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इस अंक में

 

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

चुनावी मसाले की सोंधी महक

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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निष्पक्ष चुनाव की हकीकत

जनमत

 

निष्पक्ष चुनाव की हकीकत

योगेंद्र यादव

 

इस बार वोट डालने गाँव पहुंचा तो फिजा कुछ बदली हुई थी. सभी पार्टियों के एजेंट एकमत थे-इस बार तो सभी ‘हरिजन भाई’ बीएसपी को वोट डालेंगे. दक्षिण हरियाणा के हमारे इलाके में बीएसपी का ज्यादा जोर नहीं रहा है. इसलिये मैंने बीएसपी के कैंप में जाकर पूछताछ की. “ हम कैंडिडेट को वोट नहीं दे रहे, पार्टी को वोट दे रहे हैं.”-दलित समाज के बुद्धिजीवी राम अवतार भाई साब ने समझाया. फिर रुक कर बोले-“पहली बार हम अपने लिये वोट डाल रहे हैं.”

लोकसभा चुनाव


मेरे लिये यह लोकतंत्र की महिमा और गरिमा से साक्षात्कार का क्षण था. वहीं एक सवाल मन में कौंधा. क्या स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव का सपना अब हकीकत बन गया है?

इन आम चुनावों में यह सवाल बहुत पीछे छूट गया दिखता है. अगर बीते एक महीने में देश के मीडिया और राजनीतिक फलक पर इस सवाल ने उभार नहीं लिया है, तो इसे एक अच्छा संकेत माना जा सकता है. महम, बांका और सीवान जैसे बदनाम चुनावों के किस्से आज इतिहास की बात लगते हैं. बिहार से छन-छन कर आती बूथ कैपचरिंग की तस्वीरों के लिये कैमरे तरस कर रह गए हैं. इस चुप्पी में हम यह अहसास करते हैं कि इस बार कुल मिलाकर साफ़ सुथरे चुनाव हुए हैं.

स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव अंग्रेजी के मुहावरे ‘फ्री एंड फेयर’ का अनुवाद है. कहीं इस अनुवाद की प्रक्रिया में इन शब्दों का दायरा सिकुड़ गया है. दरअसल, एक स्वतंत्र चुनाव का मतलब बिना किसी जोर जबर्दस्ती के अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल करना भर नहीं है. इसके गहरे अर्थ में जाने के लिये हमें स्वतंत्रता को स्वराज से जोड़ना होगा. उधर निष्पक्ष चुनाव का मतलब सिर्फ इतना भर नहीं है कि चुनाव अधिकारी पक्षपात न करें. सही मायने में निष्पक्ष चुनाव का मतलब है कि हर उम्मीदवार, हर दल और हर एक वोटर एक ही धरातल पर खड़ा हो. बराबरी की लड़ाई लड़ सके

अगर वोटर की आज़ादी का मतलब महज बलप्रयोग या जोर जबर्दस्ती की अनुपस्थिति से है तो हम दावा कर सकते हैं कि भारतीय वोटर स्वंतत्र होकर वोट डालता है. यहाँ भी कुछ अपवाद जरुर हैं. दार्जिलिंग समेत पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों में और बाहरी मणिपुर के पहाडी इलाकों में जोर जबर्दस्ती से वोट डलवाने के आरोप लगे हैं. सलवा जुडूम के इलाकों में माओवादियों और सुरक्षाबलों के बीच पिस रहे एक आम आदमी को कैसी आज़ादी होगी ? फिर भी यह तसल्ली कम मायने नहीं रखती कि बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और आंध्र के रॉयलसीमा के साथ-साथ जम्मू कश्मीर से ऐसी कोई खबरें नहीं आयी हैं. इसके लिये चुनाव आयोग और उसके लिये काम कर रहा समूचा तंत्र तारीफ के काबिल है. यह बेहद सूझबूझ के साथ तैयार किये गए अलग-अलग दौर के कार्यक्रमों और सुरक्षाबलों की तैनाती का नतीजा है.

लेकिन स्वतंत्र चुनाव की इस संकुचित परिभाषा को यहीं से विस्तार देने की जरुरत है. दरअसल, अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर रहे आम आदमी के लिये किसी भी किस्म का भय कोसों दूर होना चहिये. यहाँ हम वोट की आज़ादी के सामने मुंह बाये खड़े खतरों से रुबरु होते हैं.

आज भी देश के अनेक इलाकों में अपने आका के खौफ में रहने वाला भूमिहीन दलित उसी की मर्जी के मुताबिक अपना वोट डालता है. गुजरात में मुसलमान, उड़ीसा में ईसाई और मिजोरम में चकमा आदिवासी भी एक

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अनजान भय के बीच पोलिंग बूथ तक पहुंचते हैं. इसी तरह कश्मीर में सुरक्षा बलों के दमन, बिहार में जातीय हिंसा और पश्चिम बंगाल में हर जगह मौजूद पार्टी काडर की मौजूदगी के बीच वोटर की आज़ादी दांव पर होती है.

ठीक इसी तरह अगर निष्पक्ष चुनाव का मतलब बूथ कैपचरिंग और फर्जी मतदान का न होना है तो हम एक बदनाम विरासत को बहुत पीछे छोड़ आये हैं. चुनाव हराने वाले उम्मीदवार और नेता चुनावी नतीजे को जनादेश मान अपनी हार स्वीकार कर लेता है. अपने पड़ोसी मुल्कों को देखें तो यह कोई छोटी बात नहीं है. 
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 छ्त्तीसगढ के सलवा-जुडुम कैम्प के बारे मे तो बिल्कुल कहा जा सकता है कि वहां आदिवासियो की स्वतंत्रता नही है !! 
   

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