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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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आजमाना मेरा पता

एक प्रेम की एकतरफा कथा

 

आजमाना मेरा पता

गंधर्व



आदरणीय शुभदे,

आपका पोस्ट कार्ड मिला.

प्रेन की तलाश में


बारह बरस बाद. एकदम किसी सपने की तरह.

जवाब देने में थोड़ी देर हो गई क्योंकि तीन-चार दिन तो मुझे इस सच को ज़ज़्ब करने में ही लग गए कि आपने मुझे पत्र भेजा है. कुल छह पंक्तियों के इस पत्र को अनगिनत बार पढ़ चुका हूँ.

आपने लिखा कि आप पता आज़माना चाहती थीं. लेकिन आपके सानिध्य में और दुनियादारी से थोड़ी समझ तो आ ही गई है.

आपने पूछा है कि क्या मैं आपको याद करता हूँ, तो इसके जवाब में एक शेर याद आता है,

मुद्दतें गुज़रीं तेरी याद भी आई न हमें
और तुझे भूल गए हों ऐसा भी नहीं

सच कहूँ, तो आपको इतना कभी भूल ही नहीं पाया कि आपको याद कर सकूँ. याद करने के लिए भुलाना भी होता न. और मैं क्या-क्या भुलाता. आपका जाना सिर्फ़ आपका जाना नहीं था. जीवन के उन सात सालों का चला जाना था, जिसे मैं चाहूँ तो भी तो अपने जीवन से अलग नहीं कर सकता. कोई अपनी उम्र के सात साल घटा कैसे सकता है. कोई दुखद याद हो तो शायद सप्रयास ऐसा करे लेकिन अपने पहले प्रेम के क्षणों को कोई क्योंकर भुलाएगा भला? हर उस जगह से, जहाँ से हम कभी साथ गुज़रे थे, आज भी अकेले गुज़रना कठिन सा जान पड़ता है. लगता है मानों पेड़ और पत्थर तक रोक-रोककर पूछ रहे हैं कि तेरा हमसफ़र कहाँ हैं?

आप मेरी हमराज़ रही हैं इसलिए कहना ज़रुरी तो नहीं लेकिन फिर भी कहता हूँ. मेरी हर रचना, हर चित्र, हर सृजनशीलता और हर उपलब्धि के पीछे प्रेरणा की तरह आप ही खड़ी रही हैं. एक अच्छी किताब पढ़कर कुछ मित्रों से चर्चा करता हूँ और साथ में सोचता हूँ कि इसके अनुभव को आपके साथ साझा कर पाता तो कितना अच्छा होता.

हर उस जगह से, जहाँ से हम कभी साथ गुज़रे थे, आज भी अकेले गुज़रना कठिन सा जान पड़ता है.


हमारे बीच यक़ीन का एकतरफ़ा रिश्ता रहा है. मैं आप पर यक़ीन करता रहा और आपको मुझ पर शायद यक़ीन न हुआ. इसलिए हो सकता है कि मैं जो कह रहा हूँ उस पर आपको एकबारगी यक़ीन न आए लेकिन मेरी डायरी में इन बारह बरसों में दर्ज सवा सौ कविताएँ इसका गवाह हैं.

कभी अवसर मिला तो कविताएँ पढ़िएगा.

अब तो ज़ाहिर है कि आपको मिला पता सही था. आपको भी अनंत शुभकामनाएँ.

 

05.07.2009, 11.58 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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Sanjeev Pandey Kanpur

 
 मेरे साथ भी ऐसा हुआ था गंधर्व जी. मेरी पूरी सहानुभूति आपके साथ है. लेकिन आपका ये स्टैंड समझ में नहीं आया कि एक धोखेबाज स्त्री को आप अपनी रचनात्मक काम की प्रेरणा बता रहे हैं. 
   

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