकेट खेलते थे. हमारे बच्चे नहीं खेलते. ये योगदान किसका है..) जब मैं और मेरा दोस्त न रहें तब भी. और मैं यह जानता हूं कि श्री लालकृष्ण आडवाणी ऐसा नहीं चाहते.

भले ही तोड़मरोड़ कर पेश किये गये उनके सच का बहुत मंहगा मीडिया प्लान हो.

नाना अब नहीं है. बढ़ई मामा का पता नहीं. हवेली दरक रही है. भारतीय जनता पार्टी के मैनिफेस्टो में फिर राम मंदिर है. जो एनडीए के मैनिफेस्टो में नहीं होगा.

 

04.04.2009, 20.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Arvind moradabad

 
 perhaps this writer is very coward who don,t recognize your identity. i know Mr.adwani is a very strong leader and he should be prime minister of India ,and i would like to say please write something about congress and what they have done for country and i think congress is dividing the country not B J Pˇthink deeply. 
   
 

roger lobo () bangalore

 
 good article.....someone please translate into english..... 
   
 

pratibimb UAE

 
 सब लोग अडवाणी जी के पीछे पड़े है. लगता है कुछ लोगो में डर है. लेकिन यदि आप लोग एन डी ए की सरकार के वक्त का जायजा ले आप महसूस करेंगे कि ऐसा कुछ नहीं हुआ की कांग्रेस सरकार अपने शासन काल को उनसे बढ़िया बताये. कुछ लोगो ने सही कहा की कांग्रेस का विश्लेषण जरुरी है. यह भी सत्य होगा की बी जे पी कोई भी ऐसा कार्य करेगी की सत्ता खोने का डर या लोगो का विशवास न हासिल कर पाए बाद में. चुनाव में जीतने के लिए चाहे कोई भी हथकंडे अपनाए. पर मिडिया ने इस बार ज्यादा कांग्रेस के पक्ष में और एन डी ए के विरोध में ही बाते की. क्यों ? उसका विश्लेषण भी जरुरी है. 
   
 

योगेश भारती (yogeshbhartipatna@gmail.com) पटना (स्थायी), रांची (अस्थायी)

 
 एक साथ कई लोगों को आपत्ति हुई इस टिप्पणी से। इसमें ऐसा कुछ भी नहीं लिखा हुआ है, जिससे लोगों को बहुत ज्यादा कष्ट हो। अरे जो फैक्ट है वो सामने है। मेरा मानना है कि आडवाणी ने कई और कारनामे भी किये हैं। उन्हें तो वैसे भी राष्ट्र के साथ गद्दारी करने के आरोप में एकाध साल में जेल जाना ही है। उन्हें मैनडेट मिल भी गया, तो भी वे प्रधानमंत्री के पद पर ज्यादा दिनों तक थोड़े ही रह पायेंगे। काहे माथा फोड़ रहे हैं आप लोग अपना ही.... 
   
 

RAJ SINH NEW YORK

 
 एकतरफा. प्रायोजित ही होगा. पहले पढ़ें देश का इतिहास फिर जाने पाकिस्तान कैसे बना. ये अजगर सेकुलर है यानी शब्दों का बाजीगर और छद्म का नमूना. 
   
 

madhvi, new delhi (madhvi007@hotmail.com)

 
 why we always accuse HINUISM? is not Mr.Manmohan Singh is wrong when he talk about minority i.e. undoubty muslim only when we have sikh, jain, budhist,christain etc also. why hindu has done any thing wrong if he/she is poor by taking birth in hindu religion? why not economic criteria for developments for all the Indians rather than religion if we r secular country at all.congress has ruled the nation more than for 50 yrs bjp led NDA for 8 years only. why we don't have total growth for all the indians specially your friends muslims. your sachchar committee report is saying muslims in bengal is in very poor shape it means communist party, secular communist party also can n't give development to only muslim.If it was BJP govt in bengal then to you secular or communist people would not have left the BJP unspare.
have you guys ever thought for kashmiri hindu who had been draged from kashmir.fany bangladeshi hindu who are systematically being killed over there, any pakistani hinuds who are also systematically being killed or marginalised intheir own country. don't u think they also need a testa sitalwad or supporters who can fight for their right.
last but not the least don't muslim communities fight with each other in the name of state , language, status.
what is the status of muslim who have gone to pakistan r not they dominated by punjabi muslim over there...? lot to be said ...
and yes dig congress history also - killing of sikhs all over india , giving clean chit to tytler, sajjan kumar, qutrochky.. so many...
no one is holy cow over here. ppl are supporting advani becoz they are seeing the reality of the hindus all over the world and ground reality of ordinary india. this Mr. Immam bukhari has given once his support to Mr. Advani who is accusing him of so many things.Why congress has not choosen Mr. Abdul Kalam for next term in president house in INdia , then minority issue doesn't come up. Every one love blind loyalist, be it any party.
 
   
 

Ravi New Delhi

 
 मान्यवर बेनाम जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर काफी शर्मशार हुआ. कारण कि आप गुरिल्ला युद्ध में विश्वास करते हैं या डरपोक हैं.मैं भी एक छोटा सा पत्रकार हूँ.अपना नाम छुपाना कभी भी उचित नहीं लगा. विचार मीमांसा की तल्ख़ रेपोर्ताजों में मैंने अपना नाम बखूबी दिया और गलत के खिलाफ लडाई जारी रखी. अडवानी हों या कोई और आपको अपना नाम नहीं छिपाना चाहिए.

 
   
 

NItin Kumar Jadhav (nitin_jadhav04@yahoo.com) Indore

 
 मेरे महान देश की सभी राजनीतिक पार्टी एक जैसी हैं. अंग्रेजों का छोड़ा गया बाकी का काम ये हम भारतीयों को आपस में लड़ाने के लिए कर रहे हैं. इन्हें तो सिर्फ अपनी कुर्सी से मतलब है. ये बात देश का हर समझदार नागरिक जानता है, चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान, या सिक्ख या ईसाई.
इसलिए अबकि बार मैंने तय किया है कि मैं नितिन कुमार 2009 के चुनाव में किसी भी पार्टी को अपना बहुमूल्य वोट नहीं दूंगा. आप सभी लोगों से भी मेरा यही निवेदन है. अगर आपको मेरी राय पसंद न हो तो कृपया आप ही बताएं की कौन सी पार्टी ऐसी है, जिसकी छवि स्वच्छ है ?
 
   
 

ishan lucknow

 
 the fact written above need a lot of daring for writing,hats off to u.. 
   
 

anand bharti (anandbharti@rediffmail.com) mumbai

 
 आडवाणी के पहले भी भारत था, दंगे तब भी होते थे, caste war चलते थे. Secular forces और socialist उस समय भी मजबूरी जताते थे लेकिन आज जितने ये लोग निकम्मे हो गए हैं वो चिंता की बात हो गई है. इनकी एक ही कोशिश है कि सत्ता में कैसे हिस्सेदार बनें. इसलिए लालू जी जैसे लोग चुनाव के समय बाबरी मस्जिद का भूत बुलाने लगे हैं ताकि मुस्लिम वोट की थाली सजी रहे. आड़वाणी जितने जिम्मेदार हैं भाईचारा बिगाड़ने के लिए उससे ज्यादा दोषी हैं secular लोग जो कड़वा कड़वा थू मीठा गप्प में विश्वास रखते हैं. लेखक जी आपको अगर भड़ास निकालनी है तो अपने नाम से निकालते. ये जो आपका डरपोकपन है ये देश को नामर्द बना रहा है. किसी विचारधारा से लड़ने के लिए तर्क औऱ हिम्मत चाहिए. फिर भी आपको बधाई की आपने कुछ बात कही. 
   
 

vivek sanyal Mumbai

 
 इतना सच लिखने के लिए जो दृष्टि और हिम्मत चाहिए, उसे सलाम...... 
   
 

padam singh (padamchef30@yahoo.co.in) budapest

 
 i dont know who is writing this but what i know mr.adwani is a very strong leader and he should be prime minister of india ,and i would like to say plese write somethig about congress and what they have done for country and ithink congress is dividing the countˇthink deeply thanks 
   
 

Manvendra () kanpur

 
 Writer has a problem of being democratic via Muslim favor. This a big problem of intellectual in India, buy abusing anyone who favors Hinduism. Why it is so? There is no way out.

Late Kamlapati Tripathi CM of UP and home minister created first riot in Varanasi when he felt he would lose the vote. No one writes history of congress. Congress is the first who introduced riot politics. Modi was nothing when we investigate Congress history.

Q. WHY ONE SHOULD NOT TALK ABOUT HINDUISM? OR ABOUT HINDU INTEREST? IS IT NOT PART OF POLITICS. WHAT POLITICS IS THEN? TALKING ABOUT PEOPLES INTEREST IS WHAT IS POLITICS. Congress fears this kind of politics because it always talked about Muslim interests from the very beginning. Writer should ask this to politicians.
 
   
 

Ajai (aksbbk@yahoo.com) Lucknow

 
 Write any thing but include facts and figures. 
   
 

suraj delhi () delhi

 
 Now mr Aastin ka ajgar, see the mandate in comments. what it says, that you are wrong. do not try to become intellectual of narrow mindedness, try to analyze the facts and history and write facts. I am a left oriented man but i find him better then CPM OR CPI except cpiml. Advani is a only hope who can over through congress rajsahi. Let help him so far others could get a chance. Big challenge is this in Indian politics and democracy. After this try to attack feudalism in politics, culture and literature.It has dominated democracy, be free minded and think truthfully.  
   
 

yashwant raipur

 
 भाई साहब, आप अपना नाम क्यों छुपाते हैं ? सच बोलने वाले डरते नहीं हैं. रही बात नेता लोगों कि तो ये सब एक ही थैले के चट्टे-बट्टे हैं. वोट बैंक की राजनीति सभी करते हैं. आपका लेख आडवाणी जी के लिए सही है लेकिन और भी नेता हैं, उनकी भी खातिरदारी करें. 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad

 
 आडवाणी वही सब कुछ कर रहे हैं जो तीन प्रतिष्ठित लोगों को अच्छा लगता है. इससे ज्यादा वो कुछ कर भी नहीं सकते. ईश्वर जाने राजनीति में वह कैसे आ गए उन्हें तो किसी मंदिर का पुजारी होना चाहिए था. यदि आ ही गए तो उनसे चिंतित क्यों हो रहे हैं ? बस एक काम करिए उन्हें और उनके समर्थकों को वोट मत दीजिए.
दूसरी ओर और तरह के गुंडे हैं उनका भी यही हाल करना होगा. नापसंद को विकल्प तो खुला है एक बार उसे भी आजमाएं ? और इनसे निजात पाएं.
 
   
 

aniket tiwari Gadhwa, Jharkhand

 
 Dear mr Ajgar,
i think you are a so called leftist. have you seen ever the Advani inscribed the message in the Visitors’ Book at the Jinnah Mausoleum on 4th June 2005-

“There are many people who leave an inerasable stamp on history. But there are very few who actually create history. Quaid-e-Azam Mohammed Ali Jinnah was one such rare individual. In his early years, Sarojini Naidu, a leading luminary of India’s freedom struggle, described Mr. Jinnah as an "Ambassador of Hindu-Muslim Unity". His address to the Constituent Assembly of Pakistan on August 11, 1947 is a classic, a forceful espousal of a Secular State in which every citizen would be free to practise his own religion but the State shall make no distinction between one citizen and another on the grounds of faith.
My respectful homage to this great man.”
 
   
 

कुमार संभव नोयडा

 
 अकेले अडवाणी क्यों ? इंदिरा गांधी और नरसिम्हा राव के जमाने में भी तो वही सब कुछ हुआ था.और मुलायम सिंह ? कल्याण सिंह को गोद में बिठाने वाले मुलायम सिंह को क्या आप दूध का धुला मानते हैं ? हरियाणा में हीरो होंडा के मज़दूरों को जानवरों की तरह घेर कर मारा जाता है और प्रकाश करात जैसे एसी वामपंथी मुंह में दही जमाए बैठे रहते हैं. बंगाल में ताप्ति बसु को बुद्ददेव बाबू के गुंडे बलात्कार के बाद मार डालते हैं, इसे सारे देश ने देखा है. तो भइया अजगर, इन वामपंथियों में और अडवाणी में कोई फर्क नहीं है. सब एक जैसे हैं और आपको केवल अडवाणी की ऐसी-तैसी करने में क्यों मज़ा आता है, यह तो आप ही जानें. लेकिन कभी फुर्सत मिले तो अडवाणी से परे भी देखें. 
   
 

Niranjan Singh Patna

 
 लगता है आडवाणी को गाली बकना सबसे सरल काम है और हरेक आदमी उनके बारे में कुछ भी बक जाता है. मुझे इस बात पर आश्चर्य है कि लेखक में इतना साहस भी नहीं है कि वह अपना नाम तक जाहिर करे. 
   
 

suraj delhi

 
 शिक्षा भले ही संदिग्ध हो

do you consider education means degree? he is one of the few best educated man in Indian politics. some time go and have a look at his personal library, its huge. And why old raga on advani? try to catch congress to because it peruses imperialist policies and promotes imperialist culture etc. do you think Nehru is a democratic man? he is a feudal lard with liberal face this is why he declared Maithili Sran Gupta rastra kavi.who wrote--

yadi hota kinnar naresh main
raj mahal me hota
sone ka singhasan hota
sir par mukut chamakta
bandi jana guna gate rahte
darwaje par mere....

And he aspired for it. Still today you can see this in congress culture, its all feaudal. A least in advani you will not find it.

so contemplate on history and then write
 
   

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