मीडिया भी दे अपनी ‘खबर’
बात पते की
मीडिया भी दे अपनी
‘खबर’
अनिल चमड़िया
कोलकाता के जे एन मुखर्जी ने एक समाचार पत्र में एक लेख
पढ़कर लेखक की पृष्ठभूमि के बारे में जानने के लिए पत्र लिखा. उन्हें महीनों तक जवाब
नहीं मिला. लेकिन लेखक के बारे में जानना जरूरी था क्योंकि स्वास्थ्य संबंधी एक
विषय पर उन्होने जो दावे किए थे वो भ्रामक थे और एक हद तक बेबुनियाद भी थे. उस लेख
में किसी नये उत्पाद का बाजार बनाने की योजना दिखाई दे रही थी.
जे एन मुखर्जी समाचार पत्र के दफ्तर पहुंच गए. लेकिन उन्हें कई बार की भागदौड़ के
बाद भी उस लेखक का न तो पता ठिकाना मिला और वो शोधकर्ता है भी या नहीं, उसके बारे
में कोई जानकारी नहीं मिली. लेकिन उस दफ्तर के आखिरी चक्कर में एक संपादकीय सहयोगी
ने उन्हें एक जानकारी दी कि कई चीजें प्रायोजित होती हैं और उसमें लेखक का पता
ठिकाना और पृष्ठभूमि तलाशना व्यर्थ है.
जन संचार माध्यमों में रोजाना जितनी तरह की सामग्री परोसी जाती है, उनमें से बहुत बड़ा हिस्सा खबरों का नहीं होता है. उन्हें मौटे तौर पर प्रचार
सामग्री कहा जा सकता है. लेकिन वो खबरों की तरह प्रस्तुत की जाती है और उन पर खबरों
की तरह भरोसा भी किया जाता है. अपनी बातें लोगों तक पहुंचाने के लिए तमाम तरह के
संगठन रिपोर्टरों को तरह तरह से प्रेरित करते हैं.
ये एक खुली किताब की तरह है कि पत्रकारों को बड़े बड़े गिफ्ट मिलते हैं. सैर सपाटे
करने की सुविधाएं मिलती है. इन सबके प्रभाव में रिपोर्टर
खबरें प्रस्तुत करते हैं. कहा जा सकता है कि दूसरे पेशों की
तरह पत्रकारिता में भी बहुत लोग ऐसे हो सकते हैं. उस
संस्थान को उनके व्यक्तिगत आचरण के बारे में कैसे हर बात की जानकारी हो सकती है
जिसमें वह काम करता है. लेकिन संस्थान को एक बात की जरूर
जानकारी होती है, यदि कोई संस्था या व्यक्ति अपनी उपलब्धियों या अपने शोध की सफलता
के लिए किसी रिपोर्टर को कहीं ले जाता है लेकिन उसकी रिपोर्ट को रिपोर्टर की खबर के
रूप में प्रस्तुत किया जाता है. क्या किसी को यह लगे कि उस
खबर को प्राप्त करने के लिए किसके संसाधन का इस्तेमाल किया गया तो ये बताया जाना
चाहिए?
किसी रिपोर्ट से जुड़े विभिन्न तरह के सवालों का जवाब जानने का कोई रास्ता नहीं
है.तब सवाल है कि क्या मीडिया संस्थान को सूचना के अधिकार कानून के तहत लाया जा
सकता है?
यह कानून निजी संस्थानों पर सीधे तौर पर लागू नहीं है. लेकिन मीडिया दूसरी निजी
कंपनियों की तरह नहीं है. मीडिया खुद को संसदीय लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में
परिभाषित करता है. जिस तरह से संसदीय लोकतंत्र के तीनों स्तंभों पर यह कानून लागू
होता है तो मीडिया संस्थानों पर क्यों लागू नहीं किया जाना चाहिए?
तीनों स्तंभों पर भी इस कानून के लागू होने की एक सीमा निश्चित की गई है. निश्चित तौर पर मीडिया का मामला कई मायने में बेहद संवेदनशील है. इस कानून
के इस्तेमाल की खुली छूट नहीं दी जा सकती हो. जैसे मीडिया के पास अपने सूत्रों को
नहीं खोलने का विशेषाधिकार प्राप्त हैं. भले ही उसके दुरूपयोग की भी शिकायतें मिलती
रहती है. लेकिन जिस तरह से संसद और न्यायालयों ने कुछ विशेषाधिकार अपने लिए
सुरक्षित बनाए रखें हैं, मीडिया को भी ऐसे कुछ विशेषाधिकार हासिल हो सकते हैं.
लेकिन जहां विशेषाधिकार पर आंच नहीं आती हो कम से कम वैसे मामलों में तो सूचना के
अधिकार के तहत उन्हें लाया जा सकता है.
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ये एक खुली
किताब की तरह है कि पत्रकारों को बड़े बड़े गिफ्ट मिलते हैं. सैर सपाटे करने की
सुविधाएं मिलती है. इन सबके
प्रभाव में रिपोर्टर खबरें प्रस्तुत करते हैं.
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ऐसा नहीं है कि सूचना का अधिकार कानून मीडिया पर लागू नहीं है. सार्वजनिक
उपक्रमों के तहत संचालित मीडिया पर ये कानून लागू हैं. इसके अलावा पिछले विधानसभा
के चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में कई जिलों में मतदाताओं ने चुनाव आयोग के जरिये
मीडिया संस्थानों से कई जानकारियां हासिल की थी. खासतौर से उम्मीदवारों द्वारा
विज्ञापन के मद में किए गए खर्च का ब्यौरा हासिल किया था.
इस लेखक के पास भी प्रेस सूचना कार्यालय ने लगभग तीन वर्ष पूर्व एक पत्र भेजकर पूछा
था कि आपकी वार्षिक आमदनी कितनी है. सूचना के अधिकार कानून के तहत पीआईबी से उनके
यहां मान्यता प्राप्त तमाम स्वतंत्र पत्रकारों की आमदनी का हिसाब किताब पूछा गया
था. पीआईबी में मान्यता प्राप्त स्वतंत्र संवाददाताओं को अपनी मान्यता के नवीनीकरण
के लिए अंकेक्षण द्वारा सत्यापित आमदनी का ब्यौरा पेश करना होता है. पीआईबी ने
आमदनी के बारे में सूचना की मांग करते हुए इस सवाल पर टिप्पणी भी दर्ज करने की मांग
की थी कि क्या इस तरह की सूचनाएं देनी चाहिए?
जब हर वर्ष अपनी आमदनी का ब्यौरा पेश करने की बाध्यता है तो फिर सूचना के अधिकार
कानून के तहत किसी को यह जानकारी लेने से कैसे रोका जा सकता है? मीडिया का पूरा
व्यापार भरोसे पर टिका है. जिस तरह से मीडिया के आचरण को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं,
वैसी स्थिति में एक रास्ता ये है कि पारदर्शिता के दरवाजे थोड़े खोले जाएं.
पिछले दिनों टेलीविजन चैनलों की खबरों को लेकर शिकायतें बढ़ने लगी तो एक नई बहस शुरू
की गई. क्या सरकार को कोई निगरानी तंत्र का निर्माण करना चाहिए? सरकार ने कानून का
प्रारूप भी तैयार कर लिया था. उसका जोरदार विरोध हुआ. लेकिन उस विरोध के साथ
ब्राडकास्टरों ने सरकार को ये भरोसा दिलाया कि वे अपने स्तर पर इस तरह के एक
निगरानी तंत्र का गठन करेंगे.
ब्राडकास्टरों ने जे एन वर्मा की अध्यक्षता में एक निगरानी तंत्र का गठन किया है जो
दर्शकों की शिकायतों का निपटारा करेंगे. इसी तरह से प्रिंट के संदर्भ में ये किया
जा सकता है कि सूचना के अधिकार कानून की भावनाओं के अनुरूप कोई ऐसा तंत्र विकसित
करें, जहां से पाठक अपनी सूचनाओं का जवाब हासिल कर सकें.
अभी मीडिया द्वारा खुद खबरों के लिए इस कानून का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा
है. लेकिन मीडिया को भी अपने लिए इस कानून का इस्तेमाल करने की सुविधा मुहैया कराई
चाहिए.
14.06.2009, 18:32 (GMT +05:30) पर प्रकाशित