पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > बात पते कीPrint | Send to Friend | Share This 

खाना खाने से फायदा क्या ?

मुद्दा

 

खाना खाने से फायदा क्या ?

देविंदर शर्मा

 

आप यह सोचकर हैरान हो रहे होंगे कि आपके खाने को क्या हुआ? आप भरपेट खाते हैं, पर आपके शरीर को पर्याप्त पोषण, खनिज और विटामिन नहीं मिल पाते. इस कमी को पूरा करने के लिए आप दुकानों में सजे फूड सप्लीमेंट और अन्य पोषक खाद्य पदार्र्थो का सहारा लेते हैं और जानबूझकर या अनजाने में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से घिर जाते हैं. क्या आपकी थाली से खाना गायब हो चुका है?

भोजन से पोषण गायब


आपने अपने माता-पिता को शिकायत करते सुना होगा कि आजकल खाने में पहले वाला स्वाद नहीं रहा. दरअसल, यह केवल बेस्वाद ही नहीं हो गया, बल्कि पौष्टिकता से रहित भी हो गया है. आप अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन आपको वे तत्व नहीं मिलते जो आपके शरीर की कार्यप्रणाली को मजबूत बनाते हैं. यथार्थ यह है कि आपका शरीर कमजोर बुनियाद वाली ऊंची इमारत बन गया है. आप जानते ही हैं कि ऐसी इमारतों का क्या हश्र होता है?

पहले ऐसा नहीं था. हरित क्रांति के दौरान सघन कृषि व्यवस्था लागू करने, रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर निर्भरता बढ़ने के बाद ही भोजन से पौष्टिकता गायब हुई है. जितनी अधिक पैदावार ली गई उतने ही अधिक पौष्टिक तत्व, विटामिन और खनिज पदार्थ कम होते चले गए. हमें बताया गया कि राष्ट्र का पेट भरने की यह छोटी सी कीमत चुकानी होगी. उस समय वैज्ञानिकों के सामने देश का पेट भरने के लिए कृषि उपज बढ़ाने की चुनौती थी. वैसे उनका काम खाद्य पदार्थो की गुणवत्ता बढ़ाना भी था.

मोलभाव के बाद उन्होंने गुणवत्ता का बलिदान कर दिया. वास्तव में साल दर साल खाद्यान्नों, दालों और फलों की पौष्टिकता सघन कृषि व्यवस्था के कारण और अधिक गिर गई है.

सघन कृषि ने मिट्टी से जरूरी पोषक तत्वों का खनन शुरू कर दिया. मिट्टी के तीन प्रमुख पोषक तत्वों- नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटास के अलावा पूरक तत्वों जिंक, लौह, कापर, मैग्नीज, मोलिबडेनम और बोरोन की कमी हो गई है. इसका मतलब यह हुआ कि पौधों द्वारा इन तत्वों के अवशोषण में भारी कमी हो गई. पौधों में इन तत्वों की कमी होने का मतलब यह है कि हमारे भोजन में भी ये तत्व कम हो गए हैं.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद के छह दशकों में वैज्ञानिकों ने जिन 12 पोषक तत्वों का अध्ययन किया है उनमें से छह में पोषक तत्वों में भारी कमी देखी गई है. यह कमी 15 से 40 फीसदी तक रही है, जबकि कापर की उपलब्धता तो 80 फीसदी तक घट गई है. अगर आप इस तथ्य से परिचित नहीं हैं कि भोजन में कापर कम होने से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है तो जान लीजिए कि इसी के कारण खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढ़ती है, जिससे दिल का दौरा तक पड़ सकता है.

सब्जियों में कैल्शियम और फास्फोरस की कमी आम है. आचार्य नरेंद्र देव यूनिवर्सिटी फार एग्रीकल्चरल साइंस, फैजाबाद द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार दालों में आयरन की उपलब्धता अपेक्षित छह ग्राम प्रति सौ ग्राम से घटकर मात्र 2.7 ग्राम रह गई है. दालों में फास्फोरस की मात्रा घटकर चार मिलीग्राम तक रह गई है. चपाती में 49 मिलीग्राम और चावल में मात्र दस मिलीग्राम रह गई है. कैल्शियम की उपलब्धता, जिससे हड्डियां मजबूत होती है, भी बड़ी तेजी से गिर रही है. दालों में कैल्शियम 110 मिलीग्राम से घटकर 73 मिलीग्राम रह गया है. चपाती में 49 से घटकर 43 और चावल में 10 मिलीग्राम से घटकर 9 मिलीग्राम रह गया है.

इसी प्रकार पिछले साठ सालों के दौरान खाद्य पदार्थो से फाइबर भी कम हो गया है. जहां तक प्रोटीन का सवाल है तो यह आम धारणा है कि दालें इसका प्रमुख स्त्रोत हैं. यह स्त्रोत भी गिर रहा है. दालों में प्रोटीन का प्रतिशत 1.6 तक घट गया है. चपाती में 1.1 प्रतिशत और चावल में यह 6.8 प्रतिशत गिर गया है. चावल में वैसे ही प्रोटीन कम होता है, जो और भी घट गया है. बहुत से विशेषज्ञों का मानना है कि चावल और दाल के समन्वय से शरीर के लिए आवश्यक प्रोटीन की पूर्ति हो जाती है. अब यह सच नहीं रह गया है.

इंग्लैंड के रोथमस्टेड रिसर्च स्टेशन द्वारा किए गए अध्ययन से पता चलता है कि गेहूं में प्रोटीन की मात्रा 30 प्रतिशत कम हो गई है. मुझे याद पड़ता है कि पौध प्रजनन में स्नातकोत्तर करने के दौरान मैंने हिमाचल प्रदेश से स्थानीय गेहूं के कुछ नमूने एकत्र किए थे, ताकि उनकी जीन संरचना की पर्यावरण अंतरक्रिया को समझा जा सके. चंबा के ऊंचे पहाड़ों से लिए गए गेहूं के एक नमूने में 14 प्रतिशत प्रोटीन था.


आज स्थिति यह है कि जो गेहूं हम खाते हैं उसमें औसत प्रोटीन मात्र 9-10 प्रतिशत रह गया है. यह बिल्कुल साफ है कि खाद्यान्नों की उन्नत किस्मों के विकास ने इसके पोषक तत्व निचोड़ लिए हैं.

अब हमें देखना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ? 1940 और 1950 के दशक में वैज्ञानिकों ने पैदावार और पौष्टिकता के सहसंबंधों पर शोध करना शुरू किया. 1945 के बाद विकसित देशों में फसलों में खाद के इस्तेमाल से पैदावार तो बढ़ गई, किंतु उसमें खनिज तत्व कम हो गए. बाद में 1960 के दशक में अधिक पैदावार की किस्में आईं और विकासशील देशों में फैल गईं. साथ ही रासायनिक खादों का इस्तेमाल भी बढ़ गया. जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि वैज्ञानिकों ने पता लगा लिया था कि रासायनिक खादों के इस्तेमाल से खाद्यान्न के पौष्टिक और खनिज तत्वों में कमी आती है.

पिछले दिनों सामने आए एक और अध्ययन से यह पता चलता है कि खादों के अधिक प्रयोग से जैवविविधता में भी कमी आई है. जमीन के रुग्ण हो जाने से पौधे भी अस्वस्थ हो गए. वास्तव में, अस्वस्थ मिट्टी का मतलब है कि पर्याप्त खनिज तत्वों में भारी गिरावट आना. गेहूं के बीजों की उवर्रता में कमी आने का यही सबसे बड़ा कारण है. मिट्टी से बीज को वे पोषक तत्व ही नहीं मिल पाते हैं कि वे अंकुरित हो पाएं. पिछले कुछ दशकों के दौरान मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है.

रोथमस्टेड सेंटर में हुए अध्ययन से पता चलता है कि 1845 से 1960 के बीच मिट्टी और गेहूं के पौधों में खनिज व पोषक तत्वों का स्तर स्थिर रहा, बल्कि इस दौरान कुछ क्षेत्रों में तो देशी खाद के इस्तेमाल के कारण मिट्टी में खनिज पदार्थो की मात्रा उलटे बढ़ गई है. इसका मतलब है कि पौधों की पौष्टिकता में तेज गिरावट का दौर 1960 के बाद शुरू हुआ.

वास्तव में अगर हम केवल परंपरागत कृषि व्यवस्था को समझदारी के साथ लागू कर पाते तो आज हम जो खाना खा रहे हैं वह अधिक पौष्टिक होता. पौधों के पोषक तत्वों में भारी कमी का कारण यह है कि हमने परंपरागत तौर-तरीकों को त्याग दिया है. गोबर की खाद के स्थान पर रासायनिक खाद डालने का परिणाम यह हुआ कि खेतों की ताकत घट गई है. बेहिसाब यूरिया के इस्तेमाल ने मिट्टी की उर्वरता को घटा दिया है.

अब देशव्यापी कार्यक्रम चलाने की आवश्यकता है, ताकि मिट्टी के स्वास्थ्य को बचाया जा सके. और यह काम तभी हो सकता है जब प्रदूषकों यानी रासायनिक खाद कंपनियों को पर्यावरण को हानि पहुंचाने की क्षतिपूर्ति करने के लिए बाध्य किया जा सके.

 

11.07.2009, 14.50 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

alok (a.sanga@rediffmail.com)

 
 यह बिल्कुल ठीक है. पर हमारी सरकार और हमारा समाज सिर्फ मिलावट के बारे में ही विचार करता है. और हर बार कुछ ही लोगों पर मिलावट के नाम पर कारवाई होती है. पर इस सच्चाई के बारे में कोई विचार नहीं करता. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in