निष्पक्ष चुनाव की हकीकत
जनमत
निष्पक्ष चुनाव की हकीकत
योगेंद्र यादव
इस बार वोट डालने गाँव पहुंचा तो फिजा कुछ बदली हुई थी. सभी पार्टियों के एजेंट
एकमत थे-इस बार तो सभी ‘हरिजन भाई’ बीएसपी को वोट डालेंगे. दक्षिण हरियाणा के
हमारे इलाके में बीएसपी का ज्यादा जोर नहीं रहा है. इसलिये मैंने बीएसपी के
कैंप में जाकर पूछताछ की. “ हम कैंडिडेट को वोट नहीं दे रहे, पार्टी को वोट दे
रहे हैं.”-दलित समाज के बुद्धिजीवी राम अवतार भाई साब ने समझाया. फिर रुक कर
बोले-“पहली बार हम अपने लिये वोट डाल रहे हैं.”
मेरे लिये यह लोकतंत्र की महिमा और गरिमा से साक्षात्कार का क्षण था. वहीं एक
सवाल मन में कौंधा. क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का सपना अब हकीकत बन गया
है?
इन आम चुनावों में यह सवाल बहुत पीछे छूट गया दिखता है. अगर बीते एक महीने में
देश के मीडिया और राजनीतिक फलक पर इस सवाल ने उभार नहीं लिया है, तो इसे एक
अच्छा संकेत माना जा सकता है. महम, बांका और सीवान जैसे बदनाम चुनावों के
किस्से आज इतिहास की बात लगते हैं. बिहार से छन-छन कर आती बूथ कैपचरिंग की
तस्वीरों के लिये कैमरे तरस कर रह गए हैं. इस चुप्पी में हम यह अहसास करते हैं
कि इस बार कुल मिलाकर साफ़ सुथरे चुनाव हुए हैं.
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अंग्रेजी के मुहावरे ‘फ्री एंड फेयर’ का अनुवाद है.
कहीं इस अनुवाद की प्रक्रिया में इन शब्दों का दायरा सिकुड़ गया है. दरअसल, एक
स्वतंत्र चुनाव का मतलब बिना किसी जोर जबर्दस्ती के अपने वोट के अधिकार का
इस्तेमाल करना भर नहीं है. इसके गहरे अर्थ में जाने के लिये हमें स्वतंत्रता को
स्वराज से जोड़ना होगा. उधर निष्पक्ष चुनाव का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं है कि
चुनाव अधिकारी पक्षपात न करें. सही मायने में निष्पक्ष चुनाव का मतलब है कि हर
उम्मीदवार, हर दल और हर एक वोटर एक ही धरातल पर खड़ा हो. बराबरी की लड़ाई लड़
सके
अगर वोटर की आज़ादी का मतलब महज बलप्रयोग या जोर जबर्दस्ती की अनुपस्थिति से है
तो हम दावा कर सकते हैं कि भारतीय वोटर स्वंतत्र होकर वोट डालता है. यहाँ भी
कुछ अपवाद जरुर हैं. दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में और बाहरी
मणिपुर के पहाडी इलाकों में जोर जबर्दस्ती से वोट डलवाने के आरोप लगे हैं. सलवा
जुडूम के इलाकों में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच पिस रहे एक आम आदमी को
कैसी आज़ादी होगी ? फिर भी यह तसल्ली कम मायने नहीं रखती कि बिहार, पूर्वी उत्तर
प्रदेश और आंध्र के रॉयलसीमा के साथ-साथ जम्मू कश्मीर से ऐसी कोई खबरें नहीं
आयी हैं. इसके लिये चुनाव आयोग और उसके लिये काम कर रहा समूचा तंत्र तारीफ के
काबिल है. यह बेहद सूझबूझ के साथ तैयार किये गए अलग-अलग दौर के कार्यक्रमों और
सुरक्षाबलों की तैनाती का नतीजा है.
लेकिन स्वतंत्र चुनाव की इस संकुचित परिभाषा को यहीं से विस्तार देने की जरुरत
है. दरअसल, अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर रहे आम आदमी के लिये किसी भी
किस्म का भय कोसों दूर होना चहिये. यहाँ हम वोट की आज़ादी के सामने मुंह बाये
खड़े खतरों से रुबरु होते हैं.
आज भी देश के अनेक इलाकों में अपने आका के खौफ में रहने वाला भूमिहीन दलित उसी
की मर्जी के मुताबिक अपना वोट डालता है. गुजरात में मुसलमान, उड़ीसा में ईसाई और
मिजोरम में चकमा आदिवासी भी एक
|
|
|
 |
अनजान भय के बीच पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं. इसी
तरह कश्मीर में सुरक्षा बलों के दमन, बिहार में जातीय हिंसा और पश्चिम बंगाल
में हर जगह मौजूद पार्टी काडर की मौजूदगी के बीच वोटर की आज़ादी दांव पर होती
है.
ठीक इसी तरह अगर निष्पक्ष चुनाव का मतलब बूथ कैपचरिंग और फर्जी मतदान का न होना
है तो हम एक बदनाम विरासत को बहुत पीछे छोड़ आये हैं. चुनाव हराने वाले
उम्मीदवार और नेता चुनावी नतीजे को जनादेश मान अपनी हार स्वीकार कर लेता है.
अपने पड़ोसी मुल्कों को देखें तो यह कोई छोटी बात नहीं है.
आगे पढ़ें
मुंबई की यह नाकामी हमें राजनीति का मूल सबक सिखाती है- राजनीति में विकल्प खड़ा
करने का कोई शार्टकट नहीं है. लगातार पांच साल तक राजनीति और राजनेताओं को
गालियां देने के बाद यह उम्मीद करना बेमानी है कि महज दो दिन के प्रचार से
सप्ताह के अंत में छुट्टी मनाने के शौकीन नागरिक को पोलिंग बूथ तक खींच
लायेंगे. राजनीतिक संगठन बनाने के लिये राजनीति को पूरी संजदीगी से आत्मसात
करना होता है. इस देश की धूल-मिट्टी फांकनी पड़ती है. एक एक ईंट जोड़ते हुए
ढांचे को खड़ा करना पड़ता है. इतनी मेहनत किये बिना स्थापित राजनीति का विकल्प
मुमकिन नहीं है.
हमारी मतदाता सूचियों में आज भी गड़बड़ी है, लेकिन किसी दल विशेष के
समर्थकों को जानबूझ कर सूची से बाहर करने की शिकायत कभी-कभार ही आती है. नए
परिसीमन की तमाम कमियों के बावजूद किसी भी दल ने इसकी निष्पक्षता पर कोई सवाल
नहीं खडा किया. देश में हमारे देखते-देखते फर्जी मतदान में कमी आयी है.
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन ने मतगणना में धोखाधड़ी की आशंकाओं को खारिज कर दिया है.
|
अगर कोई पार्टी या उम्मीदवार अख़बारों के विज्ञापन का
पैकेज नहीं खरीदती तो उसके चुनाव प्रचार की ख़बरों को पूरी तरह गुल कर दिया
जाता है. |
इसके लिये चुनाव आयोग को भी कुछ श्रेय देना चहिये. चुनाव आयोग देश के उन गिने
चुने स्तंभों में से एक है, जिसने बीते दो दशक के बीच भरपूर ताकत, साख और
सम्मान हासिल किया है. बेशक इस बार पूर्व और मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्तों की
टकराहट के बीच चुनाव आयोग की छवि पर चोट पहुंची. सरकार अगर कोशिश करती तो
विपक्ष के नेता के साथ बातचीत से नए आयुक्त को नियुक्त करने के साथ ही स्थिति
को संभाल सकती थी. लेकिन सरकार ने ऐसा नहीं किया. इसके बावजूद चुनाव आयोग एक
अंपायर वाली भूमिका बरक़रार रख पाया है. मुंशी अमरचंद की अमर कहानी ‘पंच
परमेश्वर’ के पात्र अलगू चौधरी की तरह चुनाव आयुक्त भी गद्दी पर बैठने के बाद
आंख की शर्म से बंध जाते हैं.
सही मायने में निष्पक्ष चुनाव का मतलब सभी उम्मीदवारों, दलों और वोटर के लिये
एक समतल ज़मीं मुहैया कराना है. लेकिन इस दिशा में अभी हमें लम्बा रास्ता तय
करना है. फिलहाल चुनाव आयोग छोटे चोर को पकड़ने में तत्पर है.लेकिन डकैत के
सामने असहाय नज़र आता है.
चुनावी पर्यवेक्षक उम्मीदवार से रोजाना के प्रचार के खर्च का हिसाब किताब
मांगते हैं. हर एक बैनर और पोस्टर लगने से पहले हर घर से लिखित में अनुमति लेनी
जरुरी है. चुनावी बैठक सही समय से पांच-दस मिनट आगे पीछे होने पर चुनाव आयोग का
डंडा चलता है. प्रचार के लिये प्रयोग में आ रहे हर एक वाहन के लिये पहले से
लिखित अनुमति की जरुरत है. राजनेताओं की छवि ऐसी हो गयी है कि उन पर डंडा चलाना
ही बहुतों को सकून देता है. लेकिन कारण-अकारण मीन-मेख निकालने के इस अंदाज से
लोकतंत्र की जड़ें गहरी कैसे होंगी?
उधर प्रचार पर लगी बंदिशों के बीच उम्मीदवारों और दलों ने खर्च के दूसरे रास्ते
खोज लिये हैं. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में बेशुमार पैसा खर्च हुआ. सबसे गरीब
कहे जाने वाले उड़ीसा के विधानसभा चुनावों में उम्मीदवारों के करोड़ों रुपए खर्च
करने की खबरें हैं. इसी का नतीजा है कि ज्यादातर पार्टियाँ आज धनी और सम्पन्न
उम्मीदवारों को तलाशती हैं. उम्मीदवारों के दाखिल किये गए हलफनामों की छान बीन
करने वाली नेशनल इलेक्शन वॉच के मुताबिक पिछली बार 9 फीसदी करोड़पति उम्मीदवार
थे. इस बार यह आंकडा 14 फीसदी तक चला गया है. इसमें भी राष्ट्रीय दल सबसे आगे
हैं. कांग्रेस के 60 फीसदी, बीजेपी के 42 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति हैं. सिर्फ
कम्युनिस्ट पार्टियाँ ही इस बीमारी से मुक्त कही जा सकती हैं.
सार्वजनिक प्रचार पर लगाई बंदिशों के चलते मीडिया में प्रचार पर पैसा पानी की
तरह बहाया जा रहा है. चुनाव आयोग ने बिना किसी राष्ट्रीय बहस के टेलीविज़न पर
राजनीतिक प्रचार की छूट दी है. बाकी दुनिया में इस प्रयोग ने लोकतंत्र को
धनतंत्र में तब्दील कर दिया है. अपने ही किसी दूसरे संगठन के नाम पर उम्मीदवार
और पार्टी विज्ञापन जारी करती हैं. यह बिना किसी छानबीन के टेलीविज़न के परदे पर
पहुँच जाता है.
|
यह भी पढ़ें |
|
 |
इस बार पार्टियों और उम्मीदवारों के विज्ञापन ख़बरों की शक्ल में ख़बरों के
पन्नों पर जगह ले रहे है.
अगर कोई पार्टी या उम्मीदवार अख़बारों के विज्ञापन का
पैकेज नहीं खरीदती तो उसके चुनाव प्रचार की ख़बरों को पूरी तरह गुल कर दिया
जाता है. छोटे-छोटे नियम कानून की खाल उधेड़ने की जगह अगर चुनाव आयोग मीडिया की
इस डकैती की छानबीन करता तो निष्पक्ष चुनाव को ज्यादा मदद मिलती.
गांव से वापस आते वक़्त मैं बीएसपी उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि देख रहा था. उनमें
भी 30 फीसदी करोड़पति हैं. कहा जा रहा है कि बीएसपी के कई उम्मीदवारों ने भी 30
से 40 करोड़ खर्च कर डाले हैं. वहां भी थैलीशाहों का प्रभुत्व होता जा रहा है.
अगली बार जब गाँव जाऊँगा तो राम अवतार भाई साब से इसके बारे में जरूर पूछूंगा.
12.05.2009,
02.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित