भूख का घर है भारत
मुद्दा
भूख
का घर है भारत
देविंदर शर्मा
जब अटल बिहारी वाजपेयी ने पहली बार लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया था तो
उन्होंने पश्चिमी उड़ीसा में भुखमरी के लिए कुख्यात कालाहांडी को 'खाद्यान्न का कटोरा'
बना देने का वायदा किया था.
अगर वाजपेयी ने कालाहांडी से भुखमरी खत्म करने का गंभीर प्रयास किया होता और बाद
में देश के करोड़ों लोगों को भुखमरी से निजात दिलाने के लिए इस कार्यक्रम का
देशव्यापी विस्तार किया होता तो भाजपा की इतनी दयनीय स्थिति नहीं होती. जब पिछले
दिनों संप्रग सरकार की दूसरी पारी की शुरुआत में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपने
अभिभाषण में कहा कि सरकार राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम लाकर देश के प्रत्येक
भूखे परिवार को 25 किलोग्राम खाद्यान्न तीन रुपये प्रति किलोग्राम की दर से देगी तो
मैं खुशी से झूम गया. आखिरकार, आजादी के 62 साल बाद ही सही, सरकार ने भूखे राष्ट्र
का पेट भरने का वायदा तो किया.
आधिकारिक रूप से भुखमरी के शिकार 32 करोड़ लोगों के लिए इससे बेहतर कुछ और नहीं हो
सकता कि सरकार उन्हें दो वक्त की रोटी देने की प्रतिबद्धता व्यक्त करे. अन्य साठ
करोड़ लोग, जो बीस रुपये प्रतिदिन से भी कम पर गुजर-बसर करने के लिए विवश हैं, वे भी
सरकार की इस प्रतिबद्धता से आशान्वित हो सकते हैं.
ऊपरी तौर पर यह नजर आता है कि खाद्य और कृषि मंत्रालय ने संप्रग सरकार के वायदे को
पूरा करने के लिए झट से कमर कस ली और योजना आयोग भी हरकत में आ गया है. ये दोनों
कांग्रेस के चुनावी घोषणापत्र में किए गए वायदे को पूरा करने में जुट गए हैं, लेकिन
अगर अखबारों की खबरों से कुछ संकेत मिलता है तो यह कहा जा सकता है कि भुखमरी का
अंधेरा मिटने की उम्मीद बहुत ठोस धरातल पर नहीं खड़ी है. कुल मिलाकर परेशानी के सारे
कारण नजर आ रहे हैं.
मुझे लगता है कि देश में भुखमरी के शिकार लोगों के लिए कोई उम्मीद नहीं है. शायद उनकी
नियति भूख से मरना ही है. राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की तर्ज पर
प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा अधिनियम मात्र अधिकारों से आगे कुछ नहीं देखता. नरेगा की
सफलता पर ही बहस की गुंजाइश है. हम सब जानते हैं कि यह भ्रष्टाचार और बड़े पैमाने पर
धनराशि के गबन के दलदल में धंस चुकी है. प्रस्तावित राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा
अधिनियम भी कमोबेश इतनी ही भ्रष्ट और नाकारा सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ढर्रे पर
शुरू किया जाने वाला है. और यहीं भूख से तड़पते देश को पेट भरने का वायदा दम तोड़ देता
है.
विश्व के सर्वाधिक भूखे लोगों के घर भारत की दशा अफ्रीका के करीब 25 देशों से भी
खराब है. अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति अनुसंधान संस्थान द्वारा तैयार किए गए वैश्विक
भूख सूचकांक के आधार पर 88 देशों की सूची में भारत का 66वां स्थान है. भारत का कोई
भी प्रांत 'कम भूख' या 'सहनीय भूख श्रेणी' में भी नहीं आता. हमें भूलना नहीं चाहिए
कि वैश्विक भूख सूचकांक में भारत का यह निराशाजनक प्रदर्शन सार्वजनिक वितरण प्रणाली
के बावजूद रहा है, जिसे समाज के कमजोर तबकों के लिए सुरक्षा ढाल के रूप में
इस्तेमाल किया जाता है.
वास्तव में, सार्वजनिक वितरण प्रणाली आंशिक रूप से ही प्रभावी रही है. खाद्यान्न
उपज के सबसे बड़े केंद्र पंजाब और केरल भी होंडुरास और वियतनाम सरीखे देशों से नीचे
क्यों हैं? केंद्र सरकार यदि यह सोच रही है कि वह इसी प्रणाली का विस्तार करके या
फिर इस प्रणाली को नया रूप देकर देश के भूख और कुपोषण के शिकार लोगों की दशा में
कोई परिवर्तन ला सकेगी तो ऐसा कुछ नहीं होने वाला. सच तो यह है कि संप्रग की घोषणा
महज एक वायदे से अधिक नहीं है और यह समस्या की जड़ तक नहीं पहुंच सकेगी.
वर्तमान में सरकार गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को रियायती दरों पर 35
किलोग्राम खाद्यान्न उपलब्ध कराती है. इसमें गेहूं और चावल शामिल हैं. गेंहू 4.15
रुपये और चावल 5.65 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बेचा जा रहा है. अंत्योदय योजना
के तहत वर्गीकृत 2.43 करोड़ परिवारों (ये बीपीएल में भी शामिल हैं) के लिए कीमतें
घटाकर क्रमश: दो रुपये और तीन रुपये कर दी गई हैं. अब हमें गरीबी रेखा से ऊपर (एपीएल)
लोगों की हालत पर नजर डालनी चाहिए.
गरीबी रेखा के ऊपर 11.52 करोड़ लोग हैं. इन्हें गेहूं 6.10 रुपये और चावल 8.3 रुपये
प्रति किलो की दर से मिलता है. एपीएल परिवारों को मासिक राशन देने के संबंध में
सरकार क्या करने वाली है? आखिर तथ्य यह है कि इस श्रेणी में भी खाद्यान्न बाजार भाव
से काफी कम कीमत पर दिया जा रहा है. सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत एपीएल परिवारों
की संख्या 11.52 करोड़ और बीपीएल की 6.52 करोड़ है. दूसरे शब्दों में 18.04 करोड़
परिवारों को रियायती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराया जा रहा है.
अगर यह मानें कि एक परिवार में औसतन पांच सदस्य हैं तो कागजों में सार्वजनिक वितरण
प्रणाली के दायरे में 90 करोड़ लोग आ गए हैं. अगर यह सच है तो यह समझ से परे है कि
पूरे विश्व में भुखमरी के शिकार सबसे अधिक लोग भारत में क्यों हैं?
राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम का सरकार पर अधिक बोझ नहीं पड़ेगा. खाद्यान्न
की जरूरत 2.7 करोड़ टन से घटकर दो करोड़ टन पर आ जाएगी. वार्षिक अनुदान का भार भी
पांच हजार करोड़ रुपए कम हो जाएगा. इस तरह सरकार के दोनों हाथों में लड्डू हैं. गरीब
और भूखों का क्या हश्र होता है, यह अलग सवाल है.
भुखमरी और कुपोषण में तीव्र वृद्धि के संदर्भ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली में
विस्तार का कोई भी प्रयास किसी अपराध से कम नहीं होगा. मैं नहीं जानता कि वर्तमान
व्यवस्था में सुधार करके राष्ट्रीय खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम किस उद्देश्य को
हासिल करना चाहता है? चाहे बेहतर तरीके से योजना बनाई जा रही हो या फिर जरूरतमंदों
को सीधे आर्थिक मदद देने की सोच हो, भूखों को भोजन उपलब्ध कराने का सोनिया गांधी का
सपना पूरा नहीं हो सकता.
जरूरतमंदों का दीर्घकालीन टिकाऊ आधार पर पेट तभी भरा जा सकता है, जब भुखमरी के
साथ-साथ गरीबी मिटाने का कार्यक्रम शुरू किया जाए. यह तभी संभव है जब राजनीतिक
नेतृत्व कृषि, खाद्य प्रसंस्करण, ग्रामीण विकास, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और खाद्य
सुरक्षा के ढांचे को एकीकृत रूप में पुनर्निधारित करे.
भुखमरी मिटाओ कार्यक्रम के लिए मेरे पांच सुझाव हैं. एक, टिकाऊ खेती में बाहरी आमद
के न्यूनतम इस्तेमाल की सहायता से मिट्टी की उर्वरता सुनिश्चित करते हुए कृषि को
पुनर्जीवित करना आवश्यक है. दो, न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर किसानों की तयशुदा
मासिक आय सुनिश्चित की जाए. गरीब से गरीब परिवार के लिए भी माइक्रो-फाइनेंसिंग की
सुविधा होनी चाहिए. इसके तहत ब्याज दरों को घटाकर अधिकतम 4 प्रतिशत पर लाया जाना
चाहिए. तीन, अंत्योदय परिवारों को मिलने वाली नगद राशि को छोड़कर सार्वजनिक वितरण
प्रणाली को खत्म कर दिया जाए. इनके स्थान पर ग्राम स्तर पर बिहार और पूर्वी उत्तर
प्रदेश में परंपरागत पद्धति की तर्ज पर खाद्यान्न बैंक स्थापित किए जाने चाहिए. चार,
खाद्यान्न के निर्यात की तभी अनुमति दी जाए जब खाद्यान्न की उपलब्धता मांग से अधिक
हो. अंत में मेरा पांचवा सुझाव यह है कि घरेलू कृषि और खाद्य सुरक्षा को बर्बाद करने
वाले अंतरराष्ट्रीय व्यापार और मुक्त व्यापार समझौते आदि न किए जाएं.
18.06.2009, 22.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित