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गृहयुद्ध के कगार पर नेपाल

मुद्दा

 

गृहयुद्ध के कगार पर नेपाल

आनंद स्वरूप वर्मा

 

नेपाल में प्रधानमंत्री पुष्पकमल दहाल ‘प्रचण्ड’ के इस्तीफे के बाद एक बार फिर देश की राजनीतिक पार्टियों ने वह स्थिति पैदा कर दी है, जो नवंबर 2005 में हुए 12 सूत्री समझौते के दिनों की याद दिलाती है. 12 सूत्री समझौता उस समय की भूमिगत और जनयुद्ध का संचालन करने वाली पार्टी नेकपा (माओवादी) तथा सात संसदीय दलों के बीच सम्पन्न हुआ था. यह समझौता एक ऐतिहासिक समझौता था क्योंकि इसके आधार पर जो कार्यक्रम बना उसकी परिणति नवंबर 2006 में विस्तृत शांति समझौते, संविधान सभा के चुनाव और गणतंत्र की स्थापना में हुई.

माओवादी प्रधानमंत्री प्रचंड


अगर 12 सूत्री समझौता नहीं हुआ होता तो नेपाल में इतनी जल्दी राजतंत्र का सफाया नहीं होता. लेकिन यह याद करना जरूरी है कि उस समझौते के खिलाफ अमरीका ने खुल कर अभियान चलाया था. उस समय नेपाल में अमरीका के तत्कालीन राजदूत जेम्स मोरिआर्टी ने संसदीय राजनीतिक दलों को सलाह दी थी कि वे माओवादियों के साथ हाथ न मिलाएं और राजा ज्ञानेन्द्र के साथ मिलकर माओवादियों का मुकाबला करें.

मोरिआर्टी ने यहां तक कहा था कि अगर इन पार्टियों ने समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं तो भी वे इससे बाहर आ जाएं और अपनी समीक्षा करें. यहां यह भी याद करने की जरूरत है कि यह समझौता दिल्ली में सम्पन्न हुआ था और ऐसे समय जबकि खुद भारत सरकार नेपाल के माओवादियों की धर-पकड़ में लगी थी, बिना उसकी जानकारी/सहमति के यह समझौता मूर्त रूप नहीं ले पाता. चूंकि तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की पार्टी नेपाली कांग्रेस की छवि भारत सरकार की निगाह में शुरू से अच्छी रही है, इसलिए उनके प्रयास से ही भारत में यह कार्य सम्पन्न हो सका.

काफी दिनों बाद जब हालात पूरी तरह सामान्य हो गए तो यह जानकारी बाहर आयी कि प्रचण्ड ने समझौते के लिए रोल्पा में बैठक करने का सुझाव दिया और राजनीतिक दलों के नेताओं को सुरक्षा की गारंटी दी थी लेकिन गिरिजा प्रसाद कोइराला इसके लिए तैयार नहीं हुए. उन्होंने प्रचण्ड और उनके साथियों को सुरक्षा की गारंटी देते हुए मीटिंग के लिए दिल्ली का चयन किया. दरअसल एक फरवरी 2005 को जब ज्ञानेंद्र ने समूची सत्ता अपने हाथ में ले ली और संसदीय पार्टियों के नेताओं की धर-पकड़ शुरू कर दी तो इन पार्टियों को महसूस हुआ कि माओवादियों के साथ मिलकर राजतंत्र के खिलाफ लड़ाई को मजबूती दी जाय. माओवादियों को भी इसकी जरूरत महसूस हो रही थी.

इस समझौते पर अमेरिकी प्रतिक्रिया से यह बात भी उजागर हुई कि भारत और अमरीका के बीच अनेक स्तरों पर परस्पर सहयोग के बावजूद नेपाल में वर्चस्व कायम करने के मुद्दे पर दोनों के बीच जबर्दस्त अंतर्विरोध रहा है. नेपाल में अमरीका की मजबूत स्थिति को भारत अपने राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल मानता है.

पुरानी शाही नेपाली सेना के प्रमुख रूक्मांगद कटवाल की बर्खास्तगी के मुद्दे पर नेपाल की राजनीति में जो ध्रुवीकरण दिखायी दे रहा है, वह काफी हद तक अमरीका की उस इच्छा की अभिव्यक्ति है, जिसमें वह चाहता था कि सारी पार्टियां मिल कर माओवादियों के खिलाफ मोर्चा बनाएं.

राजतंत्र तो समाप्त हो गया लेकिन कटवाल के रूप में राजतंत्र का अवशेष मौजूद है और एक बार फिर अमरीका ने हारी हुई बाजी को अपने पक्ष में लाने की कोशिश की है. आप देखेंगे कि कटवाल के मुद्दे पर नेपाली कांग्रेस, नेकपा (एमाले) तथा अन्य ढेर सारी पार्टियां एक हो गयी हैं और माओवादियों को अलगाव में डाला जा रहा है. संविधान सभा की 240 सीटों के लिए हुए प्रत्यक्ष मतदान में क्रमश: 37 और 33 सीटों पर सफलता पाने वाली नेपाली कांग्रेस और नेकपा एमाले मिलकर सरकार बनाने जा रही हैं और 120 सीटों पर जीत हासिल करने वाले माओवादियों को अलग-थलग रखा जा रहा है. मई 2009 के दूसरे सप्ताह तक की स्थिति का विवेचन करें तो पाते हैं कि काठमांडो और रौतहट से बुरी तरह चुनाव हारने वाले एमाले के पूर्व महासचिव माधव नेपाल, जिनके नेतृत्व में चुनाव में समूची पार्टी का सफाया हो गया, प्रधानमंत्री बन गये हैं.

यह सरकार कितने दिन चल सकेगी, यह बहुत अनिश्चित है. 601 सदस्यों की संसद/संविधान सभा में 240 सीटों वाली सबसे बड़ी पार्टी नेकपा (माओवादी) को अलगाव में डालकर किसी भी सरकार के लिए काम करना मुश्किल है.

काठमांडो की विशाल रैली को संबोधित करते हुए प्रचण्ड ने कहा कि उनकी पार्टी अब किसी भी हालत में वापस गांवों और जंगलों में जाकर छापामार युद्ध नहीं करेगी.


अब धीरे-धीरे यह बात सामने आने लगी है कि एक गहरी साजिश के तहत प्रचण्ड की सरकार को गिराया गया. यह भी पता चल रहा है कि सरकारी आदेशों की एक के बाद एक अवहेलना करने वाले सेनाध्यक्ष कटवाल को बढ़ावा देने वाले कौन लोग थे. सरकार में नेकपा (माओवादी) के प्रमुख सहयोगी दल नेकपा (एमाले) ने प्रधानमंत्री प्रचण्ड से स्पष्ट तौर पर कहा था कि कटवाल को फौरन बर्खास्त किया जाना चाहिए. अपनी पार्टी के अंदर विचार-विमर्श के बाद खुद पार्टी अधयक्ष झलनाथ खनाल ने यह बात प्रचण्ड से कही थी. बावजूद इसके जैसे ही सरकार ने कटवाल को बर्खास्त किया, अपना विरोध जताते हुए एमाले ने समर्थन वापस ले लिया और सरकार गिर गयी.

एमाले के ही वरिष्ठ उपाध्यक्ष और प्रचण्ड की सरकार में गृहमंत्री तथा उपप्रधानमंत्री बामदेव गौतम ने सार्वजनिक तौर पर अपनी पार्टी के इस कदम की तीखी आलोचना की और कहा कि खुद एमाले के लिए ऐसा करना (सरकार गिराना) एक आत्मघाती कदम साबित होगा.

राष्ट्रपति रामबरण यादव द्वारा कटवाल को पुन: बहाल किए जाने की घटना पर रोष व्यक्त करने के लिए 17 मई को राजधनी काठमांडो सहित देश के चार शहरों में जनसभाएं आयोजित की गयीं. काठमांडो की विशाल रैली को संबोधित करते हुए प्रचण्ड ने कहा कि उनकी पार्टी अब किसी भी हालत में वापस गांवों और जंगलों में जाकर छापामार युद्ध नहीं करेगी. वह शांतिपूर्ण जनआंदोलन के जरिए सामंती और यथास्थितिवादी शक्तियों के खिलाफ आंदोलन चलाएगी, जो नहीं चाहतीं कि नेपाल की समूची संरचना में कोई परिवर्तन हो और एक जनपक्षीय संविधान का निर्माण हो सके.

प्रचण्ड ने सैनिक सर्वोच्चता के बजाय नागरिक सर्वोच्चता स्थापित करने के मुद्दे पर सरकार से इस्तीफा दिया और पार्टी की लोकप्रियता को जनता के बीच कई गुना बढ़ा दिया. आम तौर पर राष्ट्रपति की कार्रवाई को कटवाल के साथ मिलकर ‘तख्तापलट की कार्रवाई’कहा जा रहा है. प्रचण्ड का मानना है कि जब तक राष्ट्रपति अपने कदम को वापस नहीं लेते, आंदोलन जारी रहेगा. कुल मिलाकर एक बार फिर नेपाल गृहयुद्ध के कगार पर खड़ा दिखायी दे रहा है.

 

25.05.2009, 13.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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