सर्जना का सेतुपर्व
सांझी-संगत
सर्जना का सेतुपर्व
यह पाठ वत्सल गजेन्द्र को निवेदित
पीयूष दईया
नयी सहस्रत्राब्दी के इन आरम्भिक वर्षों में ‘लोक में वीराख्यान’ शीर्षक को
समझने-जानने व इस विषय में प्रवेश करने से पहले आइए हम उस चेतना में झांकने का यत्न
करते हैं, जो हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों का राज्य स्थापित होने के बाद से लगभग
एकरैखिक रीति से विकसित होती चली गयी. यह आकस्मिक नहीं है कि लोक-दृश्य व अन्वीक्षा
पर एकाग्र लगभग सभी आधुनिक अध्ययन जिन सन्दर्भों व अभिप्रायों में स्वयं को
विवक्षित तथा पुनस्संगठित करते हैं, वे औपनिवेशिक नृतत्व-शास्त्रियों द्वारा रचित
पध्दतियां व औज़ार है. दूसरे छोर पर भी. क्या यह एक निर्मम सच्चाई नहीं है कि पिछली
दो सदियों में पश्चिम में लोक-विषय के अध्ययन के सिलसिले में जो औज़ार, पद्धतियां व
रीतियां आविष्कृत हुई, उन्हीं की देखादेखी में हमने भी हूबहू उन्हीं प्रणालियों को
अपना लिया ? उन्हीं की उच्छिष्ट राह पकड़ ली जो दुर्भाग्य से क्रमश: अब भी बदस्तूर
जारी है.
मसलन जिसके चलते आज Oral और Literate की Dichotomy सर्वस्वीकृत है. पता नहीं हम यह
कब साफ़ देख सकेंगे (जैसा कि उदयन वाजपेयी भी कहते हैं) कि जिन्हें आज भी ग्रामीण या
आदिवासी या तथाकथित लोक के खाने में डाल कर अपेक्षाकृत कम विकसित (?) कम व्यवस्थित
(?) समुदाय माना जाता है, उन्होंने अपने को कितने विकसित ढंग से संयोजित किया था और
आधुनिक समाज-संयोजन की तुलना में वह संयोजन कहीं अधिक समतामूलक, खुला और हर सदस्य
के लिए आत्म-सम्मान की सम्भावना लिए हुआ था. सम्भवत: उस संयोजन में सम्प्रभुता
(एथोरिटी) प्रवाह में समुदाय के सभी सदस्य शामिल रहते थे, इसीलिए उन्हें समाज में
सम्प्रभुता के केन्द्र या केन्द्रों को बचाने के लिए पागलखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती
थी जैसी कि आधुनिक सामाजिक संयोजन में पड़ती है.
संयोजन की वह बुनावट कब व किस तरह क्षीण हुई, कब व किस तरह टूटी, कब व किस तरह
बिखरी इसे जानने की कोशिश करना भारत के भविष्य के लिये चिन्तित हमारे समय के
अध्येताओं की प्रमुख चुनौती है. अंग्रेज़ों ने भारत की सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़कर
अपनी जो संस्थाएं बनायीं उनसे लोक भारत का ताना-बाना कहीं बेहद कमज़ोर पड़ गया, कहीं
टूट गया. उन्हीं व्यवस्थाओं के मोह में पड़कर स्वतन्त्र भारत के अध्येताओं व शासकों
ने उसे जारी रखा. पहले अंग्रेज़ों का तो अब नये अध्येताओं का यह लोक जीवन पर कब्जा
नहीं तो क्या है ? क्या हम यह अनदेखा कर सकते है कि कैसे किसी एक खास संस्कृति या
समुदाय या रचना-रूप को शोधार्थी जिस रीति व परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रहा है वह
प्रस्तुतीकरण मात्र सबकुछ को अन्तत: उलट देता है ? सुविचारित ढंग से बहुत कुछ को
बुनियादी रूप में बदल-बिगाड़ देता है ?
दरअसल यह स्थिति उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही बिगड़ने लगी थी. विभिन्न ऐतिहासिक
कारणों से वह ताना-बाना ही टूट गया जिसमें सिर्फ एक प्रदेश की नहीं, तमाम लोक
समुदायों की परस्पर पूरकता बची रह पाती. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमने उस
पूरकता को न तो समझा और न उसे पुनर्विन्यस्त करने की कोई भी कोशिश की. हमने जिस समझ
के आधार पर देश को व्यवस्थित करने का प्रयास किया, उसकी जड़ में इस देश की सदियों
पुरानी और प्रामाणिक सामुदायिक व्यवस्थाएं थी ही नहीं. स्वतन्त्र होने पर हमें अपने
लोक जीवन के अंग्रेज़ों द्वारा अवरुद्ध किये गये शक्ति के स्त्रोतों को खोलने पर
विचार करना था लेकिन इसकी जगह हम इस बारीकी और मुश्किल से बनी और बहुस्तरीय
सामुदायिक व्यवस्थाओं वाले देश को आधुनिक विकास के सांचे में फिट करने के विराट मगर
निष्फल उपक्रम में जुट गये जिससे लगभग सभी समुदाय निरन्तर विपन्न और निस्सहाय होते
गये. यजमानी प्रथा के लोप से तो मानो रीढ की हड्डी ही टूट गयी.
मुझे अब यह शिद्दत से लगने लगा है कि मसलन पश्चिमोन्मुख अध्ययनों ने बड़ी बारीकी से
भारतीय समाज को टुकड़ा-टुकड़ा दर्शाने की खातिर यहां रह रहे तमाम समुदायों के देवी
देवताओं में नैरन्तर्य ढूंढ़ने की जगह उनके बीच के छोटे छोटे अन्तरों को आत्यन्तिक
बताकर उन्हें यथासम्भव फैलाने का प्रयास किया है. वरना सीधी-सादी निरन्तरताओं को
रेखांकित करने के बजाय मामूली अन्तरों को इतना अधिक तूल न दिया गया होता. जिस तरह
का ‘एपोरिया’-ऐसा सवाल जिसका जवाब नहीं है, ऐसी समस्या जिसका समाधान नहीं है-इन
अध्येताओं ने गढ़ा है वह मिथ्या है, हेत्वाभास है.
धर्मपाल जैसे इतिहासकारों ने इसके कुछ सार्थक व आंख खोल देने वाले साक्ष्य व
स्थापनाएं रखी हैं लेकिन दुर्भाग्य से पश्चिम-भक्त हमारे अकादमिक इतिहासकार तो
उन्हें इतिहासज्ञ तक मानने से इंकार करते है. खैर ! इसके बरक्स हम गौर करें कि
विभिन्न समुदायों के पारम्परिक रचना-कार्य-कौशलों को पास-पास रखने से एक भिन्न तरह
का नक्शा उभर सकता है. यह नक्शा निश्चय ही अधूरा होगा, अच्छा खासा अधूरा होगा और
इसे पूरा करने का अवकाश यहां नहीं है पर यदि इस नक्शे को पूरा किया जा सके तो हम
साफ़ देख सकेंगे कि यह स्वायत्त सहवर्तित्व के मर्म-बोध से संघटित है, fragmented
approach से नहीं.
इससे बड़ी विडम्बना भला और क्या होगी कि हमारा आत्म-विवेक व हमारी आलोचनात्मक मनीषा
अब यह नहीं पूछती कि हमारी लिखित शब्द के प्रति भारतीय श्रध्दा और वाचिक परम्परा का
सहअस्तित्व अब दुर्भिक्ष से ग्रसित एक ऐसे प्राणी में कैसे बदलता जा रहा है जो महज़
सांस लेता कंकाल-सा रह गया प्रतीत होता है ?
लोक सर्जना अक्सर एक जीवन्त व लगातार सक्रिय कल्पना है--किसी एक समय में ठहरी हुई
नहीं है. इस कल्पना की जड़ें हमेशा सम्बन्धित समुदाय के मानस में गहरे तक रची-बसी
होती है. हमारे यहां एक ही समय में अनेक सदियों का सहअस्तित्व है. और आख्यान
सामूहिक स्मृति के बहुवर्णी फलन हैं. यहां स्थानीयता ही उन्मोचित हो सार्वभौम में
रूपान्तरित हो जाती है. यह रूप-रूपंकर-रूपान्तरण की लीला है. लोकाभिव्यक्ति की
पारम्परिक भाषा सदैव देशज संवेदनशीलता के नवोन्मेषित रचाव है. अपने उत्तरवर्ती
चिन्तन में विट्गेंस्टाइन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक भाषा की कल्पना करने का अर्थ
एक जीवन-रूप की कल्पना करना है.
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हम सभी “प्राण जाय पर वचन न जाय” जैसी लोकोक्ति से परिचित है. ठेठ राजस्थानी इलाकों
में अभी भी यह खांटी उक्ति प्रचलित है कि “बचन बाप मरदां रा कहीजे जुग में एक”
अर्थात् वीरों के वचन और पिता एक ही होते हैं. विट्गेंस्टाइन-पध्दति से विचार करें
तो उपर्युक्त वाक्य राजस्थान के जीवन-रूपों व व्यवहार पर चरितार्थ होता प्रतीत होता
है. क्या यह इस समूचे प्रदेश की अवधारणात्मक रूपरेखा को प्रकट कर सकता है ?
राजस्थान का जातीय आत्म यशोज्ज्वल शौर्य, साहस, वीरता के उत्कर्ष व आदर्श का पर्याय
माना जाता है और यह अलग से रेखांकित किया जाने वाला बिन्दु रहा है कि अन्य प्रदेशों
के बनिस्पत यहां लोक में “वीराख्यान” की समृद्ध परम्पराओं में कई शैलियों तथा
विभिन्न विधा-विद्याओं का एकीकृत समवाय सक्रिय रहा है. अनेकानेक सन्दर्भो में यह
निष्पादित होता रहा है.
गीता में श्रीकृष्ण कहते है : स्वभावस्तु प्रवर्तते. अर्थात्, स्वभाव ही प्रवृत्त
होता है. राजस्थान के लोक-जीवन-रूपों में वह स्वभाव क्या है ? वीर से वर्गीकृत
लोकाख्यानों में वह क्या है जिसके माध्यम से हम इस प्रदेश-विशेष की चेतना को समझने
के उद्यम में उतर सकते है बल्कि क्या राजस्थान के स्वभाव को गढ़ने में इन आख्यानों
की भूमिका का चिन्हांकन किया जा सकता है ? एक महाकाव्यात्मक आख्यान में समष्टि
अस्मिता और स्थानीय विश्व-दृष्टि को परिभाषित करने की विलक्षण क्षमता होती है. यह
सृजनात्मकता के गूढ़ तथा अभेद संसार की बहुवर्णी दीप्ति व अतल अर्थ में निमज्जित
होना है.
लेकिन क्या समकालीन पाठात्मक विश्लेषण के जरिये इस स्वभाव को पकड़ा जा सकता है ?
लोक-सर्जना के कोश में क्षेपक जैसा कोई शब्द नहीं हो सकता. एक पाठ में सदियों के
अन्तराल में आई गढत-बढत उस पाठ का ही हिस्सा है. पाठ में आए परिवर्तन उस पाठ की
सामूहिक स्मृति के वाहक है. पाठ-भेद लोकाख्यानों की ताकत है, समस्या या कमज़ोरी
नहीं. यहां अलग से तथाकथित प्रामाणिक पाठ के लिए कोई जगह नहीं है लेकिन अध्येताओं
ने यह मिथ्या समस्या खड़ी कर दी है.
पाठ केन्द्रित बात करें तो यह हमें कई तरह से समस्याग्रस्त कर देती है. मसलन ऐसा
क्यों है कि एकाधिक वीर-गाथा को छोड़ दें तो ज्यादातर वीराख्यान मारवाड़ क्षेत्र से
ही प्रकाश में आए हैं ? क्या इसलिए क्योंकि शायद मेवाड़ में पशुपालक समाज नहीं रहा ?
राजस्थान के वीराख्यानों का अन्त आधुनिक अभिप्रायों में दुखान्त है और नायक गांव,
ज़मीन या देश अथवा किन्हीं समतामूलक मूल्यों को बचाने के लिए अपना प्राणोत्सर्ग नहीं
करता. वह गायों को बचाने के लिए युध्द करता है. वह भी इसलिए क्योंकि उसने किसी को
कोई ‘वचन’ दिया है. यह वचन भी उसे अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिए देना पड़ता
है. यहां वचन केन्द्र में है, गायें या कुछ और नहीं. हर कथांश में आग्रह
व्यक्ति-अस्मिता पर है-आधुनिक अभिप्रायों में समष्टि से प्रतिश्रुत मानवीय सरोकारों
के रूप में नहीं. पाबूजी या देवनारायण के पूरे आख्यान का वितान व विस्तार अनेकानेक
छोटे-छोटे उपाख्यानों के संयोजन से बुनता है जिसमें नायक के चरित्र को उतना ही
महत्व मिला है जितना कि अन्य पात्रों को.
तकनीकी अर्थ में यह कहना भी बहुत कठिन है कि आख्यान किसी दृष्टि या मूल्य-चेतना से
संचालित व रूपायित है बल्कि पाठ में अनेक स्थल ऐसे आते हैं जहां नायक के बोल व
कृत्य उसके चरित्र को स्खलित ही करते हैं बजाय नायकत्व की गरिमा देने के. यह भी
गौरतलब है कि यहां वीर तो कुल से आते हैं लेकिन ज्यादातर सन्त अज्ञातकुलशील ही है.
और राजस्थान के लगभग सभी वीराख्यानों में कथा से सम्बन्धित सभी स्त्रियां सती हो
जाती हैं.
दरअसल इन आख्यानों में सती-भाव इतना बध्दमूल है कि उसे गिराते ही इन आख्यानों का
वीर-भाव भी गिर जाता है. यह बात इतने सहज ढंग से रोपित है कि दोनों अन्योन्याश्रित
है. लेकिन क्या हम यह कह सकते है कि इन आख्यानों में ‘सती’ एक विकार है ? यह हम
आधुनिकों के लिए एक समस्या हो सकती है, उनके लिए नहीं. आस्था व श्रध्दा के
जीवन-दर्शन में क्या प्रश्नवाचकता के लिए कोई जगह नहीं है ? ठीक वैसे ही जैसे कि
प्रकृति के प्रति कहीं भी प्रश्नवाचकता नहीं है. इस ओर भी मेरा ध्यान जाता है कि
राजस्थान में जैन-धर्म की व्याप्ति होने के बावजूद यह प्रदेश अहिंसा के बजाय लौकिक
अभिप्रायों में वीरता के युयुत्सु/हिंसात्मक अभिप्रायों में कैसे प्रचलित है ? इन
आख्यानों की रीढ अन्तत: नायक के ‘वचन’ पर टिकी है और जिसे पूरा करने के लिए वह
आत्मोत्सर्ग करता है. लेकिन यह आत्मोत्सर्ग स्व के अभिमान की कुछ ऐसी फलश्रुति है
जिसे एक मनस्विद् रूग्णता से अभिहित करेगा, उदात्त मानवीय-बोध से नहीं.
इन आख्यानों के पाठ के अभिधात्मक विवरणों को आपस में उलझाते व समस्याग्रस्त करते
हुए कई किस्म की व्याख्याएं व प्रश्न उठते चले जा सकते हैं जिनसे पन्ना-दर-पन्ना
रंगा जाता रह सकता है लेकिन वह रास्ते पर चलना नहीं होगा. मेरा प्रस्ताव यह है कि
इन आख्यानों को भारतीय पैगन-दृष्टि व स्वभाव के आलोक में ही बांचा-समझा जाना चाहिए.
पैगन-दृष्टि का यह एक विलक्षण वैशिष्टय है कि यहां किसी तरह का उच्चावच क्रम नहीं
है. कभी heirarchy/उच्चावचन नहीं बनायी जाती.
ब्रह्मा-विष्णु-महेश में कोई पहला-दूसरा-तीसरा नहीं है. कभी ब्रह्मा मुसीबत में
फंसे हैं तो बाक़ी उनकी सहायता कर रहे हैं, कभी बाक़ी मुसीबत में फंसे हैं तो ब्रह्मा
सहायता कर रहे हैं. कभी शिव की जान पर बन आई है.
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पुराणकार मन में यह बैठने नहीं देते कि ब्रह्मा पहले नम्बर पर है या विष्णु दूसरे
नम्बर पर या महेश तीसरे नम्बर पर. इस तरह heirarcy न बनने से सब समानरूपा हैं,
शुद्ध रूप में हैं. सभी सात्विक रूप में है. सभी के साथ देहधरे का दण्ड है. ठीक यही
बात इन आख्यानों पर भी लागू होती है. इसी दृष्टि के चलते ही यह सम्भव हो पाता है कि
यह आख्यान आनन्दवर्धन के शब्दों का सहारा लूं तो “साधारण में असाधारण की प्रतिष्ठा”
कर पाते हैं. यहां heirarcy में विश्वास नहीं है और सबसे गूढ़ बात यह है कि इस आलोक
की किसी भी तरह की explanation/व्याख्या नहीं है और न ही कोई संकेत.
इन वाचिक वीराख्यानों में छिपी विरासत जिस रीति से राजस्थान की मूल्य-दृष्टि को
उजागर करती और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को विशिष्ट बनाती है उसे अन्तरानुशासनात्मक
प्रज्ञा से ही समझा जा सकता है. विद्वानों ने जिसे साम्प्रदायिक व्याख्याओं से
‘गौ-रक्षा’ के रूप में महिमामंडित कर दिया है, वैसा इन आख्यानों में बिलकुल भी नहीं
है. जिन समुदायों में यह आख्यान प्रचलित हैं यह उनकी संस्कृति व भूगोल की आत्मकथा
का रचनात्मक प्रकटीकरण है. हर समाज अपनी जीवन-स्थितियों के साथ जीने के उपाय खोज
लेता है और पशु-पालन व गोचर संस्कृति इसी का जीवित साक्ष्य है. यह हम अब अनुपम
मिश्र की किताबों से समझ सकते हैं.
यह अनायास ही नहीं है कि भारत में लगभग हर जगह कला-रूप अनुष्ठान से एकमेक रहे हैं.
यहां नायक देवता बन जाते हैं और ऐसी कोई ठोस रेखा नहीं है जो हिन्दू पैगन स्वभाव
में देवताओं को मनुष्य से आत्यन्तिक तरह से अलगा दे-महाकाव्यात्मकता और मिथ आपस में
घुल जाते हैं. धार्मिक या पारिवारिक घटना या मन्दिर के उत्सव में Ritual
Performance होती है जब एक अलौकिक घड़ी में भोपा की आत्मा में वह नायक-देवता
प्रविष्ट हो जाते हैं, जिसकी की कथा कही जा रही है. यह चेतना की वह बनावट है जिसके
जरिये समुदाय के सभी सदस्यों के लिए समाज एक अलिखित चौहद्दी बांध देता है-आस्था और
धर्म यहां एक युक्ति के पायों की तरह भी हैं. इसलिए यह महज़ संयोग नहीं है कि
राजस्थान में प्रचलित मुख्य वीराख्यान गायों को बचाने से भी जुड़े रहे हैं. यह
जीजिविषा का मानवीय अध्यात्म है.
स्टेला क्रमरिश के अद्भुत वाक्य है : ..(in) Indian art more than in any other,
Form results from performance. Making a work of art is a ritual. Its magic acts
on the form. By performing the rites of art, the craftsman transforms himself as
well as his materials. Form, ritual performance, and transformation are
simultaneous and inseparable aspects of Indian art. They are inherent in its
creation, and produce their effect in its concrete shape. राजस्थान में वीराख्यान
ने अद्भुत स्वरूप लिया है. पड़-परम्परा ने इसे एक अलग आयाम व अनूठा धरातल दिया है.
पाबूजी और देवनारायण की पड़ विष्णुधर्मोत्तर पुराण में वर्णित विभिन्न कलाओं व
साहित्य के परस्पर स्वायत्त सहवर्तित्व का एक अप्रतिम व जीवित साक्ष्य भी है. शब्द,
चित्र और संगीत का अद्भुत सम्मिश्रण व सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण-with a particular
profile. Performance और चित्रांकन का अन्यतम सौन्दर्यशास्त्र. यह जिज्ञासा सहज ही
जन्म लेती है कि ऐसा क्यों है कि यहां चित्र, कथा-अवयवों से बाहर नहीं है लेकिन कथा
कभी महज़ चित्र तक ही महदूद नहीं रहती ? आप उस अद्भुत टेक्नीक व कल्पना पर गौर करें
जिसके मार्फत पाठ परर्फोरमेंस में बदल जाता है ? पाबूजी के आख्यान-पाठ और इसके
पाठ-भेद पर तनिक विचार हुआ है लेकिन मुझे आश्चर्य है कि इस ओर कभी ध्यान नहीं गया
कि पाबूजी-पड़ की चित्रांकन विधियों व चित्रित विवरणों में इन बीती सदियों में जो
variations आए होंगे उनसे आख्यान का भाषिक पाठ किस तरह से प्रतिकृत होता रहा है ?
इस वीराख्यान के पाठ-नैरन्तर्य में तरल स्थायित्व/ fixity और variation पाठ से आता
है या चित्र से ?
गोपीनाथ कविराज ने तो भारतीय लोक-संस्कृति की एक अनवद्य विशेषता का सूत्र
''कथा-प्रणाली'' में पाया है. शायद गल्प पैगन-चेतना का स्वभाव है. लेकिन यह अध्ययन
का सचमुच गहरा विषय है कि इन चित्रांकन परम्पराओं का भाषिक पाठ पर किस तरह का असर
छूटता रहा है. यह अध्ययन का कुछ वैसा ही लगभग अछूता विषय है जैसा कि मेरी यह
जिज्ञासा कि ऐसा क्यों है कि लगभग सभी आधुनिक और एक हद तक पारम्परिक पश्चिमी
चित्रकारों ने अपने आत्म-चित्र बनाए हैं लेकिन भारतीय लोक-समय व अवकाश में ऐसी कोई
धारणा कभी नहीं रही. कहना न होगा कि यह पौर्वात्य आत्म व दर्शन का अपना ऐसा
चारित्रिक वैशिष्टय है जिसके आलोक में हम लोक-वाड्.मय के प्रज्ञा-तन्तुओं को छू
सकते हैं.
दूसरे शब्दों में, लोक-वाड्.मय के अध्ययन के लिए हमें अपनी स्वदेशी दृष्टि,
प्रणालियां व विधियां आविष्कृत व विकसित करनी होंगी अन्यथा हमारे पास भटकावों के
दस्तावेज़ तो होंगे लेकिन सच्चे मार्ग के रहस्य नहीं. दूसरे की ईंटों से हम अपना घर
नहीं बना सकते. यह आकस्मिक नहीं है कि लोक-वाड.मय में देश-विभाजन, पार्टीशन की
परिघटना, अपना अवकाश व रूपायन सृजित नहीं कर सकी. या फिरंगियों से सन्दर्भित जो कुछ
लोक-रचना-सामग्री मिलती है उसमें वीराख्यान निर्मित नहीं हो सके. यह दुर्भाग्यपूर्ण
सचाई है कि न केवल शिक्षा-दीक्षा, बल्कि समूचे जीवन के ताने-बाने में औपनिवेशिक
कारकों की वर्चस्वकामी सक्रियता का चेतन-अचेतन दबाव है.
मसलन, कोमल कोठारी आजीवन लोक-मुद्दों को हमारे सामने रखते रहे, उन पर काम करते रहे
लेकिन उन के चिन्तन पर पश्चिमी विचार-सरणियां हमेशा हावी रही. यद्यपि कोमल-दा
phenomena वार्ता व विमर्श का एक अलग विषय हो सकता है लेकिन यह एक तथ्य है कि वे यह
जानते-बूझते हुए भी कि राजस्थान के सांस्कृतिक स्वभाव को समझने के लिए इसी जमीन से
उपजती चिन्तन-प्रणालियों व औज़ारों को गढ़ना व विकसित करना होगा, वे मानो प्रतिरोध का
स्वराज्य बनाने के बजाय एक ऐसे निस्पृह अध्येता बने रहे जो सोच-विचार की पश्चिमी
सरणियों से कभी स्वयं को मुक्त नहीं कर सका. हालांकि उनके उत्तरवर्ती चिन्तन में
अपनी पध्दति व व्याकरण विकसित करने की गहरी छटपटाहट के मूल्यवान् साक्ष्य मिलते
हैं.
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बिज्जी के बाद आज राजस्थान के सन्दर्भ में सिर्फ चन्द्रप्रकाश देवल का नाम ही ध्यान
में आता है जो वैकल्पिक दृष्टि-निर्माण के लिए आकण्ठ जूझ रहे है. बहरहाल, मेरे लिए
लोक के रचना-रूप--जैसे कि यहां वीराख्यान--महज़ पांडुलिपियां नहीं है जिनके बारे में
हम सिर्फ़ लिखते-बोलते चले जाय और अपनी व्याख्याओं के पक्ष में मल्लिनाथ का यह वाक्य
रख दें कि ''जो भी व्याख्या करता हूं, पाठ के भीतर से ही करता हूं.'' -कमाल है कि
देरिदा जैसे उत्तर-आधुनिक चिन्तक अपने ढंग से मानो इसी वाक्य का ही विस्तार हमारे
सामने रख रहे थे. दरअसल, विचारों में आधिपत्य का एक सूक्ष्मतर रूप भी होता है, जो
विचारों के क्षेत्र में एक संस्कृति द्वारा दूसरी संस्कृति पर हावी होने पर दिखाई
देता है. यह आधिपत्य अंतत: अधिक चिन्ताजनक होता है, क्योंकि साधारणत: उसे लोग महसूस
नहीं करते. बीसवीं सदी के विलक्षण दार्शनिक कृष्णाचन्द्र भट्टाचार्य लिखते है :
''जब तक व्यक्ति किसी बंधन के प्रति सचेत है तब तक उसके द्वारा प्रतिरोध संभव है.
उसे एक अपरिहार्य बुराई के रूप में सहते हुए भी आत्मा में स्वतन्त्र रहा जा सकता
है. दासता तब आरम्भ होती है जब व्यक्ति बुराई को महसूस करना ही बंद कर देता
है.....जब अशुभ को शुभ के रूप में स्वीकार कर लिया जाता है तो वह दासता और
गहन-गंभीर हो जाती है.''
इसीलिए इससे पहले कि हम ''लोक में वीराख्यान'' जैसे गम्भीर व विशद विषय पर चर्चा का
श्रीगणेश करे मुझे लगता है कि हम सभी इस खतरे के प्रति सजग रहे कि कहीं हम पश्चिमी
पध्दतियों के अप्रतिरोध्य वशीकरण के दुर्निवार आवर्तो में तो नहीं फंसे हैं ? यह
समझ लेना स्वाधीन बुध्दिजीवन की सबसे बड़ी चुनौती है तभी हम लोक के अपने स्वराज्य की
जड़ों में पुनर्वास कर सकेंगे.
बहरहाल ! एक वीरगाथा पर वार्ता केवल एक आख्यान पर बातचीत नहीं है या साहित्यिक अथवा
सौन्दर्यशास्त्र या नैतिक मूल्यों पर. यह राजनीति पर भी विचार-विमर्श है और
सांस्कृतिक परिघटना पर भी वरना हम मसलन, राजस्थान में चारण-phenomena को समझ ही
नहीं सकते. बल्कि अब तो यह व्यवसाय भी है.
हम सब जानते है कि बीसवीं सदी के पूर्वाध में टेपरिकार्डर जैसी नयी प्रौद्योगिकी ने
वाचिक परम्पराओं को एक दूसरे ढंग से अकादमिक शोध के एजेंडा में प्रवेश दिला दिया
था. हमारे समय में तो ''लोक'' की बात प्रकारान्तर से ग्राम-समुदायों की बात में
महदूद हो कर रह गयी है--शहर, कस्बे, गांव का अन्तर लगातार पटता जा रहा है.
संचार-क्रान्ति ने सब उलट दिया है. इक्कीसवीं सदी में देवनारायण या पाबूजी किस बात
के प्रतीक हो सकते हैं ? लोक के समवेत अभिधान की स्मृति क्या क्षिप्रता से तिरोहित
नहीं होती जा रही ? अब किसकी स्मृति व जीवन में क्या बचा व जीवित है यह अपने में एक
विकराल मुद्दा है. अपनी ritualistic व आस्तिक ऋजुता की भित्ति से विच्छेदित होते ही
यह सारी देशज थाती एक उत्पाद में बदल जाती है. अन्तत: मनोरंजन, व्यवसाय और अपने
निहित स्वार्थो के पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए.
मैंने जितने भी लोक कलाकारों व गायकों से पूछा उनमें से लगभग सभी का कहना यही रहा
कि वे ठेठ छुटपन से ही अपने पारम्परिक काम को सीखने-करने में मुब्तिला हो गये थे.
अब Child Labour की समस्या को यहां किस तरह से रखेंगे ? यह समस्या कहीं ऐसा तो नहीं
कि फिर आधुनिकीकरण के phenomena का एक विवरण है ?
दो कोण रखता हूं : एक कलाकार व गायक कहता है कि एक उच्च-कोटि का कलाकार, कलाकार है
भले लोग उसे न जाने वह देसी घी की तरह है जिसकी सुगंध आयेगी ही. यह वह पारम्परिक
सोच है जिसमें अपनी कला पर गहरा व मजबूत भरोसा तथा आत्म-गौरव है. जबकि एक दूसरा
कलाकार कहता है कि ''कलाकार वो वहां तक होता है जहां तक लोग उसे जाने'' अगर वह अपने
गांव तक में ही, अपने घर तक में ही सीमित रह जाता है तो असल में वह अपने को मार रहा
है. तब उसकी हैसियत ''घर में खूंटे की तरह है.'' यह आधुनिकता और मुख्यधारा में
प्रवेश के लिए छटपटाहट है. यह विमानवीयकृत संसार में अपने लिए एक जगह बनाने के
संघर्ष में शामिल होना चाहना है. अब एक लोक-शिल्पी या एक लोक-गायक जिस संसार के
लोगों के लिए प्रस्तुत होता है उसका उसे न तो अनुभव है न बोध. यह वह संस्कृति है जो
उससे पूरी तरह alien है. आपको शायद विषयान्तर लगे लेकिन आप देखें कि डिजाइन के
क्षेत्र में आज क्या हो रहा है ?
उत्तर-औपनिवेशिक शिक्षा-दीक्षा से लैस और प्रोफेशनली प्रशिक्षित डिजाइनर ने
हस्तशिल्प को एक fragmented activity में बदल दिया है. डिजाइनर और कारीगर की
पारम्परिक दोहरी भूमिका निभाने वाला लोक-हुनरमंद अब नागर डिजाइनर को सिर्फ एक दक्ष
श्रम मुहैया कराता है ताकि वह नागर डिजाइनर इस दक्ष श्रम से अपने द्वारा संकल्पित
विचारों को मूर्त रूप दे सके. घर या अपने मानुसो के बीच आनुष्ठाानिक उद्देश्य के
लिए किया जाने वाला चित्रांकन अब कागज या कैनवास पर दूसरों के लिए एक व्यवसाय के
बतौर किया जाने लगा है--''आत्म'' और ''अन्य'' का जो शैतानी भेद जिस समाज में पहले
कभी नहीं था वह समाज अब अपनी चेतना और व्यवहार में ''आत्म-अन्य'' के दुष्चक्र में
फंस रहा है. यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम यहां ''लोक में वीराख्यान'' पर
विचार-विमर्श के लिए एकत्र हुए है लेकिन उन लोक-गायकों व लोक-कलाकारों की
हिस्सेदारी के बिना जिनके बारे में कि यह विषय दरअसल है. मुझे हैरत है कि इन लोक
गायकों के बिना हम भला किसी भी तरह की सैध्दान्तिकी या व्यवहार तक कैसे पहुंच सकते
हैं ?
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वैश्वीकृत बाज़ार में भारतीय कला-रूपों की मांग दिन-पर-दिन बढ़ती जा रही है लेकिन
स्वयं लोक-कलाकार की जीवन-स्थितियों पर नज़र डाले तो लगता है वे भारत में ऐसे
बड़े-छोटे व्यावसायिक घरानों के उपनिवेश में बदलते जा रहे हैं जहां उनके श्रम व हुनर
का गैर-मानवीय हद तक शोषण होता है. भारत के सन्दर्भ में इन लोक व जनजातीय कलाकारों
की जीवन-स्थितियां इतनी विषम व विकराल है कि बावजूद सारी कल्याणकारी योजनाओं के
उनका निजी संसार नारकीय ही बना रहा है. कलाकार अपने मानवाधिकारों तक के प्रति
जाग्रत नहीं है और अमूमन तो हाट-बाज़ार में वे पूंजीपतियों व बिचौलियों के ही शिकार
बने रहते हैं और इस दुष्चक्र से कभी बाहर नहीं आ पाते.
ऐसे निराशाजनक परिदृश्य में इस पूरे मकड़तन्त्र को उजागर करने के लिए यह बहुत ज़रूरी
है कि इसके पीछे सक्रिय सारे तत्वों व असलियत के बहीखाते को सामने लाया जाय ताकि
कलाकारों के लिए मानवीय जगह भी बन सके और एक स्वावलम्बी मार्ग भी प्रशस्त हो सके.
वैश्वीकरण के दौर की चुनौतियों तथा मुद्दों का अपना सिलसिला है जिसका सामना किये
बिना अब भविष्य की कोई सार्थक रूपरेखा नहीं बन सकती. अगर भूमण्डलीकरण सचमुच
सहलग्नता--कड़ियों को जोड़ने--के बारे में है तब आज भूमण्डलीकृत होने के लिए सबसे
पहले वे औज़ार होने चाहिए जिसके साथ भूमण्डलीकृत हुआ जाए. क्यों नहीं हम अपनी
समकालीनता के पैरामीटर्स को परिभाषित करना शुरू करते और समान तरह से वैधीकृत और
मूल्यवान् विकल्प नियत-निर्धारित करते व बिठाते ?
आधुनिक रचना-संसार और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के सिलसिले में यह एक गौरतलब तथ्य है
कि अभी तक के लगभग सारे प्रकाशन चाहे वे विभिन्न ज्ञानानुशासनों की किताबों के रूप
में सामने आये हो या पत्रिकाओं के रूप में, मूलत: कला-रूपों पर ही एकाग्र रहे हैं.
लेकिन स्वयं पारम्परिक व लोक कलाकार तथा गायक, दूसरे शब्दों में विशेषज्ञ, के
जीवन-संसार और उसके सरोकारों व समस्याओं से लेकर उसके अस्तित्व और उसकी अपनी आवाज़
पर एकाग्र प्रयत्नों का दृश्य पर एक तरह से अभाव-सा है.
मैं यह प्रस्तावित करना चाहूंगा कि इस सन्दर्भ में लोक-सर्जकों पर एकाग्र एक
सेमीनार की संकल्पना की जाय. यह अपनी तरह का ऐसा पहला व अभिनव प्रयास हो सकता है
जिसके माध्यम से समाज, संसार, सरकार व अध्येताओं तक कलाकार/गायक न केवल अपने
जीवन-मुद्दों व अपने सर्जना-शास्त्र को सम्बोधित व सम्प्रेषित कर सकेंगे बल्कि उनके
संग अन्त:क्रिया व साझे की स्थिति में भी आ सकेंगे.
मौजूदा दौर के उत्तर-पूंजीवादी परिदृश्य में इस तरह के सेमीनारों के माध्यम से
लोक-कलाकारों/गायकों का एक ऐसा मंच बन सकता है जहां सभी पारम्परिक व लोक कला-रूपों
के सर्जक न केवल एकत्र हो सकते हैं बल्कि उनकी बहुल आवाज़ों का समवाय एक ऐसी उर्वर
ज़मीन तैयार कर सकता है जहां पर वे एक वृहत्तर फलक पर अपनी जगह, पहचान और अस्तित्व
का निर्माण कर सके.
कलाकार के जीवन व समय को एक स्वावलम्बी आधार देने की यह बुनियादी प्रतिश्रुति जहां
एक छोर पर सांस्कृतिक उद्योग की परियोजना (वर्ल्ड बैंक व श्री राजीव सेठी द्वारा
प्रवर्तित शब्द-युग्म) के चरितार्थन में सार्थक तरह से अपना योगदान दे सकती है वहीं
दूसरे छोर पर स्वयं कलाकार की रचनात्मकता और मौलिकता को भी बरकरार रख सकती है.
दूसरे शब्दों में, यह संकल्पना एक ऐसे अभियान का आह्वान है जिसे मूर्त रूप दे पाने
का अर्थ कलाकारों की मुख्यधारा में पुर्नस्थापन की संभावनाओं को सबल बनाएगा ताकि आज
की वैश्विक दुनिया की चुनौतियों, खतरों तथा अन्यान्य बाधाओं के सम्मुख न तो वे
असहाय व कमज़ोर पड़े और न ही पूंजीवादी व्यूह के शिकार बने. इसे हम ''कलाकारों द्वारा
कलाकारों का आंदोलन'' के रूप में भी संज्ञापित कर सकते हैं.
हम कह सकते हैं कि इस तरह के सेमीनारों का ताना-बाना संवादधर्मी होना चाहिए और
विभिन्न घटकों के संयोजन से निर्मित मंच लोक-कलाकारों से बातचीत पर एकाग्र हो.
सेमीनार की अन्तर्वस्तु व संरचना का रूप-निर्धारण बोलचाल की भाषा तथा वाचिक लय से
व्याप्त रहना चाहिए ताकि स्वयं लोक-कलाकार/गायक इसमें शिरकत कर सके और इसका आस्वाद
ले सके. कहना न होगा कि इस सेमीनार के योजनाकारों की भूमिका नेपथ्य में ही सक्रिय
रहनी चाहिए और शुरू से ही कोशिश यह होनी चाहिए कि सूत्रधार से लेकर सबद-साखी तक की
यात्रा और बागडोर स्वयं लोक-कलाकारों/गायकों के हाथ में ही रहे. प्रवक्ता होने-बनने
के दम्भ व खतरों के प्रति सजग रहना प्राथमिक स्वधर्म है. और यह उन तथाकथित
कार्यशालाओं की तर्ज पर न हो जो कि एक दूसरे भेस में स्वयं योजनाकारों के अपने
निहित स्वार्थो से ही संचालित होती है.
इस तरह के सेमीनारों की एक पहचान इस चारित्रिक छाप के तहत भी अलग से रेखांकित की जा
सकती है कि यह कलाकार और कला-रूपों के सन्दर्भ में नीति-निर्माण सहित बाज़ार के लिए
वांछित रणनीति तैयार करने के विभिन्न कोणों पर न केवल अपना स्पष्ट अभिमत प्रकट करे
बल्कि उसकी यह कोशिश रहे कि इस दिशा में सरकार व अन्य सम्बन्धित निकायों द्वारा इसे
अमलीजामा भी पहनाया जा सके और एक सच्चे मायने में उस जमीनी स्वरूप से साक्षात्कार
भी जिसमें कलाकार असल में जीता व सांस लेता है. इस खण्ड़ का एक सूत्र ' रचनात्मक
अर्थशास्त्र ' के सिलसिले में अपना योगदान देने से भी जुड़ा है. इस खण्ड़ को तैयार
करने के लिए संबंधित क्षेत्रों से जुड़े विशेषज्ञों की मदद ली जा सकती है और एक ऐसा
मीमांसात्मक विमर्श विकसित करने की कोशिश हो सकती है जिसमें पाठशाला से पाठयक्रम तक
के सभी मुद्दों को उठाया जा सके.
कहना न होगा कि हर सेमीनार की योजना का तानाबाना सन्दर्भ-बहुल अन्तर्गुफन से
वाबस्ता रहना चाहिए- सर्वसमावेशी वैविध्य को उद्धाटित करता.
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मुझे लगता है कि यह अपने स्वधर्म की ऐसी पहचान गढ़ सकती है जो उत्तरपूंजीवादी दौर की
अंध वैश्वीकरण-प्रक्रिया को एक सार्थक प्रतिरोध दे सकती है और उस स्वावलम्बी
कुतुबनुमा का संकेत भी जिसके आलोक में लोक-मार्ग है. यह आत्म-बोध लगातार सक्रिय
रहना चाहिए कि एक देश व समाज अपने विवेक, ज्ञान और जड़ों को खारिज या विस्मृत करके
कभी खिल नहीं सकता.
जैसा कि अनुपम मिश्र भी यह ठीक ही विश्लेषित करते हैं कि पिछले दो सौ सालों से
विचार का केन्द्र अंग्रेजी या पश्चिम बिना सोचे-विचारे इस तरह मान लिया गया है कि
जो उनकी बहस है वही हमारी है. यहां ''बहस'' से अनुपम जी का आशय पश्चिम की दृष्टि से
लेकर उनके वातावरण, सांस्कृतिक भिन्नताएं, स्थितियां और भूगोल तक से है. फिर वे उस
औपनिवेशिक/उत्तर साम्राज्यवाद की अवधारणाओं व उसकी सर्वग्रासी व्याप्ति की छानबीन
करते हुए यह ध्यान दिलाते हैं कि भारत में कैसे इन दो सौ बरसों में चीजों को नष्ट
कर दिया गया है. फिर चाहे मसला आधुनिकीकरण की महायोजना में '' विकास'' के ढांचों का
हो या स्वयं को श्रेष्ठ समझते हुए उन्हें ''प्रशिक्षण'' या ''साक्षरता '' देने का
जिन्हें हाशिए के लोग कहा जाता है. अनुपम मिश्र का यह आग्रह सचमुच एक ज़मीनी बात है
कि समाज से जो काम गायब हो गया है उसे फिर से समाज को उसकी पूरी प्रतिष्ठा व सम्मान
के साथ लौटाना होगा--मालिक के अंहग्रस्त भाव से नहीं बल्कि एक विनम्र सेवक की
भांति. इस भूमिका को अनुपम जी ने अपने चारित्रिक लहज़े में ''मुंशीगिरी'' के रूप में
व्यवहृत करते है. वे यह मानते हैं कि '' इन सब विषयों में अगर सबसे बड़े विशेषज्ञ
हैं तो वे समाज के लोग है. दूसरे विशेषज्ञों की जरूरत नहीं पड़ती समाज को.''
यह अपने में विडम्बनामूलक तथ्य है कि विभिन्न पारम्परिक व लोक-शैलियों की सभी
रचनात्मक विधाओं के अपने व्याकरण, तकनीक व सौन्दर्यशास्त्र होने के बावजूद—जो कि
उनके सृजन-कार्य से प्रकट होता है--इनसे सम्बन्धित साक्ष्य-स्वरूप जो किताबें या
निबन्ध हमारे पास उपलब्ध है वे सभी आधुनिकों द्वारा ही लिखे गये हैं और कहना न होगा
कि उनकी दृष्टियां कुछ इस तरह से भ्रान्तमूलक व पूर्वग्रहग्रसित है कि हम उन पर
भरोसा तक नहीं कर सकते और इस सन्दर्भ में यह गौरतलब है कि अममून यह सारी
पाठ-सामग्री भी अंग्रेजी में ही है. जबकि मेरा यह प्रस्ताव है कि किसी भी
माध्यम-विशेष में सक्रिय स्वयं उस कलाकार से ही परस्पर संवाद व निरन्तर वार्ता के
जरिये-स्वयं उस कलाकार की आवाज व दृष्टि-लिपि में -अगर किताबें तैयार की जा सके तो
यह अपने में न जाने कितने किस्म के बहुल प्रत्ययों से संघनित सौन्दर्यशास्त्र हमारे
सम्मुख उजागर कर देगा.
उदाहरण के लिए अनुपम जी की किताबें पढने वाला कोई भी पाठक या विशेषज्ञ यह नहीं बता
सकता कि उनके द्वारा उल्लखित स्वयं इन गजधरों की वास्तविक तकनीक, प्रयोग व
सौन्दर्यशास्त्र तथा सांस्कृतिकी क्या है क्योंकि अभी तक हम कभी सीधे गोमुख तक गये
ही नहीं जबकि होना यह चाहिए था कि स्वयं गजधरों की कही-लिखी गयी किताबें हमारे पास
उपलब्ध होती. यही बात ''लोक में वीराख्यान'' पर भी लागू होती है.
दूसरे शब्दों में, यही वह वास्तविक प्रस्थापना-परिवर्तन है जिसकी कि हमें सच में
दरकार है ताकि तथाकथितों का वर्चस्व टूट सके और जड़ों की सांसें खिल सके.
आप देखें कि महात्मा गांधी की रचनात्मक प्रतिभा ने विद्यालयों और उच्च शिक्षा के
संस्थानों में क्राफ्ट्स के प्रशिक्षण का आग्रह किया था. वे स्वयं प्रतिदिन चरखा
चलाकर सूत कातते थे और उन्होंने हजारों लोगों को सूत कातने और बुनने के लिए प्रेरित
किया. लेकिन आज़ादी के इतने दशक बीत जाने के बाद आज भी गांधी के गुजरात में बुनकरों
की दशा/हालत अछूतों जैसी ही है.
किसी भी प्राथमिक या उच्च शिक्षा अथवा अन्य डिज़ाइन वगैरह के विद्यालयों व संस्थानों
में एक भी पारम्परिक शिल्पकार/कारीगर शिक्षक के रूप में नहीं है-गांधी के अपने
आश्रम विद्यालयों में भी नहीं. जैसे की आज इस सभागृह में ''लोक में वीराख्यान'' को
जीवित व उदात्तीकृत तरह से निनादित बनाये रखने वाले लोक-गायक व कलाकार आदि
अनुपस्थित है, जबकि उनकी उपस्थिति केन्द्रीय नाभिक या कहें रानी मधुमक्खी की तरह
है. मुझे हैरत व दुख है कि इन गायक/कलाकारों को सारे विमर्श में विशेषज्ञों के बतौर
शामिल क्यों नहीं किया जा रहा ? उपभोक्तावाद के वात्याचक्र में फंस कर इससे पहले कि
हमारी जीवित परम्पराएं व संस्कृति दम तोड़ दें, हम सभी को इसे महफूज़ रखने के लिए
अपनी ओर से आगे बढ़कर पहल करनी चाहिए.
कहना न होगा कि यह सेमीनार या मेरे द्वारा कल्पित सेमीनार इन्हीं विशेषज्ञों के
पुनर्वास व उनके काम को पुनर्नवा करने के लिए एक उर्वर जमीन तैयार करने का काम कर
सकता है और यह सांझी-संगत, सर्जना के सेतुपर्व का चरितार्थन भी.
*
प्रस्तुत आलेख सन् 2008 में साहित्य अकादेमी, दिल्ली द्वारा उदयपुर में आयोजित
''उत्तर भारतीय भाषाओं में वीराख्यान की परम्परा'' पर एकाग्र राष्ट्रीय सेमिनार में
दिये गये बीज-भाषण का किंचित संशोधित प्रारूप है. मैं अफने मित्र का आभारी हूं कि
फन्होंने इस बीज-व्याख्यान का लिप्यन्तरित पाठ मुझे सुलभ कराया औऱ अपने दिवंगत पिता
का भी, जिनके निरभिमानी वत्सलाग्रह को मैं कभी समझ नहीं सका.
27.07.2009,
9:32 (GMT +05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Dula Ram Saharan CHURU | |
| | पीयूष दईया ने अच्छा लिखा है। वे बधाई के पात्र हैं। बधाई------- | |
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| | Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh | |
| | When you find any country have much wider concept of mainstream civilization,it only means lot of discrimination of smaller groups. Not only it is against the concept of democracy, but also against human rights,humanity and civilization in broader concept. | |
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