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मुसलमानों की राजनीतिक त्रासदी

जनमत

 

मुसलमानों की राजनीतिक त्रासदी

योगेंद्र यादव

 

देश के मुसलमानों के इर्द-गिर्द बुने कुछ मिथकों के मकड़जाल ने उन्हें राजनीतिक दलों का बंधक बना दिया है. इस मकड़जाल से मुक्ति के लिए उन्हें एक आम हिंदुस्तानी वोटर की तरह देखना होगा.

मुसलमान औरतें


भारतीय मुसलमान की हालत फिल्मी परदे और राजनीति के मैदान में एक-सी है. फिल्मी परदे पर उसका किरदार कभी बेइंतेहा रुमानी शायर तो कभी बेवजह अपनी देशभक्ति की मिसाल देता पुलिस ऑफिसर का होता है. जैसे हम फिल्मी परदे पर एक सामान्य मुसलमान की कल्पना नहीं करते, वैसे ही राजनीतिक पटल पर हम एक आम मुस्लिम को नदारद पाते हैं.

यहां माना जाता है कि राजनीति का आम नियम मुस्लिमों पर लागू नहीं होता. खुद इस्लामिक नेता और अवाम को भी यही लगता है कि वे कुछ अनूठे हैं. यहीं से मिथकों का ऐसा सिलसिला शुरू होता है, जहां मुस्लिम वोटर की स्वतंत्र पहचान खो जाती है. खुद को असाधारण मानते-मानते वह राजनीति के मिथकों का पात्र बनने के लिए अभिशप्त हो जाता है.

इन मिथकों में सबसे पहले है देश की राजनीति में उनकी भागीदारी का सवाल. माना जाता है कि मुस्लिम देश के बाकी वोटरों से इतर बड़ी संख्या में वोट डालते हैं.

यह सच है कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में औसत से ज्यादा वोट पड़ते हैं, लेकिन इसकी वजह सांप्रदायिक ध्रुवीकरण में छिपी है, जिसके चलते इन क्षेत्रों में हिंदू, मुस्लिम दोनों खुलकर अपने वोट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन ऐसे क्षेत्र गिने-चुने हैं. देश में मुस्लिमों की आबादी महज 13.4 फीसदी है. अधिकांश चुनाव क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मुस्लिम वोटर 10 फीसदी भी नहीं है.

नेशनल इलेक्शन स्टडीज द्वारा जुटाए आंकड़ों से साफ है कि मुसलमानों की चुनाव और देश की राजनीति में भागीदारी बाकी समुदायों से अलग नहीं है. पिछले चार लोकसभा चुनावों में 59 फीसदी मुसलमानों ने वोट डाले. इसके मुकाबले पूरे देश में औसतन 60 फीसदी लोगों ने अपने वोट का इस्तेमाल किया. दरअसल अगर कोई फर्क है तो वह उल्टा है. शिक्षा और हैसियत जरूर राजनीति में हिस्सेदारी पर असर डालती दिखती है, लेकिन मजहब से कोई फर्क नहीं पड़ता.

संभवत: सबसे प्रचलित मिथक यह है कि मुसलमान किसी एक पार्टी या उम्मीदवार को वोट डालते हैं, यानी मुसलमान एक वोट बैंक है, लेकिन आम चुनावों में मुस्लिम मतों का रुझान यह साबित नहीं करता. पिछले आम चुनाव में देशभर में 37 फीसदी मुस्लिम वोट कांग्रेस को मिले और 17 फीसदी कांग्रेस के सहयोगी दलों को.

सपा को 16 फीसदी वोट मिले. भाजपा को सात फीसदी मुस्लिम वोट मिले. इसे वोट बैंक का नमूना कैसा बताया जा सकता है? हालांकि राज्यों में मुस्लिम मतदाता कहीं ज्यादा एकतरफा व्यवहार करता है, लेकिन फिर भी मुसलमान वोट बैंक की तरह काम नहीं करते. सिर्फ विकल्पहीनता की हालत में ही वे एकतरफा वोट डालते हैं. खासतौर से जब उन्हें कांग्रेस और भाजपा में से किसी एक को चुनना पड़ता है.

अगर उन्हें कोई तीसरी पार्टी मिल जाती है तो कांग्रेस की ओर उनका झुकाव कम हो जाता है. कुल मिलाकर राज्यों में मुस्लिम वोटर का व्यवहार बहुत हद तक सामान्य जातियों की तरह ही है. खासतौर पर बिहार और यूपी में मुस्लिम समाज में जात-बिरादरी का फर्क भी उनकी राजनीतिक पसंद-नापसंद पर असर डालने लगा है.

एक मिथक यह भी है कि मुसलमान आखिरी घंटों तक अपने फैसले को टालते रहते हैं. कुछ इलाकों में ऐसा होता भी है, लेकिन पूरा देश इसकी पुष्टि नहीं करता. अगर 33 फीसदी हिंदू चुनाव के दिन या एक दिन पहले अपना वोट तय करते हैं, तो मुस्लिमों में यह आंकड़ा महज 31 फीसदी तक है. एक मिथक यह भी है कि मुस्लिम अपना फैसला खुद नहीं लेते.

इनका फैसला पारंपरिक नेताओं और मौलवियों के जरिए होता है. कहा जाता है कि मुस्लिम वोटर का फैसला जरूरी मुद्दों की बनिस्बत इस्लाम की सोच और समुदाय के मुद्दों पर ज्यादा टिका होता है. इस धारणा में भी कोई दम नहीं है.

शोध बताते हैं कि बाकी हिंदुस्तानी वोटर की तरह वह भी पहले पार्टी देखता है, फिर उम्मीदवार और आखिर में जात. अमेरिका से चली यह धारणा हमारे देश में भी फैल रही है कि इस्लाम और लोकतंत्र में छत्तीस का आंकड़ा है, लेकिन हाल ही में दक्षिण एशिया के पांच देशों में किए एक सर्वे के नतीजे साबित करते हैं कि लोकतंत्र में सहयोग देने को लेकर मुस्लिमों और हिंदुओं में कोई फर्क नहीं है. मुस्लिम लोकतांत्रिक राजनीति से खुद को अलग नहीं कर रहे हैं.

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भारतीय मुस्लिमों की राजनीतिक तस्वीर को समझने के लिये जरूरी है कि इन टूटते मिथकों के साथ हम दो बड़े सच को भी जोड़ लें. सच्चर कमेटी की रिपोर्ट के मुताबिक मुस्लिम न सिर्फ हाशिए पर हैं, बल्कि शिक्षा, रोजगार, आवास और आर्थिक स्तर पर भी उनसे भेदभाव किया जाता है.

दूसरे एक बड़े सच से रूबरू कराया है प्रोफेसर इकबाल अंसारी ने. उन्होंने मुस्लिम सांसदों और विधायकों का आकलन किया. इनके मुताबिक राज्य स्तर पर भी मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व अपनी आबादी के अनुपात से आधे से भी कम था.

इन मिथकों और सच को साथ रख हम मुस्लिमों की राजनीतिक त्रासदी से रूबरू हो सकते हैं. भारत के मुसलमान की हालत अमेरिकी अश्वेतों की तरह है. अश्वेतों के बारे में रिपब्लिकन इसलिए नहीं सोचते, क्योंकि वे जानते हैं कि उनका वोट उन्हें नहीं मिलेगा.

डेमोक्रेट इसलिए उन्हें भाव नहीं देते क्योंकि उन्हें भरोसा है कि वे उन्हें ही वोट देंगे. मुस्लिमों के आस-पास बुने इस मिथकों के मकड़जाल ने उन्हें राजनीतिक बंधक बना दिया है. पहले कांग्रेस उन्हें बंधक मानकर चलती थी, आज कांग्रेस के साथ-साथ सपा और राजद जैसी पार्टियां भी यही सोचती हैं. दरअसल मुस्लिम को साधारण और बंधक बताने के बीच गहरा रिश्ता है. मुस्लिम वोटर की राजनीतिक मुक्ति के लिए उन्हें मिथकों के इस मकड़जाल से बाहर निकलकर देखना होगा, एक आम हिंदुस्तानी वोटर की तरह.

इस सबके बीच मौजूदा चुनाव मुसलमानों के लिए राजनीतिक मुक्ति का एक नया दरवाजा खोलता है. अब मुस्लिम वोटर पहले से मौजूद पार्टियों से इतर नए विकल्प तलाश सकता है. असम में एयूडीएफ कांग्रेस को चुनौती दे रहा है. यूपी में सपा के सामने मिल्ली कौंसिल है.

बिहार में पसमांदा मुस्लिम राजनीति राजद के लिए परेशानी का सबब है. केरल में इंडियन मुस्लिम लीग के सामने पीडीपी है. इसमें कोई शक नहीं है कि ये चुनौतियां कमोबेश सांप्रदायिक राजनीति के भीतर से आ रही हैं. ये विकल्प अकसर मौकापरस्त पार्टियों के जरिए आ रहे हैं.

इसके बहुत दिन तक बने रहने की संभावना नहीं है, लेकिन ये नए विकल्प दीर्घकाल में मुसलमान वोटर को बाकी समुदायों की तरह इस लोकतांत्रिक मुकाबले में अपने पांव पर खड़े होने में मदद जरूर करेंगे.

20.04.2009, 06.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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अनवर चौहान () दिल्ली

 
 देश की तमाम सियासी जमातों ने मुसलमानों को गुलाम बनाकर रखा है। मुसलमान के वोट के दम पर देश के कई नेता राष्ट्रीय नेता बने। लेकिन सभी ने ने मुसलमानों को शोषण किया किसी राजनैतिक दल ने इन्हें सत्ता का भागीदार नहीं बनाया। बल्कि भीख का टुकड़ा सभी डालते रहे।

मुसलमानों का ये दुर्भाग्य है कि इस मुल्क में हर कौम का नेता है और नेता विहीन अगर कोई कौम है तो वो सिर्फ मुसलमान। और कोई सियासी दल ये चाहता भी नहीं की मुसलिम लीडरशिप पनपे। चूंकि उनको खौफ हैं कि कहीं ये लोग अपनी आबादी के लिहाज से कहीं सत्ता में भागेदारी न मांगने लगें।
 
   

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