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इस अंक में

 

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

हमारी चिंतना

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

कमजोर सरकार और गैरजिम्मेवार पत्रकारिता

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
 पहला पन्ना > साहित्य > अथः प्रेम कथाPrint | Send to Friend | Share This 

अनुपस्थित के होने में

एक प्रेम की एकतरफा कथा

 

अनुपस्थित के होने में

 

शुभ शुभदे,

सच में मेरा इरादा ऐसा नहीं था. मैंने अपने यक़ीन का बयान इसलिए नहीं किया था कि आपको आहत करूँ. मैं पत्रों के इस नए सिलसिले को आपको कोसने के अवसर की तरह उपयोग में नहीं लाना चाहता. यह मेरे लिए हमेशा की तरह ऊर्जा का एक स्रोत है. अपने होने की शिनाख़्त है. सृजन का एक माध्यम है. अपने आप पर भरोसा जगाने वाला एक माध्यम है.


आपने पूछा है कि मेरे जीवन में आपकी क्या अहमियत है. यह ऐसा सवाल है, जिसके बारे में जवाब देते हुए कुछ बेईमान हो जाने का ख़तरा है. अहमियत एक सापेक्षिक शब्द है. यह तुलनात्मक स्थिति है. सच कहूँ तो अहमियत इतनी है जितनी अपने ख़ुद के होने की है.

लेकिन दुनियावी मायनों से देखूँ तो हम दोनों का रिश्ता हाशिए पर नज़र आता है. इसकी कोई सामाजिक स्वीकार्यता कभी नहीं हो सकती. इस कथित समाज की मुझे कतई परवाह नहीं. कभी थी भी नहीं. लेकिन आप कह सकती हैं कि पुरुष प्रधान समाज में मेरे लिए यह कहना आसान है. यह सच है. मैं मानता हूँ कि आपके लिए इसे परिभाषित करना बहुत कठिन होगा. मैं जानता हूँ कि इसे सामाजिक स्वीकार्यता कभी मिल ही नहीं सकती. समाज प्रेम को नहीं मानता. समाज के लिए प्रेम की कोई वैधता ही नहीं है. प्रेम के रिश्ते बहुधा इस समाज के लिए अवैध रिश्तों की श्रेणी में आते हैं. इस नाते मेरा और आपका रिश्ता भी अवैध रिश्ता है. लेकिन शुभदे, क्या प्रेम भी अवैध हो सकता है भला?

ख़लील ज़िब्रान ने कहा है कि प्रेम आपको आटे की तरह गूँथता है और आपको तब तक गूँथता रहता है जब तक आप जीवन नाम की रोटी बनाने लायक नरम नहीं हो जाते. तो जो प्रेम आपको जीवन के लिए तैयार करता हो, वह ग़लत या अवैध कैसे हो सकता है? जब समाज किसी प्रेम को अवैध कहता है तो वह इसमें देह को शामिल मानकर चलता है. उसके लिए अशरीरी प्रेम कुछ है ही नहीं. यह सिर्फ़ मैं जानता हूँ और आप जानती हैं कि हमारे प्रेम में कभी देह थी ही नहीं. क्या तो भी हमारा प्रेम अवैध है?

मैं जानता हूँ कि यह अपनी सुविधा के लिए गढ़े जा रहे तर्कों की तरह भी देखा जा सकता है लेकिन यह किसी के लिए जीवन का सच भी हो सकता है.

मेरे जीवन का सच कुछ और ही है. साहिर लुधियानवी ने अपनी एक नज़्म में लिखा है, ‘तू नहीं, तेरा ग़म, तेरी जुस्तजू भी नहीं, गुज़र रही है ज़िंदगी कुछ ऐसे कि इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं...’. पता नहीं कि साहिर ऐसा कैसे कह सके. मैं ऐसा कभी नहीं कह सका. क्योंकि मुझे अपनी दुनिया में हमेशा आपकी कमी खलती रही. उसे हमेशा आपके सहारे की आरज़ू रही.

सच में आप मेरे लिए जीवन का सहारा हैं. ख़ासकर उस जीवन का जिसमें सृजनात्मकता है और जिसके बिना मैं एक आम आदमी हो जाउँगा. और आप जानती हैं कि मैं आम आदमी नहीं बनना चाहता.

सादर,
आपका,
गंधर्व.

30.07.2009, 15.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sooraj () bhopal

 
 गंधर्व जी अगर आप गंधर्व हैं तब तो समाज की चिंता करना सहज है. गंधर्भ रिश्ते भी होते हैं. आप समझ रहे हैं ना मैं क्या कह रहा हूं. प्रेम की इकतरफा कथा नहीं होती ये द्विपक्षीय होती है. हां भक्ति और आसक्ति की बात और है. प्रेम की वैधता अवैद्यात देह नहीं दिमाग तय करता है. आप आम आदमी नहीं है आप गंधर्व है.

एक बात और एकतरफा प्रेम कथा कैसे होगी. फीडबैक चाहिए ना. अपूर्व के लिए भूतपूर्व न बने. जैसे दुनिया दो से बसंती है वैसे ही प्रेम भी. प्रेम अनुपस्थिति कैसी ? वह भी जब देह आपके लिए मायने नहीं.
 
   
 

vidhu bhopal

 
 किसी के प्रेम में महान बनना और किसी के प्रेम के सहारे महान बनना. दोनों में फर्क है. एक बात कहीं पढ़ी थी स्त्री के जीवन का महत्वपूर्ण अर्थ उसकी देह ही है. देह के अतिरिक्त सौन्दर्य, ज्ञान, जाति, कुलीनता की जो पूंजी उसके पास होती है वो तो उसकी परोक्ष उपलब्धि जैसी है.

स्त्री की देह ही उसकी मूल पूंजी है. और उसकी उपस्थिति से ही पुरुष जीवन को आसक्ति से श्रधा तक के धरातल प्राप्त होतें हें. बुद्धिमान लेखक साधारण आदमी नहीं बनना चाहता. बताएं फिर जिन्दगी में कैसे तालमेल होगा.
 
   
 

हरियश राय (hariyashrai@gmail.com) अहमदाबाद

 
 बेहतर पत्र है . थोड़ा और विस्‍तार होता तो भावनाएं, अनुभूतियों व आवेग ज्‍यादा शिद्वत से उभरकर सामने आते. 
   
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