कॉमरेड विनोद, लाल सलाम!
बात पते की
कॉमरेड विनोद, लाल सलाम!
कनक तिवारी
छत्तीसगढ़ की किंकर्त्तव्यविमूढ़ सरकार को अब तक की सबसे बड़ी चुनौती देते हुए
नक्सलियों ने प्रदेश के सबसे ईमानदार और कुशल पुलिस अधिकारी विनोद चौबे सहित कोई
छत्तीस पुलिस जवानों की आखिरकार हत्या कर ही दी. नक्सली हिंसा के इतिहास में यह अब
तक का सबसे खतरनाक और क्रूर हमला राज्य की सरकार पर हुआ है.
इस घटना के दो दिन पहले मुख्यमंत्री ने साहित्यकारों के एक बड़े सम्मेलन को
संबोधित करते हुए अनावश्यक रूप से नक्सली समस्या का उल्लेख किया और देश के
विभिन्न इलाकों से आए साहित्यकारों पर व्यंग्य कसा कि क्यों नहीं उन्हें
नक्सलियों के खिलाफ लिखना चाहिए. समाचार के अगले दिन प्रकाशित होने के 24 घंटों
के अंदर नक्सलियों ने मुख्यमंत्री को उनके गृह जिले में ही खूंखार चुनौती दे
डाली है.
यह अलग बात है कि राजनीतिक अपरिपक्वता और बड़बोलेपन का खमियाजा निम्न मध्य वर्ग
के उन गरीब परिवारों को भुगतना पड़ा जिनके होनहार युवक पेट की रोटी कमाने की गरज
से पुलिस में भर्ती हुए हैं ताकि प्रदेश की जनता की रक्षा कर सकें.
नक्सलियों ने मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकारों द्वारा उत्पन्न की गई
बौद्धिक क्रांति का अपनी भाषा में उत्तर देकर यह ऐलान कर दिया है कि वे बासी
चाय के प्याले के तूफानों की परवाह नहीं करते और कहर बरपा सकते हैं. मेरा यह
निश्चित मत है कि नक्सलवाद छत्तीसगढ़ के लिए अभिशाप है, बल्कि जहर है और उसका
खात्मा होना चाहिए. लेकिन यह इबारत भी साफ साफ पढ़ी जा सकती है कि मौजूदा सरकार
में नक्सलवाद का मुकाबला करने के लिए न तो कोई असंदिग्ध नैतिक संकल्प है और न
ही कारगर रणनीति.
सैकड़ों की संख्या में छत्तीसगढ़ के गरीब परिवारों के पुलिस कर्मी मारे जा रहे
हैं और बड़े अफसर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं. विनोद चौबे तो एक प्रतीक हैं क्योंकि
उनसे ज्यादा ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी छत्तीसगढ़ में ढूंढ़ने से नहीं
मिलेगा.
जिस रणनीति पर पुलिस के मैदानी अधिकारी नक्सलियों से लोहा ले रहे हैं, वह तो
पुलिस मुख्यालय के स्तर पर मंत्रियों के विर्मश से बनाई जाती होगी. इस नीति का
लगातार स्खलन हो रहा है. पुलिस के आला अधिकारी नैतिक जिम्मेदारी कहां ले रहे
हैं? वे शर्मसार जरूर होते रहते हैं. गोपनीय प्रक्रिया के बहाने वे अपनी रणनीति
को जन आलोचना से सफलतापूर्वक बचा लेते हैं. राज्य का विषय कहकर केन्द्र सरकार
भी पल्ला झाड़ लेती है.
आदिवासियों की रक्षा के लिए भारतीय संविधान में राज्यपाल को सीधे अधिकार
प्राप्त हैं लेकिन उनका कोई प्रयोग होता दिखाई नहीं पड़ रहा है. नया पुलिस
अधिनियम बनने के बाद भी पुलिस प्रशासन उतना ही सुस्त है. पुलिस की इंटेलिजेंस
मशीनरी पूरी तरह फेल है. छत्तीसगढ़ सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत
नक्सलवादियों के बदले नागरिक पकड़े गए हैं.
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लाल गढ़ तो पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार के संरक्षण और ना नुकुर के बावजूद केंद्रीय
सुरक्षा बलों ने आनन फानन में नक्सलियों से मुक्त करा लिया. क्या छत्तीसगढ़ को
वास्तविक 'लाल गढ' बनाया जा रहा है? |
मुख्यमंत्री को केन्द्र सरकार के खर्चे पर 'चाउर वाला बाबा' कहलाना ज्यादा सुहा रहा
है. दूसरी ओर छोटे छोटे ओहदों के पुलिस कर्मी अपना खून पसीना बहा रहे हैं लेकिन उनकी
शहादत के बावजूद समाज को नक्सलवाद से मुक्ति नहीं मिल रही है. अफवाहें तो यह भी हैं
कि नक्सलवादी छत्तीसगढ़ के जिला मुख्यालयों तक फैल गए हैं और गुपचुप कार्यरत हैं.
पुलिस और प्रशासन की इतनी बड़ी असफलता स्वतंत्रता के बाद भारत में शायद ही कहीं देखी
गई होगी. संविधान की व्यवस्थाएं भी इस कदर तकनीकी हैं कि ऐसी सरकारों को बर्खास्त
भी नहीं किया जा सकता. जब तक सिविल समाज पूरी तौर पर सक्रिय होकर सामने नहीं आयेगा
तब तक बहुत से विनोद चौबे शहीद होते रहेंगे. सरकार इस मसले पर श्वेत पत्र क्यों नहीं
प्रकाशित करती?
कांग्रेस के नेता ऐसे तो आपस में अपनी दुर्गति होने तक लड़ते रहते हैं लेकिन
नक्सलवाद की इस बड़ी घटना को लेकर वे एकजुट प्रेस सम्मेलन में दिखाई दिए. उन्होंने
सरकार की बर्खास्तगी और त्यागपत्र की एक साथ विरोधाभासी मांग की और कहा कि उन्होंने
कोई कार्य योजना सरकार को बनाकर दी है. उसका जनता को अता पता नहीं है और होगा भी नहीं.
इस मामले को लेकर छत्तीसगढ़ विधानसभा में पहली बार एक सर्वदलीय गोपनीय बैठक भी
आयोजित की गई थी लेकिन हुआ वही टांय टांय फिस्स. राज्यपाल ने कथित तौर पर यह तो जनता
को संसूचित कर दिया है कि वे सरकार से खासे नाराज हैं लेकिन उनके देश के पूर्व
इंटेलिजेन्स प्रमुख होने पर भी उनके ज्ञान और अनुभव का लाभ छत्तीसगढ़ में नहीं उठाया
जा सका-इसका भी मलाल उन्हें होना चाहिए.
घटना के तुरंत बाद अपना गृह जिला होने पर मुख्यमंत्री ने गृह मंत्री को भेजा.
कांग्रेस के बड़े नेता भी साथ नहीं ले जाए गए. सबसे वरिष्ठ शहीद विनोद चौबे के घर पर
भी प्रदेश स्तर के नेता तत्काल नहीं पहुंच सके. प्रदेश और अखिल भारतीय कांग्रेस
कमेटी के प्रवक्ताओं के बयानों में अंदाज अलग अलग नजर आए. भारतीय जनता पार्टी के बड़े
नेताओं ने तो तत्काल कोई प्रक्रिया भी नहीं दी. यहां तक कि कम्युनिस्टों ने साहित्य
सम्मेलन में मुख्यमंत्री के उन पर किए गए प्रहारात्मक भाषण का उत्तर तक नहीं दिया.
यह सब शगल चलता रहा और चलता रहेगा. नक्सलवादी हत्याएं कर चुके और करते भी रहेंगे.
लाल गढ़ तो पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार के संरक्षण और ना नुकुर के बावजूद केंद्रीय
सुरक्षा बलों ने आनन फानन में नक्सलियों से मुक्त करा लिया. क्या छत्तीसगढ़ को
वास्तविक 'लाल गढ' बनाया जा रहा है? राजनीतिक संदर्भ भले अलग हों और असहमति योग्य
भी, लेकिन श्रीलंका की सरकार ने अपने बूते पर प्रभाकरण के साम्राज्य को आखिर कुछ ही
दिनों में खत्म तो कर ही दिया. टाटा समूह नंदीग्राम और सिंगूर में कारखाना नहीं लगा
सका और पिटकर चला गया. बस्तर में वे राज्य अतिथि का दर्जा प्राप्त हैं एस्सार स्टील
वगैरह के साथ.
आंध्रप्रदेश ने नक्सलवादियों को छत्तीसगढ़ की सरहद में धकेल दिया है. जब भी नक्सली
मारे जाते हैं छत्तीसगढ़ के आदिवासी ही मारे जाते हैं. आंध्रप्रदेश, उड़ीसा और
महाराष्ट्र्र से आयातित नेतृत्व बहुत कम मारा जाता है. पंजाब के आतंकवाद उन्मूलन
विशेषज्ञ पुलिस अधिकारी केपीएस ग़िल से भी राज्य सरकार की नहीं बनी. कांकेर में
नक्सलवाद विरोधी प्रशिक्षण विद्यालय भी कोई काम नहीं आ रहा है. जितना धन नक्सलवाद
को समाप्त करने के नाम पर छत्तीसगढ़ में खर्च किया गया है उतना यदि विकास योजनाओं
में लगाकर आदिवासियों तक पहुंचा दिया जाता तो बस्तर में नक्सलवाद को पैर पसारने का
मौका ही नहीं मिलता.
आदिवासी अंग्रेज़ी भाषा के अर्थ में सैंडविच हैं और हिन्दी में गरीब की लुगाई. पूरी
दुनिया का सबसे बड़ा कत्लेआम आदिवासी छत्तीसगढ़ में भोग रहे हैं और निर्मम इतिहास और
हम सब चुप हैं. बुद्धिजीवी और पत्रकारों के लिए सरकार बड़े बड़े सम्मेलन कर रही है.
पुलिस अधिकारी बस्तर और सरगुजा जाने से डर रहे हैं. जो जा रहे हैं उनका या तो भगवान
मालिक है या फिर नक्सलवादी. आदिवासियों के नोट किसी तरह कबाड़कर सरकार बना लेना सबकी
प्राथमिकता है. वे बंधुआ मज़दूर जो ठहरे. हर एनकाउंटर में चली गोली पर किसी आदिवासी
का ही नाम लिखा है.
हम सब इतिहास की इस पैशाचिक शवयात्रा के सहयात्री हैं. नक्सलवाद का पानी सर के ऊपर
से गुजरने वाला है. इस अर्थ में मानसून तो धोखा दे रहा है लेकिन नक्सलवादी नहीं. वे
भरी बरसात खून की होली खेल रहे हैं. सरकारें मृतकों और घायलों के लिए क्षतिपूर्ति
की राशि घोषित कर रही है. घटनाओं की निंदा कर रही हैं. हौसला बढ़ाने के लिए नक्सलियों
को चुनौती दे रही हैं. सबसे सीधे साधे आदिवासियों को गृह मंत्री भी बना रही हैं.
तेज तर्रार मंत्री मलाईदार विभागों में लगे हैं. अधिकारी मैदानी मुकाबलों के बदले
सुरक्षित सभा भवनों में बैठकर तालियां बजवा रहे हैं. छत्तीसगढ़ की इक्कीसवीं सदी पूरी
दुनिया की सहानुभूति, मनोरंजन और शोषण की जगह बनती गई है.
14.07.2009, 14.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित