बस्तर, विनायक और मानवाधिकार
मुद्दा
बस्तर, विनायक और मानवाधिकार
अरुंधति राय
डॉं. बिनायक सेन पिछले 22 महीनों से जेल में हैं. वे भारत के एक सबसे दमनकारी
कानूनों में से एक " छत्तीसगढ़ विशेष जनसुरक्षा अधिनियम "
के अंतर्गत निरुद्ध हैं. इस अधिनियम में “गैरकानूनी गतिविधि” की परिभाषा इतनी व्यापक
और धुंधली है कि उसमें हर व्यक्ति दोषी है, जब तक कि वह अपने आप को निर्दोष
साबित न कर सके.
डॉ.
सेन की जमानत याचिका दो बार निरस्त हुई, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय से,
दोनों ही बार प्रारंभिक स्तर पर. दोनों ही बार मामले के गुण-दोष पर कोई चर्चा नहीं
हुई. 2 दिसंबर 2008 को छत्तीसगढ़ के उच्च न्यायालय ने पुनः उनकी जमानत याचिका, बिना
गुण-दोष में गए, खारिज कर दी, यह कहते हुए कि “परिस्थितियों
में कोई परिवर्तन नहीं है.”
पर परिस्थितियों
में परिवर्तन हुआ है. इस बीच आरोप पत्र दाखिल हुआ है. अभियोजन ने 64 साक्षियों का
बयान लिया है. इनमें से एक ने भी अभियोजन के आरोपों को पुष्ट करने लायक, कानूनी
रूप से ग्राह्य सबूत पेश नहीं किए हैं. यहां तक कि जेल अधिकारियों, जेल अधीक्षक और
जेलर–
जिन्हें अभियोजन ने गवाह बनाया था;
ने डॉ. सेन द्वारा नारायण सान्याल
के पत्रों के वाहक होने के संभावना से पूर्णतः इंकार किया है.
यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि
नारायण सान्याल, जिन्हें वरिष्ठ माओवादी नेता कहा जा रहा है और जो केन्द्रीय जेल
रायपुर के उच्च सुरक्षा कैदी हैं;
की एक स्वास्थ्य समस्या भी है जिसके लिए उन्हें समय-समय पर
शल्य चिकित्सा की आवश्यकता थी. और इसीलिए जेल अधिकारी डॉ. बिनायक सेन को उनसे मिलने की
अनुमति देते थे.
डॉ. सेन को आज
भी जेल में रखा जाना, जबकि उनके विरुद्ध बनाया गया मुकदमा लगभग असफल हो चुका है; आज
छत्तीसगढ़ में व्याप्त गंभीर परिस्थिति को इंगित करता है.
राज्य में एक गृह युद्ध
चल रहा है. सैकड़ों मारे जा रहे हैं, जेलों में ठूसे जा रहे हैं. सैकड़ों-हजारों
गरीब से गरीबतम जनता जंगलों में छुपी हुई है. उन्हें अपनी जान का डर है. भोजन,
हाट-बाजार, स्कूल, अस्पताल–
सब उनकी पहुँच से बाहर हैं. वे हजारों लोग, जो सरकार समर्थित जनमिलिशिया–
सलवा जुडूम के कैम्पों में आए हैं, वे घुटन भरे कैद में हैं, जहां सशस्त्र
पुलिस का पहरा है. नफरत, हिंसा और पाश्विकता बेदर्दी से फैलाई जा रही है, जिसमें
गरीब को गरीबतम से लड़वाया जा रहा है.
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उनकी
कैद का मकसद है छत्तीसगढ़ में चल रहे गृहयुद्ध के आसपास चुप्पी की एक दीवार खड़ी
करना. |
इसमें कोई शक
नहीं कि डॉ. सेन इसलिए जेल में हैं क्योंकि उन्होंने राज्य सरकार की इस नीति का
विरोध किया है, उन्होंने सलवा जुडूम का विरोध किया. उनकी कैद का मकसद है विरोध के
स्वर को दबाना और लोकतांत्रिक गतिविधियों को भी अपराधिक करार देना. इसका मकसद है
छत्तीसगढ़ में चल रहे गृहयुद्ध के आसपास चुप्पी की एक दीवार खड़ी करना. इसका मकसद
है हमारा सारा ध्यान खींच लेना, ताकि उन सैकडों नाम-विहीन, चेहरा-विहीन
लोगों-जिनके पास वकील नहीं, जिन पर पत्रकार ध्यान नहीं देते,
जो जंगलों में भूखे हैं, मर रहे हैं; वे अदृश्य और अलिखित ही रहें.
कल विश्व
स्वास्थ्य दिवस है. डॉ. बिनायक सेन ने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा भारत के गरीब से
गरीब लोगों के बीच कार्य करने में बिताया, जो सरकार के ध्यान से बहुत दूर है. जिनके
पास न दवाखाना है, न अस्पताल. न डॉक्टर और न दवाई. उन्होंने हजारों लोगों को उस
निश्चित मौत से बचाया है जो मलेरिया, दस्त और आसानी से उपचार होने वाली बीमारियों
से हो जाती.
फिर भी वो जेल
में हैं, जबकि वे लोग जो धड़ल्ले से जनसंहार की बात करते हैं, वे बड़े मजे से खूले
घूमते हैं और चुनाव में भी खड़े हो सकते हैं.
यह हमारे बारे
में क्या बताता है ? हम कौन है
और कहां जा रहे हैं ?
06.04.2009, 11.47 (GMT+05:30) पर प्रकाशित