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भगवा, हरा और काला आतंकवाद

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

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रणेन्द्र

 
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एक सर्वज्ञात समस्या का गुमनाम भविष्य

बात निकलेगी तो

 

एक सर्वज्ञात समस्या का गुमनाम भविष्य

कनक तिवारी

 

पूर्व अमेरिकी प्रेसीडेंट जॉर्ज बुश ने सत्ता और शक्ति के अहंकार में कहा था कि ओसामा बिन लादेन जैसे लोगों की अगुवाई में पनप रहे आतंकवाद या इराक के राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के खिलाफ अमरीकी हमलों को लेकर जो कोई देश अमरीकी कार्यवाही का समर्थन करता है वह अमरीका का दोस्त है और बाकी सब दुश्मन.

माओवादी


बुश की थ्योरी के चलते यह जरूरी है कि पूरी दुनिया को दोस्त और दुश्मन दो खेमों में बांट दिया जाना चाहिए. इस विभाजन के चलते किसी तीसरे पक्ष अर्थात तटस्थ, निष्पक्ष, निश्चेष्ट, उदासीन, मध्यमार्गीय या समझौता मूलक व्यक्तियों की इतिहास को कोई ज़रूरत नहीं है. बुश की यह बुल थ्योरी कूड़ादान में फेंक देने के लायक होने पर भी उसका फासिस्टी चेहरा बहुतों को आकर्षित करता रहा है.

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह ने भी एक वक्त यह कहा था कि नक्सली समस्या को लेकर जो सरकार का समर्थन करता है वह हमारा मित्र है बाकी सब हमारे दुश्मन हैं. ऐसे में उस तीसरी अर्थात जनता की शक्ति और वांछनीयता का क्या होगा जो लोकतंत्र की रीढ़ है. छत्तीसगढ़ में नासूर की तरह पनप रही नक्सली समस्या को लेकर गैर संलिप्त लोगों के भी विचार की कोई दुनिया होती है. वह नक्सलियों की हिंसा और सरकार की नीतियों से ज्यादा बड़ी व्यापक और स्थायी प्रकृति की होती है.

इसमें कोई शक नहीं कि नक्सली समस्या एक प्रतिक्रियात्मक उत्पाद है. इसके अतिरिक्त घने जंगलों का होना उसके लिए एक अतिरिक्त कारण होता है क्योंकि हर अपराधी जंगलों में उसी तरह छिप जाता है जिस तरह सांप बिलों में. नक्सल समस्या के विकसित होने का एक तीसरा कारण निरीह, मासूम, निरक्षर, गरीब और सदियों से नागर सभ्यता से अलग थलग रहे आदिवासियों के समूह का हिंसक नक्सलियों को अनुयायी बनाने के लिए उपलब्ध होना है.

यदि सरकारों के अधिकारी वन, राजस्व, आबकारी, पुलिस और अन्य विभागों में बैठकर आदिवासियों का शोषण नहीं करते. ठेकेदारों और बिचौलियों के दलाल बनकर आदिवासियों की अस्मत और अस्मिता नहीं लूटते. नेतागण शराब और शबाब के हत्थे चढ़कर अपनी लोकतंत्रीय प्रतिबद्धताओं को तबाह नहीं करते तो नक्सलवाद कैंसर की तरह नहीं पनपता. सरकारें लाख अपने हाथों अपनी पीठ ठोकें जब तक वे शोषण की प्रक्रिया पर लगाम नहीं लगाते तब तक नक्सलवाद समूल कुचला नहीं जा सकता.

छत्तीसगढ़ सरकार के सरगनाओं को यह शिकायत लगातार रही है कि तथाकथित मानव अधिकार कार्यकर्ता नक्सलियों की हत्या होने पर बहुत चिल्लपों मचाते हैं लेकिन जब पुलिस कर्मी और निर्दोष लोग मारे जाते हैं तब वे खामोश रहते हैं. आला सरकारी अधिकारी तो यह भी कहते रहे हैं कि बुद्धिजीवियों और लेखकों को भी नक्सली इलाकों में जाकर उन्हें हिंसा के खिलाफ समझाइश देनी चाहिए.

इसमें कोई शक नहीं कि इन पंक्तियों के लेखक ने कई समाचार पत्रों में छत्तीसगढ़ सरकार के अजीबो गरीब राजनीतिक प्रयोग सलवा जुड़ूम की कड़ी आलोचना की है लेकिन नक्सलियों की घिनौनी हरकतों की कड़े शब्दों में भर्त्सना भी की है और उन पर लगाम कसने का समर्थन किया है. लेकिन इन आरोपों के परस्पर पक्ष भी हैं. तमाम हिंसा फैलाने के बावजूद नक्सलियों के भी मानवीय अधिकार हैं.

यह ‘नक्सली’ शब्द भ्रामक है. कुछ चुस्त, चालाक, कुटिल, समर्थ और षड़यंत्रकारी नक्सली नेताओं को छोड़कर जो गरीब आदिवासी समुदाय बंदूक की नोक पर बंधुआ मजदूरों की तरह नक्सलियों द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है उसे नक्सली नहीं कहा जा सकता. जो पूरी तौर पर अपढ़ हैं, हिन्दी तो क्या छत्तीसगढ़ी तक नहीं समझते, सदियों से एकाकी और अलग थलग हैं, जो जल, जंगल और जमीन के अतिरिक्त समाज से कुछ नहीं लेना चाहते जिन्हें नमक और चिरौंजी की विनिमय दरों का पता नहीं है. जिनके अधनंगे शरीर कामुकता का विश्वविद्यालय नहीं हैं. जो प्रतिरोध नहीं करते और सब पर विश्वास करते हैं. यदि उन्हें पकड़कर नक्सली उन पर हुक्म चलाते हैं तो क्या इनसे भी सरकार उसी तरह लड़ेगी जिस तरह कट्टर नक्सली नेतृत्व से.

नक्सलवाद तो वामपंथ का सबसे कट्टर और हिंसक हिस्सा रहा है. पूरी दुनिया में जब कम्युनिस्ट आंदोलन लातीनी अमेरिका के अपवाद को छोड़कर पिट गया है. जब रूस और चीन जैसे देश अमेरिका समर्थक हो रहे हैं, तब नक्सलबाड़ी से उपजा तथाकथित नक्सलवाद अपनी नाल से उसी तरह कट गया है जैसे पैदा होने पर कोई बच्चा मां की नाल से. यह तो एक गिरोह है जो बटमारों, ठगों, चोरों, डाकुओं, लुटेरों, गिरहकटों, हत्यारों वगैरह का घालमेल है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 इन गिरोहबाज नेताओ मे सभी को चुनाव मे खारिज करने का अधिकार चुनाव आयोग से मांगिये ! शिक्षा और आर्थिक स्वतंत्रता मांगिये !

पुलिस को इन नेताओ की गिरफ़्त से आजाद करें और शराब के बदले वोट देने की आदत छोड़ें तब शायद कुछ बदले वरना वो दिन ज्यादा दूर नही जब हर ईमानदार आदमी नक्सली बन जायेगा !!
 
   
 

sanat jain jagdalpur

 
 सिर्फ करने वाले की टांग खींचना समस्या का हल होता तो कोई समस्या ही नहीं रहती. हल बताइये न कि कमी गिनाएं.
समस्या का कारण भ्रष्टाचार कम शराब ज्यादा है.औऱ आप जैसे लोग सरकार या पुलिस का मनोबल बढ़ाते नहीं हैं, बल्की उपद्रवियों को सपोर्ट करते हैं. आज अधिकार की बात सब करते हैं पर अपनी जिम्मेवारी का किसी को ध्यान नहीं रहता. अगर लोग अपनी जिम्मेवारी समझ लें तो बहुत सारी समस्या सुलझ सकती है.
 
   

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