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इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

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थप्पड़ के नाम पर

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रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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कौन बनाएगा प्रधानमंत्री

जनमत

 

कौन बनाएगा प्रधानमंत्री !

योगेंद्र यादव

 

इस गुरुवार को पहले दौर का मतदान खत्म होने के बाद पोलिंग बूथ से छनकर आती तस्वीरों के बीच एक बड़ा सवाल गुम हो जाएगा. जाहिर है कि मीडिया का फोकस नक्सली और अलगाववादी हिंसा पर होगा. इस बीच आपको कतार में खड़े बॉलीवुड के सितारों या बड़े औद्योगिक घरानों की कुछ दिलचस्प कहानियां मिल सकती हैं.

चुनाव


आप महानगरों और बड़े शहरों के वोटरों की नाराजगी से रूबरू हो सकते हैं, लेकिन दूरदराज के इलाकों में लोकतंत्र के हथियार का इस्तेमाल करता एक गंवई चेहरा कभी-कभार ही उभार लेता दिखाई देगा. हां, आकाशवाणी-दूरदर्शन की शैली में परंपरा, हर्षोल्लास के साथ सज-धजकर वोट देने जाती आदिवासी महिलाओं की तस्वीर जरूर आ जाएगी. लेकिन इसे सरकारी उत्सवधर्मिता के आईने में पेश किया जाएगा. भारी मतदान हुआ तो इसे वोटर के गुस्से का नाम दिया जाएगा. मतदान कम हुआ तो वोटर की उदासीनता या मौजूदा राजनीति के प्रति उसकी घृणा के आईने में पेश किया जाएगा.

कौन बनेगा प्रधानमंत्री? किसकी होगी सरकार? इन दो सवालों के इर्द-गिर्द सिमटी इस बहस में दो बुनियादी सवाल गुम होते जा रहे हैं. कौन बनाएगा प्रधानमंत्री? कैसा होगा लोकतंत्र? हकीकत यह है कि हमारे देश में लोकतंत्र की जड़ें लगातार नया विस्तार और गहराई ले रही हैं.

यहां उदासीनता और घृणा की जगह लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का विस्फोट दिखाई दे रहा है. राजनीति में भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है. इसके चलते आज भारत लोकतंत्र के इतिहास में बाकी दुनिया के लिए मिसाल बन चुका है. लेकिन दिक्कत यह है कि कुछ गढ़ी-गढ़ाई छवियों और सोच से घिरा हमारा मीडिया इनसे बाहर नहीं निकलना चाहता, इसीलिए वह भारतीय लोकतंत्र में उफान लेती राजनीतिक भागीदारी की शिनाख्त करने में चूक जाता है.

राजनीति में बढ़ती भागीदारी का आईना दिखाने के लिए हमें पहले इस मिथक को तोड़ना होगा, जो मतदान के जरिए नतीजों को पढ़ने के सूत्र थमाता है. ये मान्यता देश में पहली दो सत्ता विरोधी लहरों से जुड़ी है. वर्ष 1967 और 1977 के चुनावों में मतदान प्रतिशत बढ़ा और कांग्रेस के खिलाफ वोटर की नाराजगी भी उभरी, लेकिन 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर ने भी मतदान के सारे रिकॉर्ड तोड़ते हुए राजीव गांधी को दिल्ली की गद्दी तक पहुंचाया.

बीते दो दशक में न पक्ष और न विरोध में ऐसी कोई लहर देखने को मिली है. इसके बावजूद मतदान और नतीजों को लेकर गढ़ा मिथक टूट नहीं पाया है. बीते पांच वर्षो में 31 विधानसभाओं के लिए वोट डाले गए. 14 राज्यों में मतदान पिछली बार की तुलना में दो या दो फीसदी से अधिक रहा. लेकिन, सिर्फ छह राज्यों में ही सरकारें बदलीं. इससे उलट, जिन बाकी राज्यों में पिछले चुनावों के बराबर या उससे भी कम वोट पड़े, वहां सरकारों में बदलाव दिखा.

देश के आम आदमी की राजनीति में बढ़ती भागीदारी और दिलचस्पी को आप हर ढाबे, चौपाल या ड्राइंगरूम में महसूस कर सकते हैं. दुनिया के बाकी देशों में जहां मतदान धीरे-धीरे गिर रहा है, वहीं हमारे देश में मतदान में धीरे-धीरे बढ़ोतरी दिख रही है.

यह सच है कि अपने लोकसभा चुनावों के मतदान को हम दुनिया के बाकी देशों के समानांतर रखें तो भारत बीच की पायदान के कुछ नीचे ही ठहरता है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में औसतन 65 फीसदी मतदान हुआ. इसके मुकाबले 57 फीसदी मतदान के साथ भारत पीछे दिखाई दे सकता है. अगर भागीदारी का स्तर बरकरार रहे तो इस बार मतदान के आंकड़ों में बढ़ोतरी की उम्मीद की जानी चाहिए.

अगर हम चुनावों और राजनीति में भागीदारी को राज्यों की जमीन पर टटोलें तो भारत यूरोप और अमेरिका से बेहतर स्थिति में दिखता है. वहां लगातार मतदान कम हो रहा है, जबकि भारत में इसके उलट राज्यों में मतदान में बढ़ोतरी हो रही है. आज विधानसभा चुनावों में औसतन 70 फीसदी तक मतदान होता है. पंचायत और म्यूनिसिपल चुनावों में ये आंकड़ा 75 से 80 फीसदी तक चला जाता है. इस दौर मे जहां मतदान को लेकर नागरिकों में उदासीनता घर करती जा रही है, भारत का धीरे-धीरे बढ़ता आंकड़ा राजनीति में आम आदमी की बढ़ती भागीदारी को और मजबूती से पेश करता है.


पश्चिम में गढ़ी गई राजनीति की समझ में राजनीति और चुनाव में भागीदारी को सामाजिक हैसियत से जोड़कर देखा जाता है. आप ज्यादा धनवान हैं, ज्यादा पढ़े-लिखे हैं और बहुसंख्यक समुदाय का हिस्सा हैं, तो आप राजनीति में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं.

लेकिन भारत इस बनी-बनाई पश्चिमी सोच को तोड़ता है. हमारे देश के शहरों में अमीरों की तुलना में गरीब ज्यादा वोट डालते हैं. सामाजिक वर्ण व्यवस्था में सबसे नीचे खड़ा दलित आज अगड़ी जातियों से ज्यादा अपने वोट का इस्तेमाल करता है. पिछले तीन दशक से शहर के मुकाबले गांवों में ज्यादा मतदान होता है.

हालांकि, अभी भी पुरुषों की तुलना में महिलाएं कम वोट डालती हैं. आदिवासी भी कम मतदान करते हैं. लेकिन, ये फासला लगातार कम हो रहा है. मुस्लिम वोटरों का आंकड़ा साफ नहीं है. आज लोकतंत्र अमीर और भद्रलोक की बपौती नहीं है. सामाजिक और आर्थिक पायदान पर सबसे नीचे खड़ा एक आम नागरिक भी आज अपने वोट की कीमत जानता है. हमारी राजनीति और चुनावों में भागीदारी की यह सोच हमारे लोकतंत्र की जड़ों को गहराई तक ले जा रही है.

निचले तबके के इस लोकतांत्रिक जन उभार को आत्मसात करने में राष्ट्रीय पार्टियां नाकाम रहीं. नतीजतन क्षेत्रीय पार्टियों और राजनीतिक विकल्पों ने उभार लिया. इसी के चलते राष्ट्रीय राजनीति के क्षितिज पर ऐसे तबकों से नेताओं का उभार हुआ, जिनके लिए कल तक सत्ता के गलियारों तक पहुंचना दुश्कर था. लेकिन आज एक दलित देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना देख सकता है. यह परिवर्तन राजनीति की सोच और एजेंडे को बदलने का माद्दा रखता है.

इसीलिए इस गुरुवार को जब मतदान के आंकड़ों पर नजर डालें तो हम इसे नतीजों के तराजू पर न तोलें. इससे आगे जाकर हम बड़े सवालों पर नजर दौड़ाएं. क्या देश की राजनीति में आम आदमी की बढ़ती भागीदारी का सिलसिला आज भी जारी है? क्या यह थम गया है? या इसे रोक दिया गया है? हमें पार्टियों और सरकारों के भविष्य से आगे जाकर लोकतंत्र के भविष्य पर निगाह डालनी होगी. जनभागीदारी के विस्तार और शीर्ष राजनीति के संकुचन पर चिंतन करना होगा.

13.04.2009, 09.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशि


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