लाल्टू की कविताएं
साहित्य
लाल्टू की कविताएं
सोचने में सबको मुस्कराना
दूसरा इसी में खुश कि साथी ने खिलौना गाड़ी को धागे से बाँधकर खींचते हुए
उसे साथ रखा. गाड़ी के साथ वह बँधा. गाड़ी को ढलान मिली. वह खुदबखुद चली
जा रही. दोनों की खुशी में उसकी सोच शामिल. सोचना, उन दो को सोचना, उनकी
खुशी सोचना. सोचना कि पता नहीं क्या सोचना. सोचना बिना किसी क्रम और
अचानक ही क्रम टूटना. गली की ढलान पर गाड़ी. इतिहास में गली थी पगडंडी.
भविष्य में गली हो सकती है पगडंडी, अमूमन सोचना ऐसा नहीं होता. सोचने का
इतिहास पगडंडी, गली, सड़क नहीं. सोचना कदाचित ही तीसवीं सदी का है. दस
सदियों बाद का सोचना अभी का सोचना. पहला जिसने खिलौना गाड़ी धागे से
बाँधी, यह नहीं सोचता कि दस सेकंड बाद दूसरी ओर से तीसरा एक चक्के को
लाठी से घुमाता आ रहा. ढलान के विपरीत चक्का लगातार डगमगा रहा. सोचना यह
कि चक्का नहीं आदमी डगमगाता. चक्का और खिलौना गाड़ी की टक्कर. गाड़ी का
उलटना. पहला तीसरे को देखता. तीसरे का आकार देख आँखें छलछलातीं. सोचना कि
वह भी उतना बड़ा होता तो चक्का चलाता. सोचना कि फिर देखता. पहले के जितने
आकार का दूसरा सिकुड़ कर एक ओर होता. खिलौना गाड़ी खींचने वाला कुछ कहता
और चक्का चलाने वाला गरजता. सोचना कि इतिहास बदलना है. सोचने में क्रम
आना है. सोचने में भविष्य में तीसरे को प्यार से पहले को पुचकारना. सोचने
में दूसरे को मुस्कराना. सोचने में सबको मुस्कराना.
हर बात पुरानी लगती है
हर बात पुरानी लगती है
खबरें दुहराती हैं खुद को
ऐसा नहीं कि फिर से हूण शक कुषाण
चरित्र नहीं वैशिष्ट्य दिखता विद्यमान निरंतर
जीवन शुरु हुआ मुझ से ही
हर धार का उद्गम मैं ही
समझना मुश्किल कि दूसरों को दिखता यह क्यों नहीं
तो क्या कहता रहूँ अब भी कि विरोध ज़रुरी है
ज़रुरी है विक्षिप्त हो उठना हर बसंत हर सावन
देखकर कि उत्सव नहीं है मौसम
मनुष्य के लिए
कि मनुष्य नहीं मनुष्य है जंतु
या कहीं जंतु से भी बदतर
कितनी बार दुहराऊँ कि लकीरें बनावटी हैं
कितनी बार समझाऊँ कि वस्त्र नहीं होते तन पर जब जनमते हैं हम
कितनी बार तड़पूँ कि जितने सुनने वाले हैं
उनसे कहीं ज्यादा है न सुनने वालों की तादाद
और फिर कुछ हैं कि
जाने क्यूँकर कहते रहते हैं सुख है दैन्य में भी.
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आज सुबह है कि एक प्रतिज्ञा है
आज सुबह है कि एक प्रतिज्ञा है
दिनों की सालों की जकड़न फेंक रहा हूँ
आज सुबह है कि पौधे रोपने लगा हूँ
मिट्टी पानी बना हूँ सींचने लगा हूँ
आज आवाजें सुनने लगा हूँ
यह जो ठकाठक सुन रहा ये छेनियाँ और हथौड़े हैं
सुबह से भी पहले सुबह होती है उनकी
मेरे जगने तक ठक ठक ठकाठक चल रहे होते हैं
हर ओर कुछ बन रहा हो रहा निर्माण
आज सुबह है कि चिढ़ नहीं रहा
आवाजों को सँजो रहा हूँ
सों सों की आवाजें हैं बसों की ट्रकों की
थोड़ी ही दूर है सड़क
निंदियाई होंगी आँखें ड्राइवरों की अब भी
मलते हुए आँखों को रेस में लगे हैं
आज सुबह है कि सब को सब कुछ मुआफ है
मैं अपनी ही कैद से कर रहा हूँ मुक्त खुद को
ज़मीं से ऊपर नहीं ठोस फर्श पर रख पैर
रच रहा हूँ शब्द.
बीत चुकी रात फिलहाल
बीत चुकी रात फिलहाल
अँधेरे से निकला हूँ
रोशनी है पठाने खाँ के गायन सी
गुलाम फरीद के बोल पर नाच रहे हैं पत्ते
मन में मोर पसार रहा पंख
कब बीतेंगी रातें
मैं नहीं निशाचर मैं जीवन का प्यासा
ढूँढता हूँ सोते जीवन के
प्यार की बूँदें
रात का थका
सुबह समेट रहा हूँ बाँहें फैलाए
सूर्य नमस्कार नहीं सूरज को पास लाने की
मुद्राएँ हैं मेरे खयालों में
रूखा ही सही जीभ गर्म स्वाद चाहती है
अक्षर अक्षर जीवन बुनता हूँ
मात्राएँ गढ़ता हूँ ध्वनियाँ बाँधता हूँ
कदम कदम चलता हूँ
काल से होड़ के सूत्र सीखता हूँ
मैं नहीं निशाचर मैं जीवन का प्यासा
चीखता हूँ पठाने खाँ फरीद बनता हूँ
क्या हाल सुणावाँ दिल दा
कोई मरहम ......
उनकी साँसें मुझमें चल रहीं
वे अनजान नहीं हैं उनकी साँसें मुझमें चल रहीं
घर बाजार धरती आस्मान जहाँ भी
आखिरी क्षणों में याद किया अपने प्रियजनों को जिन्होंने
वे यहाँ हैं बैठे इस स्टूल पर
लैपटॉप पर की दबा रहे यूनीकोड इनपुट
लेख जो संपादकीय के साथ के कालम में है
पढ़ रहा हूँ उम्र के बोझ में
अर्थव्यवस्था राजनीति जंग लड़ाई के बीच साँईनाथ हूँ मैं
विदर्भ का मर रहा किसान हूँ
ईराकी फिलस्तीनी हूँ
मर्द हूँ औरत हूँ
न आए अखबार की हर खबर हूँ मैं.
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रात भर बारिश
तीसरे चौथे पहर टिप टिप सुनता हूँ
झिर झिर आती है नम हवा
मेढक झींगुर के झीं झीं टर टर के साथ
चादर में काँपता हुआ ध्वनियों को समेटता हूँ
सिकुड़ते बदन के साथ बदलते सपनों के रंग
बैंगनी सा होता है सपने में अतीत
सुनता हूँ शंख
उलूध्वनि घबराहट माँओं की
यह सपना नहीं जब रात भर पानी छतों से चूता
बाप जगा खपरैल या पालीथीन की छत सँभालता
माँ अपने बदन से ढकती बच्चे को
घुप्प काला है पहर गहराता
यह सोचकर फिर पलकें मूँदता हूँ
कि बसंती उम्मीद भी है हल्की सी कि
देर से जाएँगे लोग काम पर सुबह
हालाँकि बहुत दिक्कत होगी औरत को
मर्द के लिए चाय बनाने में सुबह सुबह.
रंग हिरोशिमा
ब्लैक ऐंड ह्वाइट फोटोग्राफ में गुलाबी
जो भाप बन कर उड़ गया
आँखें फाड़ हम देखते हैं रंग हिरोशिमा
जानते हैं कि हमारे चारों ओर फैला रंग अँधेरा
हिबाकुशा रंग है जीवन का
स्लाइड शो से परे सीटों पर से उड़ते हुए
हमारे प्यार के रंगीन टुकड़ों का
हमारे ही जैसे दिखते हैं दानव
जिनका कोई देश नहीं, नहीं जिनकी कोई धरती
वाकई रंगहीन वे जो धरती से छीन लेना चाहते हैं हरीतिमा
रुकते ही नहीं सवाल
अनजाने ही रंगे गए हमारी चितकबरी चाहतों से
देर तक बहती है हिरोशिमा की याद
एक नितांत ही अँधेरे कमरे में फैलती
भोर की सुनहरी उमंग.
उन सभी मीराओं के लिए
तुम्हारे पहले भी छंद रचे होंगे युवतिओं ने
अधेड़ महिलाएँ सफाई करतीं खाना बनातीं
गाती होंगी गीत तुमसे पहले भी
किसने दी तुम्हें यह हिम्मत
कैसी थी वह व्यथा प्रेम की मीरा
कौन थीं तुम्हारी सखियाँ
जिन्होंने दिया तुम्हें यह जहर
कैसा था वह स्वाद जिसने
छीन ली तुमसे हड्डियों की कंपन
और गाने लगी तुम अमूर्त्त प्रेम के गीत
उन सभी मीराओं के लिए जो तुमसे पहले आईं
मैं दर्ज़ करता हूँ व्यथाओं के खाते में अपना नाम
मेरा प्रतिवाद कि मैं हूँ अधूरा अपूर्ण
मुझसे छीन लिए गए हैं मेरी माँओं के आँसू
आँसू जिनसे सीखने थे मैंने अपने प्रेम के बोल
अपनी राधाओं को जो सुनाने थे छंद.
तुमने पूछा
तुमने पूछा कि बारिश हो रही है
और बारिश होने लगी
क्या तुम पूछ नहीं सकती
कि दिख रहे हैं मुझे
सुखी परिंदे
मैं चाहता हूँ कि विलुप्त हो गई गौरैयों के बारे में पूछो
मुझे यकीन है कि तुम्हारे पूछने पर उड़ आएँगी वे
जहाँ भी वे पिंजड़ों में बंद हैं या अतीत के बिंदुओं पर से
यहाँ चहचहाने को मुझे एक बार भरोसा दिलाने को
कि बुरे दिनों का अंत हो सकता है
पूछो तुम यह भी कि
आशीष लिख रहा है कविताएँ
और मुझे हर सुबह जीमेल पर मिलने लगें
युवा कविताएँ जिनमें ज़िंदा हो दादी की दुनिया
जिनमें तकलीफ न हो समंदर किनारे जला दिए घरों की
यह महज ज़िद नहीं
बहुत गहरी तमन्नाएँ हैं कि
तुम पूछो धुआँ हट रहा है
और सूरज दिखे साफ जितना भी गर्म क्यों न
पूछो कि पूछ रहा हूँ मैं.
03.05.2009,
08.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित