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खोखली भाषा,खोखले लोकतंत्र

विचार

 

खोखली भाषा, खोखला लोकतंत्र

अरुंधति राय

अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव



हम आज भी इस सवाल पर बहस किए जा रहे हैं कि क्या मृत्यु के बाद जीवन होता है. आइए, इसी क्रम में एक और सवाल को जोड़ लें. क्या लोकतंत्र के बाद जीवन होता है? यदि हां, तो उस जीवन का स्वरूप क्या होगा? लोकतंत्र से मेरा अर्थ किसी आदर्श अथवा आकांक्षा से नहीं है. मेरा अर्थ इसके कामकाजी मॉडल से है यानी पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र या फिर इसके विभिन्न संस्करण!

लोकतंत्र


तो सवाल है कि क्या लोकतंत्र के बाद जीवन होता है? इस सवाल का जवाब देने के सारे प्रयास दरअसल विभिन्न किस्म की प्रशासनिक प्रणालियों की तुलना में तब्दील हो जाते हैं और आखिरकार इनका अंजाम कुछ आक्रामक तरीके से लोकतंत्र के बचाव में ही होता है. हम कहते हैं कि इसमें गड़बड़ियां हैं. यह आदर्श नहीं है, लेकिन बाकी तमाम चीजों से तो बेहतर ही है जो आज हमारे सामने हैं. अचानक ही कोई बोल पड़ेगा, ''तो क्या आप चाहेंगे कि आप भी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सउदी अरब या सोमालिया बन जाएं?''

क्या लोकतंत्र को एक ऐसा यूटोपिया होना चाहिए जो सभी 'विकासशील' समाजों के लिए आकांक्षणीय है, यह एक बिल्कुल ही अलग सवाल है. (मुझे ऐसा लगता है कि यह होना चाहिए. इसका आरंभिक आदर्शवादी चरण आकांक्षा के योग्य है). लेकिन लोकतंत्र के बाद जीवन के होने या न होने का सवाल हमारे जैसे उन लोगों को संबोधित है जो पहले से ही लोकतंत्र में रहते आ रहे हैं, या कहें कि उन देशों में जो लोकतांत्रिक होने का ढोंग करते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि हम वापस पुरानी और अविश्वसनीय हो चुकी एकाधिकारवादी या सर्वसत्तावादी प्रशासनिक प्रणालियों की ओर चले जाएं. हम यह कहना चाह रहे हैं कि प्रातिनिधिक लोकतंत्र की यह प्रणाली- जो कि कुछ ज्यादा ही प्रातिनिधिक और काफी कम लोकतांत्रिक है- उसमें कुछ ढांचागत समायोजन की जरूरत है.

यहां वास्तव में हम यह सवाल उठा रहे हैं कि हमने अपने लोकतंत्र के साथ क्या कर डाला है? हमने उसे क्या बना दिया है? एक बार लोकतंत्र के संपूर्ण दोहन के बाद आखिर क्या होता है? क्या होता है जब प्रत्येक लोकतांत्रिक संस्था किसी खतरनाक चीज़ में तब्दील हो जाती है? आज जब लोकतंत्र और मुक्त बाजार एक साथ मिल कर एकल जैव तत्व बन चुके हैं और एक ही विचार है जो लगातार मुनाफा बढ़ाने के उद्देश्य के इर्द-गिर्द घूमता रहता है, ऐसे में क्या होगा? क्या इस प्रक्रिया को उलटना संभव है? कोई ऐसी चीज़ जिसे अब खत्म कर दिया गया हो, क्या अपने मूल स्वरूप में वापस जा सकती है?


आज हमें इस धरती को बचाने के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टि की जरूरत है. जिन सरकारों का अस्तित्व ही दोहन पर टिके अल्पकालिक और तात्कालिक हितों से जुड़ा हो, क्या वे ऐसा कर सकती हैं? जो लोकतंत्र हमारी छोटी-मोटी उम्मीदों और प्रार्थनाओं का एक पावन उत्तर है, हमारी निजी स्वतंत्रताओं का संरक्षक है और हमारे सपनों का पोषण करता है, क्या वह इंसानी सभ्यता की आखिरी मंजिल साबित होगा? क्या लोकतंत्र इंसानों को इसीलिए इतना प्रिय है कि वह हमें हमारी सबसे बड़ी मूर्खता का प्रतिबिंब दिखाता है- हमारे अदूरदर्शी होने की छवि? अधिकतर पशुओं की तरह सिर्फ वर्तमान में जीने की हमारी अक्षमता और भविष्य में बहुत दूर तक देख पाने की हमारी अक्षमता का मिश्रण ही हमें जीवित प्राणियों में सबसे अद्भुत बनाता है- हमें जानवर और पैगंबर दोनों से ही अलग करता है. ऐसा लगता है कि हमारी अद्भुत मेधा ने जीने की हमारी चाह को ही पीछे छोड़ दिया है. हम धरती को कुछ इस तरह से लूटे जा रहे हैं कि जैसे चीजों का संग्रहण करने से ही हमारी कोई खोई हुई अथाह और बहुमूल्य चीज हमें वापस मिल पाएगी.

यह कहना मेरा बड़बोलापन होगा कि इन सवालों का जवाब मेरी निबंधो की नई पुस्तक लिसनिंग टु ग्रासहॉपर्स देती है. यह पुस्तक सिर्फ कुछ हद तक इस बात का विवरण देती है, कि जैसे लोकतंत्र की लौ अब चुक रही हो और अब लोकतंत्र पर उस स्थिरता और इंसाफ के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता जिसका हम कभी सपना देखा करते थे. ये सभी निबंध भारत में निर्णायक मौकों पर सार्वजनिक हस्तक्षेप के तौर पर तकरीबन आपात स्थितियों में लिखे गए हैं- गुजरात में राज्य द्वारा प्रायोजित मुस्लिमों के जनसंहार के दौरान; 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले के दोषी मुहम्मद अफज़ल को फांसी पर चढ़ाए जाने की तय तारीख से ठीक पहले; पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के भारत दौरे पर; 2008 की गर्मियों में कश्मीर में हुए जन असंतोष के उभार के दौरान; और 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद. ये निबंध घटनाओं की प्रतिक्रिया नहीं थे, बल्कि प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया थे.

भले ही इनमें से कई निबंध काफी आक्रोश में लिखे गए हैं, उन क्षणों में जब कुछ कहने से ज्यादा मुश्किल चुप रहना हो रहा था, इनमें एक समान सूत्र देखा जा सकता है. ये निबंध लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं या विचलनों के बारे में नहीं हैं. ये दरअसल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के परिणामों और उसके काम करने के तौर-तरीकों पर पूरक टिप्पणियां हैं. (या फिर जैसा कि श्रीनगर की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे एक कश्मीरी प्रदर्शनकारी ने अपनी तख्ती पर लिखा हुआ था, दुनिया की सबसे बड़ी ''डेमन-क्रेजी'' के बारे में. उसकी तख्ती पर लिखा था- ''डेमोक्रेसी विदाउट जस्टिस यानी डेमन क्रेजी).
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Abhijeet Sen Raigarh

 
 One have to think about his country's foreign, economic and environmental policies as well as industrial,health and banking policies along with fighting for food, employment and shelter. 
   
 

suresh chandra parekh Toranto

 
 देश में जिस तरह से विकास के पैमाने बनाए गए हैं और असमानता जिस तेज़ी से बढ़ रही है, उसमें किसी तरह की बदलाव की बात संभव नहीं है. हम लोग एक भ्रष्ट व्यवस्था के अंग हैं और अपने देश से दूर बैठ कर जब मैं भारत के बारे में सोचता हूं तो मुझे अपने देश पर शर्म आती है. तोगड़िया जी, सिंघल जी, अडवाणी जी, मुझे क्षमा करें. मुझे तो एक ही वाक्य सुझ रहा है- शर्म से कहो हम हिंदू हैं, शर्म से कहो हम भारतीय हैं. 
   
 

दीपक (deepakrajim@gmail.com) दुबई

 
 पहली बात यह कि लोकतंत्र उस देश कि व्यवस्था है जहा लोग पढे-लिखे समॄद्ध और जागरुक हो इसलिये भारत मे यह इतनी जल्दी और आदर्श रुप मे संभव नही ....याद रखिये मानवाधिकार कि दुहाई दे दे के आप समाजवाद नही ला सकते समाजवाद तभी आयेगा जब पूंजीवाद परिपक्व होगा....दर-असल पूंजीवाद कि निष्पत्ती का नाम ही समाजवाद होगा ....क्योकि जब उद्योग और पैसा आयेगा तब वह पैसा किसी पुंजीवादी के खीसे मे हमेशा नही भरे रहेगा जाहिर है वह पैसा घुमफ़िरकर फ़िर समाज के हिस्से मे आयेगा ....

पुंजीपति उसका दुरुपयोग भी करेंगे और अपनी तिजौरी पहले भरेंगे यह बात सही है मगर यह भी सही है कि आप को भी कुछ ना कुछ जरुर मिलेगा और वह कोई डाका नही डाल रहा है उसने पूंजी पैदा की है जाहिर है उसमें देश कि संपत्ति लगेगी और उस लिहाज से उस पर सभी का बराबर हक होगा ....मगर अभी बराबरी से क्या बाटेंगे हमारे पास गरीबी के सिवा क्या है ? इसलिये पुंजी के समान वितरण के लिये ज्यादा जरुरी है कि पुंजी पहले पैदा तो हो !!मसलन आज अगर किसी उद्योगपति के पास ५०० रु है और आसपास के लोग २ रुपये मे गुजर-बसर कर रहे है तब कल अगर वहा उद्योग लग गये तब उद्योगपति के पास १००० हो गये तो आपके पास भी २ रु, से ५० रु हो जायेंगे आपने भी कुछ कमाया है !!

मगर मै फ़िर भी यह कहुंगा कि यह फ़र्क इतना ज्यादा नही होना चाहिये और इस फ़र्क के लिये उद्योगपति या नेता जिम्मेदार नही यह सिस्टम जिम्मेदार है... आपका तंत्र जिम्मेदार है इसलिये नेता बदलने या सरकार बदलने से काम नही चलेगा इस व्यस्था को बदलना होगा अमीर गरिब इस तंत्र के हिस्से है तंत्र इसी ढंग से काम करेगा तब चेहरे भले बदले स्थिती नही बदलेगी !!और यह भी सोचने कि बात है कि दो आदमी कभी भी समान नही हो सकते इसलिये उन्हे समान बनाना ही गलत धारणा है समाजवाद का मतलब होगा कि प्रयेक आदमी को असमान होने के लिये समान अवसर मिलना चाहिए सबके पास शिक्षा स्वास्थ्य और भोजन करियर के अवसर समानतापुर्वक उपलब्ध होने चाहिए !!

इन सबके लिये भारत को गाल बजाने वाला लोकतंत्र नही बल्कि लोकतांत्रिक तानाशाही चाहिये.... इसके बगैर यह सब संभव नही ...अब आप सब बुद्दीजीवी ही देखे आप सब नेता अफ़सर सिस्टम को कोसते है मगर क्या किसी ने सोचा कि इसका जड़ कहा है इसका जड़ है आपकी चुनाव प्रणाली आप चिल्ला रहे है वोट डालो मगर किसको ?क्या जनता को अधिकार है कि वह सब नेताऒ को खारिज कर सके ? क्या सच्चे लोकतंत्र के लिये यह जरुरी नही ? फ़िर क्या एक शिक्षित और गैर शिक्षीत को आप बराबर मान लेंगे इसलिये यदि एक शिक्षित अगर वोट डाले तब उसके वोट को एक अनपढ के वोट से दो गुना ज्यादा महत्व देना चाहिये ....निरक्षर होने का यह अपमान आपके शिक्षा के स्तर मे क्रांति करेगा ....

ये आपके रैली और जनजगरण अब काम नही आने वाले !! फ़िर शिक्षा भी आपके ज्ञान कि परीक्षा होनी चाहिये ना कि आपके स्मृति कि ....रट्टा लगाना कोई ज्ञान का लक्षण नही ! हमे अपने सारे सिस्टम मसलन न्याय व्यवस्था,चुनाव व्यवस्था, शिक्षा ,उद्योग सबको खंगालने कि जरुरत है वरना जब जब तक यह तंत्र ऐसा है अमीर गरीब का फ़ासला बढता रहेगा ,चेहरो को कब तक बदलोगे? चेहरो को बदलने से काम नही चलेगा !! और अब ये लोकतांत्रिक शब्द खोखले हो गये इसका जिम्मा इन नेताओ पर नही इन बुद्धीजीवीयो पर जाता है क्योकि इन्होने इनको कभी रिफ़ाईन ही नही किया कि ये २१ सदी के साथ चल सके .....ये बुद्धिजीवी खुद तो कार मे घुम रहे है मगर विचार अभी बैलगाडी मे ही सफ़र कर रहे है !!
 
   

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