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पत्रिका का जुनून

पत्रिका का जुनून
 

पुरुषोत्तम ठाकुर

जगतसिंहपुर, उड़ीसा से

बिजय महापात्रा का परिचय देना हो तो एक वाक्य में कहा जा सकता है- वे संपादक हैं, बाल पत्रिका के संपादक. लेकिन यह विजय का अधूरा परिचय होगा.


असल में विजय देश और दुनिया के किसी भी दूसरे संपादक से अलग हैं. वे पत्रिका का संपादन नहीं करते, ‘पत्रिकाओं’ का संपादन करते हैं. वह भी एक-दो नहीं, देश की अलग-अलग भाषाओं में कुल 50 पत्रिकाएं !


उड़ीसा के जगतसिंहपुर में एक छोटा सा गांव है- पाकनपुर. इसी गांव में रहते हैं 40 साल के बिजय महापात्रा. दो कमरों वाले उनके घर के एक कमरे में उनका कार्यालय है, आप चाहें तो इस कमरे को पत्रिकाओं का कारखाना कह सकते हैं.

विजय 50 से अधिक भाषाओं में बाल पत्रिकाएं निकालते हैं.


इस एक कमरे से कई बाल पत्रिकाएं निकलती हैं- तमिल में अंबू सगोथारी के नाम से, अंगिका में अझोला बहिन, उड़िया में सुनाभाउनी के नाम से, लद्दाखी में छू छू ले, कुमाउनी में भाली बानी, अंग्रेजी में लविंग सिस्टर, मंडीयाली में लाडली बोबो, उर्दू में प्यारी बहन, संस्कृत में सुबर्ण भगिनी, मराठी में प्रिय ताई, तेलुगु में प्रियमैना चेलेउ, कश्मीरी में त्याथ ब्यानी.......!


वन मैन शो

बिजय इन बाल पत्रिकाओं के पीर, बावर्ची, भिश्ती, खर हैं यानी बिजय इन पत्रिकाओं के लिए रचनाएं मंगवाते हैं, उनका संपादन करते हैं, प्रकाशन करते हैं और इन पत्रिकाओं को बेचते भी हैं.


अधिकांश पाठकों तक ये पत्रिकाएं वे डाक से भेजते हैं. इसके अलावा वे अलग-अलग स्कूलों में जा कर सीधे बच्चों को भी ये पत्रिकाएं बेचते हैं. रोज कई-कई किलोमीटर दूर जाने-अनजाने रास्तों पर अपनी साईकल से वे इन पत्रिकाओं को बेचने के लिए जाते हैं.


क्यों निकालते हैं वे इतनी पत्रिकाएं ?


इसके जवाब में बिजय कहते हैं-“ भारत वर्ष में जितनी भाषा और बोलियां हैं, मैं उन सभी भाषाओं में बाल पत्रिकाएं निकालना चाहता हूं. मैं इन सबकी लिपि का प्रचार-प्रसार करूं. इतने विशाल देश में शायद यह काम थोड़ा मुश्किल है, लेकिन नामुमकिन नहीं है.”


लेकिन यह इतना सरल भी नहीं है.


ज़मीन बेचनी पड़ी

इन पत्रिकाओं का प्रकाशन काफी मुश्किल काम है. कई बार तो आर्थिक कारणों से किसी-किसी पत्रिका के एक अंक निकालने में साल लग जाते हैं. लेकिन अंग्रेजी, हिंदी और उड़िया की पत्रिका जी तोड़ मेहनत के बाद हर महीने निकल जाती है. लेकिन इन सबके लिए रचनाएं जुटाने में ही हालत खराब हो जाती है.


1990 से इन पत्रिकाओं के प्रकाशन-संपादन में जुटे बिजय कहते हैं- “ मैं निजी तौर पर हर लेखक से संपर्क करता हूं. अलग-अलग राज्यों में जा कर लेखकों से मुलाकात करता हूं, उनसे बिना मानदेय के रचनाएं भेजने के लिए अनुरोध करता हूं. फिर इन रचनाओं को टाईप करना...! मेरे पास तो कंप्यूटर भी नहीं है. जिनके पास है, उनसे बहुत सहयोग नहीं मिलता.”

बिजय की मानें तो इसके चलते उनके परिवार को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है क्योंकि वो अपने घर के इकलौते कमाऊ सदस्य हैं.
पत्रिका निकालने के इस जुनून के कारण उन्हें घर की ज़मीन भी बेचनी पड़ी है लेकिन वे हार मानने को तैयार नहीं हैं. घर के दूसरे सदस्य भी चाहते हैं कि बिजय अपने मिशन में जुटे रहें.


बिजय कहते हैं- “ मैं कम से कम 300 भाषा और बोलियों में बाल पत्रिकाएं निकालना चाहता हूं.”


बिजय के इस जुनून पर जुबान से एक ही लफ़्ज निकलता है– आमीन !

 

लेखक NDTV भुवनेश्वर में कार्यरत हैं.

 

04.05.2008, 00.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shree prakash(samvadik@gmail.com)

 
 congrats to vijay mahapatra! 
   
 

dayashankar mishra

 
 vijay you are doing a great job.my best wishes to you.
dayashankar mishra
journalist. bhopal
09977700221
 
   
 

Manoj Kumar(k.manojnews@gmail.com)

 
 best. vijay ko salam. vijay ki photo and add. mil jay to bat bane. kuch bal kahani hindi me to me bhijva dunga 
   
 

ila kumar

 
 This holy- work should be informed all over world & kind request to help Shri Vijoy by money .
His address ?
 
   
 

kaduvasach.blogspot.com

 
 विजय जी का कार्य प्रंशसनीय है,गिनीज बुक मे दर्ज होने की पुर्ण सम्भावना है,शुभकामनाएँ । 
   
 

kishore kumar jain()

 
 raviwar.com me aneko behtarin rachanae padhkar acha laga.nai nai jankarion ne man moh liya.b.ringania ka lekh,tejendra sharma ki kahani achi lagi.badhai. 
   
 

piyush daiya(todaiya@gmail.com)

 
 sir :: kya mujhe shri vijay ka pata v phone no. mil sakta hain ?
vineet
piyush
 
   
 

krishna()

 
 wah , man gad gad ho gaya , dil bhar aaya, bahut khub  
   
 

NILAMBUJ SINGH(thenilambuj@gmail.com)

 
 badhiya prayaas hai. ek sher kahana chahunga in prayaason par------

wo chand log jo khamosh rah gaye aksar,
unhi ke dam se ye tarikh muskuraegi.---Dr. hariom
 
   

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