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घर लेकर आए नदी

मिसाल-बेमिसाल

 

घर लेकर आए नदी

बाबा मायाराम, होशंगाबाद से

 

आमतौर पर बिना बिजली, बिना ईंधन और पशुधन की ऊर्जा के बगैर खेतों की सिंचाई करना मुश्किल है लेकिन सतपुड़ा अंचल के दो गांव के लोगों ने यह कर दिखाया है. अपनी कड़ी मेहनत, कौशल और सूझबूझ से वे पहाड़-जंगल के नदी- नालों से अपने खेतों तक पानी लाने में कामयाब हुए और अनाज पैदा करने लगे. जंगल पर आधारित जीवन से खेती की ओर मुड़े आदिवासी भरपेट भोजन करने लगे.

अपनी नदी


प्रकृति से लड़-भीड़ कर अपनी जिंदगी को संवारने में तो ये गांव वाले कामयाब हो गये लेकिन सरकारी नीतियां इन उपलब्धियों के साथ-साथ उनके भविष्य को भी दांव पर लगाने के लिए आमदा हैं. सरकार ने सतपुड़ा टाईगर रिजर्व की अधिसूचना जारी कर दी है और विस्थापन की तलवार जिन 75 गांवों पर लटकी है, उनमें ये दो गांव भी शामिल हैं. गांववालों में अपने भविष्य को लेकर असमंजस और अनिश्चय बना हुआ है.

होशंगाबाद जिले के पिपरिया विकासखंड में सतपुड़ा के घने जंगलों के बीच बसे वनग्राम रांईखेड़ा में प्यासे खेतों को पानी पिलाने की पहल करीब 20 पहले शुरू हुई, जब गांव के 16 लोगों ने गांजाकुंवर नामक नदी से पानी लाने का बीड़ा उठाया.

यह काम आसान नहीं था. खेतों से नदी की दूरी लगभग 5 किलोमीटर दूर थी, जिसके बीच में नाली निर्माण का श्रमसाध्य कार्य करना आवश्यक था. लेकिन इन संकल्पवान लोगों की माली हालत भी अच्छी नहीं थी. वे खुद मजदूरी कर गुजारा करते थे. उनका इस सामुदायिक स्वैच्छिक काम में ज्यादा समय लगने से उनके सामने रोजी-रोटी का संकट पैदा हो रहा था क्योंकि इससे उन्हें आर्थिक मदद तो नहीं ही मिलती थी, उल्टे अपने संसाधन इसमें लगाने पड़ रहे थे. इसके लिए कुछ कर्ज भी लिया गया.

शुरूआत में गांव के लोगों ने इस सार्थक पहल का मजाक उठाया. कुछ ने कहा कि यह ऊंट के पीछे नशेनी यानी सीढी लगाने का काम है, जो असंभव है. यानी पहाड़ से खेतों तक पानी लाना टेढी खीर है. फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और यह काम जारी रखा.

इस जनोपयोगी पहल से सक्रिय रूप से जुड़े लालजी कहते हैं कि “ हमने इस काम की प्रेरणा गांव के ही एक बुजुर्ग से ली थी, जिन्होंने कुंभाझिरी नदी से अपने खेत तक पानी लाया था. यह बात करीब 40-45 साल पुरानी है. फिर हम 16 लोगों ने इस काम को करने की ठानी. जिसे हमने एक साल में पूरा कर लिया. जिन लोगों को शुरू में हम पर इस काम को करने का विश्वास नहीं हो रहा था, बाद में वे भी हमारे साथ हो गए.”

जंगल और पहाड़ के बीच स्थित गांजाकुंवर नदी से पानी लाने के लिए खेतों तक नाली बनाने का बड़ा और कठिन काम शुरू किया गया. ऊंची-नीची पथरीली जमीन में नाली निर्माण होने लगा. कहीं कई फुट गहरी खुदाई की गई तो कहीं बड़ी-बड़ी चट्टानों और पत्थरों को फोड़ा गया. कहीं पर पेडों के खोल से छोटा पुल बनाया गया तो कहीं नाली पर भूसे और मिट्टी का लेप चढ़ाया गया. पत्थरों की पिचिंग की गई,जिससे पानी का रिसाव न हो. और इस प्रकार, अंतत: ग्रामवासियों को 5 किलोमीटर दूर से अपने खेतों तक पानी लाने में सफलता मिली. इस काम में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

पहाड़ से उतरे सरपट पानी से सूखे खेत तर हो गए. गेहूं और चने की हरी-भरी फसलें लहलहा उठीं. भुखमरी और कंगाली के दौर से गुजर रहे कोरकू आदिवासियों के भूखे पेट की आग शांत हो गई. लोगों के हाथ में पैसा आ गया. वे धन-धान्य से परिपूर्ण हो गए.

यहां सभी ग्रामवासियों को नि:शुल्क पानी उपलब्ध है. पानी के वितरण में प्राय: किसी प्रकार के झगड़े नहीं होते हैं. अगर कोई छोटा-मोटा विवाद होता भी है तो उसे शांतिपूर्ण ढंग से सुलझा लिया जाता है.

इस संबंध में लालजी बताते हैं- “यहां सबके खेतों को पानी मिलेगा, यह तय है. यह हो सकता है कि किसी को पहले मिले और किसी को बाद में, पर मिलेगा सबको. फिर विवाद बेमतलब है. इसके अलावा, नाली मरम्मत का कार्य भी मिल-जुलकर किया जाता है. आज गांव में दो नालियां गांजाकुंवर नदी से और तीन नालियां कुंभाझिरी नदी से आती हैं. कुल मिलाकर, पूरे गांव के खेतों में सिंचाई की व्यवस्था हो गई है.”

रांईखेड़ा की तरह वनग्राम आंजनढाना में भी खुद की सिंचाई की व्यवस्था है. बल्कि आंजनढाना में यह व्यवस्था रांईखेड़ा से पहले की है. रांईखेड़ा और आंजनढाना के बीच में भी कुछ मील का फासला है.

गांववासियों का कहना है कि यहां के पल्टू दादा ने बहुत समय पहले इसकी शुरूआत की थी. वे ढोर चराने का काम करते थे. और जब वे सतधारा नाले में ढोरों को पानी पिलाने जाते थे तब वे वहीं पड़े-पड़े घंटों सोचा करते थे कि काश! मेरे खेत में इस नाले का पानी पहुंच जाता, तो मेरे परिवार के दिन फिर जाते.

आदिवासी जंगल और वन्य जीवों को बिना नुकसान पहुंचाये उनके साथ सामंजस्य बना कर रहते आये हैं और आज उन्हें ही प्रकृति का विरोधी साबित करने की कोशिश हो रही है.


इसके लिए उन्होंने सतत् प्रयास किए. शुरूआत में नदी पर दो बांध बांधने की कोशिश की पर कामयाब नहीं हुए. वे अपने काम में जुटे रहे और अंतत: उन्होने अपने बाडे में पानी लाकर ही दम लिया.

शुरूआत में उन्होंने सब्जियां लगाईं- प्याज, भटा, टमाटर, आलू, मूली वगैरह. फिर गेहूं बोने लगे. पल्टू दादा के बेटे बदन सिंह ने बताया कि आज हम उनकी वजह से भूखे नहीं हैं. गांव भी समृद्ध है. पहले हम सिर्फ बारिश में कोदो, मक्का बोते थे. अब गेहूं- चना की फसल ले रहे हैं. गांव के लोगो को भी पानी मिल रहा है.

इस बहुमूल्य व सार्थक पहल में रांईखेड़ा, आंजनढाना के बाद कोसमढोड़ा, तेंदूखेड़ा और नयाखेड़ा जैसे कुछेक गांव के नाम और जुड़ गए हैं. इस तरह प्यासे खेतों में पानी देकर अन्न उपजाने की यह पहल क्षेत्र में फैलती जा रही है. हालांकि आंजनढाना में पक्की नाली का निर्माण वनविभाग के मारफत करवाया गया है लेकिन रांईखेड़ा में यह काम अब तक नहीं हो पाया है. गांववालों का कहना है इसके लिए स्वीकृति मिल चुकी है फिर भी इसे लटकाया जा रहा है.

कुल मिलाकर, इस पूरी पहल से कुछ बातें साफ तौर पर दिखाई देती है.एक तो यह पूरा काम प्रकृति और पर्यावरण से सामंजस्य बनाकर किया गया क्योंकि आदिवासियों का प्रकृति से गहरा रिश्ता है. वे जंगल और वन्य जीवों के सबसे करीब रहते आए हैं. उन्हें इसकी जानकारी है. और इस पूरे काम में न तो परिवेश को नुकसान पहुंचा, न जंगल को और न ही किसी वन्य जीव को. इसमें सिंचाई के लिए पानी लाने में किसी बिजली की जरूरत भी नहीं पड़ी. लिहाजा बिजली तार भी नहीं खींचे गए. और न हीं डीजल ईंजन की आवश्यकता पड़ी. कोई ध्वनि प्रदूषण भी नहीं हुआ.

इस तरह प्रकृति, वन्य जीव और जंगल का संरक्षण करते हुए कृषि के लिए पानी की व्यवस्था करना बहुत ही सार्थक व बहुमूल्य काम है. ऐसे गांवों को विस्थापित करने के बजाए सरकार उनकी मदद वन और वन्य जीवों के संरक्षण में मदद ले सकती है. शर्त केवल इतनी भर है कि उसे अपनी नियत ठीक रखनी होगी. क्योंकि अभी तो वनविभाग इन गांवों के विस्थापन की बात कर रहा है जिससे गांव के लोगों का नजरिया वनविभाग के प्रति दूसरा हो सकता है. लेकिन अगर वह अपना रूख बदलें और गांव के लोगों की जंगल और वन्य जीवों के संरक्षण में मदद मांगे तो वे मददगार हो सकते है.

 

16.07.2009, 12.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

deepali (deepalishukla99@yahoo.com) shukla

 
 जहाँ चाह वहाँ राह। यदि हौंसला बुलन्द हो तो हर मुश्किल हल हो जाती है। इससे बाकी लोगों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए। 
   
 

अजय बुवा (ajaybuwa@gmail.com) नई दिल्ली

 
 इतिहास गवाह रहा है की जब जनता ठान लेती है तो उसे किसी सरकारी मशनरी की जरुरत नही पडती. वही सरकार बन जाती है, अपना निर्णय लेती है. लेकीन यह सब होता है जरूरत पडने पर.

अगर भविष्य की नीव रखनी है तो जरुरत का विचार छोडके आनेवाली पिढियो को अच्छी विरासत देने के लिए इस तरह के कार्य जरुरी है. मध्यप्रदेश के इन आदिवासीयो ने हमे यही सिखाने की कोशिश की है. अब यह हमपे निर्भर है की इसका सामना हम कैसे करते है ध्यान दे के या अनजान बन के?
 
   
 

suresh chandra gohil PUNE

 
 अगर इस गांव की तरह ही देश के दूसरे हिस्सों में भी लोग सरकार का भरोसा छोड़ कर अपने दम पर काम करने लगें तो देश में सब बातों के लिए मचने वाला रोना-धोना बंद हो जाएगा. 
   

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