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सच का सामना

बात निकलेगी तो...

 

सच का सामना

प्रीतीश नंदी



आज इस लेख को लिखने की वजह एक नया टीवी शो है, जिसमें कोई भी प्रतिभागी 21 सवालों का जवाब देकर एक करोड़ रुपए जीत सकता है. शर्त यह है कि उसे शो में पूछे गए इन सवालों का जवाब बिलकुल सच देना होगा. एक पॉलीग्राफ टेस्ट उनकी सत्यता की जांच करेगा. आपने एक झूठ बोला और आप इस गेम शो से बाहर.

सच का सामना


वास्तव में हम सच्चाई को हमेशा से ही पूजते चले आ रहे हैं. हमें जन्म से ही सिखाया जाता है कि हम सच बोलें और हमेशा इस पर कायम रहें. हमारा न्यायशास्त्र सच पर निर्भर है. हमारे जीवन मूल्य सच पर निर्भर हैं. हमारे धर्मों ने सच को सदैव अक्षुण्ण रखा और बेचारे युधिष्ठिर को अपने स्वर्ग जाने की राह में महज इसलिए दंडित किया गया कि वे अपने जीवन में सिर्फ एक बार और वह भी महाभारत के भीषण युद्ध के दौरान सत्य के मार्ग से थोड़ा सा भटक गए थे.

सच्चाई किसी भी न्यायिक और सभ्य सामाजिक व्यवस्था की बुनियाद है. यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को इतना महत्वपूर्ण माना जाता है. किसी न किसी को कहीं न कहीं हमेशा सच्चाई की खोज में लगे रहना चाहिए, ताकि झूठ का पर्दाफाश किया जा सके, न्याय किया जा सके और अच्छाई की बुराई पर जीत हो.

सच्चाई के व्योम में ही अच्छे लोग रहते हैं. अदृश्य सींग और पूंछ वाले बुराई के पुतले झूठ की अंधेरी कंदराओं में मंडराते रहते हैं. यही वह परिकल्पना है जो सच और झूठ के मध्य समग्र बहस को प्रेरित करती है. यह अच्छाई और बुराई के बीच एक शाश्वत जंग है.

इस संदर्भ में मेरी राय कुछ जुदा है. मुझे लगता है कि इसका बुनियादी आधार ही गलत है. सच और झूठ अपने आप में कोई नैतिक मसला नहीं है. आप सच या झूठ के साथ क्या करते हैं, यही मायने रखता है. एक अकेला सच हजारों लोगों की मौत का कारण बन सकता है. एक छोटा सा झूठ हजारों लोगों को बचा सकता है. कुछ ऐसे जर्मन थे जिन्होंने अपने यहूदी पड़ोसियों के बारे में झूठ बोला और उन्हें नाजियों से बचा लिया.

गुजरात दंगों के दौरान कई हिंदुओं ने अपने मुस्लिम मित्रों के बारे में झूठ बोलते हुए उनकी जान बचाई. उड़ीसा में ऐसे आदिवासी रहे हैं जिन्होंने तब झूठ बोला जब हत्यारे ईसाइयों को तलाशते हुए उनके पास आए. उन्होंने खुद के साथ-साथ दूसरों को भी बचाया. जब भीड़ हिंसा पर उतारू हो, तब एक छोटे से झूठ का भी बहुत महत्व होता है. ऐसे में कोई मूढ़मति आगे आकर सच उगल दे, तो वह सबको खतरे में डाल देता है.

मेरे विचार से सच को आज के मूल्यों के कमजोर परितंत्र से हटा देना चाहिए. यह न तो महत्वपूर्ण है और न ही अच्छा है. यह सिर्फ एक घिसी-पिटी बात है. जब इससे कुछ अच्छा होता है तो आप इसका बचाव करें. जब इससे किसी को नुकसान पहुंचे तो आपको कोई बेहतर विकल्प तलाशना चाहिए.

यदि आप इतने मूरख हैं कि पॉलीग्राफ टेस्ट की गिरफ्त में आए बगैर झूठ नहीं बोल सकते, तो कृपया चुप बैठें. खुद को सत्यनिष्ठ समझते हुए ऐसा सच न उगल दें, जिसकी वजह से दूसरों को समझौते करने पड़ें. हालांकि इसकी वजह से आपको अपना सीना फुलाने का मौका मिल जाए कि आप नाजुक क्षणों में सच के साथ खड़े रहें, लेकिन किसी भी सभ्य नागरिक को यह अधिकार नहीं है कि वह दूसरों को जोखिम में डाले.

क्या मैं एक नई जीवन शैली के तौर पर झूठ की पैरवी कर रहा हूं? ऐसा बिलकुल नहीं है. मेरे कहने का आशय सिर्फ यही है कि जब आप सच बोल सकते हैं तो सच ही बोलें. झूठ तब बोलें जब यह बेहतर विकल्प हो. इसमें कुछ भी नैतिक या अनैतिक नहीं है. झूठ बोलने के लिए भी उतने ही साहस की जरूरत होती है जितना कि सच बोलने के लिए होती है और यदि आप नैतिक छलावे को हटा दें तो फिर इन दो के बीच चयन के लिए ज्यादा कुछ नहीं रह जाता.

लोग टीवी पर आकर इस भरोसे के साथ अपनी जिंदगी से जुड़ी हकीकत का खुलासा करते हैं कि उनके मित्र, पत्नी, बच्चे और समाज लाखों दर्शकों के सामने सच उगलने के लिए उनका सम्मान करेंगे.


क्या आप किसी गंभीर रोगी के समक्ष यह सच बोलेंगे कि उसके पास जीवन के सिर्फ 12 घंटे शेष हैं या फिर उससे झूठ बोलते हुए उसे उम्मीद बंधाएंगे कि वह अपनी अंदरूनी शक्ति के बल पर अपनी बीमारी पर काबू पा सकता है? मैंने ऐसे लोगों से झूठ बोला, जिनसे मुझे प्यार था और इस झूठ की वजह से उन्हें अपनी बीमारियों से उबरते हुए भी देखा, जबकि डॉक्टर अपनी ओर से जवाब दे चुके थे. मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि कई लोग जानलेवा बीमारी से जूझने के लिए जरूरी अपनी इच्छाशक्ति को सिर्फ इस वजह से छोड़ देते हैं क्योंकि उनके इर्द-गिर्द रहने वाले मूढ़मति लोग उन्हें चिकित्सकीय सच्चाई बताने में लगातार मशगूल रहते हैं.

यहां से मैं अपनी अगली बात पर आता हूं. नहीं, मैं आपको गीता या बाइबिल की बातें बताकर बोर करने नहीं जा रहा हूं. इतने सालों तक इस दुनिया में रहने के बाद मैं समझता हूं कि सच और झूठ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. आप इस सिक्के का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, आखिरकार यही बात मायने रखती है.

मैंने हमेशा सच को उतने ही भरोसे के साथ बोला है, जितनी दृढ़ता के साथ कभी कभार झूठ बोला है. इसकी कला इस बात में निहित है कि आप जो कहते हैं उसमें भरोसा करें, फिर यह वैसा ही हो जाता है जैसा आप इसे बनाना चाहते हैं. न तो सत्य के बारे में कुछ संपूर्ण है और न ही झूठ के बारे में.

पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है, इस बात को पहले-पहल एक झूठ के तौर पर लिया गया और गैलिलियो को इस बात के लिए कानून के तत्कालीन रखवालों द्वारा मौत की सजा सुना दी गई. बाद में जाकर वैज्ञानिक जांच से यह सिद्ध हुआ कि गैलिलियो ने सच कहा था. चर्च झूठा पाया गया. ऐसा जान-बूझकर किया गया या फिर अनजाने में, यह जानना इतिहासकारों का काम है.

वास्तव में सभी तरह के इतिहास झूठे हैं. ये इतिहास विजेताओं और संतचरित लेखकों द्वारा लिखे गए. फिर भी हम इन पर भरोसा करते हैं और इसको लेकर लड़ते भी हैं. यदि यह मूर्खता नहीं है तो फिर क्या है. चलिए मैं बताता हूं कि यह मूर्खता क्या है.

ये अच्छे-अच्छे जो लोग टीवी पर आकर इस भरोसे के साथ अपनी जिंदगी से जुड़ी हकीकत का खुलासा करते हैं कि उनके मित्र, पत्नी, बच्चे और समाज लाखों दर्शकों के सामने सच उगलने के लिए उनका सम्मान करेंगे. ऐसा कोई नहीं करेगा. जैसे ही वे उस एक करोड़ के चेक के बगैर घर वापस लौटेंगे, वे सबके निशाने पर आ जाएंगे. क्षमा संबंधी तमाम आश्वासन ध्वस्त हो जाएंगे. उन्हें अपनी बाकी जिंदगी इसी तरह अपमान के साथ गुजारनी होगी.


23.07.2009, 20.42 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

नवीन कुमार"रणवीर" (ranvir1singh@gmail.com) किशन गंज दिल्ली-7

 
 सच का सबसे बड़ा सामना खुद से होता है। सच की खोज में जीतनें भी लोग निकले उनकी किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं रही, जवाबदेही केवल खुद से होती है। सच खुद को पता होना चाहिए बस और खुद को यदि लगता है कि आपनें किसी को दुखी करके भी सच बोला है और आपके एक झूठ से किसी को खुशी मिली, या आपकी सच्चाई केवल अपनें स्वार्थ मात्र के लिए है तो वो भी अपनें-आप में सच है

आपका सच आपके निजी स्वार्थ का सच इंसान के चरित्र की ऐसी ग्रंथी है जो कि उसे स्वीकार्य और अस्वीकार्य बनाती है, किसी के द्वारा दिया गया धोखा या कपट किसी को स्वीकार्य होता है किसी को नहीं, जिसे स्वीकार्य होता है वो जानता है कि क्या कारण रहा होगा दूसरे व्यक्ति के धोखे का।
जिसे अस्वीकार्य होता है वो ऐसे व्यक्ति से उचित दूरी रखता है और चाहता है कि मैं जैसा हूं वैसे ही व्यक्ति उससे संपर्क करे या उस परिधि में आएं जिसमें की वो अपना जीवन-यापन करना चाहता है। हम जो हैं वो हम स्वीकार करते हैं, जो हम नहीं है वो हमें स्वीकार्य नहीं होता, ये गुण भी इसी दुनिया से सीखा होता है।
 
   
 

Fakeer Mohammad Ghosee (fmghosee@gmail.com) Falna (Rajasthan)

 
 बहुत बढ़िया. लगे रहो. 
   
 

mustqeem khan (mustqeem.1988@gmail.com) delhi

 
 It is a very good report for the our Indian audience. And also good for the our new generation. 
   
 

TRIPTI new delhi

 
 All the posts are a simple manifestation of the fact that how restricted our thinking has become. although i don't watch the show, but incidentally i got to see the last episode. i can only say that if the programme is aimed at getting the truth from people, then what do you expect?

आपने परीक्षा में चीटिंग करके अच्छे नंबर लिए थे, या मम्मी से छुप के सिगरेट पी थी. इन सचों को जाहिर करके आप बहुत हिम्मत का काम करेंगे. अगर एक करो़ड़ जीतने हैं तो फिर सच भी उसी लेवल का बोलना पडेगा.

Whatever, the only point is if you dont like the programme dont watch. but do watch your kids because even if they are not watching this programme you cannot be sure that their minds are not being corrupted by some other thing.

HOW MUCH CARE DO YOU TAKE TO GET YOUR CHILD A GOOD LITERATURE OR HAVE YOU GONE THAT EXTRA STEP TO INCULCATE IN THEM A GOOD HABIT OF READING, WRITING OR MUSIC. we cannot held others responsible for giving our children good culture. IT IS OUR RESPONSIBILITY, NOT THE TV CHANNEL'S.
 
   
 

Pradeep Kant (kant1008@rediffmail.com) Indore

 
 Of course, if one lie can save the any innocent life then it is always better to speak lie instead of truth but it is not applied in the case of this serial. For this, we should also be agree with the questions asked by Aniket ranjan from Delhi.

And I don't know what is the need of these kind of bogus serials? We have many good things to read, listen and see, are we not wasting our time?
 
   
 

dixit (bijayamd@gmail.com) US

 
 जिस देश का इतिहास ही झूठ पर आधारित हो, वहां सच के लिए गुजरात दंगे का उदाहरण आपने दिया, मगर स्वराज प्राप्ति के समय की मानवा जाति की भयावह त्रासदी और करोड़ों की हत्या के लिए बापू कितने जिम्मेवार थे, कांग्रेस कितनी दोषी थी, इस बारे में आप क्या कहेंगे ? 
   
 

anand appolo (anand.appolo@gmail.com) delhi university

 
 मेरा मानना है कि सच का सामना में सवाल ही पूछे जाते हैं ना कि कोई गलत काम करने के लिए कहा जाता है. मैं लोकतंत्र का बचाव नहीं लेना चाहूंगा लेकिन यह पक्की बात है कि अगर आपको डर, शर्म ये नापसंद है तो मत देखिए. जब कोई जानना चाहता है और उसको ऐतराज नहीं है तो हमें भी मज़ा ही लेना चाहिए ना कि बुदबुदाना चाहिए, हालांकि अगर इस पर राजनेताओं को लिया जाता तो अच्छा होता. 
   
 

Puneet K Malaviya (puneet.kumar21@gmail.com) Allahabad

 
 It was quite on expected lines. Pritish Nandy is no doubt an excellent writer, a celebrity, a page 3 figure but how mischievously he has delivered his thoughts on sach ka saamana ..

By quoting examples of Mahabharata, Galileo, Gujarat riots what exactly he wants to convey?

Is he trying to justify what is being shown on that porn type program?
Merely talking about ethics and advocating indecency in any form has become fashion in affluent society. This is quiet evident from the post.

What exactly is required a clear cut policy a self imposed restriction or a proper censor board. Until then we have to bear such kind of shame less, so called bold and cheap quality programmes on our TV sets.
 
   
 

Saikat Ghosh (saikat_ghosh@rediffmail.com) Delhi

 
 इस धारावाहिक का नाम 'सच का सामना' से बदल कर 'शर्म से सामना' कर देना चाहिए. 
   
 

Gauri Singh Kanpur

 
 'मोमेंट ऑफ ट्रुथ' की यह नकल हिंदुस्तान में बंद होनी चाहिए या फिर इसे सिनेमाघरों में ए सर्टिफिकेट के साथ दिखाया जाना चाहिए. 
   
 

Aniket ranjan Delhi

 
 सवाल केवल झुठ और सच का नहीं है. इस धारावाहिक के सवालों पर जरा गौर करें-
- आपने अबतक जितनी लड़कियों के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं, उनके नाम आपको याद हैं ?
- क्या शादी के बाद आपने अपनी पत्नी के सिवा दूसरी लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं ? (पूर्व टेस्ट क्रिकेटर विनोद कांबली से पूछे गए सवाल).

क्या आपसे मिलनेवाला हर शख्स आपसे शारीरिक संबंध बनाना चाहता है ? क्या आप नाबालिग थीं , तभी प्रेगनंट हो गई थीं और आपको कॉलिज से बाहर निकाल दिया गया था ? (उर्वशी ढोलकिया से पूछे गये सवाल).

अगर आपकी बीवी को पता नहीं चले तो आप दूसरी लड़की के साथ शारीरिक संबंध बनाना चाहेंगे ? क्या आप लड़की को किस करने के लिए लेडिज़ टॉइलट में गए हैं ? (ऑल्विन डिसूज़ा से पूछा गया सवाल).

मतलब साफ है कि सेक्स और व्यक्तिगत जीवन के सवाल इस तरह पूछे जाएं कि युवा वर्ग इसमें औऱ मजा ले और समाज में यौन कुंठा और बढ़े.
 
   
 

Sanjay Kumar sinha Nawada, Bihar, India

 
 लगता है प्रीतीश जी इस मुद्दे पर चर्चा के साथ-साथ भारतीय परंपरा को भी गलत ठहराने पर तुले हुए हैं. झुठ बोलना कभी भी नैतिक नहीं हो सकता और आप तो इस लेख के बहाने इसे ही स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं. आपने जिस तरह के विचार दिए हैं, उसके अनुसार तो देश में किसी भी तरह के संस्कार और नियमों की जरुरत ही नहीं है. कोई मर्यादा चाहिए ही नहीं. लेकिन प्रीतीश जी, अगर ऐसा होने लगे तो दुनिया रसातल में चली जाएगी और यह विवेकशील जानवार तो जैसी मर्जी वैसा करने लगेगा. 
   
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