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विकल्प की राजनीति

जनमत

 

विकल्प की राजनीति

योगेंद्र यादव

 

मुंबई में एक बार फिर कम मतदान की खबर से सवाल उठता है कि हमें राजनीति के विकल्प चाहिए या वैकल्पिक राजनीति ? या फिर हम स्थापित राजनीति और उसके बने बनाए विकल्पों से संतुष्ट हैं. 2009 का चुनाव इस सवाल का कोई निर्णायक उत्तर तो नहीं दे पायेगा. लेकिन इन सवालों को लेकर जनमानस को खंगालने की दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है.

वैकल्पिक राजनीति


इस चुनाव में राजनीतिक भागेदारी के आंकड़े एक विरोधाभास दिखाते हैं. इन आम चुनावों में पहले की तुलना में आम आदमी अपने वोट का कम इस्तेमाल कर रहा है. लेकिन यही आम आदमी अब कहीं ज्यादा शिद्दत से चुनावी मैदान में खम्ब ठोंक रहा है. यह आम आदमी की राजनीतिक सोच के दो सिरे हैं. ये जितने एक दूसरे से अलग दिखते हैं, उतने ही कहीं न कहीं एक दूसरे से जुड़े हुए भी.

आंकडों के मद्देनज़र 2004 की तुलना में पहले दौर में एक फीसदी और दूसरे दौर में दो फीसदी कम वोट पड़े. हम यहाँ 2004 के उन्हीं इलाकों से तुलना कर रहे हैं, जिनमें इस बार पहले और दूसरे दौर में वोट डाले गए. लेकिन ठीक यहीं पिछले चुनावों के मुकाबले इस बार उम्मीदवारों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है. 1997 में चुनाव आयोग ने चुनावी दंगल में शौकिया उतर जाने वाले उम्मीदवारों पर नकेल कसने के इरादे से कुछ कड़े नियम लागू किये थे. नतीजतन उम्मीदवारों की संख्या घटी. 1998 में औसतन हर लोकसभा क्षेत्र में 9 से कम उम्मीदवार थे. जबकी 2004 में 10 उम्मीदवार थे. लेकिन इस बार हर लोकसभा क्षेत्र में औसतन 14 से कुछ अधिक उम्मीदवार हैं.

पहली नज़र में हम इन दोनों पहुलओं की अलग-अलग वजहों को टटोल सकते हैं. मतदान में कमी की सीधी वजह तेजी से बढ़ती गर्मी, राष्ट्रीय स्तर पर एक नीरस प्रचार और वोटर की पहचान को लेकर चुनाव आयोग की कड़ाई कही जा सकती है. दूसरी और उम्मीदवारों की बढ़ती संख्या की वजह सिर्फ शौकिया उम्मीदवारों का बढ़ना नहीं है. बहुकोणीय मुकाबलों में नजदीकी होती लड़ाई भी इसका एक कारण है. पीएमके जैसी पार्टियों की कामयाबी ने कईयों में नयी उम्मीदें जगाई हैं. दरबार में बदलते राजनीतिक दलों में आत्मसम्मान वाले कार्यकर्त्ता के पास अपनी मौजूदगी जताने का एक ही रास्ता बचा है कि वो निर्दलीय की हैसियत से चुनाव लड़े.

फिर इस विरोधाभास में हम एक बड़े सच को भी तलाश सकते हैं. राजनीतिक भागेदारी के इन दो छोर को इन आम चुनावों में राजनीतिक विकल्पों की कमी के दो अलग-अलग जवाब के तौर पर भी देखा जा सकता है. हकीकत यह है कि आज जनता स्थापित राजनीतिक मॉल्स के बड़े बड़े शोरूम में तब्दील हो गए दलों में भरोसा खोती जा रही है. पिछले कुछ चुनावों में इन मॉल्स के स्थापित विकल्पों को तलाशते कुछ छोटे शोरूम भी उभर आये हैं. कहने को शोरूम और दुकानें तो बहुत हो गयी हैं. लेकिन हरेक के पास सामान एक-सा है. इस विकल्पहीनता से जनता की छटपटाहट दो तरीकों से अभिव्यक्त होती है. एक औसत नागरिक की चुनावों में दिलचस्पी घट जाती है. लेकिन एक सचेत नागरिक की राजनीति में दखल देने के व्यग्रता बढ जाती है. मतदान का गिरना और उम्मीदवारों का बढ़ना विकल्पहीनता से जूझने के दो पहलू हैं.

इस लिहाज़ से यह मौजूदा आम चुनाव मुख्यधारा की राजनीति के जवाब तलाशने की कोशिशों में एक मील का पत्थर बनकर सामने है. इससे पहले कभी भी किसी चुनाव में मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टियों से इतर एक आम आदमी और संगठनों ने इतनी शिद्दत से राजनीतिक दखलंदाजी की कोशिश नहीं की. दरअसल, भारतीय राजनीति के भविष्य को समझने के लिये चुनावी घुड़दौड़ के परिणाम के बजाय यह पहलू कहीं ज्यादा मायने रखता है.

लेकिन हर बार की तरह मीडिया भारतीय लोकतंत्र में बदलाव की इस बयार को महसूस करने में चूक गया है. अखबार हो या इन्टरनेट, रेडियो हो या टेलीविजन, चमकदार चेहरों के जरिए मतदान के लिये जारी जागरूकता अभियान के बीच मीडिया इस सच्चाई तक नहीं पहुँच पाता. इसी के चलते मल्लिका साराभाई, कैप्टेन गोपीनाथ और मीरा सान्याल जैसे गैर राजनीतिक चेहेरे खूब सुर्खियाँ बटोरते हैं. यही मीडिया पोलिंग बूथ से बाहर आते फ़िल्मी सितारों, मॉडल्स और कुछ बड़ी शख्सियतों को जम कर दिखाता है.

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लेकिन ले देकर लोकतांत्रिक अधिकार का यह अभियान राजनीतिक विरोध की आवाज़ को बुलंद करता है. ठीक उसी तरह जैसे मुंबई हमलों के बाद राजनेताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शन ने राजनीतिक विरोध को मजबूत किया था.

ज़ाहिर है, यह राजनीति नैराश्य पैदा करती है. दूसरे दौर में जब इसी मुंबई में वोट डाले गए तो यह सब एक बड़ी निराशा में तब्दील हो गया. मुंबई हर बार की तरह इस बार भी बाकी देश के मुकाबले अपने वोट का इस्तेमाल करने में बहुत पीछे छूट गया.
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