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इस अंक में

 

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

साहित्य का ओपेरा संस्करण

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

यह सबके लिये चेतावनी है

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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वंश पर दंश क्यों ?

बात पते की

 

वंश पर दंश क्यों ?

कनक तिवारी



पंद्रहवीं लोकसभा के गठन के साथ राजनीतिक वंशजों की चर्चाएं वैचारिक सेंसेक्स के उछाल पर हैं. राजनीतिक आलोचक, सर्वेकार, समाजशास्त्री और वरिष्ठ पत्रकार इस बात की उधेड़बुन में लगे हैं कि देश की राजनीति इक्कीसवीं सदी में अन्य व्यवसायों की तरह एक महज व्यवसाय बनकर रह गई है और प्रत्येक राजनेता यथासंभव अपने वंशजों को गद्दीनशीन करने पर आमादा है.

गांधी परिवार


एक साधारण सा भोथरा तर्क दिया जाता है कि जितने भी राजनीतिक वंशज हैं वे सब के सब एक ही प्रक्रिया के तहत उपजे हैं. उन सबके पीछे उनके अभिभावकों का हाथ बल्कि तिकड़म है और इस कारण ही वे राजनीति की प्राथमिक पाठशाला में भर्ती होने के बदले सीधे विश्वविद्यालयीन स्तर के छात्र हो जाते हैं और राजनीतिक डिग्रियां बटोरने लगते हैं.

यदि ठहरकर इनमें से अलग अलग प्रकरणों की छानबीन की जाए तो नतीजे अलग अलग आते हैं. मोटे तौर पर यह राजनीतिक आरोप या जनता की समझ तो सही है कि राजनीतिक वंशज केवल अपने दमखम पर राजनीति में प्रवेश नहीं करते. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि राजनीति में प्रवेश करने के बाद ऐसे बहुत से कारण होते हैं जब उन्हें बाकी साधारण कार्यकर्ताओं के मुकाबले तरजीह मिलती है और वे हाथों हाथ उठा लिए जाते हैं.

सबसे बड़े आरोपी नेहरू गांधी परिवार का किस्सा अपनी अनोखी प्रकृति का है. पंडित मोतीलाल नेहरू महात्मा गांधी के प्रभाव में कांग्रेस की राजनीति में आए और उसके सर्वोच्च पद तक पहुंचे. उन्होंने जंगे आजादी में खुलकर हिस्सा लिया और जेल की सजाएं भी काटीं. उनके यशस्वी पुत्र जवाहर लाल तो भारतीय राजनीति की आत्मा तक बन गए थे. स्वतंत्र भारत को वैचारिक बुनियाद पर खड़ा करने में पंडित नेहरू का योगदान सर्वोपरि है. उनके दामाद फीरोज़ गांधी भी अपने दमखम पर राजनीति में आए और आज़ादी के बाद तो उन्होंने अपने ससुर के मंत्रिमंडल के खिलाफ जेहाद छेड़ दिया.

पारिवारिक अनबन और परिस्थितियों के कारण श्रीमती इंदिरा गांधी ने पति के बदले पिता का साथ दिया. वे एक तरह से अपने पिता की दोस्त, सलाहकार और निजी सचिव भी थीं. पिता के अवसान के बाद इंदिरा गांधी का राजनीतिक अभ्युदय एक स्वाभाविक प्रक्रिया का परिणाम था.

इंदिरा गांधी ने उन पर हुए आक्रमणों के कारण एक सख्त चेहरा भी बनाया और आपातकाल लगाने जैसी गलती का खामियाजा भी उन्हें ही भुगतना पड़ा. असुरक्षित महसूस करने के कारण उन्होंने अपने छोटे बेटे संजय गांधी को राजनीति में लाने का फैसला किया लेकिन संजय की असामयिक मौत के कारण अनिच्छुक बड़े बेटे राजीव गांधी को पायलट की नौकरी छोड़कर राजनीति में आना पड़ा.

एक भयानक हादसे का शिकार होने के बाद इंदिरा गांधी के निधन ने सत्ताधारी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को यह अवसर दिया कि वे राजीव गांधी को कांग्रेस का नेता चुन लें. राजीव गांधी की भी अमानवीय दुर्घटना में मृत्यु के कारण उनकी पत्नी विदेशी मूल की भारतीय महिला सोनिया गांधी को प्रारंभिक ना नुकुर के बाद उस राजनीति में आना पड़ा जिसका केन्द्रीय स्थान लगभग खाली पड़ा था.

सोनिया गांधी ने अपने असाधारण धैर्य, चतुराई और समझदारी से भारत की राजनीति में अपने लिए वह स्थान बना लिया है जिसका कोई सानी एक विदेशी मूल के नागरिक द्वारा अन्य देश में वहां की राजनीति में खप जाने का नहीं है.

इसमें भी कोई शक नहीं कि सोनिया गांधी ने बहुत सोच समझकर राहुल गांधी को अपने राजनीतिक वंशज के रूप में चुना है. ऐसा चुनाव तो ग्राम विकास खंड और जिला स्तर के नेता भी करते हैं. इस तरह राहुल गांधी के पहले चार पीढ़ियों का राजनीति में जुड़े रहने का इतिहास है जिनमें से दो पीढ़ियां तो आजादी की लड़ाई के योद्धाओं की रही हैं. स्वयं इंदिरा गांधी ने भी आजादी की लड़ाई में सक्रिय सहयोग किया था. नेहरू गांधी परिवार पर राजनीतिक वंशवाद का आरोप इस तरह वैज्ञानिक आधारों पर खरा नहीं उतरता. मौलाना आज़ाद, लाल बहादुर शास्त्री, उमाशंकर दीक्षित, शेख अब्दुल्ला, रविशंकर शुक्ल और चौधरी चरणसिंह आदि के परिवारों पर भी इस तरह का आरोप तर्क की कसौटी पर ज्यादा देर तक नहीं ठहरता.

देश के बहुत से नेता सीधे सीधे अपने वंशजों को राजनीतिक कुर्सियों पर आसीन करने में मशक्कत के साथ लगे हुए हैं. इनमें शरद पवार और उनकी बेटी सुप्रिया सुले, मुलायम सिंह यादव और उनके बेटे अखिलेश यादव, करुणानिधि के बेटे स्टालिन और अझागिरी तथा बेटी कानीमोझी और नाती दयानिधि मारन (उसके पहले दामाद स्वर्गीय मुरासोली मारन), मुरली देवड़ा और उनके बेटे मिलिंद देवड़ा, भूपेन्द्र सिंह हुड्डा और उनके बेटे दीपेन्द्र हुड्डा, चौधरी बंशीलाल की पोती किरण चौधरी, हिमाचल के मुख्यमंत्री प्रेमकुमार धूमल के बेटे अरुण कुमार, छगन भुजबल के बेटे समीर भुजबल, लालू यादव के साले साधु यादव, अटल बिहारी वाजपेयी की भतीजी करुणा शुक्ला, देवेगौड़ा के पुत्र कुमारा स्वामी, एनटीरामाराव के दामाद चंद्राबाबू नायडू, बीजू पटनायक के बेटे नवीन पटनायक, प्रकाशसिंह बादल के बेटे सुखबीर सिंह बादल, पूर्णो संगमा की बेटी अगाथा संगमा जैसे बीसियों उदाहरण शामिल हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

उषा वर्मा (ushaverma9@hotmail.com) यॉर्क, ब्रिटेन

 
 मेरे विचार में योग्यता तथा ईमानदारी ही राजनीति में जाने की कसौटी है, दुख यही है कि ईमानदारी से किसी का रिश्ता नहीं है।
योग्यता होते हुए भी तिकड़मबाजी ,चापलूसी,बेइमानी तथा जातिवाद ने भारत को तबाह किया है और कर रहा है।
 
   
 

Dr.Lal Ratnakar (ratnakarlal@gmail.com) Ghaziabad

 
 देखिये कनक जी, मायावती के बारे में आपकी जानकारी अधूरी है. यही तो खूबी है कि मायावती के वारिस के बारे में संदिग्ध जानकारी जैसे ही उजागर हुयी थी वैसे ही उनके सारे सिपासालारो के होश उड़ गए थे और वह था उनका भाई. फिलहाल अभी सब कुछ दबा-दबा है ! कम से कम इन्होने स्वामी जी की उक्ति तो नहीं मानी होगी, हाँ कोई आदमी नहीं मिला होगा जो इन्हे उस समय पसंद आया हो, इसी में बात बढ़ गयी और अब है सत्ता. सत्ता है तो वारिस तो मन में होगा ही कहीं, समय आएगा तो पता चल जायेगा !

दूसरी ओर जिन नामों को आपने गिनाया है, उसमे से अधिकांश नेता ऐसे है जो वंशानुक्रम से नहीं आये है. कहीं न कहीं वह संघर्ष करके ही आये थे. हाँ, नेहरू परिवार नेहरू से बदल कर गाँधी हो गया मगर वहां से फिरोज़ गायब हो गए. भारत में पितृ सत्तात्मक व्यवस्था है, ऐसे में फिरोज़ गाँधी की वंशावली के वारिस आज के राहुल गाँधी की जयकार करने वाले भूल जाते है कि सोनिया ने जिस समझ और दूरदर्शिता से इस देश के आवाम को प्रभावित किया है, वह यहाँ के नाकारा नेताओं की अदूरदर्शिता का परिणाम है. चाहे किसी भी भारतीय राजनीतिक दल को देखा जाय, वह अपने को बड़ा करने के बजाय दूसरो को छोटा और नीचा दिखाते रहे.

एक अमर सिंह हैं सोनिया के बच्चो को कंडक्टर और खलासी बनाते रहे. मौका मिला तो पलक पावड़े बिछाते रहे और मौके बे मौके बिना बुलाये आते जाते रहे! ऐसे-ऐसे लोग भारतीय राजनीति के उदयीमान महान राजनीतिको के सलाहकार बनकर उनका सत्यानाश करके जिस परंपरा को बढा रहे है, वह नेहरु से गाँधी हो जाने की ही परंपरा है !

नाम और उसका लाभ लेने वाले राजनेताओं के पुत्र, पुत्री, पत्नी और पति तो हैं ही, राजे रजवाड़े भी इस देश को अपनी सम्पदा ही समझते है ! कोई कितना भी प्रबुद्ध हो उनके लिए अदना ही होता है, आखिर वो जो ठहरे सत्तानसिनो की औलाद. भगवान उनका भला करे, संभव हो तो वह देश का नाश न करें !
 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) कुवैत

 
 कांग्रेस मे यह परंपरा गहरी है इससे इंकार नही किया जा सकता मगर अन्य पार्टीयां भी इसका अपवाद नही है अभी पिछले चुनावो मे छ्त्तीसगढ मे ही देखिये ...पापा कहते है ...पापा कहते है करने वाले अमीतेष शुक्ल ने फ़िर अपने लिये टिकट छीन ली और प्रीति नेताम ...युद्ध्वीर सिह जुदेव...अमर अग्रवाल ...रेणु जोगी. वोरा..ये सब वंशवाद की परिपाटी का प्रतीक है ....ये स्वतंत्र रुप से चुनाव लडे और जीते ...इसमे किसी को कोई आपत्ती नही होगी ...यकीनन ये स्वतंत्र रुप से चुनाव नही जीत पायेंगे ..क्योकि लोग आज भी पार्टीयो को वोट देते है नेताओ को नही और इन पार्टीयो मे टिकिट झटकने के लिये इनके रिश्तेदार मौजुद है ही ऐसे मे मैदानी जमीनी कार्यकर्ता अत्यंत निराश होते है और दल-बदल की परिपाटी फ़लती-फ़ुलती है !! 
   
 

o p pal (allahabadx@yahoo.com) Allahabad

 
 आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है. बहुत प्रासंगिक सवालों की तरफ इशारा किया है. मैं इसमें सिर्फ कुछ जोड़ना चाहता हूं. जो लोग सांसद में पहुँचे हैं उनके प्रति मेरा कोई दुराग्रह नहीं है. आखिर वो जनता के द्वारा चुने गए हैं, मेरे मानने या ना मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन युवा नेतृत्व के नाम पर कई भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों/मंत्रियों/सांसदों/विधयकों के बेटों/बेटियों/पत्नियों आदि को टिकट देकर सांसद में भेजा गया. पुराने राजे-रजवाड़ों का तर्ज पर राजनीति के रंगमंच पर नये नये राजकुमारों/राजकुमारियों का राजतिलक किया जा रहा है. ऐसा लगता है कि 53 फीसदी युवा वाले इस देश में तथाकथित राजपरिवारों के अलावा और कहीं युवा नहीं पाए जाते. लोकतंत्र को राजतंत्र की चादर में ढकने की कोशिश सचेतन की जा रही है. स्टूडेंट्स युनियन के इलेक्शन पर रोक इसी प्रक्रिया का विस्तार है. किसी भी पार्टी ने स्टूडेंट्स युनियन इलेक्शन के लिए कभी भी पार्लियामेंट के बहसों में गंभीरता से हिस्सा नहीं लिया. क्योंकि उनको डर है कि यदि स्टूडेंट्स पॉलिटिक्स जारी रही तो आम किसानों के बेटे नये राजकुमारों के लिए रुकावट बन सकते हैं. ऐसा 60-7 के दशक में हो भी चुका है. विडंबना यह है कि उस समय जो किसान पुत्र थे वो भी आज राजपरिवार हो गए हैं. और उनके युवा नेतृत्व का नारा भी अपने राजकुमारों के राजतिलक से आगे नहीं जाता.
युवाओं को इनके बहकावे में आने की जगह सच्चे लोकतंत्र के लिए और सामंती चिंतन के खिलाफ संघर्ष के रास्ते को अपनाना ही होगा.
 
   

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