पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > विचार > बात पते कीPrint | Send to Friend | Share This 

सर्जना का सेतुपर्व

सांझी-संगत

 

सर्जना का सेतुपर्व
यह पाठ वत्सल गजेन्द्र को निवेदित


पीयूष दईया



नयी सहस्रत्राब्दी के इन आरम्भिक वर्षों में ‘लोक में वीराख्यान’ शीर्षक को समझने-जानने व इस विषय में प्रवेश करने से पहले आइए हम उस चेतना में झांकने का यत्न करते हैं, जो हिंदुस्तान में अंग्रेज़ों का राज्य स्थापित होने के बाद से लगभग एकरैखिक रीति से विकसित होती चली गयी. यह आकस्मिक नहीं है कि लोक-दृश्य व अन्वीक्षा पर एकाग्र लगभग सभी आधुनिक अध्ययन जिन सन्दर्भों व अभिप्रायों में स्वयं को विवक्षित तथा पुनस्संगठित करते हैं, वे औपनिवेशिक नृतत्व-शास्त्रियों द्वारा रचित पध्दतियां व औज़ार है. दूसरे छोर पर भी. क्या यह एक निर्मम सच्चाई नहीं है कि पिछली दो सदियों में पश्चिम में लोक-विषय के अध्ययन के सिलसिले में जो औज़ार, पद्धतियां व रीतियां आविष्कृत हुई, उन्हीं की देखादेखी में हमने भी हूबहू उन्हीं प्रणालियों को अपना लिया ? उन्हीं की उच्छिष्ट राह पकड़ ली जो दुर्भाग्य से क्रमश: अब भी बदस्तूर जारी है.

अनंत का आकाश


मसलन जिसके चलते आज Oral और Literate की Dichotomy सर्वस्वीकृत है. पता नहीं हम यह कब साफ़ देख सकेंगे (जैसा कि उदयन वाजपेयी भी कहते हैं) कि जिन्हें आज भी ग्रामीण या आदिवासी या तथाकथित लोक के खाने में डाल कर अपेक्षाकृत कम विकसित (?) कम व्यवस्थित (?) समुदाय माना जाता है, उन्होंने अपने को कितने विकसित ढंग से संयोजित किया था और आधुनिक समाज-संयोजन की तुलना में वह संयोजन कहीं अधिक समतामूलक, खुला और हर सदस्य के लिए आत्म-सम्मान की सम्भावना लिए हुआ था. सम्भवत: उस संयोजन में सम्प्रभुता (एथोरिटी) प्रवाह में समुदाय के सभी सदस्य शामिल रहते थे, इसीलिए उन्हें समाज में सम्प्रभुता के केन्द्र या केन्द्रों को बचाने के लिए पागलखाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी जैसी कि आधुनिक सामाजिक संयोजन में पड़ती है.

संयोजन की वह बुनावट कब व किस तरह क्षीण हुई, कब व किस तरह टूटी, कब व किस तरह बिखरी इसे जानने की कोशिश करना भारत के भविष्य के लिये चिन्तित हमारे समय के अध्येताओं की प्रमुख चुनौती है. अंग्रेज़ों ने भारत की सामाजिक व्यवस्थाओं को तोड़कर अपनी जो संस्थाएं बनायीं उनसे लोक भारत का ताना-बाना कहीं बेहद कमज़ोर पड़ गया, कहीं टूट गया. उन्हीं व्यवस्थाओं के मोह में पड़कर स्वतन्त्र भारत के अध्येताओं व शासकों ने उसे जारी रखा. पहले अंग्रेज़ों का तो अब नये अध्येताओं का यह लोक जीवन पर कब्जा नहीं तो क्या है ? क्या हम यह अनदेखा कर सकते है कि कैसे किसी एक खास संस्कृति या समुदाय या रचना-रूप को शोधार्थी जिस रीति व परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर रहा है वह प्रस्तुतीकरण मात्र सबकुछ को अन्तत: उलट देता है ? सुविचारित ढंग से बहुत कुछ को बुनियादी रूप में बदल-बिगाड़ देता है ?

दरअसल यह स्थिति उन्नीसवीं सदी की शुरुआत से ही बिगड़ने लगी थी. विभिन्न ऐतिहासिक कारणों से वह ताना-बाना ही टूट गया जिसमें सिर्फ एक प्रदेश की नहीं, तमाम लोक समुदायों की परस्पर पूरकता बची रह पाती. स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमने उस पूरकता को न तो समझा और न उसे पुनर्विन्यस्त करने की कोई भी कोशिश की. हमने जिस समझ के आधार पर देश को व्यवस्थित करने का प्रयास किया, उसकी जड़ में इस देश की सदियों पुरानी और प्रामाणिक सामुदायिक व्यवस्थाएं थी ही नहीं. स्वतन्त्र होने पर हमें अपने लोक जीवन के अंग्रेज़ों द्वारा अवरुद्ध किये गये शक्ति के स्त्रोतों को खोलने पर विचार करना था लेकिन इसकी जगह हम इस बारीकी और मुश्किल से बनी और बहुस्तरीय सामुदायिक व्यवस्थाओं वाले देश को आधुनिक विकास के सांचे में फिट करने के विराट मगर निष्फल उपक्रम में जुट गये जिससे लगभग सभी समुदाय निरन्तर विपन्न और निस्सहाय होते गये. यजमानी प्रथा के लोप से तो मानो रीढ की हड्डी ही टूट गयी.

मुझे अब यह शिद्दत से लगने लगा है कि मसलन पश्चिमोन्मुख अध्ययनों ने बड़ी बारीकी से भारतीय समाज को टुकड़ा-टुकड़ा दर्शाने की खातिर यहां रह रहे तमाम समुदायों के देवी देवताओं में नैरन्तर्य ढूंढ़ने की जगह उनके बीच के छोटे छोटे अन्तरों को आत्यन्तिक बताकर उन्हें यथासम्भव फैलाने का प्रयास किया है. वरना सीधी-सादी निरन्तरताओं को रेखांकित करने के बजाय मामूली अन्तरों को इतना अधिक तूल न दिया गया होता. जिस तरह का ‘एपोरिया’-ऐसा सवाल जिसका जवाब नहीं है, ऐसी समस्या जिसका समाधान नहीं है-इन अध्येताओं ने गढ़ा है वह मिथ्या है, हेत्वाभास है.

धर्मपाल जैसे इतिहासकारों ने इसके कुछ सार्थक व आंख खोल देने वाले साक्ष्य व स्थापनाएं रखी हैं लेकिन दुर्भाग्य से पश्चिम-भक्त हमारे अकादमिक इतिहासकार तो उन्हें इतिहासज्ञ तक मानने से इंकार करते है. खैर ! इसके बरक्स हम गौर करें कि विभिन्न समुदायों के पारम्परिक रचना-कार्य-कौशलों को पास-पास रखने से एक भिन्न तरह का नक्शा उभर सकता है. यह नक्शा निश्चय ही अधूरा होगा, अच्छा खासा अधूरा होगा और इसे पूरा करने का अवकाश यहां नहीं है पर यदि इस नक्शे को पूरा किया जा सके तो हम साफ़ देख सकेंगे कि यह स्वायत्त सहवर्तित्व के मर्म-बोध से संघटित है, fragmented approach से नहीं.

इससे बड़ी विडम्बना भला और क्या होगी कि हमारा आत्म-विवेक व हमारी आलोचनात्मक मनीषा अब यह नहीं पूछती कि हमारी लिखित शब्द के प्रति भारतीय श्रध्दा और वाचिक परम्परा का सहअस्तित्व अब दुर्भिक्ष से ग्रसित एक ऐसे प्राणी में कैसे बदलता जा रहा है जो महज़ सांस लेता कंकाल-सा रह गया प्रतीत होता है ?

लोक सर्जना अक्सर एक जीवन्त व लगातार सक्रिय कल्पना है--किसी एक समय में ठहरी हुई नहीं है. इस कल्पना की जड़ें हमेशा सम्बन्धित समुदाय के मानस में गहरे तक रची-बसी होती है. हमारे यहां एक ही समय में अनेक सदियों का सहअस्तित्व है. और आख्यान सामूहिक स्मृति के बहुवर्णी फलन हैं. यहां स्थानीयता ही उन्मोचित हो सार्वभौम में रूपान्तरित हो जाती है. यह रूप-रूपंकर-रूपान्तरण की लीला है. लोकाभिव्यक्ति की पारम्परिक भाषा सदैव देशज संवेदनशीलता के नवोन्मेषित रचाव है. अपने उत्तरवर्ती चिन्तन में विट्गेंस्टाइन इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि एक भाषा की कल्पना करने का अर्थ एक जीवन-रूप की कल्पना करना है.
आगे पढ़ें

Pages:
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Dula Ram Saharan CHURU

 
 पीयूष दईया ने अच्‍छा लिखा है। वे बधाई के पात्र हैं। बधाई-------  
   
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 When you find any country have much wider concept of mainstream civilization,it only means lot of discrimination of smaller groups. Not only it is against the concept of democracy, but also against human rights,humanity and civilization in broader concept. 
   
[an error occurred while processing this directive]
 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in