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आप भी जहर खा रहे हैं ?

मुद्दा

 

आप भी जहर खा रहे हैं ?

देविंदर शर्मा

 

आपका भोजन धीमे जहर में बदल रहा है. फलों से सब्जियों तक, दूध से लेकर कोल्ड ड्रिंक, घी, खाद्य तेल, आटा, दाल और मसालों से मिठाई तक जो भी आप खा रहे हैं, इसकी पूरी आशंका है कि उसमें जहर है. बाजार से आप जो भी खाद्य पदार्थ खरीदते हैं वे करीब-करीब सभी मिलावटी हैं. भोजन आपका दुश्मन बन गया है.

दाल में मिलावट

 

रसीले आम अब आपका पसंदीदा फल नहीं रह गया है. इसे कैल्शियम कार्बाइड से पकाया जाता है. यह वही रसायन है जिसे पटाखों और सस्ते बम बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. कैल्शियम कार्बाइड में आर्सेनिक और फास्फोरस का अंश होता है. इनसे एसिटिलीन गैस निकलती है, जो फलों को तेजी से पकाती है. गैस के प्रभाव में आकर फल को विकसित करने वाले हार्मोंस तेजी से सक्रिय हो जाते हैं. कैल्शियम कार्बाइड का इस्तेमाल खाद्य पदार्थो में नहीं किया जाना चाहिए और इसे बच्चों की पहुंच से दूर रखा जाना चाहिए. इसकी सहायता से पकाया जाने वाला फल आकर्षक लगता है और उस पर रंग भी खूब निखरता है.

आपके परिवार में पीढि़यों से सोने से पहले एक गिलास दूध पीने की परंपरा चल रही होगी. आप हमेशा सोचते होंगे कि इससे आपके शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिल जाते हैं, किंतु अनेक वर्षों से सुनने में आ रहा है कि दूध में सिंथेटिक तत्वों की मिलावट हो रही है, जिनमें यूरिया, डिटरजेंट और खाद्य तेल शामिल हैं. आप बाजार से जो सब्जियां खाते हैं उनमें से अधिकांश में कीटनाशकों की भारी मात्रा होती है. ताजा और आकर्षक दिखाने के लिए बहुत सी सब्जियों को रसायनों के घोल में रखा जाता है. आंखों को भाए, इसके लिए इन्हें बनावटी रंगों से रंगा भी जाता है. हालिया वर्षो में इस तरह की खबरें बराबर आ रही हैं कि सब्जियों का आकार बढ़ाने के लिए उनमें आक्सीटोसिन हार्मोस के इंजेक्शन भी लगाए जा रहे हैं.

 
इस बात की पूरी संभावना है कि जो देसी घी आप खरीद रहे हैं वह मिलावटी हो. अच्छी कीमत अदा करने के बाद भी आपको पोषक तत्व के बजाय जानवरों की चर्बी, हड्डियों का चूरा और खनिज तेल मिलता है. जो लोग देसी घी का इस्तेमाल करने में असमर्थ हैं उनके लिए वनस्पति में भी मिलावट की जा रही है. इसमें स्टेरिन की मिलावट होती है, जो साबुन के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले पाम आयल का सह उत्पाद है. हरियाणा के पानीपत से खबर आई है कि वहां से पुलिस ने तीन हजार किलोग्राम मिलावटी घी बरामद किया है.


यह अकेली घटना नहीं है. इस प्रकार की घी उत्पादन की इकाइयां पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में जगह-जगह बिखरी हुई हैं. माना जाता है कि बाजार में बेचा जाने वाला 90 प्रतिशत वनस्पति घी खाद्य मिलावट रोकथाम अधिनियम की शर्तो का उल्लंघन करता है. मिलावट इस हद तक है कि मिठाई में इस्तेमाल होने वाले पिस्ते को भी बख्शा नहीं जा रहा है. मिलावट करने वाले व्यापारी घटिया क्वालिटी के मूंगफली दानों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर उन्हें रंग देते हैं. सिंथेटिक दूध भी आम है. इस मामले में भी देश का पश्चिमोत्तर भाग मिलावटी दूध और इससे बने उत्पादों में अग्रणी भूमिका निभा रहा है.


अब मुझे इस बात पर प्रकाश डालना चाहिए कि मिलावटी भोजन के कारण आपके साथ क्या-क्या हो सकता है? मिलावटी भोजन के कारण अनेक प्रकार की बीमारियां हो सकती हैं. जब तक डाक्टरों को यह पता नहीं चलेगा कि आपने मिलावटी वस्तु विशेष का उपभोग कर लिया है, तब तक वे भ्रम में डालने वाले सामान्य लक्षणों के आधार पर इलाज करते हैं. यही कारण है कि आम लोगों को यह पता नहीं चल पाता कि उनके रोग का संबंध मिलावटी भोजन से है.

उदाहरण के लिए मिलावटी पिश्तों के खाने से एसिडिटी, तेज सिरदर्द, उलटी और अनेक मामलों में गर्भवती महिला पर बड़ा घातक प्रभाव पड़ता है. सिंथेटिक दूध आपके शरीर के अंगों को अपूरणीय क्षति पहुंचाता है. यह कुल मिलाकर स्वास्थ्य को तो नुकसान पहुंचाता ही है, किंतु अगर आप हृदय और किडनी के रोगों से ग्रस्त हैं तो यह इन बीमारियों को तेजी के साथ बढ़ा सकता है. यूरिया खास तौर पर किडनी के लिए नुकसानदायक है, जबकि कास्टिक सोडा दिल और हाइपरटेंशन के मरीजों के लिए बेहद घातक है.

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कैल्शियम कार्बाइड से पके आम और केले सिरदर्द, चक्कर आना, नींद उड़ना और बहुत से मामलों में मानसिक असंतुलन की स्थिति पैदा कर सकते हैं. भोजन में लेड की अधिक मात्रा से दिमाग पर बुरा असर पड़ता है, जबकि कैडमियम से किडनी रोग और कैंसर हो सकता है. यह तो कुछ खतरे मात्र हैं, नुकसानदायक रसायनों से होने वाले नुकसान की सूची काफी लंबी है.


परेशान करने वाली बात यह है कि खाद्य पदार्र्थो में मिलावट पर रोकथाम की जिम्मेदार नियामक इकाइयां इस संबंध में जरा भी ध्यान नहीं दे रही हैं. हाल में टीवी कार्यक्रमों में बार-बार खबरें आने के बावजूद मिलावट करने वाले व्यापारियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने का शायद ही कभी प्रयास हुआ हो. कुछ नियमित छापेमारी और गिरफ्तारियों के अलावा इस दिशा में कोई भी सार्थक प्रयास नहीं हुए हैं.

 

टीवी पर एक कार्यक्रम के दौरान मैं स्वास्थ्य उप मंत्री को यह कहते सुनकर अचंभित रह गया कि समस्या यह है कि स्वास्थ्य राज्यों के अधीन विषय है और वे उपयुक्त कार्रवाई करने से सामान्यतया बचते हैं. इस प्रकार के बचकाने बयान से साफ हो जाता है कि सरकार मिलावटखोरों के खिलाफ कार्रवाई में अक्षम क्यों है? मुझे इसमें कोई कारण नजर नहीं आता कि स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस खतरनाक प्रवृत्ति पर अंकुश न लगा पाए.

 

मिलावटखोर व्यापारियों के खिलाफ जबरदस्त और व्यापक अभियान चलाए जाने की फौरी आवश्यकता है. अक्सर मिलावट किसान के स्तर से शुरू होती है. यह सही समय है कि इसके लिए किसानों पर भी शिकंजा कसा जाए, क्योंकि इस यथार्थ से मुंह नहींमोड़ा जा सकता कि लालच किसानों और व्यापारियों को खाद्य पदार्र्थो को जहरीला बनाने की ओर ले जा रहा है. इसीलिए मौजूदा कानूनों को कड़ा बनाकर मिलावटखोरों के लिए उम्र कैद और फांसी तक के प्रावधान करने चाहिए.


नवगठित भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण बड़े पैमाने पर मिलावट का मूकदर्शक नहीं बना रह सकता. यदि इसे नए कानून और मानक निर्धारित करने में समय भी लगेगा तो भी यह पहले से लागू खाद्य मिलावट रोकथाम अधिनियम के प्रावधानों का इस्तेमाल करते हुए मिलावट को आपराधिक कृत्य ठहरा सकता है और मौजूदा तंत्र को इसके अनुरूप कार्य करने को बाध्य कर सकता है. सवाल यह है कि हमारे देश का खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण कब तक अपेक्षित कार्रवाई करने से बचता रहेगा?

 

अब यह भी आवश्यक हो गया है कि खाद्य और उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के साथ-साथ खाद्य व कृषि मंत्रालय मिलावट के खिलाफ लोगों को सचेत करने के लिए संयुक्त अभियान छेड़े. कारगर कार्रवाई के लिए संबंधित मंत्रालय के सम्मलित प्रयासों की आवश्यकता है. मैं यह समझने में विफल हूं कि जब प्रधानमंत्री तमाम व्यापारिक गतिविधियों के लिए मंत्रियों के समूह का गठन कर सकते हैं तो लोगों के लिए स्वास्थ्यपूर्ण और सुरक्षित भोजन उपलब्ध कराने के लिए ऐसा क्यों नहीं कर सकते?

30.07.2009, 13.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

o p pal (pal.omprakash1@gmail.com) Delhi

 
 अच्छा लेख है. मिलावट पर रोक लगाने के लिए आपके सुझाव तो ठीक हैं लेकिन मेरे ख्याल से मुनाफाखोरी व मिलावट को सरकार स्वयं बढ़ावा दे रही है.एपीएमसी एक्ट में संशोधन और वायदा कारोबार को बढ़ावा देना दरअसल बाज़ार के खिलाड़ियों को खुली छूट देना ही है. 
   
 

भोला प्रसाद भगत (bholabhagat@hotmail.com) सत्यम कुटीर, काली ताजिया रोड,दिलावरपुर, मुंगेर-811201

 
 आपने समाज में चन्द पैसों के लिए खाद्य पदार्थों में की जा रही खतरनाक मिलाबट एवं उपयोग के वारे में हम उपभोक्ताओं को जागरूक करने एवं सरकार को तत्काल कठोर कदम उठाने का जो अह्वान किया है, हम आपका समर्थन करते हैं।

चूँकि, इस प्रकार की मिलावट स्वास्थ्य के साथ घातक खिलवाड़ है, अत: ऐसे राक्षस लोगों के विरूद्ध केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा कठोरत्तम कानून ( मृत्युदण्ड/ आजीवन सश्रम कारावास )की सजा हो और तुरन्त इस पर कारगर कारर्वाई की जाय। आपसे अनुरोध है कि इस प्रकार की मिलावटी सामग्री की पहचान करने के उपायों की भी जानकारी देने की कृपा करें।
 
   
 

birijesh kumar saini kotputli japur

 
 लेख बहुत अच्छा है मिलावट रोकने के लिए सरकार को जन जागृति की आवश्यकता हैं व तहसील स्तर पर लैब लगाने की आवश्यकता हैं ताकी इमानदार दुकानदार अपने प्रोडक्ट की जाँच करवा सकें.  
   
 

ZU Sheikh (zu_sheikh@yahoo.co.in) SIDHI MP.

 
 इस तरह के कार्य देशद्रोह के समक्ष अपराध माने जाने चाहिए. 
   
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