वंश पर दंश क्यों ?
बात
पते की
वंश
पर दंश क्यों ?
कनक तिवारी
पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के साथ राजनीतिक वंशजों की चर्चाएं वैचारिक सेंसेक्स के
उछाल पर हैं. राजनीतिक आलोचक, सर्वेकार, समाजशास्त्री और वरिष्ठ पत्रकार इस बात की
उधेड़बुन में लगे हैं कि देश की राजनीति इक्कीसवीं सदी में अन्य व्यवसायों की तरह एक
महज व्यवसाय बनकर रह गई है और प्रत्येक राजनेता यथासंभव अपने वंशजों को गद्दीनशीन
करने पर आमादा है.
एक साधारण सा भोथरा तर्क दिया जाता है कि जितने भी राजनीतिक वंशज हैं वे सब के
सब एक ही प्रक्रिया के तहत उपजे हैं. उन सबके पीछे उनके अभिभावकों का हाथ बल्कि
तिकड़म है और इस कारण ही वे राजनीति की प्राथमिक पाठशाला में भर्ती होने के बदले
सीधे विश्वविद्यालयीन स्तर के छात्र हो जाते हैं और राजनीतिक डिग्रियां बटोरने
लगते हैं.
यदि ठहरकर इनमें से अलग अलग प्रकरणों की छानबीन की जाए तो नतीजे अलग अलग आते
हैं. मोटे तौर पर यह राजनीतिक आरोप या जनता की समझ तो सही है कि राजनीतिक वंशज
केवल अपने दमखम पर राजनीति में प्रवेश नहीं करते. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि
राजनीति में प्रवेश करने के बाद ऐसे बहुत से कारण होते हैं जब उन्हें बाकी
साधारण कार्यकर्ताओं के मुकाबले तरजीह मिलती है और वे हाथों हाथ उठा लिए जाते
हैं.
सबसे बड़े आरोपी नेहरू गांधी परिवार का किस्सा अपनी अनोखी प्रकृति का है. पंडित
मोतीलाल नेहरू महात्मा गांधी के प्रभाव में कांग्रेस की राजनीति में आए और उसके
सर्वोच्च पद तक पहुंचे. उन्होंने जंगे आजादी में खुलकर हिस्सा लिया और जेल की
सजाएं भी काटीं. उनके यशस्वी पुत्र जवाहर लाल तो भारतीय राजनीति की आत्मा तक बन
गए थे. स्वतंत्र भारत को वैचारिक बुनियाद पर खड़ा करने में पंडित नेहरू का
योगदान सर्वोपरि है. उनके दामाद फीरोज़ गांधी भी अपने दमखम पर राजनीति में आए और
आज़ादी के बाद तो उन्होंने अपने ससुर के मंत्रिमंडल के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया.
पारिवारिक अनबन और परिस्थितियों के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी ने पति के बदले
पिता का साथ दिया. वे एक तरह से अपने पिता की दोस्त, सलाहकार और निजी सचिव भी
थीं. पिता के अवसान के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक अभ्युदय एक स्वाभाविक
प्रक्रिया का परिणाम था.
इंदिरा गांधी ने उन पर हुए आक्रमणों के कारण एक सख्त चेहरा भी बनाया और आपातकाल
लगाने जैसी गलती का खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ा. असुरक्षित महसूस करने के
कारण उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में लाने का फैसला किया
लेकिन संजय की असामयिक मौत के कारण अनिच्छुक बड़े बेटे राजीव गांधी को पायलट की
नौकरी छोड़कर राजनीति में आना पड़ा.
एक भयानक हादसे का शिकार होने के बाद इंदिरा गांधी के निधन ने सत्ताधारी
कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को यह अवसर दिया कि वे राजीव गांधी को कांग्रेस का
नेता चुन लें. राजीव गांधी की भी अमानवीय दुर्घटना में मृत्यु के कारण उनकी
पत्नी विदेशी मूल की भारतीय महिला सोनिया गांधी को प्रारंभिक ना नुकुर के बाद
उस राजनीति में आना पड़ा जिसका केन्द्रीय स्थान लगभग खाली पड़ा था.
सोनिया गांधी ने अपने असाधारण धैर्य, चतुराई और समझदारी से भारत की राजनीति में
अपने लिए वह स्थान बना लिया है जिसका कोई सानी एक विदेशी मूल के नागरिक द्वारा
अन्य देश में वहां की राजनीति में खप जाने का नहीं है.
इसमें भी कोई शक नहीं कि सोनिया गांधी ने बहुत सोच समझकर राहुल गांधी को अपने
राजनीतिक वंशज के रूप में चुना है. ऐसा चुनाव तो ग्राम विकास खंड और जिला स्तर
के नेता भी करते हैं. इस तरह राहुल गांधी के पहले चार पीढ़ियों का राजनीति में
जुड़े रहने का इतिहास है जिनमें से दो पीढ़ियां तो आजादी की लड़ाई के योद्धाओं की
रही हैं. स्वयं इंदिरा गांधी ने भी आजादी की लड़ाई में सक्रिय सहयोग किया था.
नेहरू गांधी परिवार पर राजनीतिक वंशवाद का आरोप इस तरह वैज्ञानिक आधारों पर खरा
नहीं उतरता. मौलाना आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री, उमाशंकर दीक्षित, शेख अब्दुल्ला,
रविशंकर शुक्ल और चौधरी चरणसिंह आदि के परिवारों पर भी इस तरह का आरोप तर्क की
कसौटी पर ज्यादा देर तक नहीं ठहरता.
देश के बहुत से नेता सीधे सीधे अपने वंशजों को राजनीतिक कुर्सियों पर आसीन करने
में मशक्कत के साथ लगे हुए हैं. इनमें शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले,
मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव, करुणानिधि के बेटे स्टालिन और
अझागिरी तथा बेटी कानीमोझी और नाती दयानिधि मारन (उसके पहले दामाद स्वर्गीय
मुरासोली मारन), मुरली देवड़ा और उनके बेटे मिलिंद देवड़ा, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा
और उनके बेटे दीपेन्द्र हुड्डा, चौधरी बंशीलाल की पोती किरण चौधरी, हिमाचल के
मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के बेटे अरुण कुमार, छगन भुजबल के बेटे समीर भुजबल,
लालू यादव के साले साधु यादव, अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला,
देवेगौड़ा के पुत्र कुमारा स्वामी, एनटीरामाराव के दामाद चंद्राबाबू नायडू, बीजू
पटनायक के बेटे नवीन पटनायक, प्रकाशसिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह बादल, पूर्णो
संगमा की बेटी अगाथा संगमा जैसे बीसियों उदाहरण शामिल हैं.
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कांग्रेस के नेता जीतेन्द्र प्रसाद, राजेश पायलट और माधवराव सिंधिया के पुत्रों
जितिन प्रसाद, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रकरण राजनीतिक वंशवाद
की थ्योरी के चलते विशिष्ट प्रकृति के हैं. ये तीनों युवा नेता अपने पिताओं के
जीवनकाल में राजनीति में सक्रिय नहीं हुए थे.
राजेश पायलट और माधवराव सिंधिया की तो दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई थी तथा लोग
उनमें भविष्य के प्रधानमंत्री तक के कंटूर देखने लगे थे. ऐसी हालत में इन तीनों
काबिल युवा नेताओं को पूरी तौर पर प्रशिक्षित होने के कारण एक तरह से अपने
पिताओं के आधे अधूरे रह गए व्यक्तित्वों को पूरा करने के लिए राजनीति में आना
पड़ा. इन्हें इनके पिता सप्रयत्न राजनीति में कहां लाए थे?
सत्ता की बंदरबाट के चलते मुलायम सिंह ने अपने अपरिपक्व पुत्र अखिलेश यादव को
उत्तरप्रदेश समाजवादी पार्टी का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है तथा भाई रामगोपाल
यादव को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है.
यह ठीक उसी तरह हुआ जब भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे होने के कारण लालू यादव ने
अपनी गृहिणी पत्नी राबड़ी देवी को जबरिया मुख्यमंत्री बनाकर बिहार की जनता की
पीठ पर लाद दिया था. भाजपा का कांग्रेस पर वंशवाद को लेकर किया गया आरोप इसलिए
बेतुका है क्योंकि पंजीकृत राजनीतिक पार्टी के रूप में भाजपा की उम्र ही क्या
है, जबकि कांग्रेस बकौल नरेन्द्र मोदी एक बुढ़िया पार्टी हो गई है क्योंकि वह
1885 में जन्मी थी.
राजनीति में बाल ठाकरे के उत्तराधिकारी आखिर उद्धव ठाकरे ही तो बनाए गए और
विरोध भी उनके ही भतीजे राज ठाकरे कर रहे हैं. राजनीति में सांसद या विधायक की
अचानक मृत्यु हो जाने के कारण पत्नी, पुत्र या भाई को उनका स्थान देने के लिए
एक परंपरा ही विकसित की गई है. यह सभी पार्टियों में है. इनमें से जो लोग भी
अपने पैर जमा लेते हैं उनके बारे में वंशवाद का आरोप कैसे लगाया जा सकता है. यह
भी तो एक तरह से अनुकंपा नियुक्ति का ही उदाहरण हुआ.
वैसे भी राजनीति महात्मा गांधी के दिनों में कहां है, जिस व्यक्ति ने राजनीतिक
वंशवाद की कोई परंपरा ही शुरु नहीं की. गुलजारी लाल नंदा भी इस तरह एक वंशविहीन
आकाश कुसुम ही हैं. कुल मिलाकर यह तो तय है कि राजनीतिक वंशवाद लोकतंत्र के लिए
अशुभ लक्षण है और उसका खामियाजा उन साधारण, मैदानी और निष्ठावान कार्यकर्ताओं
को भुगतना पड़ता है जो अन्यथा अपनी अपनी पार्टी में समाज सेवा के जरिए एक बेहतर
भविष्य बना सकते थे.
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ऐसा कोई कानून भी तो नहीं रचा जा
सकता कि राजनीतिक वंशवाद को लोकप्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत निषेधित कर दिया जाए.
लोकतंत्र में जनता का समर्थन सबसे बड़ा तत्व है. |
बात राजनीति में तो खुले खेल की तरह है लेकिन क्या अन्य क्षेत्रों में यही घपले नहीं
हो रहे हैं. कोई सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट के न्यायाधीशों की सूची उठाकर क्यों नहीं
देखता जहां वंश परंपरा की अमर बेल साधारण परिवारों के योग्य उम्मीदवारों पर गाज
बनकर गिरती रही है. ये अन्यायी घपले तो न्याय मंदिर में ही होते रहे हैं.
अपनी स्व अर्जित पूंजी से उद्योगपति परिवार अपने वंशजों को अपना उत्तराधिकार तो ठीक
ही सौंपते रहे हैं लेकिन निजी संगठनों में बड़े बड़े सरकारी ओहदेदारों के बेटे क्या
समय समय पर निदेशक और प्रबंध निदेशकों के पद पर नहीं बैठ रहे हैं. कोई उनकी सूची
बनाएगा?
फिल्मों में भी क्या करण जौहर, अभिषेक बच्चन, रितिक रोशन, रितेश देशमुख, फरहान
अख्तर वगैरह को अपने प्रसिद्ध पिताओं का योगदान क्या नहीं मिल रहा है और इसी तरह के
प्रयोग क्या पहले नहीं हुए हैं और क्या आगे नहीं होंगे?
डॉक्टर लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, पाराशरन, राम जेठमलानी, शांति भूषण और कपिल सिब्बल
वगैरह के वकील पुत्रों को क्या अपने पिताओं का लाभ नहीं मिला है और क्यों नहीं मिलना
चाहिए?
अब भी देश में सामंतवाद का कानूनी सफाया होने के बाद भी राजनीतिक पार्टियां पुराने
सामंतवादियों को क्या सिर पर नहीं लादे हुए हैं और क्या जनता इन्हें चुनकर भेज नहीं
रही है? जब शिक्षित जनता ही लोकतंत्र में रूढ़ विचारों के साथ है तो यह सब आरोप बाजी
किसलिए.
ऐसा कोई कानून भी तो नहीं रचा जा सकता कि राजनीतिक वंशवाद को लोकप्रतिनिधित्व कानून
के अंतर्गत निषेधित कर दिया जाए. लोकतंत्र में जनता का समर्थन सबसे बड़ा तत्व है. ऐसे
बहुत से राजनीतिक वंशज हैं जिनका अपने कुकर्मों या निष्क्रियता की वजह से सूपड़ा साफ
हो गया है. लेकिन एक यक्ष प्रश्न यह भी है कि केवल राजनीतिक वंशवाद पर उंगली उठाने
के बदले यह देखा जाना ज्यादा जरूरी है कि जो लोग लोकतंत्र में चुनाव लड़ने के लिए
सामने आ रहे हैं क्या वे चरित्रवान हैं, अपराधी तो नहीं हैं अथवा बड़े बड़े व्यापारिक
प्रतिष्ठानों और पूंजीपतियों के दलाल तो नहीं हैं.
पुछल्ला: स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जो लोग समाज सेवा करें उन्हें गृहस्थ बनने
की कोई जरूरत नहीं है. अन्य किसी नेता ने यह बात तो नहीं मानी लेकिन देश की तीन बड़ी
महिला नेता जयललिता, मायावती और ममता बनर्जी इस आधार पर खरी उतरती हैं. कम से कम उन
पर यह आरोप तो नहीं लगाया जा सकता कि वे अपने राजनीतिक वारिसों के लिए राजनीति करती
हैं.
06.06.2009,
02.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित