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वन अधिकार कानून का जंगल राज

मुद्दा

 

वन अधिकार कानून का जंगल राज

सचिन कुमार जैन, भोपाल से



बरातीलाल आदिवासी के परिवार के लिए यह किसी सदमे से कम नहीं है. कहां तो उन्हें उम्मीद थी कि वन अधिकार कानून लागू होने के बाद उनका परिवार अब और बेहतर तरीके से खेती-बाड़ी कर सकेगा. लेकिन वन अधिकार कानून ने बरातीलाल और उनके परिजनों के सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा कर दिया है.

आदिवासी कहां जाएं


बरातीलाल इस वन अधिकार कानून के अकेले शिकार नहीं हैं. गांव के दूसरे लोगों के साथ भी यही हुआ.

सिवनी जिले की आमागढ़ पंचायत के नन्हीं कन्हार गांव में सभी परिवारों को ढाई हेक्टेयर भूमि पर अधिकार के लिये दावा करने के लिये बाध्य किया गया, जबकि उन्हें कानूनन 4 हेक्टेयर जमीन पर दावे का अधिकार था. यहां 29 परिवार हैं किन्तु 18 परिवारों को ही दावे करने दिये गये और वहां यह बताया गया कि इस गांव में 1980 में मौजूद परिवारों को ही अधिकार पत्र मिलेंगे.

इसका परिणाम यह हुआ कि बरातीलाल आदिवासी के परिवार से अलग होकर पांच नये बने परिवारों को दावे करने की स्वतंत्रता नहीं दी गई. ये सभी मिलकर 30 एकड़ जमीन वर्षों से जोत रहे हैं किन्तु अब इन 6 परिवारों को 6.25 एकड़ तक ही सीमित कर दिया गया. सवाल यही है कि क्या 24 सदस्यों के ये परिवार जीवित रह पायेंगें सवा छह एकड़ की खेती से अपना गुजारा कर पाएंगे ?

वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन के लगभग डेढ़ साल के अनुभव यह बताते हैं कि अब भी आदिवासियों और वनों में रहने वाले अन्य परम्परागत वन निवासियों को ऐतिहासिक अन्याय से सीमित मुक्ति देने की कोशिशें हो रही हैं. विगत डेढ़ सौ सालों में सरकार ने सुनियोजित ढंग से वन विभाग को जंगलों का मालिक बनाने की पुरजोर कोशिशें की परन्तु उसका विरोध होता रहा. चूंकि आदिवासियों सहित कई अन्य गैर आदिवासी समुदाय वनों में और वन्यजीवन के साथ सह-जीवन की पध्दति से जीवन जीते रहे हैं. वन विभाग ने वनों पर अपना कब्जा स्थापित करने के उद्देश्य से सह-जीवन के इस समीकरण को बल और भेद के माध्यम से तोड़ने की लगातार प्रयास किए. जाहिर है, आदिवासी समाज आज भी वन विभाग को एक जिम्मेदार और सहृदय विभाग नहीं मानता है.

यही कारण है कि भारत सरकार ने यह मानते हुये कि आदिवासियों के साथ हुये ऐतिहासिक अन्याय की क्षतिपूर्ति वन विभाग की कार्यशैली के जरिये नहीं की जा सकती है; 2005 में बने इस कानून के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी आदिवासी कल्याण मंत्रालय को सौंपी.

इतना ही नहीं इस कानून की नियम और प्रक्रियाओं में भी वन विभाग की भूमिका को बेहद सीमित रखा परन्तु मध्यप्रदेश में संकट यह है कि वन विभाग के प्रभुत्व और बल के सामने आदिवासी विकास विभाग व्यावहारिक रूप से पनप ही नहीं पाया.

वन विभाग के अफसर ग्राम सभाओं और वन अधिकार समितियों की बैठकों में जाकर कानून के बारे में भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं.

कन्हार गांव के ही सुखराम भलावी बताते हैं –“ हमें तो यह नहीं बताया कि गांव का हर वह स्वतंत्र परिवार दावा लगा सकता है, जो वन भूमि जोत रहा है. हमें तो उन्होंने रिकार्ड से बताया कि बस 18 परिवार के दावे लगेंगे. अब रोना आता है यह सोचकर कि बेटे-भाइयों के लिये जमीन नहीं बचेगी. जब सरकार ही ऐसा कर रही है तो फिर किस पर विश्वास करेंगे?”

ऐसा नहीं है कि नन्हीं कन्हार गांव में भूलवश ऐसा हुआ है. यहां तो बड़े पैमाने पर सरकार ने विसंगतियां पैदा की हैं. वन विभाग यह मानकर चल रहा है कि वन अधिकार कानून के तहत केवल उन्हीं 1.50 लाख परिवारों को जंगल की 2.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर अधिकार दिया जाना चाहिये, जिनकी जानकारी उसके यानी वन विभाग के रिकार्ड में अतिक्रमणकारी के रूप मे दर्ज है.

वास्तविकता यह है कि वन विभाग के जमीनी अमले ने बहुत से अतिक्रमणकारी परिवारों की जानकारी को रिकार्ड में आने ही नहीं दिया है क्योंकि यदि वे सभी वास्तविक अतिक्रमणकारियों की रिपोर्ट अपने आला अफसरों के दिखाते तो उन पर सवाल उठते कि इतने अतिक्रमणकारी जंगल में क्यों हैं?

ऐसे में जमीनी अमला उन्हें बिना रिकार्ड में दर्ज किये बार-बार बेदखल करता रहा, झोंपड़े तोड़ते रहा और यह कभी कानून का सवाल नहीं बना क्योंकि जिन परिवारों की मौजूदगी के प्रमाण नहीं हैं, उनकी बेदखली तो हो ही नहीं सकती. कानून तो सबूत मांगता है.

एक मुसीबत यह भी है कि इस कानून के तहत समुदाय को जंगल पर अपने सामाजिक अधिकार को सिद्ध करने के लिये स्वयं प्रमाण प्रस्तुत करने को कहा गया है. अन्याय के शिकार आदिवासियों को सिद्ध करना है कि उनके साथ अन्याय हुआ है, यह कानून की दूसरी विसंगति है.

सरकार में पिछले 60 से ज्यादा वर्षों से बाजिब-उल-अर्ज और निस्तार पत्रकों में समुदाय के संसाधनों के अधिकार, विस्तार और दायरे स्पष्ट रूप से दर्ज किये जाते रहे हैं. हर गांव की जानकारी सरकार के रिकार्ड रूम में मौजूद है, जिनसे पता चलता है कि गांव का समाज कौन से जंगल का निस्तार के लिये, जड़ी-बूटी के लिये, आवागमन के लिये, देवता की पूजा के लिये, लकड़ी के लिये या लघुवनोपज के लिये उपयोग में लाता रहा है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Oma.Nand.Hazri (onhazri41@gmail.com) Dharampur Mandi.H.P.175040

 
 In the state of Himachal the Forest Department is claiming its rights on unculturable land which is shear injustice with the poor public as they are seldome barred by the lower subordinates from using product like sand,stone,lime.and whatnot.Such lands needs to be declared as unculturable & no one should be owner of this land. 
   
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Domicile rights of tribes should be define properly and should be regularize properly by government with the help of concerning departments along with restoration of right of possession of land as well as rights of using forest products for their survival benefit and role of Non Government Organization should be clearly define. 
   
 

yogesh (yogeshbpandey@gmail.com) Bhopal

 
 सचिन जी, आपने बिल्कुल सही लिखा है. ये आपकी प्रतिबद्धता है. मैं रविवार में आफलो पढ़ता रहता हूं. 
   
 

Suresh Singh मेदनीनगर, पलामू, झारखंड

 
 पूरे देश में वन अधिकार कानून की यही हालत है. वन विभाग ने जिस तरह से इस कानून को अपने कब्जे में लिया है, उसके बाद लगता नहीं कि यह कानून आदिवासियों और जंगलों में रहने वालों के लिए किसी काम का है.अफसोस यही है कि इस दिशा में न तो राजनीतिज्ञ ध्यान दे रहे हैं औऱ ना ही एनजीओ. मीडिया में भी ऐसी खबरें नादारद हैं. 
   

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