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भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

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भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

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लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

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लोकतंत्र के बेताल का सवाल

जनमत

 

लोकतंत्र के बेताल का सवाल

योगेंद्र यादव

 

लोकतंत्र का बेताल आपसे एक सवाल पूछता है. हमारे देश का भाग्य विधाता अपने ही वोट से ठगा, अपनी ही सरकार से हारा, अपने भाग्य को कोसने पर मजबूर क्यों है? इसे समझने के लिए देश के आम चुनाव के पहले दौर पर एक नजर डालें.

लोकसभा चुनाव बेताल


आज देश के करीब एक चौथाई मतदाताओं का दिन है. पहले दौर में चुनाव आयोग ने उन 124 सीटों को चुना है, जो नक्सली हिंसा से लेकर चुनावी हिंसा का शिकार बन सकती हैं. आज नक्सली आतंक के लाल गलियारे से लेकर जातीय हिंसा के शिकार पूर्वोत्तर तक और दलीय राजनीतिक हिंसा में उलझे केरल में मत पड़ेंगे. देश की एक तिहाई आदिवासी आबादी आज अपने वोट का इस्तेमाल कर रही है.

लाल गलियारे के ये इलाके अपने ही राज्यों में विकास के हाशिए पर पड़े हैं. इसी का नतीजा है कि आंध्र मे तेलंगाना, महाराष्ट्र में विदर्भ, उड़ीसा में पश्चिम उड़ीसा और उत्तरप्रदेश में पूर्वाचल तक सभी जगह अलग राज्य का आंदोलन चल रहा है.

पहले दौर की इन 124 सीटों पर पिछली बार राष्ट्रीय औसत से कुछ ज्यादा ही वोट पड़े. इसकी एक वजह केरल जैसे राज्य का इसमें शामिल होना भी है. यही बात मतदाताओं की पार्टीवार पसंद पर भी लागू होती है. कोई बड़ी वामपंथी पार्टी इस लाल गलियारे में पैठ नहीं जमा पाई है. झारखंड, बिहार और उत्तरप्रदेश की भाकपा(माले) जरूर अपवाद कही जा सकती है. लेकिन चुनावों में भागीदारी करने का दुस्साहसिक फैसला करने वाली यह पार्टी धीरे-धीरे अपनी जमीन खोती जा रही है.

बहरहाल, पहले दौर में सबसे दिलचस्प लड़ाई तेलंगाना में लड़ी जाएगी. तेलंगाना ने 1952 में कम्युनिस्टों को भारी सफलता दिलाई थी. आज भी माकपा के झंडे तले लेफ्ट की तेलंगाना में मौजूदगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

इसी के चलते माकपा तेलुगुदेशम की अगुआई वाले महाकौटिम गठबंधन का एक अहम हिस्सा है. पृथक तेलंगाना राज्य की मांग कर रही तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) भी इससे जुड़ी है. तेलुगुदेशम और टीआरएस का तालमेल पहले दौर में तेलंगाना की सभी 17 सीटों और पांच तटीय सीटों के नतीजों पर असर डालेगा. चिंरजीवी की प्रजाराज्यम का यहां ज्यादा आधार नहीं है. कांग्रेस ने अगर इस दौर में दांव पर लगी सीटों में से तकरीबन आधी भी जीत लीं तो अगले दौर में वह इसकी भरपाई कर सकती है.

लेकिन अगर महाकौटिम गठबंधन ने यहां उसका सफाया कर दिया तो कांग्रेस के लिए विधानसभा में बहुमत हासिल करना मुश्किल हो जाएगा. कांग्रेस के लिए अगर तेलंगाना बड़ी चुनौती है तो महाराष्ट्र का विदर्भ एक बड़ा मौका है. पिछली बार बसपा ने कांग्रेस को उसके इस परंपरागत गढ़ में भारी नुकसान पहुंचाया था. बसपा ने कोई सीट नहीं जीती थी, लेकिन उसके हिस्से में आए छह फीसदी वोट ने कांग्रेस और उसकी सहयोगी एनसीपी को एक-एक सीट पर रोक दिया था.

भाजपा-शिवसेना गठजोड़ ने यहां 11 सीटों पर भगवा परचम लहरा दिया था. बसपा इस बार भी मौजूद है, इसके बावजूद कांग्रेस भाजपा-शिवसेना को पटखनी दे सकती है. इस बार बेहतर पैदावार और किसानों को राहत देती यूपीए सरकार की नीतियां उसे बढ़त का मौका दे रही हैं. किसानों की आत्महत्या एक बड़ी चुनावी बहस में तब्दील नहीं हो पाई है.

कांग्रेस के लिए मौका उड़ीसा में भी है. पहले दौर में पश्चिमी उड़ीसा में वोट डाले जाएंगे. कांग्रेस यहां भाजपा और बीजद का गठबंधन टूटने का फायदा उठा सकती है. कांग्रेस ने यहां पिछली बार बेशक सिर्फ दो सीटें जीती थीं, लेकिन उसे इस इलाके में 42 फीसदी वोट मिले थे. दूसरी ओर पांच सीटें जीतने वाली भाजपा को करीब 28 फीसदी और तीन सीटें जीतने वाली बीजद को महज साढ़े 18 फीसदी वोट हासिल हुए थे. परंपरागत आदिवासी वोट बैंक कांग्रेस के साथ है. लेकिन उसकी दिक्कत यह है कि वह सही नेतृत्व और दिशा के बगैर नवीन पटनायक को पटखनी देने की सोच रही है.

कांग्रेस उड़ीसा में जो भी हासिल करेगी, संभवत: झारखंड में उसे गंवा देगी. आज जिन छह सीटों के लिए झारखंड में वोट डाले जाएंगे, उनमें भी चार पिछली बार यूपीए के पाले में गई थीं. भाजपा के हिस्से में महज एक सीट आई थी. लेकिन बीते पांच वर्ष के राजनीतिक ड्रामे के कारण भाजपा यहां उभार पर है.

बिहार और उत्तरप्रदेश का भोजपुर एक मिसाल है कि मौजूदा राजनीति ने किस तरह एक ही भाषायी संस्कृति के क्षेत्र को दो अलग राजनीतिक प्रदेशों में बांट दिया. उत्तरप्रदेश में आने वाला भोजपुर का हिस्सा यानी पूर्वाचल आज बसपा और सपा का गढ़ है. पिछले चुनावों में राष्ट्रीय पार्टियों को हाशिए पर धकेलते हुए इन दोनों ने यहां पांच-पांच सीटों पर कब्जा किया था. बिहार के भोजपुर इलाके में जद(यू)-भाजपा गठबंधन और राजद-लोजपा गठबंधन के बीच सीधी लड़ाई है.


कांग्रेस यहां सिर्फ वोट कटवा की भूमिका में है. पिछले चुनावों में लालू यादव की अगुआई में मैदान में उतरे इस गठबंधन ने सूपड़ा साफ कर दिया था. लेकिन अब समीकरण बदल गए हैं. लालू का गठबंधन सिकुड़ गया है. जद(यू) ने भी अपनी खोई जमीन वापस पा ली है. यहां भी बाकी बिहार की तरह बड़ा सवाल विकास बनाम जातीय गठबंधन का है.

उधर, छत्तीसगढ़ में भाजपा को कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. यहां सभी 11 सीटों के लिए आज ही वोट डाले जा रहे हैं. पिछली बार भाजपा ने एक को छोड़ सभी सीटों पर कब्जा किया था. चार महीने पहले हुए विधानसभा चुनावों में मिली कामयाबी के बाद भाजपा के ही आगे रहने की उम्मीद है.

केरल में भी आज सभी 20 सीटों के लिए मतदान हो रहा है. पिछली बार लेफ्ट की अगुआई वाले एलडीएफ ने सभी बीस सीटों पर कब्जा किया था. लेकिन इस बार हर बात एलडीएफ के खिलाफ है. यहां सिर्फ सवाल यही है कि लेफ्ट अपनी दो-पांच सीटों को बचाने में कामयाब हो सकता है या नहीं?

पहले दौर के मतदान का यह आकलन हमें भारतीय राजनीति के मूल विरोधाभास से रूबरू कराता है. इस लोकतंत्र में गरीबों का बहुमत है और वे वोट डालते भी हैं, लेकिन विडंबना यह है कि जिस सरकार को यह तबका चुनता है, उस सरकार के एजेंडे में गरीबी उन्मूलन कहीं नहीं होता.

धर्म, जाति और क्षेत्रीयता के कठघरों में बंधता वोटर, वोटर से कटे राजनीतिक दल और इन दोनों से कटा अपनी ही दुनिया में मशगूल मीडिया बेताल के सवाल का जवाब देने के कुछ सूत्र थमाते हैं.


16.04.2009, 08.55 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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krishan () delhi

 
 यह एक बहुत ही ज्ञानवर्धक लेख है जो अवश्य ही योगेंद्र यादव जी के द्वारा लिखा गया होगा और आगे ऐसे और भी ज्ञानवर्धक लेख पढ़ने के लिए मिलेंगे. धन्यवाद. 
   

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