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अथः प्रेम कथा

एक प्रेम की एकतरफा कथा

 

अथः प्रेम कथा

गंधर्व



जब क़िस्सा शुरु हुआ तो दोनों प्रेम में थे. मैं उसके प्रेम में और वह अपने आप से प्रेम में. मैंने कभी अपने आपसे प्रेम के बारे में सोचा नहीं था. उसने अपने अलावा किसी और से प्रेम के बारे में नहीं सोचा था.

उसके जीवन में मेरे लिए बड़ा स्थान था. इतना अहम कि लोगों को लगता था कि हम एक-दूसरे के प्रेम में हैं. लेकिन मैं जानता था कि वह मुझसे प्रेम नहीं करती. फिर भी मैं उससे प्रेम करता रहा. और वह अपने आप से.

एक प्रेम की एकतरफा कथा


उम्र का ज़रा सा फ़ासला था. सो मैं उन्हें आप से संबोधित करता, और वह मुझे तू और तुम से. मैं पत्र लिखते हुए उन्हें आदरणीय लिखता और वह मेरे नाम के सामने स्नेहिल लिखती. उसे मैंने एक दिन बता दिया था कि मैं उससे प्रेम करता हूँ. लेकिन उसने जवाब में कुछ नहीं कहा. मानों मैं ईश्वर के सामने प्रार्थना कर रहा था और वह शाश्वत निर्विकार भाव से उसे सुन रहा था, या नहीं सुन रहा था.

लेकिन कोई कितने दिनों तक अपने आप से प्रेम करता रह सकता है. या दूसरे के प्रेम को अनदेखा करता रह सकता है. आख़िर एक दिन उसे भी प्रेम हो गया. लेकिन इसमें मेरी भागीदारी अब भी नहीं थी. वह कोई तीसरा ही था.

उसके प्रेम को मैं जानता था. लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि मैं इस बात को जान गया हूँ. इसका फ़ायदा भी था. उसका व्यवहार मुझसे यथावत बना रहा और प्रार्थना सुने जाने की मेरी उम्मीद बनी रही. ठीक ‘जगह मिलने पर साइड दी जाएगी’ के निरर्थक आश्वासन की तरह.

किसी घूरे के दिन की तरह एक दिन मेरे भी दिन बहुर गए. एक दिन उसे मुझसे भी प्रेम हो गया. हालांकि उसने ऐसा कभी कहा नहीं. एक दिन उसने सीधे मुझसे शादी का प्रस्ताव रखा. इस तरह मानों प्रेम तो है ही, उसके इज़हार की ज़रुरत ही कहाँ है. इस अप्रत्याशित प्रस्ताव पर मैंने कहा, थोड़ी प्रतीक्षा करनी होगी. उसने कहा कि वह प्रतीक्षा करेगी.

मैं प्रतीक्षा के आश्वासन में जीने लगा.

प्रतीक्षा को अभी दो महीने भी नहीं गुज़रे थे. एक दिन अचानक उसने आकर बताया कि वह विवाह कर रही है. उसी व्यक्ति से जिससे उसे पहले प्रेम हुआ था. सूचना देते वक़्त उसके माथे पर कोई शिकन नहीं थी. आवाज़ में कोई कँपकपी नहीं थी. क़दम लड़खड़ा भी नहीं रहे थे. एकदम भावहीन. सिर्फ़ सूचना. इतनी भावहीन कि उसने ऐसा कहने के बाद आकाशवाणी में जाकर अपना एक प्रोग्राम रिकॉर्ड करवाया और मुझे स्टूडियो के बाहर बिठाए रखा. फिर वह ट्रेन में बैठकर विवाह करने चली गई. मेरे जीवन पर संकट बन आया. मैं धीरे-धीरे संभला और फिर प्रतीक्षा की अनंत दुनिया में चला गया.

वह शायद मुझे भूल गई थी. लेकिन मैं उसे नहीं भूला था.

बारह बरस बाद. एक दिन दूर शहर में मेरे पते पर एक पोस्टकार्ड मिला. खुला पत्र. कारण लिखा था कि पता आज़माने का मन हुआ सो चिट्ठी लिख दी. मैं जानता था कि निशाने पर मैं हूँ और बहाना पते का है.

मैं प्रतीक्षा के अपने जंगल से बाहर आया तो बहुत गहरे असमंजस में था. अब हम दोनों के बीच दुनियावी जवाबदेहियों का बड़ा पहाड़ खड़ा था. अब हमारा प्रेम, अवैध संबंधों के दायरे में आता था. लेकिन अपने आपको समझाया गया कि प्रेम कैसे अवैध हो सकता है. प्रेम ही तो दुनिया का सबसे वैध रिश्ता है.

और एक बार फिर पत्रों का सिलसिला चल पड़ा.

अपने आपको समझाया गया कि प्रेम कैसे अवैध हो सकता है. प्रेम ही तो दुनिया का सबसे वैध रिश्ता है.


बारह बरस पहले, सात बरसों का जो प्रेम था, उसकी कथा जगज़ाहिर सी थी. लेकिन इस समय के प्रेम का साक्षी सिर्फ़ भारतीय डाक-तार विभाग रहा.

सो पाठको, अगर आपकी रुचि हो तो इस प्रेम को मैं आपके साथ साझा कर सकता हूँ. लेकिन यह साझा एकतरफ़ा प्रेम का ही होगा. एकतरफ़ा इसलिए कि मैं सिर्फ़ यह बता सकता हूँ कि इस संवाद में मेरा पक्ष कैसा था. उसका पक्ष भी, चाहूँ तो बता सकता हूँ लेकिन वह ‘ब्रीच ऑफ़ ट्रस्ट’ यानी विश्वासघात हो जाएगा. प्रेम में विश्वास तोड़ने से ज़्यादा बड़ा पाप कुछ नहीं हो सकता.

यह किसी प्रेम कहानी की तरह तो नहीं होगा. लेकिन इससे प्रेम ज़रुर होगा. हो सकता है (सिर्फ़ हो सकता है, कोई गारंटी नहीं है) कि यह आपको दिलचस्प भी लगे.

इस सिलसिले को जारी रखने या बंद करने का फ़ैसला आपको और रविवार डॉट कॉम के संपादक को मिलकर करना होगा.

मेरा क्या, मैं तो प्रेम में हूँ. आप इसकी कथा सुनें या ना सुनें.

 

24.06.2009, 10.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

kamlesh pandey (kamlmj.2008@yahoo.com) BHOPAL

 
 आपकी `प्रेम कथा `नामक कथा बहुत अच्छी लगी  
   
 

Zafar Irshad (zafarzir@yahoo.co.in) Kanpur

 
 प्यार के लिए कुछ खास दिल मकसूस होते है
ये वो राग है जो हर साज पर गाया नहीं जाता...
 
   
 

ARIF JAMAL (newobserverpost@gmail.com) RAJ NAGAR-II,NEW DELHI-77 05

 
 आपके प्रेम की डोर एक तरफा नहीं हो सकती, जब-जब आप प्रेम की पींग बढ़ाएंगे प्रेम का जवाब प्रेम से ही मिलेगा. प्रेम करने और उसको जताने का अच्छा विचार और हथियार अपनाया है. साहित्य में भी लोग चालाकी का इस्तेमाल करते हैं - आपके इस कल्पना वाले खत की तरह - कोशिश अच्छी है, दोस्त. 
   
 

hradesh agrawal (hradesh_2003@yahoo.co.in) bhopal

 
 गंधर्व जी आपका लेख अच्छा लगाय कृपया इसी प्रकार लिखकर हम सभी को प्रेरणा देते रहें.  
   
 

अजय सिंह लखनऊ

 
 चाणक्य का एख उत्तम वाक्य है- हृदय में प्रीति रखने वाले लोगों को ही दुःख झेलने पड़ते हैं। प्रीति सुख का कारण है तो भय का भी। अतएव प्रीति में चालाकी रखने वाले लोग ही सुखी होते हैं। 
   
 

surendra singh maurya Muzaffarpur, Bihar

 
 प्रेम में ऐसा होता है गंधर्व जी. आप निराश न हों और इन पत्रों को हमसे ज़रुर साझा करें.हां, प्रेम में हम हमेशा पाने की कोशिश करते हैं, जबकि ऐसा नहीं होना चाहिए. किसी की लिखी ग़ज़ल याद आ रही है. माफ करें, उनका नाम मुझे याद नहीं है. शायद श्याम उनके नाम का तखल्लूस है. तो गौर फरमाएं-

मुहब्बत की वापिस निशानी करें।
शुरू फिर जो चाहें कहानी करें।।

है घाटे का सौदा मुहब्बत सदा।
हिसाब अब लिखें या जुबानी करें।।

चलो नागफनियाँ उखाड़ें सभी।
वहाँ फिर खड़ी रात-रानी करें।।

है रुत पर भला बस किसी का चला।
चलो बातें ही हम सुहानी करें।।

खरीदे बुढापे को कोई नहीं।
सभी तो पसन्द अब जवानी करें।।

बहुत जी लिये और मर भी लिये।
बता क्या तेरा जिन्दगानी करें।।

रवायत नहीं ‘श्याम’ जब ये भली।
तो फिर बातें क्यों हम पुरानी करें।।
 
   
 

सुमित शर्मा (sumit.yaas@gmail.com) बिलासपुर

 
 मुझे नही लगता कि प्रेम असफल होते है.और जो होते है वो प्रेम नही होते.आपका प्रेम एक तरफा था.एक तरफा प्रेम,प्रेम नही होता.अगर आप की शादी हो गयी है तो आप किसी के साथ धोखा कर रहे है.खत का सिलसिला रोक दे.
आप एक लेखक की तरह अपनी कहानी पूरी करिये.पुरानी सारी बातो से उबरना तो मुश्किल है इस लिये आप उन से नफरत करने की कोशिश करिये ,अब वो आप के लिये कुछ नही है.
सदमा तो है मुझे भी,के तुझसे जुदा हूँ मै.
लेकिन ये सोचता हूँ,के अब तेरा क्या हूँ मै.
 
   
 

priya (m_priya_09@yahoo.com) bilaspur

 
 आप अपनी स्टोरी कृपया पूरी करें. 
   
 

Ashutosh ranjan Noida

 
 मुझे लगता है कि एक उम्र में हम सब इसी तरह प्रेम में पड़ते हैं. हम सब लोगों के पास इसी तरह के अनुभव हैं. आप ने जो कुछ लिखा है, वह मेरे साथ भी हुआ है, लेकिन हमारे पास आपकी तरह लिखने का कौशल नहीं है. आप इसे लिखें, हमारी मनोकामना पूरी होगी. 
   
 

sunanda ghosh गोरखपुर, उत्तर प्रदेश

 
 गंधर्व जी, आपकी दास्तां पढ़ कर बहुत देर तक ढ़ेर सारी यादों में डूबी रही. दास्तां जारी रहे. 
   

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