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साहित्यः ईरानी कहानी

साहित्यः ईरानी कहानी

 

अपना देश

सईद नफीसी

अनुवाद : फैयाज अहमद

 


अब से अस्सी साल पहले ईरान की पुरानी पीढी का एक बूढा हेरात में रहता था. उसका नाम नसरुल्लाह था. वह अपनी जिंदगी के 74 वर्ष पूरे कर चुका था. यों तो वह 'दहख्वारकां' का रहनेवाला था, लेकिन दुनिया के कारोबार उसे हेरात खींच लाये थे. वह यहां मेहनत मजदूरी किया करता था.

नसरुल्लाह उन लोगों में से था, जो किसी भी चीज से प्यार नहीं करते. जब वह बच्चा था, तभी उसके मां-बाप गुजर गये. इसलिए उसे बाप के प्यार और मां की ममता का अंदाजा नहीं था. अगर कोई मां किसी गली में अपने बच्चे को अपनी छाती से लगाये चूम रही होती तो उसे यह चीज बहुत नागवार लगती थी. वह उस गली में जाना ही पसंद नहीं करता था.

ईरानी कहानी


वह अपना घर भी नहीं बसा सका था, इसलिए घरेलू जिंदगी का मजा उसे नहीं मालूम था. अब तक उसे न तो किसी से प्यार हुआ था और न ही किसी ने उससे प्यार किया था. उसका मानना था कि जब इस दुनिया से एक दिन जाना ही है तो प्यार-व्यार के चक्कर में क्यों फंसा जाये. यही वजह थी कि उसके यहां किसी का भी आना-जाना नहीं था और न ही उसका कोई दोस्त था. उसका अपना कोई ठिकाना भी नहीं था. जहां रात होती, वहीं सो लेता. उसे किसी एक मुहल्ले से तो क्या किसी एक देश से भी नहीं जोडा जा सकता था. वह बूढा अपने दिल-दिमाग, सबसे आजाद था.

उन्हीं दिनों खुरासान में जंग छिड गयी. पहले तो ईरानी फौज का पलडा भारी रहा, फिर पांसा पलटा और अंगरेजों ने उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर दिया. इसलिए हेरात और दूसरे शहरों के लिए खतरा पैदा हो गया. लोग डरने लगे और शहर के वे पूंजीपति, जिन्हें अपने देश पर बहुत नाज था, दुम दबा कर भाग खडे हुए. जिनके पास जायदाद थी, वे उसे औने-पौने बेच कर मशहद और दूसरी महफूज जगहों पर चले गये.

इसी अफरा-तफरी में नसरुल्लाह की चांदी हो गयी. वह सुबह से शाम तक शरणार्थियों का सामान उठाने में लग गया. उसकी आमदनी दिन दोगुनी और रात चौगुनी हो गयी. जब शाम को नसरुल्लाह चाय दुकान में पहुंचता तो अक्सर हेरात छोड कर जानेवालों को कोसता और उन्हें बुरा-भला कहता, "बुजदिल कहीं के ...टसऊ बहाते हैं... यह नहीं सोचते कि हेरात और मशहद में क्या फर्क है. वह भी खुदा की जमीन है और यह भी. और अगर जाना ही है तो फिर रोना-धोना क्यों...हेरात से अगर इतनी ही मुहब्बत है तो मत जाओ, कौन कहता है जाने को."

 

लोग उसे समझाते, " बडे मियां, हर आदमी अपने वतन से प्यार करता है. जहां आप ने पूरी जिंदगी गुजारी हो, वहां से हमेशा के लिए जाना पडे तो आंख भर ही आती है." लेकिन नसरुल्लाह पर कोई असर नहीं होता. वह बस अपना ही राग अलापता रहता.

एक दिन शहर के एक प्रतिष्ठित खान ने उसे बुला कर कहा, " बडे मियां, जमाने के रंग-ढंग आप देख ही रहे हैं. बहुत से लोग शहर छोड कर चले गये और बाकी भी जाने को तैयार बैठे हैं... मैं भी चाहता हूं कि किसी महफूज जगह पर न चला जाऊं. पर यह सोचता हूं कि मेरे बाद मेरे बाग का क्या होगा. इस वक्त इसका कोई खरीदार भी नहीं है... अगर मेरा बाग तुम संभाल लो तो मैं इतमीनान से यहां से जा सकूंगा. वैसे भी तुम बूढे हो चुके हो, बोझ उठाने की ताकत अब तुम में रही नहीं. अगर यह काम तुम अपने जिम्मे ले लो तो रोजी-रोटी की तलाश में भटकने से बच जाओगे."


पिछले कुछ दिनों से नसरुल्लाह को भी यह लगने लगा था कि वह अब बूढा हो चुका है. बोझ उठाने की ताकत नहीं रह गयी थी. चुनांचे उसने हामी भर ली और बोरिया-बिस्तर लेकर खान के बाग में आ गया.

मेहनत-मशक्कत करनेवाला तो वह था ही. कुछ ही दिनों में बाग का नक्शा ही बदल गया. उसने बहुत से नये पौधे लगाये. बहुत से सडे-गले पौधों को उखाड फेंका. नहर को साफ किया. कई घंटे लगातार काम करने के बाद जब वह थक जाता तो उसी नहर के किनारे बैठ जाता और अपने लगाये हुए पौधों को फलते-फूलते देख कर खुश होता रहता.

एक दिन अचानक उसकी नजर नहर की तह पर जा पडी. छोटे-छोटे पत्थर के टुकडे पानी के तेज बहाव का मुकाबला कर रहे थे. पानी उन्हें अपने साथ बहा ले जाना चाहता था, लेकिन वे मजबूती से अपनी जगह पर जमे थे. उन्हें देख कर नसरुल्लाह को ऐसा लगा, जैसे दुश्मन की फौज निहत्थे शहरियों को शहर से बाहर निकाल देना चाहती है, लेकिन वे पूरे हौसले के साथ अपने-अपने घरों में डटे हुए हैं.

आखिर वह मनहूस घड़ी भी आ गयी, जब हेरात पर दुश्मनों का कब्जा हो गया. नयी सरकार ने शहर छोड कर जानेवालों की जायदादें जब्त कर लीं. खान का बाग भी नहीं बच सका. हाकिमों ने उसे भी छीन लिया और नसरुल्लाह को जबरदस्ती निकाल दिया. अब वहां किसी माली की जरूरत नहीं थी. सच तो यह था कि हाकिम यह काम अपने किसी खास आदमी से कराना चाहते थे.

नसरुल्लाह उदास रहने लगा. वह अक्सर रो पडता, कभी-कभी वह बाग के जंगले पर चढ जाता और हसरत भरी निगाहों से बाग को देखता रहता. उसे बाग से बेइंतहा प्यार था. उसका बस चलता तो वह दुश्मनों को मार भगाता, लेकिन वह मजबूर था.

उसकी आमदनी का सिलसिला बंद हो गया था. उसने फिर से बोझा उठाने का काम शुरू कर दिया, लेकिन अब तक उसके मिजाज में काफी तबदीली आ चुकी थी. कुछ महीने पहले तक उसे बोझा उठाने में मजा आता था, लेकिन अब बोझा उठाते हुए उसके सीने पर सांप-सा लोटता है. उसका दिल करता था कि वह सामान को जमीन पर पटक दे. ऐसा आदमी, जिसे दुनिया से कोई मतलब नहीं था, जो दिल-दिमाग दोनों से आजाद था, जिसे मुहब्बत या नफरत का मतलब भी नहीं मालूम था, आज गुस्से की आग में जल रहा था.

एक दिन अपनी आदत के मुताबिक वह बाग के जंगले पर मायूस खडा था कि उसे उसी नहर का ख्याल आया, जिसमें छोटे-छोटे पत्थर पानी के तेज बहाव का मुकाबला कर रहे थे. उन पत्थरों को अपनी जगह से बहुत प्यार था, इसलिए वे वहां से जाना नहीं चाहते थे, नसरुल्लाह ने सोचा.

उस दिन के बाद किसी ने भी नसरुल्लाह को हेरात में नहीं देखा. हां, दो महीने बाद 'दहख्वारकां' के वासियों ने एक बहुत ही कमजोर बूढे को देखा, जिसके कपडों पर धूल-मिट्टी जमा थी और जिसने अपनी लाठी के एक सिरे पर एक छोटी-सी गठरी बांध रखी थी. वह नसरुल्लाह के बाप रजब अली के घर का पता पूछ रहा था.

12.04.2009, 11.49 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

priyank () pantnahar -uttarakhand

 
 आप की कहानियां वास्तविकता और यथातथा की प्रतीक हैं.  
   
 

prachi minneapolis, usa

 
 घर में अकेली बैठी थी तो ये कहानी पढ़ी. रात से ही मम्मी की बहुत याद आ रही है... ये कहानी बहुत ही अपनी लगी. 
   
 

हरियश राय (hariyashrai@gmail.com) अहमदबाद

 
 बेहतरीन कहानी है और मार्मिक भी. अर्थ की अनेक पर्ते इस कहानी में मौजूद हैं.‍इस तरह की कहानियां प्रकाशित करते रहा करें. 
   

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