अजब भारत कुमार की गजब बात
साहित्य/ उपन्यास
अंश
अजब
भारत कुमार की गजब बात
जुगनू शारदेय
जवानी के दिन, साल 1972.
भारत की स्वतंत्रता का रजत जयंती वर्ष. भारत कुमार बाकायदा बालिग हो चुका है.
और अब बीसवीं सदी की आखिरी रात- 1999. मध्य रात्रि-घड़ी की भाषा में रात के बारह
बजते ही 21 वीं सदी आरंभ हो जाएगा. कन्याकुमारी के सागर तट पर बैठा हुआ भारत
कुमार का मन क्यों 21 वीं सदी के सूरज के इंतजार में 20 वीं सदी के 1972 के
बारे में सोच रहा है.
1947 से 1972- पूरे पच्चीस साल.
क्यों नहीं इंतजार किया कवि रघुवीर सहाय ने 1972 का. लिख दी भारत के मन की बात
1967 में अपने ‘आत्महत्या के विरुद्ध’ में -क्या खूब !
बहुत जल्दी ऊब गए अपनी आजादी की आजादी से रघुवीर सहाय. कौन सा रघुवीर सहाय ऊबा
होगा-पत्रकार या कवि. पत्रकारिता के अनुभव से उपजा होगा गान या ज्ञान. बीस साल
पूरा भी नहीं हुआ कि ऊब गए अपनी आजादी की उड़ान से. अभिव्यक्त कर दी भारत के
समाज की सच्चाई वाली पंक्तियां भारत के ‘आत्महत्या के विरूद्ध’ में- “बीस वर्ष
/ खो गए भरमे उपदेश में / एक पूरी पीढ़ी पली पुसी क्लेश में / बेगानी हो गई
अपने ही देश में / वह अपने बचपन की / आजादी /छीन कर लाऊंगा! ”
बढ़ रहा है बेगानापन. किस-किस के बारे में कहा जाए. अपने से बेगाने हैं या
बेगाने से अपने हैं. भांड़ में जाए यह अपनापन–बेगानापन. कोई नहीं लौटा सकता है
उसे उसका 1972. किससे छीने अपनी आजादी. उसके अपनों ने ही तो छीनी उसकी आजादी.
अपनों से ज्यादा अपने सपनों ने छीनी है आजादी.
यहां कन्याकुमारी में, रात में, सुबह के इंतजार में अपना ही बेगानापन और
बेगानों के अपनापन के बीच सोचता हुआ कि कैसे खत्म हुआ अपने भारत में अपनापन.
भारत कुमार क्यों कल में जा रहा है. इस सच के बावजूद कि न तो निजी जीवन में और
न ही सार्वजनिक जीवन में कोई कल होता है– न गुजरा हुआ कल, न ही आने वाला कल.
बहुत होता है तो निजी जीवन में याद होती है. यह याद सार्वजनिक जीवन में इतिहास
हो जाता है–बशर्ते कि आप विजेता हों. कहां है विजेता भारत कुमार–वह तो मैं अभी
हारा नहीं, जग अभी जीता नहीं भर है.
कैसे बढ़ रहा है बेगानापन. किस किस के बारे में कहा जाए. सब तो अपने से बेगाने
हैं या बेगाने से अपने हैं. भांड़ में जाए यह अपनापन – बेगानापन. कोई नहीं लौटा
सकता है उसे उसका 1972. आखिर जवानी का दिन था 1972. और है भी क्या उसके पास उस
भूत के सिवा. तब वह काया से ही नहीं कानून से भी बाकायदा मताधिकार के हक के साथ
भारत का वयस्क नागरिक हो गया था. तब भी और आज भी और क्या चाहिए भारत के नागरिक
को. उसके पास भूख का हक न जाने कब से था. बेरोजगार रहने का हक भी था ही उसके
पास. अब तो उसके पास वोट भी है. और भी न जाने कितने अधिकार थे उसके लिए भारत के
संविधान में- अधिकार ही अधिकार. सबसे बड़ा वोट का अधिकार. इसे बेचा भी जा सकता
है. खरीदा भी जा सकता है. अधिकार ही अधिकार है हमारे महान संविधान में !
तो 1972 से पहले, थोड़ा और पीछे चलें- सिर्फ पांच साल पीछे 1967 में. बीस साल
में पहली बार सत्ता में बदलाव की उम्मीद. उसके दस साल बाद 1977 में सत्ता में
पूरा बदलाव. इस गलतफहमी को मिटाने के लिए कि सत्ता की गंदी नाली में सिर्फ कागज
की नाव ही बहाते हैं 1967 के गैर कांग्रेसवाद के बच्चे. कहां देखे थे उसने ऐसे
बच्चे जो नहीं थे मन के सच्चे. थे कान के कच्चे. उम्र के बूढ़े, अपने ही कामचलाउ
विचारों के बच्चे. 1967 के बाद के और बिहार आंदोलन से जन्मे बच्चे.
क्या साल था 1967. इसी साल तो छपा था ‘आत्महत्या के विरुद्ध’. तब कहां पढ़ा था
उसने ‘आत्महत्या के विरुद्ध’. तब तो उसकी दुनिया ‘जासूसी दुनिया’ के इब्ने सफी
के कर्नल विनोद तक ही सिमटी थी. ‘जासूसी दुनिया’ के साथ कुछ और भी पढ़ लिया करता
था. कितना समझता था और कितना नहीं समझता था– यह तो वह आज तक नहीं समझ पाया था.
पर तरक्की की राह पर था वह. ‘दिनमान’ और ‘धर्मयुग’ भी तो पढ़ लिया करता था. बड़े
बदमाश थे इसके संपादक. आलतू–फालतू चिट्ठियां छापा करते थे. उसकी चिट्ठियां
छापते ही नहीं थे. मत छापो. इससे मैं पढ़ना थोड़े ही बंद कर दूंगा.
अब हंसी आती है भारत कुमार को अपनी प्रगति पर. कभी उसका साथ निभाने के लिए
सिनेमा वाला भारत कुमार भी होता था गाते हुए कि “मेरे देश की धरती सोना उगले ,
उगले हीरे मोती..मेरे देश की धरती.” अब वह गुनगुनाता है उगल रही है भूख , भय और
भ्रष्टाचार देश की धरती...
भूख, भय और भ्रष्टाचार की पहली पहचान थी बेकायदा मताधिकार के अधिकार पर काबिज
हो जाना. यह अधिकार उसे 1967 में वोटर लिस्ट की मेहरबानी से मिला चुका था. 1967
में 21 की उम्र में वोट देने का अधिकार हुआ करता था भारत के नागरिक का. मतदाता
सूची में उसका नाम था 1967 में. स्कूल के खाते में 18 के आस पास ही पहुंच पाया
था वह. वोटर लिस्ट में वह 48 का था. उसकी मां की आयु 28 दर्ज थी. टाइप सेटिंग
की भूल.
देश की बहुत बड़ी समस्या पुराने जमाने की टाइप सेटिंग भी है. 1860 से 1937 तक
बना कानून इसी टाइप सेटिंग की देन है. वह संविधान भी है जिसमें कुछ भी अपना
नहीं है. बस एक सपना है. पता नहीं किस समय का सपना है. कम से कम भोर का सपना तो
नहीं है. कहते हैं कि भोर का सपना सच होता है. पर यह सपना तो जेठ की दोपहर की
धूप है.
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टाइप सेटिंग के जमाने में टाइपसेटर कुछ भी कर सकता था.
भारत के कुछ के कुछ को प्रूफ रीडर कुछ का कुछ भी कर सकता था. इस टाइप सेटिंग को
आप माइंड सेटिंग भी मान सकते हैं. अब देखिए न, न जाने कब से रफ्फूगिरी के बल पर
चल रहा है देश. संविधान में इतने संशोधन दुनिया के किसी भी देश में नहीं हुए
होंगे. और न ही कोई देश अंग्रेजों के बनाए कानून पर चलता होगा. अभी भी टूटी हुई
पुरानी पुलिया के बाहर लिखा होता है फोटो खींचना मना है. कमाल तो यह है कि
पुलिया हर साल धंस रही होती है. बोर्ड हर साल नया होता रहता है. अकसर इस बोर्ड
पर गुप्त रोगों को ठीक करने वाला विज्ञापन भी धंसा होता है. बाबा बंगाली आपकी
हर मुश्किलों को हल करने के लिए भी चिपके होते हैं.
यह मुल्क बुनियादी तौर पर टाइप सेट मुल्क है. इसमें वैदिक सभ्यता से ले कर दलित
मुक्ति आंदोलन का टाइप सेट है. सबसे बड़ा टाइप सेट है जाति. कोई इसे मानता नहीं,
सब इसे अपनाते हैं. कभी-कभी तो यह भी नहीं पता चलता कि जाति और धर्म के बीच के
झगड़े में कौन जीतता है. सिर्फ इतना साबित हुआ था कभी कि वोट के खेल में धर्म
जीत जाता रहा है. फिर पता चला कि जाति जीत गई. वह तो जाति और धर्म से बाहर था.
अपना पहला वोट उसने पेड़ को दिया था. तब वह पेड़ वाली पार्टी पर मुग्ध था. आज
भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है उसका पेड़. हर विकास के साथ यह कटता है. बड़ी
ईमानदारी हुई तो एक फूलों वाली झाड़ी उस छायादार बरगद की जगह पर नजर आती है.
उसका बोगस वोट उसके भारत की इमानदारी की भी पहचान है. कह सकते हैं कि तब वह
बेवकूफ था. या यह भी कह सकते हैं कि नाबालिग काल में उसने एक ही अक्ल का काम
किया कि बोगस वोट दिया. काश बालिग होने के बाद बोगसपन बना रहता तो कन्याकुमारी
की सागरीय लहरों को निहारता हुआ मिलावटी रम के बजाए किसी फाइव स्टार में न सही
शैंपेन बीयर की झाग को ही सागर की लहर समझता.
तब जब उसने बोगस वोट दिया था तब यह कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती थी. आज भी नहीं
मानी जाती. वोट से जो चीज बनती है सरकार– वह भी तो बुनियादी तौर पर बोगस ही
होती है. लेकिन तब आम बात थी उस जैसे नाबालिग लोगों के लिए. थोड़ा बहुत
बहादुराना, थोड़ा थ्रिल भरा कि -देखो कैसे छकाया, साला निशान लगाता है उंगली पर
! अब उंगली पर लगा निशान लोग दिखाते हैं. हिंदी-हिंदी का राग रटने वाले भी अपनी
उंगलियों से अंग्रेजी का वी बना कर संदेश देते हैं विक्टरी उनकी ही है. दरअसल
यह विक्टरी नहीं होता. यह ठेंगा होता है. गारंटी होती है कि जिसकी विक्टरी
होगी, वह पांच साल तक ठेंगा दिखाता रहेगा.
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कन्याकुमारी के सागर की लहर बार बार जा कर
उसे छू कर जा रही है. वह भी तो जा रहा है अपने भूत के पास. इससे कभी डरा नहीं वह.
एक मायने में उसे मुहब्बत है इस भूत से. |
तब उसके पास पपीते का दूध होता था उंगली का निशान मिटाने के लिए. बार-बार जा कर
वोट देने के लिए. चूंकि वह जन्म जात मूर्ख था, इसलिए बार-बार वोट न दे सका था.
वोट देने नहीं गई थी उसकी मां. कभी भी ऐसा फालतू काम उसकी मां ने नहीं किया था.
सो मां का भी कर्त्तव्य भी उसी ने निभाया था. अपना भी वोट और अपनी मां का भी
वोट. इससे ज्यादा वह महापर्व चुनाव के लिए कुछ नहीं कर सकता था. 1967 से बोगस
वोट और बूथ कब्जा का उद्यम और उद्योग शुरू हुआ. कांग्रेस पार्टी की इस महान देन
को बाद में सभी पार्टियों ने भारतीय संविधान की तरह अपना लिया. उस वक्त की बोगस
वोटानी वीरता अब मन को कचोटती है कि इस सच को कैसे झुठलाया जा सकता है कि 1967
में वह था तो नाबालिग -18 साल का भी तो नहीं था वह.
कहीं बोगसपन हमारे समाज की खासियत तो नहीं कि 1967 में रघुवीर सहाय ने यह भी
लिखा- “मुंह छुओ मेरे बच्चे का, गाल वैसा नहीं, जैसा विज्ञापन में छपा...”
उपभोक्तावाद के बोगसपन पर कवि का ख्याल ! यह उपभोक्तावाद क्या होता है ? न तब
समझ में आया था. न अब समझ में आया है. वह तो बस इतना ही समझ पाया है कि वह
दुनिया के बाजार में एक तरबूजनुमा ग्राहक है. चाहे तरबूज पर महंगाई का चाकू
गिरे या ग्राहक चाकू पर गिरे, कटना तो उसे ही है. कटता ही रहता है वह. अकेले
नहीं बहुत सारे लोगों के साथ कटती रहती है सपनों की कभी खत्म न होने वाली नींद.
अपनी हे मन की कविता में बंद...“देश के खंडहरों में क्या रखा है/ सभ्यता के
अवशेष /किसी खंडहर का होना या न होना/ क्या मतलब रखता है/ खंडहर क्या हैं/
भग्नावशेष/ अवशेष अभी भी हैं/ अभिलाषाएं/ भारत के देह के खंडहर में सुरक्षित…”
.वो बचपन में और आज भी किसी बुढ़ाई-सी सुंदर स्त्री को देख कर कहा जाता है, आज
भी कहते होंगे रघुवीर सहाय की बेगानी पीढ़ी के नौजवां कि खंडहर देख कर लगता है
कि इमारत बुलंद होगी.
भारत को भी देख कर लगता है कि इमारत कभी बुलंद होगी. एक
और झूठ. सौ बार बोले जाने पर झूठ भी सच हो जाता है. अपने ही झूठ के सच में फंसी
एक सदी जा रही है... कन्याकुमारी के सागर की लहर बार बार जा कर उसे छू कर जा
रही है. वह भी तो जा रहा है अपने भूत के पास. इससे कभी डरा नहीं वह. एक मायने
में उसे मुहब्बत है इस भूत से. इस भूत में ही तो छिपा है कुछ गुदगुदाते पल, कुछ
रुलाते पल, कुछ हंसाते पल. ज्यादातर अपनी ही बेवकूफियों से भरा पल. यह और बात
है कि हर मूर्खता उसे एक महान क्रांतिकारिता दिखती थी. वजह यह थी कि तब उसे
किसी किस्म की जानकारी नहीं थी. और जब जानकारी हो गई तो आंखों पर चश्मा चढ़ चुका
था. बिना चश्मे का सब कुछ आउट आफ फोकस. फोकस में आने पर दिखता है बेगाना हो
चुका कस्बे का किशोर.
16.05.2009,05.40 (GMT+05:30) पर प्रकाशित