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मुख्यमंत्री रमन सिंह के नाम खुला पत्र

छत्तीसगढ़ / बात निकलेगी तो...

 

मुख्यमंत्री रमन सिंह के नाम खुला पत्र

 

25 जुलाई 2009, रायपुर

 

मुख्यमंत्री जी,

राज्य के पुलिस प्रमुख और अन्य प्रशासकीय तथा राजनीतिज्ञ सलाहकारों से सहमत होते हुए बुद्धिजीवियों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को लगभग उलाहने के स्वर में आपने यही बार-बार आव्हान किया है कि वे राज्य सरकार की आलोचना करने के बदले नक्सलियों के खिलाफ क्यों नहीं लिखते. आपकी 'रियाया' होने के कारण मैंने इस सलाह पर अमल किया है और समाचार पत्र इसके प्रमाण हैं.

रमन सिंह, मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़

 

यह अलग बात है कि नक्सली हिंसा के बरक्स राज्य की हिंसा एक बड़ा खतरनाक प्रयोग है जो आज़ादी के बाद से ही भारत की चिंता का विषय रहा है. छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद नासूर की तरह फैल गया है. वह मलेरिया के बुखार की तरह आए दिन मनुष्यता को ही तबाह करता है और बाकी दिन जब ऐसे बुखार की तरह तापमान छोड़ देता है जिसे सामाजिक थर्मामीटर माप नहीं पाता, तब सरकारी तंत्र के अत्याचार बदस्तूर कायम रहते हैं.

मुख्यमंत्री जी, बुद्धिजीवी, मानव अधिकार कार्यकर्ता, लेखक और कलाकार किसी कौम, वंश या प्रतिबद्धता के नहीं होते. यदि होते हैं तो उनकी अभिव्यक्ति भोथरी हो जाती है. यह सुनना अच्छा लगता है कि राज्य सत्ता बुद्धिजीवियों को तुरही बजाकर विचारों के मूल्य युद्ध में जुट जाने का आव्हान करती है. क्या राज्य और बुद्धिजीवियों का इतना ही रिश्ता है कि बुद्धिजीवी केवल राज्य के कहने पर सरकारी अजान दें और राज्य एक बौद्धिक नूराकुश्ती या हमख्याली की खबरें प्रकाशित करता रहे. क्या राज्य ने कभी बुद्धिजीवियों से सहकार करने की कोशिशें की हैं? छत्तीसगढ़ निर्माण के बाद किसी सरकार ने कभी राज्य के हालात और भविष्य को लेकर अभिव्यक्ति के सिपाहियों से बात तक करने की जरूरत नहीं समझी.

मानस-पुत्रों से मेरा आशय केवल उन कथित रचनाधर्मियों से नहीं है जो राज्य सत्ता पर निर्भर रहे बिना अपने अभिव्यक्त होने को निरर्थक मानते हैं. समाज के चिंतकों में सेवा निवृत्त बुजुर्गों, अध्यापकों, लेखकों, कलाकारों, सेवानिवृत्त फौजी और पुलिस अधिकारियों, शिक्षित उद्योगपतियों, खिलाड़ियों, अर्थशास्त्रियों, समाज सेवकों, राजनीति से तौबा कर चुके अनुभवी जनसेवकों, प्रबुद्ध महिलाओं, वैज्ञानिक नवोदय के तीक्ष्ण बुद्धि के युवजनों, विधि विशेषज्ञों, चिकित्सकों, इंजीनियरों तथा प्रयोगधर्मी कृषकों आदि की जमात से है. वे किसी भी सभ्य समाज की रचना, निरंतरता और विकास के स्थायी आधार स्तंभ होते हैं. आप छत्तीसगढ़ के माटी पुत्र होने के नाते हमारी स्थायी संपत्ति हैं. आयुर्वेदिक डॉक्टर के रूप में आप एक जागरूक जनसेवक हैं. राजनीतिज्ञ के रूप में आपने स्वेच्छा से एक बड़ी भूमिका का चुनाव किया है. लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी एक संयोग है. आपमें छत्तीसगढ़ के लिए ढेरों चिंताएं होंगी लेकिन छत्तीसगढ़िया होने से जो अनुभूति होती है, उसे मुख्यमंत्री की अभिव्यक्ति बनते बहुत गड़बड़ हो जाती है.

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मुख्यमंत्री जी, हमारे संविधान में राज्यपाल नामक पद है जिस पर यह बाध्यता है कि वह मंत्रि परिषद की सलाह से काम करेगा सिवाय कुछ महत्वपूर्ण मसलों को छोड़कर. मंत्रि परिषद पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है. कार्यपालिका के रूप में उसे नौकरशाहों को निर्देश देने के अधिकार हैं उनसे निर्देशित होने के नहीं. लेकिन अमूमन मंत्रि परिषदें नौकरशाहों पर उसी तरह निर्भर हो जाती हैं जिस तरह किसी भवन का प्रथम तल निर्भर होता है भूतल पर. यह क्यों होना चाहिए और क्यों हो रहा है? नक्सल समस्या को ही लें. सरकारी फाइलों पर ऊपर लिखित सभी तरह के नागरिकों और विधायिका के प्रतिनिधियों से सलाह मशविरे और उनकी भूमिका का नगण्य उल्लेख मिलेगा. उसमें नौकरशाही और पुलिसिया सिफारिशों की भरमार होगी. केवल क्रियान्वयन के अर्थ में नहीं सलाह देने के अर्थ में भी. नक्सल समस्या एक प्रदूषण है. वह प्रत्येक छत्तीसगढ़वासी के जीवन को तकलीफदेह बना रही है. जो भुक्तभोगी हैं उनसे क्या कभी कुछ मशविरा किया जाता है? या उन्हें इस लायक भी समझा जाता है?

मुख्यमंत्री जी, यह आई ए एस और आई पी एस क़ी नौकरशाही सड़ी गली अंग्रेज व्यवस्था की देन है. गांधी जी ने इसका विरोध किया था और मौजूदा संसदीय पद्धति का भी. बीसवीं सदी की दुनिया की सबसे मशहूर कृति 'हिंद स्वराज' में तत्कालीन भारत की खस्ता हालत का उस ऐतिहासिक परेशान दिमाग व्यक्ति ने जो खाका खींचा था उसमें भविष्य के भारत के बीजाणु भी छितराए थे. क्या हमारी सरकारें जनता के साथ किया जाने वाला सलूक 'हिन्द स्वराज' के प्रस्थान बिन्दु के साथ स्वीकार करना चाहेंगी? भारतीय संसदीय पद्धति में चुनाव जीतना और कुर्सियों पर फिट होना दुर्घटना, भाग्योदय या संयोग है. बर्फ की सिल्लियों को चट्टान समझने की भूल की जाती है. जो नागरिक हैं उन्हें केवल मतदाता समझ लिया जाता है. देश में भूकंप, बाढ़ या ज्वालामुखी फट पड़ने पर तबाही का शिकार जनता होती है. राजनेता उससे धैर्र्य रखने की अपीलें करते हैं. वह टैक्स देती है. भुखमरी झेलती है. महंगाई से कराहती है. आत्महत्या करती है. राजनीतिक क्षय के रोग के कारण पीली पड़ती चली जा रही है लेकिन यदि वह उफ करती है तो उसे बगावत समझ लिया जाता है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ABDUL ASHIF KHAN (ashif@gmail.com) KAWARDHA

 
 आपने सही कहा है कनक तिवारी जी, नौकरशाही ने नक्सलवाद को बढ़ावा दिया है. अभी हाल ही में मुख्यमंत्री के गृह जिले राजनांदगांव के मदनवाड़ा में नक्सली हमला हुआ, जिसमें एसपी समेत कई जवान शहीद हो गए.

इसमें एक गौर करने वाली बात है कि अचानक आईजी मुकेश गुप्ता राजनांदगांव जाते हैं और वो भी मदनवाड़ा फिर तीन दिन बाद वहीं हमला होता है. एसपी साहब मोरचा संभालते शहीद हो जाते हैं और सब हो जाने के बाद आईजी साहब फिर पहुँचते हैं. थोड़ा सोचने का विषय है. आप अगर इस बारे में भी कुछ लिख सकें तो अच्छा होगा.
 
   
 

p.c. rath (pckanker@gmail.com) raipur,

 
 ऐसी कोई भी आशा इन सरकारों के साथ मत रखें कनक जी. ये खुद चुनाव में शराब बाटेंगे और खुद नशा मुक्ति रैली निकालेंगे! ऐसा इनका व्यक्तित्व है ...फ़िर रमन चालीसा और विश्वरंजन उपनिषद पढने वाले कलमवीर भी कम नही है ?

जब विपक्ष ना चिल्लाये तब ये कहेंगे विपक्ष कुछ नही कहती. जब विपक्ष चिल्लाने लगे तब भी यही कहेंगे कि विपक्ष को सिर्फ़ चिल्लाना आता है और कुछ नही. आज रमन सिंह जी नक्सलियो के खिलाफ़ लिखने के लिये बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य कस रहे है,जब सलवा-जुडुम जैसे प्रयोग किये तब किसी बुद्धीजीवी से सलाह ली ? सिर्फ आरएसएस से ली. ये सिर्फ़ माटी के शेर है .
 
   
 

jay prakash singh (jpsh.pol) new delhi

 
 कनक जी, आपलोग क्यों नहीं मानते कि माओवाद एक संगठित अपराध बन चुका है. असंतोष को हिंसा में बदलने के लिए दर्शन मत गढ़िए. चीन से आई बौद्धिकता को कब तक ढोएंगे.
आदिवासियों के सशक्तिकरण का काम केवल एक-47 से नहीं हो सकती. स्कूल से भी हो सकता है, जो कि माओवादी खोलने नहीं देते. राज्य की हिंसा की आड़ में कितने मुद्दों को छुपाया जा सकता है?
 
   
 

डॉ.लाल रत्नाकर (ratnakarlal@gmail.com) गाजियाबाद |

 
 कनक तिवारी जी के खुले पत्र ने जिस तरह माननीय रमन सिंह के सिंहासन के महिमा मंडन के हर पेंच पर प्रहारनुमा आलेख खुले पत्र के रूप में लिखा है काश मुख्यमंत्री जी उसे पढ़ पाते.

रमन सिंह जी ने कोई गुनाह नहीं किया है मुख्यमंत्री बनकर. बेचारे नौकरशाह अपने कुकर्मो पर इस तरह के खुले पत्र कैसे मुख्यमंत्री तक ले जा सकते है, रविवार या प्रिंट मिडिया से शायद ही सरोकार हो मुख्यमंत्री जी का,या है तो अच्छी बात है-काश कनक तिवारी जी जैसे लोग एक बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ पाते और बुद्धिजीवियों को जोड़ पाते. पता नहीं कनक जी दिल्ली की तरफ कभी आये है या नहीं जैसा की उन्होंने लिखा है कि वह ''हमने ठीक तरह से आज तक मुख्यमंत्री निवास और मंत्रालय देखा तक नहीं है'' मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच जिनकी है, वह आप जैसे नहीं रह पाते. वह जगह ही ऐसी है, जो वहां पहुच गया वह रमन सिंह न हो पर उन जैसा तो हो ही जाता है.

फिर भी तिवारी जी का 'मानव' कहीं बचा है इसके लिए साधुबाद. यदि नेता आप जैसो की सुन ले तो ढपली लेकर सड़क पर आ जायेगा और बुद्धिजीवी मंत्रालयों में, नौकरशाह रचना कर्मी और ............फिर शुरू होता अलग तरह का प्रलाप, पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र आपके अविभाजित प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं, 1963 से 1967 एवं 1967 से 1967 तक. पता नहीं तब कितने आदिवासियों का उत्थान की योजनाये बनी थी ?

जो भी हो तिवारी जी यह बदलता हुआ देश है. श्री जसवंत सिंह जी ने जिन्ना पर किताब क्या लिख दी. भाजपा ने उन्हें पार्टी से निकल दिया.क्या चाहते हैं रमन सिंह को छत्तीसगढ़ से निकलवाना. ये 'जय श्री राम' के नाम पर वोट मिलता है आखिर राम के दुर्दिन में यही जंगली राम के काम आये थे.
 
   
 

शरद कोकास (sharadkokas.60@gmail.com) दुर्ग

 
 राज्य के बुद्धिजीवियों को भी उनके कर्तव्य की याद दिलाना ज़रूरी है .नये राज्य निर्माण् के पश्चात उनकी जो भूमिका होनी चाहिये थी वह उन्होने स्वयं तय नही की उसका निर्वाह तो दूर की बात है तात्कालिक सुख-सुविधायें प्राप्त करने के नाम पर शर्मनाक समझौते किये गये पत्रिकाओं के लिये विज्ञापन,कार्यक्रमो के लिये राशि,

इन सब की धुन्ध मे उन्हे अपना व राज्य का भविष्य नही दिखाई दिया .आज जो स्थिति है वह स्वयं उनके द्वारा निर्मित है . इसलिये अब नये सिरे से इस पर विचार करने की ज़रूरत है.हाँलाकि जिन्हे सुविधाओं की आदत पड गई है वे विचार को भी त्याग चुके है और आत्ममुग्ध है . आपने इस तालाब के शांत जल में कंकर फेंका है इसके लिये साधुवाद अब लहरें उठने की प्रतीक्षा करें.
 
   
 

ASHISH TIWARI (ashishk700@gmail.com) HYDERABAD

 
 कनक जी आपके विचार बहुत अच्छे हैं. ये छ्त्तीसगढ़ का सौभाग्य है कि आप जैसे विचारक और चिंतक इस प्रदेश को मिले. उम्मीद की जानी चाहिए की इन सलाहों पर डॉक्टर रमन जरूर विचार करेंगे. 
   
 

uday (shyamkoriuday@gmail.com) bilaspur

 
 नक्सली समस्या के सामने सब बौने दिख रहे हैं, कोई कारागार योजना दिखाई नहीं पड़ती, सही मायने में कहा जाए कोई गंभीर नहीं जान पड़ता.  
   
 

anil pusadkar Raipur

 
 तिवारी जी समय समय की बात है। सारे बयान सारे दृष्टिकोण सत्ता में आपकी भूमिका से तय होते हैं।राज्य मे आप सत्ता में हैं तो आप बचाव में होते हैं और अगर विपक्ष में हैं तो सारे हथियारों का खुल कर प्रयोग करने की छूट होती है।

आज कांग्रेस इतना चिल्ला रही है, क्या इनके कार्यकाल में कभी नक्सली हिंसा नही हुई क्या? मैं कोई राजनैतिक कार्यकर्ता नहीं हूं लेकिन आपको पढ कर जो मन में आया वो सामने रख रहा हूं।
 
   
 

विवेक रस्तोगी (rastogi.v@gmail.com) http://kalptaru.blogspot.com

 
 अपनी गलती किसी को दिखती है क्या, वैसे ही सरकार है जो किसी और मुद्दे पर ध्यान लगाकर अपनी अकर्मण्यता प्रदर्शित कर रही है। 
   
 

Sudeep kumar Noida

 
 सरकारें अपनी सुविधा, असुविधा से निर्णय लेती हैं और राज्य में माओवादी आंदोलन को खत्म करने की उनकी कोई इच्छा नहीं है. 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) kuwait

 
 ऐसी कोई भी आशा इस सरकार के साथ मत रखीये कनक जी ,ये खुद चुनाव मे शराब बाटेंगे और खुद नशा मुक्ति रैली निकालेंगे !ऐसा इनका व्यक्तित्व है ...फ़िर रमन चालीसा और विश्वरंजन उपनिषद पढने वाले कलमवीर भी कम नही है ? जब विपक्ष ना चिल्लाये तब ये कहेंगे विपक्ष कुछ नही कहती. जब विपक्ष चिल्लाने लगे तब भी यही कहेंगे कि विपक्ष को सिर्फ़ चिल्लाना आता है और कुछ नही. आज रमन सिंह जी नक्सलियो के खिलाफ़ लिखने के लिये बुद्धिजीवियों पर व्यंग्य कस रहे है,जब सलवा-जुडुम जैसे पयोग किये तब किसी बुद्धीजीवी से सलाह ली ? ये सिर्फ़ माटी के शेर है इसलिये मै कहता हु ज्यादा बेहतर है कि दुनिया में सच्चे बेईमान हो बनिस्पद झुठे ईमानदारो के !! 
   
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