पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

साहित्य का ओपेरा संस्करण

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

जल, जंगल, जमीन, जिंदगी... सब बर्बाद !

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

यह सबके लिये चेतावनी है

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

चुनावी मसाले की सोंधी महक

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
Photobucket
 पहला पन्ना > बात निकलेगी तो... > छत्तीसगढ़Print | Send to Friend | Share This 

कॉमरेड विनोद, लाल सलाम!

बात पते की

 

कॉमरेड विनोद, लाल सलाम!

कनक तिवारी



छत्तीसगढ़ की किंकर्त्तव्यविमूढ़ सरकार को अब तक की सबसे बड़ी चुनौती देते हुए नक्सलियों ने प्रदेश के सबसे ईमानदार और कुशल पुलिस अधिकारी विनोद चौबे सहित कोई छत्तीस पुलिस जवानों की आखिरकार हत्या कर ही दी. नक्सली हिंसा के इतिहास में यह अब तक का सबसे खतरनाक और क्रूर हमला राज्य की सरकार पर हुआ है.

छत्तीसगढ़-नक्सली-माओवादी


इस घटना के दो दिन पहले मुख्यमंत्री ने साहित्यकारों के एक बड़े सम्मेलन को संबोधित करते हुए अनावश्यक रूप से नक्सली समस्या का उल्लेख किया और देश के विभिन्न इलाकों से आए साहित्यकारों पर व्यंग्य कसा कि क्यों नहीं उन्हें नक्सलियों के खिलाफ लिखना चाहिए. समाचार के अगले दिन प्रकाशित होने के 24 घंटों के अंदर नक्सलियों ने मुख्यमंत्री को उनके गृह जिले में ही खूंखार चुनौती दे डाली है.

यह अलग बात है कि राजनीतिक अपरिपक्वता और बड़बोलेपन का खमियाजा निम्न मध्य वर्ग के उन गरीब परिवारों को भुगतना पड़ा जिनके होनहार युवक पेट की रोटी कमाने की गरज से पुलिस में भर्ती हुए हैं ताकि प्रदेश की जनता की रक्षा कर सकें.

नक्सलियों ने मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकारों द्वारा उत्पन्न की गई बौद्धिक क्रांति का अपनी भाषा में उत्तर देकर यह ऐलान कर दिया है कि वे बासी चाय के प्याले के तूफानों की परवाह नहीं करते और कहर बरपा सकते हैं. मेरा यह निश्चित मत है कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ के लिए अभिशाप है, बल्कि जहर है और उसका खात्मा होना चाहिए. लेकिन यह इबारत भी साफ साफ पढ़ी जा सकती है कि मौजूदा सरकार में नक्सलवाद का मुकाबला करने के लिए न तो कोई असंदिग्ध नैतिक संकल्प है और न ही कारगर रणनीति.

सैकड़ों की संख्या में छत्तीसगढ़ के गरीब परिवारों के पुलिस कर्मी मारे जा रहे हैं और बड़े अफसर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं. विनोद चौबे तो एक प्रतीक हैं क्योंकि उनसे ज्यादा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी छत्तीसगढ़ में ढूंढ़ने से नहीं मिलेगा.

जिस रणनीति पर पुलिस के मैदानी अधिकारी नक्सलियों से लोहा ले रहे हैं, वह तो पुलिस मुख्यालय के स्तर पर मंत्रियों के विर्मश से बनाई जाती होगी. इस नीति का लगातार स्खलन हो रहा है. पुलिस के आला अधिकारी नैतिक जिम्मेदारी कहां ले रहे हैं? वे शर्मसार जरूर होते रहते हैं. गोपनीय प्रक्रिया के बहाने वे अपनी रणनीति को जन आलोचना से सफलतापूर्वक बचा लेते हैं. राज्य का विषय कहकर केन्द्र सरकार भी पल्ला झाड़ लेती है.

आदिवासियों की रक्षा के लिए भारतीय संविधान में राज्यपाल को सीधे अधिकार प्राप्त हैं लेकिन उनका कोई प्रयोग होता दिखाई नहीं पड़ रहा है. नया पुलिस अधिनियम बनने के बाद भी पुलिस प्रशासन उतना ही सुस्त है. पुलिस की इंटेलिजेंस मशीनरी पूरी तरह फेल है. छत्तीसगढ़ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत नक्सलवादियों के बदले नागरिक पकड़े गए हैं.

लाल गढ़ तो पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार के संरक्षण और ना नुकुर के बावजूद केंद्रीय सुरक्षा बलों ने आनन फानन में नक्सलियों से मुक्त करा लिया. क्या छत्तीसगढ़ को वास्तविक 'लाल गढ' बनाया जा रहा है?


मुख्यमंत्री को केन्द्र सरकार के खर्चे पर 'चाउर वाला बाबा' कहलाना ज्यादा सुहा रहा है. दूसरी ओर छोटे छोटे ओहदों के पुलिस कर्मी अपना खून पसीना बहा रहे हैं लेकिन उनकी शहादत के बावजूद समाज को नक्सलवाद से मुक्ति नहीं मिल रही है. अफवाहें तो यह भी हैं कि नक्सलवादी छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालयों तक फैल गए हैं और गुपचुप कार्यरत हैं.

पुलिस और प्रशासन की इतनी बड़ी असफलता स्वतंत्रता के बाद भारत में शायद ही कहीं देखी गई होगी. संविधान की व्यवस्थाएं भी इस कदर तकनीकी हैं कि ऐसी सरकारों को बर्खास्त भी नहीं किया जा सकता. जब तक सिविल समाज पूरी तौर पर सक्रिय होकर सामने नहीं आयेगा तब तक बहुत से विनोद चौबे शहीद होते रहेंगे. सरकार इस मसले पर श्वेत पत्र क्यों नहीं प्रकाशित करती?

कांग्रेस के नेता ऐसे तो आपस में अपनी दुर्गति होने तक लड़ते रहते हैं लेकिन नक्सलवाद की इस बड़ी घटना को लेकर वे एकजुट प्रेस सम्मेलन में दिखाई दिए. उन्होंने सरकार की बर्खास्तगी और त्यागपत्र की एक साथ विरोधाभासी मांग की और कहा कि उन्होंने कोई कार्य योजना सरकार को बनाकर दी है. उसका जनता को अता पता नहीं है और होगा भी नहीं.

इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहली बार एक सर्वदलीय गोपनीय बैठक भी आयोजित की गई थी लेकिन हुआ वही टांय टांय फिस्स. राज्यपाल ने कथित तौर पर यह तो जनता को संसूचित कर दिया है कि वे सरकार से खासे नाराज हैं लेकिन उनके देश के पूर्व इंटेलिजेन्स प्रमुख होने पर भी उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ छत्तीसगढ़ में नहीं उठाया जा सका-इसका भी मलाल उन्हें होना चाहिए.

घटना के तुरंत बाद अपना गृह जिला होने पर मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री को भेजा. कांग्रेस के बड़े नेता भी साथ नहीं ले जाए गए. सबसे वरिष्ठ शहीद विनोद चौबे के घर पर भी प्रदेश स्तर के नेता तत्काल नहीं पहुंच सके. प्रदेश और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के प्रवक्ताओं के बयानों में अंदाज अलग अलग नजर आए. भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेताओं ने तो तत्काल कोई प्रक्रिया भी नहीं दी. यहां तक कि कम्युनिस्टों ने साहित्य सम्मेलन में मुख्यमंत्री के उन पर किए गए प्रहारात्मक भाषण का उत्तर तक नहीं दिया. यह सब शगल चलता रहा और चलता रहेगा. नक्सलवादी हत्याएं कर चुके और करते भी रहेंगे.

लाल गढ़ तो पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार के संरक्षण और ना नुकुर के बावजूद केंद्रीय सुरक्षा बलों ने आनन फानन में नक्सलियों से मुक्त करा लिया. क्या छत्तीसगढ़ को वास्तविक 'लाल गढ' बनाया जा रहा है? राजनीतिक संदर्भ भले अलग हों और असहमति योग्य भी, लेकिन श्रीलंका की सरकार ने अपने बूते पर प्रभाकरण के साम्राज्य को आखिर कुछ ही दिनों में खत्म तो कर ही दिया. टाटा समूह नंदीग्राम और सिंगूर में कारखाना नहीं लगा सका और पिटकर चला गया. बस्तर में वे राज्य अतिथि का दर्जा प्राप्त हैं एस्सार स्टील वगैरह के साथ.


आंध्रप्रदेश ने नक्सलवादियों को छत्तीसगढ़ की सरहद में धकेल दिया है. जब भी नक्सली मारे जाते हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी ही मारे जाते हैं. आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और महाराष्ट्र्र से आयातित नेतृत्व बहुत कम मारा जाता है. पंजाब के आतंकवाद उन्मूलन विशेषज्ञ पुलिस अधिकारी केपीएस ग़िल से भी राज्य सरकार की नहीं बनी. कांकेर में नक्सलवाद विरोधी प्रशिक्षण विद्यालय भी कोई काम नहीं आ रहा है. जितना धन नक्सलवाद को समाप्त करने के नाम पर छत्तीसगढ़ में खर्च किया गया है उतना यदि विकास योजनाओं में लगाकर आदिवासियों तक पहुंचा दिया जाता तो बस्तर में नक्सलवाद को पैर पसारने का मौका ही नहीं मिलता.

आदिवासी अंग्रेज़ी भाषा के अर्थ में सैंडविच हैं और हिन्दी में गरीब की लुगाई. पूरी दुनिया का सबसे बड़ा कत्लेआम आदिवासी छत्तीसगढ़ में भोग रहे हैं और निर्मम इतिहास और हम सब चुप हैं. बुद्धिजीवी और पत्रकारों के लिए सरकार बड़े बड़े सम्मेलन कर रही है. पुलिस अधिकारी बस्तर और सरगुजा जाने से डर रहे हैं. जो जा रहे हैं उनका या तो भगवान मालिक है या फिर नक्सलवादी. आदिवासियों के नोट किसी तरह कबाड़कर सरकार बना लेना सबकी प्राथमिकता है. वे बंधुआ मज़दूर जो ठहरे. हर एनकाउंटर में चली गोली पर किसी आदिवासी का ही नाम लिखा है.

हम सब इतिहास की इस पैशाचिक शवयात्रा के सहयात्री हैं. नक्सलवाद का पानी सर के ऊपर से गुजरने वाला है. इस अर्थ में मानसून तो धोखा दे रहा है लेकिन नक्सलवादी नहीं. वे भरी बरसात खून की होली खेल रहे हैं. सरकारें मृतकों और घायलों के लिए क्षतिपूर्ति की राशि घोषित कर रही है. घटनाओं की निंदा कर रही हैं. हौसला बढ़ाने के लिए नक्सलियों को चुनौती दे रही हैं. सबसे सीधे साधे आदिवासियों को गृह मंत्री भी बना रही हैं. तेज तर्रार मंत्री मलाईदार विभागों में लगे हैं. अधिकारी मैदानी मुकाबलों के बदले सुरक्षित सभा भवनों में बैठकर तालियां बजवा रहे हैं. छत्तीसगढ़ की इक्कीसवीं सदी पूरी दुनिया की सहानुभूति, मनोरंजन और शोषण की जगह बनती गई है.

 

14.07.2009, 14.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

याज्ञवल्‍क्‍य (yagnyawalky@gmail.com) सरगुजा

 
 विनोद चौबे को भावभीनी श्रद्वांजली। लेकिन मौजुदा हालात में यह तयशुदा बात है कि, सरकार के पास सोच का अभाव है। सरकार के खुद ही समझ नहीं आता कि, करना क्‍या है। ननकी राम कंवर रायपुर में नक्‍सलियों के एक साल में खात्‍मे की बात करते हुए दावा करते है कि, लडेगे, और बस्‍तर पहुंच कर कहते है बातचीत का रास्‍ता खत्‍म नहीं हुआ। कभी कभी लगता है यह सरकार नीरो है और बांसुरी में अभी कई राग सुनने बचे है छत्‍तीसगढ जलता है तो जले अपनी बला से । इस सरकार के पास शहीदों के लिए भी ना सम्‍मान है और ना ही परिजनों के लिए सात्‍वंना के ठोस शब्‍द।  
   
 

pramod gupta (ji_bhai@redif mail) kota

 
 सरकारें आज तक यही नहीं तय कर पाई की नक्सलवाद आतंकवाद है या सामाजिक समस्या. आदमी मारना बड़ी बात नहीं है, हमें इस विध्वंसक विचार मारना होगा. जो सरकारों के बस का नहीं है. आम आदमी के बस का है. जो वैचारिक क्रांति से ही संभव है. 
   
 

neelam () india

 
 नक्सल समस्या का समाधान कोई सही तरीके से नहीं करना चाहता. सरकार उसे दुष्प्रचार और पुलिस से समाप्त करना चाहती है जबकि भारत के इतिहास में पुलिस किसी आर्थिक और सामाजिक समस्या का हल नहीं किया. पुलिस जहां भी deploy की जाती है मानवाधिकार की समस्या और अपने चरम पर हो जाती है. 
   
 

राजकिशोर नई दिल्ली

 
 नक्सलवाद के मूल में गये बगैर समस्या को समझना मुश्किल है और सरकारें ऐसा करना नहीं चाहतीं. योजना आयोग की उस रिपोर्ट को कोई नहीं पलटना चाहता, जिसमें नक्सलवाद औऱ विकास की पड़ताल की गई थी. 
   
 

बृजमोहन अग्रवाल (jp2009@rediffmail.com) Raipur,CHATTISGARH.

 
 सच तो ये है कि राज्य सरकार नक्सल समस्या के प्रति न तो गंभीर है, ना ही इमानदार. यही कारण है कि सरकार के दो-दो कार्यकालों के बावजूद हालात जस के तस हैं.
प्रदेश में पुलिस कि बागडोर सम्हालने वाले खाकीधारी नेता भी नकारा किस्म के होते हैं, जो इधर राजधानी में रहकर साहित्य रचना की बातों में मशगूल रहते हैं. यानि, जिस काम का तनख्वाह खा रहे हैं, उसमे पूरी तरह लापरवाह. अब तो सरकार को भी चूड़ी पहन लेना चाहिए. अरे कुछ तो शर्म करो. एसपी की हत्या क्या कम बड़ी बात है, बड़ी संख्या में मारे जा रहे जवानों की मौत के जिम्मेदार यही लोग हैं.
 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) दुबई

 
 इस चाउंर वाले बाबा से ये सब नही सम्हलने वाला है ....ये अयुर्वेदिक पुडिया नही कि दी और रोग ठीक हो गया ....कडाई से निपटेंगे, फ़लाना-ढेकाना करने वाली इस स्टंट्बाज सरकार को अकर्मण्यता का नोबल पुरस्कार दिया जाना चाहिये !!

उन पर क्या बीत रही होगी जिन्होने अपने परिजनो को खोया है ?...मगर इस भाषण बाज सरकार से क्या उम्मीद करेंगे जो गले तक भ्रष्टाचार और दलाली मे डूबी है !!
 
   
 

मुक्ता घोष (jkhjkhlkj@gmail.com) . नोयडा

 
 नक्सली केवल आदिवासियों को निशाना बना रहे हैं और अब क्रांति-फ्रांति उनके बस का नहीं है. वे जंगलों में ठेकेदारों से वसूली करने वाले लठैत बन कर रह गए हैं. 
   
 

Suresh Kumar Sharma (jkhjkhlkj@gmail.com) Pune, Maharashtra, INDIA

 
 नक्सलवाद आज नासूर बन गया है और सरकारें अपने लाभ के लिए उसको पाल पोस रही हैं. हरेक विपक्ष इस मामले में सरकार से इस्तीफा मांग कर अपना कर्तव्य निभा लेता है और सरकार भी कोई रटा-रटाया जुमला बोल कर वाहवाही लूटने के लिए बेशर्मी से जनता के सामने आ जाती है. अगर सरकार में इच्छा शक्ति हो तो इस समस्या को सुलझाया जा सकता है. लेकिन कोई भी इसे नहीं सुलझाना चाहता. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   

 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in