दाल रोटी के लिए वोट
बात
पते की
दाल
रोटी के लिए वोट
देविंदर शर्मा
वोट स्थिरता के लिए नहीं है. वोट तो दाल-रोटी के लिए है.
मई 2004 में रुष्ट ग्रामीणों ने चिढ़ाने वाली शाइनिंग इंडिया टोली के खिलाफ वोट
डालकर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया. पांच साल बाद 2009 में ग्रामीणों का
गुस्सा ठंडा पड़ गया प्रतीत होता है. संभवत: पहली बार, दाल-रोटी ने प्रतिस्पर्धी
जाति समीकरणों को पछाड़ते हुए प्रमुखता हासिल की है. ग्रामीण गरीबों ने उन्हें
वोट दिया है, जिन्होंने उन्हें खाने को भोजन दिया.
राष्ट्रीय स्तर पर स्थिरता उनके दिमाग में नहीं थी, बिल्कुल भी नहीं. न ही
सुधारों के लिए वोट मिला. वास्तव में कांग्रेस की गाड़ी फिर से पटरी पर आई ही
सुधारों के विरोध के कारण है. जनादेश पर कारपोरेट भारत की उत्तेजना साफ दिखाई
दे रही है, लेकिन अगर कांग्रेस कारपोरेट घरानों के मीडिया के जाल में फंस गई जो
दिन-रात सुधार मंत्र का जाप करता रहता है तो वह अपने पतन की कहानी लिख देगी.
एक साल पहले 2008 के बजट में 60 हजार करोड़ रुपये की कृषि ऋण माफी की घोषणा हुई
थी. बाद में यह रकम बढ़ाकर 71 हजार करोड़ रुपये कर दी गई थी. ऋण माफी योजना से
पहले ही संप्रग सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना ले आई थी.
योजना के तहत किसी भी ग्रामीण परिवार में कम से कम एक व्यक्ति को साल में
न्यूनतम सौ दिन के रोजगार की गारंटी दी गई थी. यह योजना 2 फरवरी, 2002 को देश
के दो सौ जिलों में लागू की गई. अप्रैल 2008 में राहुल गांधी के जोर देने पर
योजना पूरे देश में लागू कर दी गई. भ्रष्टाचार और गलत इस्तेमाल की रिपोर्टो के
बावजूद नरेगा ने निश्चित तौर पर भूमिहीन कामगारों की माली हालत बदल दी.
जबसे योजना लागू की गई है तब से श्रमिकों की दिहाड़ी दोगुनी हो गई है. बिहार में
2007 में दिहाड़ी 50-60 रुपये से बढ़कर 2009 में 120-130 रुपये पर पहुंच गई है.
आंध्र प्रदेश में 70-80 रुपये से बढ़कर 140-150 और महाराष्ट्र में 65-70 से
बढ़कर 150-160 रुपये हो गई है.
नरेगा और कृषि ऋण माफी दोनों ही योजनाओं का नवउदारवादी अर्थशास्त्रियों ने कड़ा
विरोध किया था. सर्वविदित है कि योजना आयोग और ग्रामीण विकास मंत्रालय ने भी
शुरू में नरेगा का विरोध किया था. बाद में विश्व बैंक ने भी यह कहकर इसका विरोध
किया कि नरेगा श्रम के मुक्त प्रवाह में अवरोध पैदा करेगा. तीसरे और इतने ही
महत्वपूर्ण जिस फैसले ने सत्तारूढ़ संप्रग को जबरदस्त फायदा पहुंचाया वह है
गेहूं, चावल, कपास, गन्ना, सोयाबीन और दालों की सरकारी खरीद के समर्थन मूल्यों
में जबरदस्त उछाल.
पिछले तीन सालों के दौरान गेहूं के समर्थन मूल्य में 69 प्रतिशत और चावल के
मूल्य में 61 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई है. इनके अलावा, कपास के दाम पचास प्रतिशत
बढ़े हैं. यह 2008 में 2050 रुपये प्रति कुंतल से बढ़कर 2009 में 3000 रुपये पर
पहुंच गया जबकि राजग के कार्यकाल में इन जीन्सों के समर्थन मूल्य कमोबेश वही
रहे.
दो-तीन साल की अवधि में गेहूं के दामों में तीन सौ रुपये प्रति कुंतल की वृद्धि
होने से पंजाब और हरियाणा के किसानों के चेहरों पर मुस्कान लौट आई है. उत्तर
प्रदेश में अधिकृत मंडियों के अभाव में गेहूं की कमजोर बिक्री की खबरें हैं.
यहां के किसानों को 1080 रुपये प्रति कुंतल के भाव पर गेहूं बेचने के लिए पड़ोसी
राज्यों हरियाणा और मध्य प्रदेश जाना पड़ा.
बिहार में नीतीश कुमार ने न केवल कानून-व्यवस्था में सुधार किया बल्कि नरेगा,
मिड-डे मील, सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं को सुचारु रूप से चलाने पर पूरा
ध्यान केंद्रित किया. बिहार ने योग्य प्रशासक को वोट दिया न कि राष्ट्रीय
स्थिरता को. पश्चिम बंगाल ने भी औद्योगिक विस्तार को उखाड़ दिया. ममता बनर्जी को
वोट देकर पश्चिम बंगाल ने साफ संकेत दे दिया है कि विकास के नाम पर कृषि भूमि
का अधिग्रहण स्वीकार्य नहीं है. पुन: नंदीग्राम और सिंगूर गरीबों से दाल-रोटी
छीनने के कारपोरेट प्रयास के प्रतीक बन गए हैं. लोगों ने इसका जबरदस्त विरोध
किया. इसका संकेत बिल्कुल स्पष्ट है- करोड़ों गरीबों के लिए भूमि ही एकमात्र
आर्थिक सुरक्षा है.
आंध्र प्रदेश में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी ने जनता की नब्ज पहचानी और खुद को
उनकी मांग के अनुरूप ढाला. गरीबों के लिए दो रुपये प्रति किलोग्राम चावल,
आरोग्यश्री योजना के तहत दो लाख तक का मुफ्त स्वास्थ्य बीमा, गरीबों के लिए
इंदिराम्मा मकान और वृद्ध पेंशन योजना से उन्हें भारी लाभ मिला.
गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन कर रहे करीब 1.85 करोड़ परिवारों ने दो रुपये प्रति
किलोग्राम चावल योजना से फायदा उठाया. इसके अलावा, राजशेखर रेड्डी ने सिंचाई
योजनाओं में भारी निवेश किया. इनमें से प्रत्येक को न्यायोचित नहीं ठहराया जा
सकता, लेकिन इससे किसान समुदाय के मन में आशा की किरण तो जगी. किसानों को मुफ्त
बिजली ने तो किसानों पर मजबूत पकड़ बना दी है.
गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले 37 लाख परिवारों को दो रुपये किलो की दर पर चावल
देने का वायदा कर छत्तीसगढ़ में गत दिसंबर में भाजपा फिर से सत्ता में आ गई थी.
छत्तीसगढ़ में बीपीएल परिवारों को वर्तमान में तीन रुपये किलो की दर से मिल रहा
चावल मध्य प्रदेश की तर्ज पर दो रुपये किलो वाली योजना में बदला जाना है.
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नवीन पटनायक ने भी दो रुपये प्रति किलो चावल की योजना लागू कर 55.79 लाख गरीब
परिवारों को लाभ पहुंचाया है. इन राज्यों में भी गरीबी की मार झेल रहे
लाभार्थियों ने राष्ट्रीय स्थिरता के लिए नहीं बल्कि खाद्यान्न सुरक्षा के लिए
सत्तारूढ़ पार्टियों को वोट दिया है.
सस्ता चावल मुहैया कराने के अलावा, मध्य प्रदेश सरकार की लोकप्रिय 'लाडली'
योजना भी वोटरों को लुभाने में सफल रही. इस योजना के तहत सरकार स्कूल जाने वाली
प्रत्येक लड़की का बैंक खाता खुलवाती है. लड़की के जन्म लेने के बाद राज्य सरकार
पांच सालों तक प्रति वर्ष छह हजार रुपये के बचत पत्र खरीदती है. पांचवीं कक्षा
पास करने के बाद लड़की को दो हजार रुपए मिलते हैं, आठवीं के बाद चार हजार रुपये
तथा दसवीं पास करने के बाद साढ़े सात हजार रुपये मिलते हैं. 11वीं कक्षा में
प्रति माह दो सौ रुपये का भुगतान किया जाता है. जब वह 12वीं कक्षा में आ जाती
है या फिर 18 साल की हो जाती है तो उसे करीब एक लाख 18 हजार रुपये मिलते हैं.
मीडिया रिपोर्टो के अनुसार तमिलनाडु में 2006 के विधानसभा चुनाव के दौरान
द्रमुक ने मुफ्त रंगीन टीवी, दो रुपये प्रति किलो चावल, भूमिहीनों को दो एकड़
जमीन, बेरोजगारों को मुफ्त गैस स्टोव और तीन सौ रुपये, गरीब महिलाओं के बच्चा
होने पर छह माह तक प्रति माह एक हजार रुपये और बुनकरों को मुफ्त बिजली का वादा
किया था.
तत्पश्चात, 2009-10 के बजट में तमिलनाडु ने किसानों को मुफ्त बिजली के लिए 271
करोड़ रुपये और झोपड़ियों में मुफ्त बिजली कनेक्शन के लिए 1251 करोड़ रुपये का
प्रावधान किया. इसके अलावा 25 लाख कलर टीवी के लिए 250 करोड़ रुपये तथा मुफ्त
गैस स्टोव कनेक्शन के लिए 140 करोड़ रुपये रखे.
तमिलनाडु में वोटरों ने निश्चित तौर पर राष्ट्रीय स्थिरता की बजाय द्रमुक को
वरीयता दी. कुल मिलाकर कहा जाए तो जनादेश स्पष्ट रूप से उन सत्तारूढ़ दलों को
मिला जिन्होंने गरीबों की आमदनी बढ़ाई और उनके भोजन का इंतजाम किया. गरीबों को
जीवनरक्षक सहायता प्रदान करना भी तो आर्थिक राहत ही है चाहे यह खाद्यान्न के
रूप में हो या नगद. इसे चुनावी बाध्यता भी कहा जा सकता है, लेकिन सम्मिलित
संवृद्धि सुनिश्चित करने का कोई और उपाय नहीं है.
21.05.2009,
11.05 (GMT+05:30) पर प्रकाशित