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ऐसे-वैसे-कैसे कुलपति

बात पते की

 

ऐसे-वैसे-कैसे कुलपति

देविंदर शर्मा

 

एक समय था जब किसी विश्वविद्यालय के कुलपति से मुलाकात बड़ी प्रेरणादायी होती थी. आप खड़े होकर पूरे मान-सम्मान के साथ उन्हें सुनते थे. दुर्भाग्य से अब ऐसा नहीं है. वजह जो भी हो, कुलपति अब प्रेरित नहीं करते.

ईमानदारी से कहा जाए तो आज एक हद तक स्थिति यह है कि आप कुलपति से मुलाकात करने के बजाए उनसे बचना चाहेंगे. कुलपति के रूप में एक संस्था में पतन का सिलसिला कुछ समय पहले शुरू हुआ और आज की तारीख में इस संस्था को लगा रोग संभवत: आखिरी चरण में प्रवेश कर गया है.

कुलपतियों की नियुक्ति


शिक्षा व्यवस्था में रुचि रखने वाले सभी लोगों को इस पर चिंतित होना चाहिए कि कभी संस्थान का पर्याय माने जाने वाले कुलपति पद की गरिमा बड़ी तेजी से गिरी है. अगर कोई शैक्षिक संस्थान अपना पुनरुद्धार चाहता है तो उसे कुलपति कार्यालय में सुधार से इसकी शुरुआत करनी होगी. कोई भी आर्थिक राहत और शिक्षा के क्षेत्र में सुधारों की तीव्र गति तब तक संभव नहीं है जब तक कुलपति के पद की खोई हुई गरिमा फिर से स्थापित न की जाए. भारतीय शिक्षा के भविष्य का प्रत्यक्ष संबंध संस्थान के कुलपति पद के सम्मान से जुड़ा है. यह सुधार कार्यक्रम नई सरकार की प्राथमिकताओं में आना चाहिए.

दस केंद्रीय विश्वविद्यालयों के कुलपतियों की नियुक्ति विवादों से घिरी रही है. जिस तत्परता के साथ तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने ये नियुक्तियां की थीं, उससे भौंहें तननी ही थीं. जिस प्रकार से कुलपतियों की नियुक्तियां की जा रही हैं उससे सामान्य विश्वविद्यालयों की साख पर गंभीर संकट खड़ा हो रहा है. निजी विश्वविद्यालयों की हालत तो और भी दयनीय है. सर्वोच्च पद सामान्यतया उस व्यक्ति के पास होता है, जिसकी काबिलियत विश्वविद्यालय के प्रवर्तक का करीबी और वफादार होना है.

मुझे अधिक चिंता कृषि विश्वविद्यालयों की है. कृषि विज्ञान और अनुसंधान प्राथमिक रूप से कुलपति की नेतृत्व क्षमता पर निर्भर करता है. यह न केवल अनुसंधान की उपयोगिता और महत्ता निर्धारित करता है, बल्कि एक तरह से देश की खाद्य सुरक्षा और 60 करोड़ किसानों की आजीविका के लिए भी जिम्मेदार है.

कुछ समय पहले तक कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति की नियुक्ति एक राजनीतिक कवायद मानी जाती थी. कई सालों से मैं देख रहा हूं कि कुलपतियों की एकमात्र योग्यता राजनीतिक नेतृत्व से निकटता रह गई है. इसके कुछ अपवाद हो सकते हैं, लेकिन आम तौर पर कुलपति का नामांकन और चयन प्रक्रिया महज एक स्वांग में तब्दील हो गई है.

उदाहरण के लिए तमिलनाडु के कोयंबटूर में तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी का मामला देखें. यह बेहद प्रतिष्ठित संस्थान रहा है. टीएनएयू देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित कृषि विश्वविद्यालयों में से एक था. देश के अन्य शिक्षण संस्थानों की तरह टीएनएयू में भी शोध और शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है, किंतु मैंने यह अपेक्षा नहीं की थी कि यह गिरावट इस सीमा तक पहुंच जाएगी कि कृषि मंत्री का निजी सचिव खुद को इस पद पर नियुक्त कराने में करीब-करीब कामयाब हो सकता है. यह तो टीएनएयू के शिक्षकों की तरफ से उठे तीव्र विरोध के कारण ही ऐसा होने से बच गया. टीएनएयू एक अपवाद है.

अधिकांश विश्वविद्यालयों में ऐसे कुलपतियों की नियुक्ति की जा रही है, जो इनके लायक नहीं हैं. यही प्राथमिक कारण है कि कृषि विश्वविद्यालय सार्थक शोध में विफल हो रहे हैं. असल में अधिकांश कृषि विश्वविद्यालय निजी बीज कंपनियों के क्रियाकलापों को दोहरा भर रहे हैं.

कुलपति के प्रति आदर भाव अब बीते दिनों की बात हो गया है. कुछ साल पहले जब हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डीआर भुंबला ने अचानक इस्तीफा दे दिया था तो इसके विरोध में वहां के छात्रों ने हड़ताल कर दी थी. यह एक असाधारण घटना थी. मैंने ऐसा पहले कभी नहीं देखा कि छात्र एक कुलपति को रोकने के लिए आंदोलन शुरू करें. हां, ऐसे तो बहुत से मामले हैं जब छात्रों ने कुलपति को हटाने के लिए हड़ताल की हो.

पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी, लुधियाना के कुलपति के पद पर कार्य कर चुके विख्यात प्रशासक डा. एमएस रंधावा ने एक मजेदार घटना सुनाई थी. एक दिन हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल ने वाईएस परमार यूनिवर्सिटी आफ हार्टिकल्चरल साइंस एंड फोरेस्ट्री, सोलन के कुलपति की नियुक्ति के संबंध में उनसे सलाह मांगी. राज्यपाल ने तीन नामों का विकल्प रखा. डा. रंधावा को जो उपयुक्त लगा उसका सुझाव दिया. कुछ दिनों बाद वह अखबार में यह पढ़कर दंग रह गए कि इस पद पर किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति कर दी गई थी.

आम चुनाव की तरह ही कृषि व्यवसाय से जुड़ी कंपनियां खास उम्मीदवारों के लिए माहौल बनाने तथा उसके पक्ष में दबाव डालने के काम में लग जाती हैं. शोध कार्ययोजना से उन्हें क्या लेना-देना!


अगर आप चकित हैं कि किस प्रकार कुलपतियों की नियुक्ति होती है तो इस प्रक्रिया की तह में जाने की जरूरत है.

दिखावे के लिए तो चुनाव प्रक्रिया योग्यता के आधार पर होती है. द इंडियन काउंसिल फार एग्रीकल्चरल रिसर्च सामान्य तौर पर तीन नामों का एक पैनल बनाती है. ये नाम उस राज्य के राज्यपाल के पास भेजे जाते हैं जिसमें विश्वविद्यालय होता है. विश्वविद्यालय के कुलपति होने के नाते उपराज्यपाल ही अंतिम फैसला लेते हैं, जबकि व्यवहार में प्रदेश के मुख्यमंत्री की राय ही सर्वोपरि मानी जाती है.

सच्चाई यह है कि मुख्यमंत्री की पसंद आईसीएआर को पहले ही बता दी जाती है और उम्मीदवारों का चुनाव करते समय इस बात को ध्यान में रखा जाता है. कुछ समय से पेशेवर योग्यता को ताक पर रख दिया गया है. सच यह है कि विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के मुकाबले कुलपति बनना आसान है, किंतु मुझे यह बात परेशान करती है कि जिस पद की कभी अभिलाषा की जाती थी, अब वह बिकाऊ हो गया है.

राजनीतिक निकटता ही एकमात्र मापदंड नहीं है. आप कितना खर्च कर सकते हैं, इससे भी अंतिम फैसला प्रभावित होता है. कई कुलपतियों ने मुझे बताया है कि विश्वविद्यालय के प्रमुख होने के लिए कितनी रकम खर्च करनी पड़ती है. आम चुनाव की तरह ही कृषि व्यवसाय से जुड़ी कंपनियां खास उम्मीदवारों के लिए माहौल बनाने तथा उसके पक्ष में दबाव डालने के काम में लग जाती हैं. शोध कार्ययोजना से उन्हें क्या लेना-देना! उन्हें तो बस कंपनी के व्यापारिक हितों की चिंता होती है.

यद्यपि यह हरेक मामले में सही नहीं है, किंतु यह विडंबना है कि अधिकांश मामलों में कुलपति रुपयों से भरे सूटकेस लेकर चलते हैं. मैं किसी भी तरह कुलपति पद की अवमानना करना नहीं चाहता, क्योंकि इस पद को धारण करने वाले सभी व्यक्तियों को एक ही श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, किंतु गलत कार्यों की अनदेखी करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा.

पता नहीं इस सड़न को कौन बंद करेगा, किंतु इस पर असहमति की गुंजाइश नहीं है कि इस संस्थान को बचाने की सख्त जरूरत है. देश का भविष्य इस पर निर्भर है कि यहां शिक्षा का क्या स्तर होगा? शिक्षा की गुणवत्ता मुख्यत: कुलपतियों की योग्यता पर निर्भर करती है. घटिया श्रेणी के कुलपतियों के भरोसे हम महाशक्ति बनने की उम्मीद नहीं कर सकते.

 

02.06.2009, 01.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Kaushal (kaushalvnu@gmail.com) Bhopal

 
 Yes You are very right. I feel that the procedure is according to the Chancellor's need not by education and intitutional need. take an example of M.P. Bhoj OPen University. the aware readers knew all the developments happening in MPBOU.Not only in MP, it is well in fashion in all the states. when NO VC is from educational background, then who will concerned about the university and education? the same corruption is going on in the field of teacher's training. many of the institutions mushroomed now. 
   
 

डॉ. लाल रत्नाकर (ratnakarlal@gmail.com ) गाजियाबाद उ. प्र.

 
 'कुल-पति' अति सम्मान जनक वोहदा-जिसे आमजन से खास लेना देना नहीं , जहाँ शिक्षाविद वैज्ञानिक या प्रसाशनिक अधिकारी नियुक्त हुआ करते रहे है,यह उस संप्रदाय के प्रमुख हुआ करते थे जहाँ सरकारें समुचित शिक्षा के लिए उक्त पद पर नियुक्ति हुआ करती थी,पर जब से शिक्षा का निजी करन हुआ है तब से अधिकांश कुलपति यानि एसे वैसे कुलपति के रूप में आने लगे और जब ये आये तो इनके इर्द गिर्द एसे ही लोग तमाम बुराईयाँ वाले शिक्षक छात्र दोनों के नेता और विश्वविद्यालय के महान कर्मचारी जिनके कन्धों पर पूरा विश्वविद्यालय होता है. जोड़ जुगत के इस युग में नियुक्तियों में जाती धर्म संप्रदाय से यदि कुछ बचता है तो वह जगह नकारे और रखैलों के लिए होते है. यदि गलती से कोई भला और पढ़ा लिखा आ गया तो उसका जीना दूभर .
यही से निकलती है कुलपति की कुर्शी जिस पर सुशोभित होते है ऐसे वैसे कुलपति.

बलात्कार हत्याएं अपहरण तो सामान्य घटना है - फर्जी नंबर फर्जी डीग्री और न जाने क्या क्या, नाम देना आम आदमी के सामने जहाँ सम्मानजनक नहीं होता था वहीं अखबार वाले मोटे मोटे शिर्शसकों के साथ खबरें लिखते नहीं थकते - परदे के पीछे क्या - क्या हो रहा है उसके लिए उन्हें प्रमाण पत्रों की जरुरत होती है. मैं एसे कई कई नेताओं को जनता हूँ जिनसे माफिया भी शर्मायेगा यदि उनका खुलासा किया या हो जाय. माफ़ करियेगा शर्मा जी कुलपति कौन बन रहा है और क्यों बन रहा है उससे आप भी वाकिफ है और हम सब भी. यदि सब कुछ ठीक ठाक हो जाता तो आज हम अच्छे से अच्छे देश से बड़े होते.
 
   
 

संदीप भट्ट (sana_sho21@webdunia.com) इंदौर

 
 सिफारिशी कुलपतियों ने विश्‍वविद्यालयों को राजनीति का अखाड़ा बना दिया है। देश के अधिकतर विश्‍वविद्यालयों में कमोबेश यही आलम बरकरार है। चतुर्थ श्रेणी की नियुक्‍तियों से लेकर अफसरों और कुलपतियों की नियुक्‍ितयों में हर विश्‍वविद्यालय के एक जैसे हाल हैं। हाल ही में मध्‍यप्रदेश के देवी अहिल्‍या विश्‍वविद्यालय के कुलपति के चयन के लिए जिस तरह की रस्‍साकसी दिखी उससे यही साबित होता है। जुगाड़ू अफसर,नेता,सब लाइन में लग जाते हैं।इसी विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति को कांग्रेस ने लोकसभा का टिकट दिया तो उन्‍होंने गद्दी छोड दी।उज्‍जैन का विक्रम विश्‍वविद्यालय चक्रम में बदल गया था, भोज और बरकतउल्‍लाह विश्‍वविद्यालय की खबरों से अखबारों के पन्‍ने भरे पड़े रहते हैं। योग्‍य और अकादमिक लोग सिफारिशों में पीछे रह जाते हैं। रिटायर्ड या प्रतिनियुक्‍ति पर किसी आइएएस या आईपीएस को इस तरह के पदों पर बैठाने से यही तो होगा। विश्‍वविद्यालय सरकारी दफ्तर में तब्‍दील हो जाते हैं। राजनैतिक दखल इस कदर रहता है कि कुलपति चाह कर भी कुछ नही कर पाते। दूसरी बात है कि कुलपतियों के चयन राजनैतिक दलों की दखलंदाजी भी हावी रहती है। ऐसे में किसी साफ सुथरे व्‍यक्‍ति के चयन की उम्‍मीदवारी कमजोर हो जाती है। बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्‍यप्रदेश, उत्‍तराखंड ही नहीं मुल्‍क के तमाम विश्‍वविद्यालयों में यही हाल है। और अगर यही जारी रहा तो एक दिन विश्‍वविद्यालय नाम की संस्‍था की साख पर ही बट्टा लग जाएगा।  
   

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