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हबीब तनवीर होने का मतलब

वक्तव्य

 

हबीब तनवीर होने का मतलब

अशोक वाजपेयी



जो लोग मध्यप्रदेश की अपनी सांस्कृतिक यात्रा से वाकिफ हैं उनको ये बताने की जरूरत नहीं है कि न सिर्फ इस रंगयात्रा में बल्कि संस्कृति यात्रा में हबीब तनवीर की केन्द्रीय भूमिका रही है.

हबीब तनवीर


जब भारत भवन में रंगमंडल बनाने की बात हुई थी तो सबसे पहले निर्देशक का प्रस्ताव लेकर मैं उनके पास गया था. उन दिनों उनके लिए ये संभव नहीं था कि वो अपने छत्तीसगढ़ के रंग कलाकारों को छोड़कर यहां आएं. या हमारे लिए संभव नहीं था कि भारत भवन में सिर्फ छत्तीसगढ़ी के कलाकारों को लेकर एक रंग मंडल बनाएं. बहरहाल वो नहीं आ सके थे.

मेरा जन्म छत्तीसगढ़ में हुआ और बाद में सरकारी नौकरी में थोड़े दिन छत्तीसगढ़ में काम करने का भी मौका मिला. लेकिन मैं ये नहीं कह सकता कि मैंने छत्तीसगढ़ को वैसा जाना था, जैसा हममें से बहुतों ने सबसे पहले छत्तीसगढ़ी कलाकारों को हबीब तनवीर के नाटकों में देखकर जानना शुरू किया.

मुझसे कोई सलाह क्यों लेगा. आजकल तो वैसे भी नहीं लेता. लेकिन अगर ले तो इस नए छत्तीसगढ़ राज्य का पहला राज्यपाल हबीब तनवीर को बनाना चाहिए....अगर किसी एक व्यक्ति का नाम लिया जा सकता है पिछले पचास वर्ष में, जिसने छत्तीसगढ़ को उसकी अस्मिता दी है, उसकी पहचान दी है, और छत्तीसगढ़ पर जो जिद करके अड़ा रहा है. और ये जिद सारे संसार में उन्हें ले गई है तो वह हबीब तनवीर हैं.

एक तो हिन्दी में ही नाटक करना कठिन है, ऐसे में हम कभी नहीं सोचते थे कि एक बोली और वो भी हिन्दी की एक उपबोली में नाटक करें. और उस नाटक को इस हद तक ले जाएं, इतने बरसों तक ले जाएं. बोली जो निपट स्थानीय है. और प्रभाव और लक्ष्य जो सार्वभौमिक है.

हबीब तनवीर ने एक तो पहली बार ये सिद्ध किया कि बोली में भी समकालीन होना न केवल संभव है बल्कि बोली भी समकालीनता का ही एक संस्करण है.

आप में से बहुतों को ये याद होगा कि हबीब तनवीर भारत भवन के आरंभिक न्यासियों में से थे. भारत भवन (अब तो भारत भवन का अनौचित्य बताना जरूरी है. लेकिन उस जमाने में हम लोग औचित्य बताते थे.) के मूल में ये परिकल्पना थी कि समकालीन सिर्फ शहर में रहने वाला नहीं है. वो परिकल्पना ये थी कि समकालीन सिर्फ वो नहीं है जो तथाकथित एक नागरिक किस्म की आधुनिकता में फंसा हुआ है. समकालीन वो भी है जो जंगल में रहता है. जो पहाड़ में रहता है. जो शायद किसी तरह की समकालीन अभिप्रायों से बिल्कुल अनजान है.

असल में अपने-अपने ढंग से अलग-अलग क्षेत्रों में तीन लोगों ने मध्यप्रदेश में ये काम किया. सबसे क्रांतिकारी काम तो निश्चय ही हबीब तनवीर का है. जिन्होंने छत्तीसगढ़ की बोली को लेकर काम किया. और सिर्फ बोली नहीं, बोली के साथ जो कुछ जुटा होता है, उन सब पर. बोली लेना तो आसान काम है. लोकगीत वोकगीत गाते रहते हैं आकाशवाणी पर. उससे कुछ बात बनती-वनती नहीं है. लेकिन बोली के साथ जो समूची जातीय स्मृति है, जो समूची लोक संपदा है, जो उसके बिंब हैं, जो उसकी मुद्राएं हैं, उन सबको गूंथकर कुछ ऐसा करना जो स्थानीय भी है और जो स्थानीयता से आगे भी जाता है.

अधिकांश लोगों को छत्तीसगढ़ी समझ में नहीं आती थी. हिन्दी वालों को भी नहीं आती है तो गैर हिन्दी वालों को क्या आती. लेकिन इससे उनके उनके नाटक के प्रभाव में कभी कोई क्षति नहीं हुई. कोई हानि नहीं हुई. एक काम किया रंगमंच में हबीब तनवीर ने. दूसरा काम किया कुमार गंधर्व ने. मालवी लोकसंगीत को लेकर एक शास्त्रीय संगीत को सबवर्ड करने का काम. ये तीनों काम असल में बहुत ही आधुनिक शब्दावली में कहें तो सबर्वशन के काम हैं. तीनों लोगों के.

हबीब तनवीर ने आधुनिक भारतीय रंगमंच को सबवर्ड किया. उसको उसकी तथाकथित यथार्थवादी और एक तरह की पश्चिम की नकल में हो रहे यथार्थवादी आग्रहों से मुक्त किया. सबवर्ड किया, इस अर्थ में भी कि बोली में शास्त्र को भी और आधुनिक को भी, दोनों को अपने में संभव करना शुरू किया.

बहुतों ने देखा होगा ‘मिट्टी की गाड़ी’. मैंने पहली बार अपने जीवन में यह देखा था कि शास्त्र को लोक कैसे मुंह चिढ़ाता है. कैसे जब संस्कृत के, मतलब ‘मिट्टी की गाड़ी’, ‘शूद्रक’ अद्भुत नाटक है. या ‘मुद्राराक्षस’ की संस्कृत की पदावली. संस्कृत के वक्तव्य यकायक छत्तीसगढ़ी में जब बोले जाते थे या छत्तीसगढ़ी कलाकार उनको अपने ढंग से बोलते थे. तो वो जो एक बहुत महिमा मंडन था संस्कृत का. एक विराट आभिजात्य था जो अपने आपमें बहुत सुंदर है. मैं उसकी अवमानना नहीं करना चाहता. वो महान है. लेकिन उसको जैसे मुंह चिढ़ाते थे ये लोग. जैसे एक डिप्रेशन होता है शास्त्र का लोक द्वारा. बिना शास्त्र की मर्यादा का उल्लंघन किए. शास्त्र को लोक में ऐसे संभव जैसे हबीब तनवीर ने बनाया.

वैसे ही एक दूसरे स्तर पर कुमार गंधर्व ने बनाया. कौन-सा ऐसा शास्त्रीय गायक है जो तीन घंटे का एक मालवा की लोक धुनें कार्यक्रम प्रस्तुत कर सकता है. थोड़ा कजरी वजरी गा देते थे अंत में. बहुत सारे कलाकार एक थोड़ा क्षेत्रिय, थोड़ा लौकेक छौंक लगाने के लिए आखिर में. लेकिन बड़े-बड़े उस्ताद बड़े-बड़े पंडित ये हिम्मत नहीं कर सकते थे कि लोक संगीत का एक पूरा कार्यक्रम प्रस्तुत कर दें. जो कुमार गंधर्व ने किया.

तीसरा काम हमारे मित्र जगदीश स्वामीनाथन ने कला के क्षेत्र में किया. भारत भवन के माध्यम से. जहां लोक और आदिवासी कलाकार को वही समकक्षता दी जो समकालीन कला को हासिल थी. अकबर पदमसी और हुसैन और रजा और मंजीत बावा के साथ-साथ प्रेमा फात्या और जनगण सिंह श्याम और वो सब लोग आए. मिट्टी बाई, भूरी बाई इत्यादि.

ये दिलचस्प बात है कि ये तीनों काम मध्यप्रदेश में हुए. ये दिलचस्प बात नहीं है इस अर्थ में कि ये शुद्ध संयोग है. ये कोई भौगोलिक या जैविक संयोग नहीं है कि ऐसा यहां संभव हुआ. दो लोग ऐसे थे जो असल में मध्यप्रदेश के नहीं थे. कुमार गंधर्व मूलत: मध्यप्रदेश के नहीं थे. स्वामीनाथन भी मूलत: मध्यप्रदेश के नहीं थे. हबीब तनवीर मूलत: मध्यप्रदेश के हैं. लेकिन ये इसलिए हिन्दुस्तानी आधुनिक कला परिदृश्य में पिछले पचास वर्षों में, मुझे ये कहने की इजाजत दीजिए. कम से कम भोपाल में तो कहा ही जा सकता है; आधुनिकता का जो सबर्वशन तीनों ने किया, उसमें आधुनिकता का जो दृश्य था वो मौलिक रूप से बदल दिया.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

रवीन्द्र व्यास (ravindrasvyas@gmail.com) इंदौर

 
 अचूक, सटीक और मार्मिक।  
   
 

ramesh sharma (sharmarameshcg@gmail.com) raipur

 
 आदरणीय आशोकजी,
हबीब तनवीर पर आपका लेख सबसे अलग और मर्मस्पर्शी है. वे शास्त्र को लोक के जरिए चिढ़ा सकते थे और छत्तीसगढ़ को उन्होंने नई पहचान दी थी. धन्यवाद
 
   

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