चुनाव में गांव कहां हैं ?
जनमत
चुनाव में गांव कहां हैं ?
योगेंद्र यादव
भारत गांवों में बसता है लेकिन चुनाव के समय गांव अदृश्य
हो जाते हैं. दूसरे दौर में जिन सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं, उनमें 102
ग्रामीण हैं. चुनाव से किसान का मुद्दा गायब है.
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तस्वीरः केवल कृष्ण |
चुनाव की पूर्व संध्या पर बेताल ने फिर विक्रमादित्य से सवाल पूछा, “ भारत
गांवों में बसता है, लेकिन जब चुनाव आते हैं तो गांव अदृश्य क्यों हो जाते हैं?
” सवाल मौजूं था. दूसरे दौर में जिन 141 सीटों पर वोट डाले जा रहे हैं, उनमें
102 ग्रामीण हैं. इसके बावजूद चुनाव में न किसान का मुद्दा गरमाया है, न ही
किसी ने खेतिहर मजदूर की सुध ली है.
आज मीडिया से लेकर राजनेताओं ने किसानी से जुड़े मुद्दों पर चुप्पी साध ली है.
दूसरे दौर के मतदान का नक्शा देखकर विक्रमादित्य सोच में डूब गए. देश की इतनी
बड़ी ग्रामीण आबादी क्यों एक राजनीतिक ताकत में तब्दील नहीं हो पाती?
महाराष्ट्र में धन-संपन्न किसानों का राजनीतिक प्रभुत्व एक आम किसान और खेतिहर
मजदूर के मुद्दों को हाशिए पर डाल देता है. किसानों की बदहाली की खबरों में बने
रहने वाले इस राज्य में आज 25 लोकसभा सीटों पर वोट डाले जाएंगे. इस दौर में
पश्चिम महाराष्ट्र की चीनी पट्टी, उत्तरी महाराष्ट्र, ग्रामीण कोंकण और
मराठवाड़ा में वोट पड़ेंगे.
बीते एक दशक में अपनी-अपनी जमीन खोने की भरपाई कांग्रेस और एनसीपी ने गठजोड़
बनाकर कर ली है. कांग्रेस अपने ग्रामीण वोट बैंक को बरकरार रखती है. उसकी
सहयोगी एनसीपी धनी किसानों के बीच अपनी पकड़ को बनाए रखती है. पिछले आम चुनावों
में इन दोनों पार्टियों ने यहां 14 सीटों पर कब्जा किया था.
इस बार पहले दौर में विदर्भ के इलाके में कांग्रेस-एनसीपी कुछ फायदे में दिख
रही है. मराठा वोट पर शिवसेना की ढीली होती पकड़ का फायदा उठाकर वे मराठवाड़ा
में भी इस बढ़त को मजबूती दे सकते हैं लेकिन पश्चिम महाराष्ट्र में दोनों
पार्टियां अपनी अंदरूनी गुटबाजी से जूझ रही हैं. इसी के चलते शिवसेना और भाजपा
राज्य में बहुत बड़े नुकसान से बच सकती हैं.
कर्नाटक में राजनीतिक पार्टियां ग्रामीण मुद्दों से किनारा करके भी ग्रामीण वोट
बचाए रखने की कला सीख रही हैं. यहां आज आंध्र और महाराष्ट्र से जुड़ी 17 सीटों
पर वोट डाले जाएंगे. भाजपा अपने शहरी वोट बैंक में किसानों को जोड़ने की उम्मीद
कर रही है. फिर विधानसभा चुनावों की तरह कांग्रेस अभी भी आपसी गुटबाजी में उलझी
है. जनता दल (एस) भी ग्रामीण वोट के बाहर जमीन तलाशने में जुटी है.
कर्नाटक की तरह मध्यप्रदेश में भी भाजपा विधानसभा चुनावों की कामयाबी को लोकसभा
में विस्तार देती दिखती है. अगर विधानसभा चुनावों के आइने में आज की 13 लोकसभा
सीटों को देखें तो इनमें 12 पर भाजपा को बढ़त थी. उधर झारखंड में पहले दौर की
तरह इस अंतिम दौर में भी भाजपा की स्थिति बेहतर नजर आती है. यहां मुद्दा किसान
और गांव नहीं है. राज्य में हुई राजनीतिक नौटंकी से जनता परेशान है और
गैर-भाजपाई ताकतें बंटी हुई हैं.
राजनीतिक तौर पर एक बेहद कड़ा मुकाबला आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में लड़ा जा रहा
है. दोनों जगह लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा चुनाव भी हो रहे हैं. इस वजह से यहां
पहले दौर में लोगों ने बढ़-चढ़कर वोट डाले. लेकिन इन दोनों ही राज्यों में
त्रिशंकु विधानसभा की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है.
दिल्ली में सवाल यह है कि क्या कांग्रेस लोकसभा चुनावों में अपेक्षाकृत बेहतर
प्रदर्शन करेगी.
उड़ीसा में नवीन पटनायक के लिए अपनी कुर्सी बचाना आसान नहीं है. आज लड़ाई दूसरे
दौर में तटीय उड़ीसा के विकसित और शहरी इलाकों में दाखिल हो रही है तो बीजद
अपने परंपरागत वोट बैंक के जरिए पहले दौर के नुकसान की भरपाई करने की उम्मीद कर
सकती है लेकिन दिक्कत यह है कि कल तक उड़ीसा में किनारे पर खड़ी भाजपा आज राज्य
में तीसरी ताकत की तरह उभर गई है.
इसमें नवीन पटनायक से नाराज और परेशान नेताओं के भाजपा में शामिल होने ने बड़ी
भूमिका निभाई है. लेकिन नवीन पटनायक इस त्रिकोणीय मुकाबले के अपने हक में आने
की उम्मीद के साथ सत्ता में बने रहने की आस संजो रहे हैं. पहले दौर में इस
त्रिकोणीय मुकाबले का फायदा कांग्रेस को मिलता दिखाई दे रहा है.
इन दोनों राज्यों में नजदीक होती इस लड़ाई से ये मतलब नहीं निकाल सकते कि यहां
गांवों के मुद्दों के इर्द-गिर्द ज्यादा तीखी बहस हो रही है. आंध्र प्रदेश में
इसका मतलब चंद सस्ती घोषणाएं हैं. उड़ीसा में राजनीति का जमीन तक नहीं पहुंच
पाना और राजनीतिक तौर पर किसान समुदाय के जागरूक न होने के चलते किसानी के
मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं.
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उत्तरप्रदेश और बिहार में चुनावी लड़ाई आज भी जातीय समीकरणों में उलझी है.
बिहार में राजद-लोजपा के गठबंधन की स्थिति कमजोर दिख रही है. पहले दौर में उसे
नुकसान हुआ लगता है. दूसरे दौर में लालू और पासवान की साख दांव पर है. दूसरी ओर
नीतीश सरकार की लोकप्रियता और निम्न ओबीसी और महादलित में बनती पकड़ इस दौर में
एनडीए को फायदा पहुंचा सकती है.
उत्तर प्रदेश में बसपा और सपा का चुनावी गणित काम करता नहीं दिख रहा है. पहले
दौर से संकेत मिल रहे हैं कि ब्राrाण वोट बसपा की झोली में नहीं जा रहा है. इसी
तरह मुलायम की मुसलमानों के बीच साख कम हो रही है. ऐसी खबरें हैं कि पहले दौर
में भाजपा उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर पायी है, लेकिन दूसरे दौर में उसका
दोहराव होता नहीं दिख रहा. अब सपा को अगर चुनावी नतीजों के बाद सजने वाली बिसात
में अपनी भूमिका बरकरार रखनी है तो आज दांव पर लगी 17 सीटों में से पिछली बार
की तरह 10 सीटों पर कब्जा करना होगा.
इस चुनावी बिसात पर एक ग्रामीण वोटर एक बार फिर हाशिए पर खड़ा है. सिर्फ सस्ते
चावल से लेकर कलर टीवी जैसे चुनावी लॉलीपॉप हैं, जिसका गांव के विकास से
दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं है. हालत यह है कि नरेगा और किसानों की कर्ज माफी
जैसी बड़ी योजनाओं पर बहस चलाने के बजाय खुद सरकार इससे बचकर निकलना चाहती है.
दूसरे दौर के इलाकों पर नजर डालने के बाद विक्रमादित्य फीकी मुस्कुराहट के साथ
बोले – “ भारत गांवों में भले ही बसता है, लेकिन इसके कर्णधार गांवों में नहीं
बसते. न ही गांव उनके मन में बचा है. सत्ता की लगाम का अंतिम छोर भले ही गांव
में पड़ा है, लेकिन इसे कसने वाली मुट्ठियां किसान की नहीं उद्योगपतियों और
दलालों की हैं.” अपने प्रश्न का उत्तर सुन लोकतंत्र का बेताल अगले दौर तक के
लिए फिर गायब हो गया.
23.04.2009,
06.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित