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खोखली भाषा,खोखले लोकतंत्र
विचार
खोखली भाषा, खोखला लोकतंत्र
अरुंधति राय
अनुवादः अभिषेक श्रीवास्तव
हम आज भी इस सवाल पर बहस किए जा रहे हैं कि क्या मृत्यु के बाद जीवन होता है. आइए,
इसी क्रम में एक और सवाल को जोड़ लें. क्या लोकतंत्र के बाद जीवन होता है? यदि हां,
तो उस जीवन का स्वरूप क्या होगा? लोकतंत्र से मेरा अर्थ किसी आदर्श अथवा आकांक्षा
से नहीं है. मेरा अर्थ इसके कामकाजी मॉडल से है यानी पश्चिमी उदारवादी लोकतंत्र या
फिर इसके विभिन्न संस्करण!
तो सवाल है कि क्या लोकतंत्र के बाद जीवन होता है? इस सवाल का जवाब देने के सारे
प्रयास दरअसल विभिन्न किस्म की प्रशासनिक प्रणालियों की तुलना में तब्दील हो
जाते हैं और आखिरकार इनका अंजाम कुछ आक्रामक तरीके से लोकतंत्र के बचाव में ही
होता है. हम कहते हैं कि इसमें गड़बड़ियां हैं. यह आदर्श नहीं है, लेकिन बाकी
तमाम चीजों से तो बेहतर ही है जो आज हमारे सामने हैं. अचानक ही कोई बोल पड़ेगा,
''तो क्या आप चाहेंगे कि आप भी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, सउदी अरब या सोमालिया
बन जाएं?''
क्या लोकतंत्र को एक ऐसा यूटोपिया होना चाहिए जो सभी 'विकासशील' समाजों के लिए
आकांक्षणीय है, यह एक बिल्कुल ही अलग सवाल है. (मुझे ऐसा लगता है कि यह होना
चाहिए. इसका आरंभिक आदर्शवादी चरण आकांक्षा के योग्य है). लेकिन लोकतंत्र के
बाद जीवन के होने या न होने का सवाल हमारे जैसे उन लोगों को संबोधित है जो पहले
से ही लोकतंत्र में रहते आ रहे हैं, या कहें कि उन देशों में जो लोकतांत्रिक
होने का ढोंग करते हैं. इसका अर्थ यह नहीं है कि हम वापस पुरानी और अविश्वसनीय
हो चुकी एकाधिकारवादी या सर्वसत्तावादी प्रशासनिक प्रणालियों की ओर चले जाएं.
हम यह कहना चाह रहे हैं कि प्रातिनिधिक लोकतंत्र की यह प्रणाली- जो कि कुछ
ज्यादा ही प्रातिनिधिक और काफी कम लोकतांत्रिक है- उसमें कुछ ढांचागत समायोजन
की जरूरत है.
यहां वास्तव में हम यह सवाल उठा रहे हैं कि हमने अपने लोकतंत्र के साथ क्या कर
डाला है? हमने उसे क्या बना दिया है? एक बार लोकतंत्र के संपूर्ण दोहन के बाद
आखिर क्या होता है? क्या होता है जब प्रत्येक लोकतांत्रिक संस्था किसी खतरनाक
चीज़ में तब्दील हो जाती है? आज जब लोकतंत्र और मुक्त बाजार एक साथ मिल कर एकल
जैव तत्व बन चुके हैं और एक ही विचार है जो लगातार मुनाफा बढ़ाने के उद्देश्य के
इर्द-गिर्द घूमता रहता है, ऐसे में क्या होगा? क्या इस प्रक्रिया को उलटना संभव
है? कोई ऐसी चीज़ जिसे अब खत्म कर दिया गया हो, क्या अपने मूल स्वरूप में वापस
जा सकती है?
आज हमें इस धरती को बचाने के लिए एक दीर्घकालिक दृष्टि की जरूरत है. जिन सरकारों
का अस्तित्व ही दोहन पर टिके अल्पकालिक और तात्कालिक हितों से जुड़ा हो, क्या वे
ऐसा कर सकती हैं? जो लोकतंत्र हमारी छोटी-मोटी उम्मीदों और प्रार्थनाओं का एक
पावन उत्तर है, हमारी निजी स्वतंत्रताओं का संरक्षक है और हमारे सपनों का पोषण
करता है, क्या वह इंसानी सभ्यता की आखिरी मंजिल साबित होगा? क्या लोकतंत्र
इंसानों को इसीलिए इतना प्रिय है कि वह हमें हमारी सबसे बड़ी मूर्खता का
प्रतिबिंब दिखाता है- हमारे अदूरदर्शी होने की छवि? अधिकतर पशुओं की तरह सिर्फ
वर्तमान में जीने की हमारी अक्षमता और भविष्य में बहुत दूर तक देख पाने की हमारी
अक्षमता का मिश्रण ही हमें जीवित प्राणियों में सबसे अद्भुत बनाता है- हमें
जानवर और पैगंबर दोनों से ही अलग करता है. ऐसा लगता है कि हमारी अद्भुत मेधा ने
जीने की हमारी चाह को ही पीछे छोड़ दिया है. हम धरती को कुछ इस तरह से लूटे जा
रहे हैं कि जैसे चीजों का संग्रहण करने से ही हमारी कोई खोई हुई अथाह और
बहुमूल्य चीज हमें वापस मिल पाएगी.
यह कहना मेरा बड़बोलापन होगा कि इन सवालों का जवाब मेरी निबंधो की नई पुस्तक
लिसनिंग टु ग्रासहॉपर्स देती है. यह पुस्तक सिर्फ कुछ हद तक इस बात का विवरण
देती है, कि जैसे लोकतंत्र की लौ अब चुक रही हो और अब लोकतंत्र पर उस स्थिरता
और इंसाफ के लिए भरोसा नहीं किया जा सकता जिसका हम कभी सपना देखा करते थे. ये
सभी निबंध भारत में निर्णायक मौकों पर सार्वजनिक हस्तक्षेप के तौर पर तकरीबन
आपात स्थितियों में लिखे गए हैं- गुजरात में राज्य द्वारा प्रायोजित मुस्लिमों
के जनसंहार के दौरान; 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हुए हमले के दोषी मुहम्मद अफज़ल
को फांसी पर चढ़ाए जाने की तय तारीख से ठीक पहले; पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति
जॉर्ज बुश के भारत दौरे पर; 2008 की गर्मियों में कश्मीर में हुए जन असंतोष के
उभार के दौरान; और 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमलों के बाद. ये
निबंध घटनाओं की प्रतिक्रिया नहीं थे, बल्कि प्रतिक्रिया की प्रतिक्रिया थे.
भले ही इनमें से कई निबंध काफी आक्रोश में लिखे गए हैं, उन क्षणों में जब कुछ
कहने से ज्यादा मुश्किल चुप रहना हो रहा था, इनमें एक समान सूत्र देखा जा सकता
है. ये निबंध लोकतांत्रिक प्रक्रिया में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं या विचलनों के
बारे में नहीं हैं. ये दरअसल दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में लोकतांत्रिक
प्रक्रिया के परिणामों और उसके काम करने के तौर-तरीकों पर पूरक टिप्पणियां हैं.
(या फिर जैसा कि श्रीनगर की सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे एक कश्मीरी प्रदर्शनकारी
ने अपनी तख्ती पर लिखा हुआ था, दुनिया की सबसे बड़ी ''डेमन-क्रेजी'' के बारे
में. उसकी तख्ती पर लिखा था- ''डेमोक्रेसी विदाउट जस्टिस यानी डेमन क्रेजी).
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आर्मेनियाई पत्रकार रांत डिंक की हत्या की पहली सालगिरह पर जनवरी 2008 में मैंने
इस्तानबुल में एक लेक्चर दिया था. डिंक को उसके दफ्तर के बाहर सड़क पर गोली मार
दी गई थी क्योंकि उसने तुर्की में सार्वजनिक रूप से वर्जित एक विषय को उठाने का
दुस्साहस किया था- 1915 में आर्मेनियाइयों का हुआ जनसंहार, जिसमें दस लाख से
ज्यादा लोग मारे गए थे. मेरा अभिभाषण नरसंहारों और 'प्रगति' के साथ उनके
प्राचीन अन्योन्य संबंधों पर था.
मुझे यह तथ्य हमेशा चौंकाता रहा है कि तुर्की में जिस राजनीतिक पार्टी ने
आर्मेनियाई जनसंहार को अंजाम दिया, उसका नाम कमेटी फॉर यूनियन एंड प्रोग्रेस
था. लिसनिंग टु ग्रासहॉपर्स में अधिकतर निबंध दरअसल यूनियन और प्रोग्रेस के
समकालिक संबंधों पर ही हैं, या फिर आज के मुहावरे में कहें तो राष्ट्रवाद और
विकास के संबंधों पर- वे दो तत्व जो आधुनिक मुक्त बाजार लोकतंत्र के दो उच्चतम
और निर्विरोध टि्वन टावर हैं. हम जानते हैं कि अपने अतिवादी रूप में ये दोनों
ही तत्व इतनी क्षमता रखते हैं कि ये सनातन विनाश ला सकते हैं (परमाणु युध्द,
जलवायु परिवर्तन).
ये निबंध हालांकि 2002 से 2008 के बीच लिखे गए, लेकिन इनमें एक अदृश्य पन्ना
इनका प्रस्थान वर्ष 1989 है जब अफगानिस्तान की ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियों में पूंजीवाद
ने रूसी साम्यवाद के खिलाफ अपने पुराने जिहाद में जीत हासिल की. (और वहां समय
का पहिया एक बार फिर घूम रहा है. क्या वे ही पहाड़ अब पूंजीवाद को दफनाने की
तैयारी में हैं? इस बारे में कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी). सोवियत संघ के पतन और
बर्लिन की दीवार के गिरने के कुछ महीनों के भीतर ही कभी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का
नेतृत्व करने वाले भारत ने गजब की तेज कलाबाजी खाई और नई एकध्रुवीय दुनिया के
बादशाह अमेरिका के साथ हो लिया.
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जिन लोगों की जमीनें बांधों के जलाशयों में डूब रही हैं और जिनके घरों पर बुलडोजर
चलाया जा रहा है, उनसे वे कहते हैं, 'क्या आपके पास विकास का कोई वैकल्पिक मॉडल
है?' |
अचानक ही खेल के सारे नियम पूरी तरह बदल गए. वे करोड़ों लोग जो सुदूर गांवों और
अनछुए जंगलों की गोद में रहते थे, जिनमें से कई ने तो बर्लिन या सोवियत संघ का
नाम तक न सुना होगा, उन्होंने कल्पना भी नहीं की होगी कि इन दूरदराज के देशों
में हुई घटनाएं कैसे उनके जीवन पर असर डालेंगी. हालांकि इन लोगों के विस्थापन
और वंचितीकरण की प्रक्रिया तो पचास के दशक में ही शुरू हो चुकी थी जब भारत ने
सोवियत का विकास मॉडल अपना लिया था जिसके तहत विशाल स्टील संयंत्रों और हजारों
बड़े बांधों को अर्थव्यवस्था के शिखर पर होना था. निजीकरण और ढांचागत समायोजन के
दौर ने इस प्रक्रिया को दिमाग को झकझोर कर रख देने वाली रफ्तार दे डाली.
आज 'प्रगति' और 'विकास' जैसे शब्द 'आर्थिक सुधार', 'विनियमन' और 'निजीकरण' के
पर्याय बन चुके हैं. 'स्वतंत्रता' का अर्थ आज 'चुनाव' हो गया है. इसका इंसानी
स्वतंत्रता से बहुत ज्यादा लेना-देना नहीं रह गया है, बल्कि यह स्वतंत्रता
डियोडरेंट के अलग-अलग ब्रांड के बीच चुनाव करने की है. 'बाजार' का अर्थ अब ऐसी
जगह नहीं रह गया है जहां आप सामान खरीदने जाते थे. 'बाजार' एक सीमाविहीन स्पेस
है जहां विशाल निगम अपने अज्ञात चेहरों के साथ कारोबार करते हैं, जिसमें 'वादों'
की खरीद-फरोख्त होती है. अब 'न्याय' का अर्थ रह गया है 'मानवाधिकार' (जिसके बारे
में वे कहते हैं कि इनमें से 'कुछ' को ही यह हासिल होगा). भाषा की यह चोरी,
शब्दों को उधार लेकर हथियारों की तरह तैनात करने की यह तकनीक, अपनी वास्तविक
नीयत को छुपाने और उनके पारंपरिक अर्थ से ठीक विपरीत अर्थ देने का यह प्रयोग नई
व्यवस्था के रखवालों की सबसे चौंकाने वाली रणनीतिक विजय में से एक है. इस जीत
ने उन्हें मौका दिया है कि वे अपने विरोधियों को हाशिये पर डाल सकें, आलोचना की
भाषा से उन्हें वंचित कर सकें और 'प्रगति विरोधी', 'विकास विरोधी', 'सुधार
विरोधी' और जाहिर तौर पर 'राष्ट्र विरोधी' कह कर पूरी तरह खारिज कर सकें. आप
किसी नदी को बचाने या जंगल को बनाए रखने की बात करके देखें, वे तुरंत कहेंगे, 'क्या
आप प्रगति में विश्वास नहीं करते?' जिन लोगों की जमीनें बांधों के जलाशयों में
डूब रही हैं और जिनके घरों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है, उनसे वे कहते हैं, 'क्या
आपके पास विकास का कोई वैकल्पिक मॉडल है?' ऐसे लोग जो इस बात में विश्वास करते
हैं कि सरकार का कर्तव्य लोगों को बुनियादी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और
सामाजिक सुरक्षा देना है, उनसे वे कहते हैं, 'आप बाजार के खिलाफ हैं.' आखिर एक
विक्षिप्त के अलावा और कौन बाजार के खिलाफ हो सकता है?
इन चुराए गए शब्दों को वापस पाने के लिए जिस व्याख्या की जरूरत पड़ेगी, वह
लगातार ध्यान भंग करने वाली इस दुनिया की रफ्तार में खलल डालेगी; वो भी तब जबकि
स्वतंत्र अभिव्यक्ति गरीबों के लिए बेहद महंगी हो चुकी है. हमारे कुछ नहीं कर
पाने के पीछे दरअसल, भाषा का यह अर्थभेद ही प्रमुख कारण है.
इस किस्म की 'प्रगति' ने भारत में एक विशाल मध्यवर्ग को पैदा किया है जो अचानक
आई दौलत और उसी के साथ अचानक आने वाली प्रतिष्ठा के मद में चूर है- और इसी के
साथ एक बेहद विशाल निम्न वर्ग को भी पैदा किया है. सैंकड़ों-करोड़ों लोग बाढ़,
अकाल और जमीन के बंजर होने के कारण वंचित और अपनी जमीनों से विस्थापित हो गए
हैं, जिसकी वजह विशाल बुनियादी ढांचा परियोजनाएं, पर्यावरण इंजीनियरिंग, बांध,
खदान और विशेष आर्थिक क्षेत्र हैं. इन सभी का विकास दरअसल गरीबों के नाम पर ही
किया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह नए कुलीन वर्ग की बढ़ती मांग की भरपाई करने
के लिए है.
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'विकास' पर इस विमर्श के केन्द्र में शामिल है जमीन की लड़ाई. भारत का वित्त
मंत्री बनने से पहले पी. चिदंबरम एनरॉन के वकील थे और एक बहुराष्ट्रीय खनन निगम
वेदांत के निदेशक बोर्ड में सदस्य थे. यह कंपनी उड़ीसा की नियमगिरी पहाड़ियों को
फिलहाल बरबाद कर रही है. इनकी विश्वदृष्टि भी शायद उनके पेशेवर करियर की ही देन
थी या हो सकता है कि ठीक इसका उलट हो. एक साल पहले दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने
कहा था कि उनका 'सपना' यह है कि भारत की 85 फीसदी आबादी शहरों में रहे. इस 'सपने'
को पूरा करने के लिए अकल्पनीय स्तर पर सोशल इंजीनियरिंग की जरूरत पड़ेगी. इसका
अर्थ होगा 50 करोड़ से ज्यादा लोगों को जबरन बल प्रयोग कर गांवों से शहरों में
ले आना.
यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अब काफी तेजी से भारत को एक ऐसे पुलिस राज्य में
यह तब्दील कर रही है जहां अपनी जमीनें देने से इनकार करने वाले लोगों को बंदूक की
नोक पर ऐसा करने को मजबूर किया जा रहा है. शायद यही वजह है कि बगैर किसी दिक्कत के
इतनी आसानी से पी. चिदंबरम वित्त मंत्री से गृह मंत्री बन गए. दोनों पदों के बीच एक
बेहद झीना सा परदा है. चिदंबरम का स्वप्न दरअसल एक ढंका हुआ दु:स्वप्न है जिसमें बड़े
पैमाने पर जमीनों को खाली कराने और भारत के प्राकृतिक संसाधनों को मुक्त कराने की
योजना शामिल है ताकि कॉरपोरेट लूट के लिए आसानी हो सके. प्रभावी तौर पर यह
स्वतंत्रता के बाद हुए भूमि सुधार की नीतियों को उलटने जैसी चीज़ है.
जंगल, पहाड़ और जलीय तंत्र सभी लुटेरे बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा तबाह किए जा रहे
हैं और इन्हें उस राज्य का समर्थन प्राप्त है जो बेलगाम होकर पर्यावरणीय आत्मघात का
शिकार होने को तैयार है. पूर्वी भारत में बॉक्साइट और लौह अयस्क का खनन समूचे
पारिस्थितिकीय तंत्र को तबाह कर रहा है और उर्वर भूमि को रेगिस्तान में तब्दील कर
रहा है. हिमालय में सैकड़ों ऊंचे बांधों की योजना बनाई जा रही है जिनके परिणाम
विनाशक ही होंगे. मैदानी इलाकों में नदियों के किनारे बाढ़ को रोकने के लिए बनाए गए
तटबंध और ज्यादा बाढ़ ला रहे हैं, जलजमाव पैदा कर रहे हैं, कृषि भूमि में नमक की
मात्रा बढ़ा रहे हैं जिससे सैकड़ों लोगों की आजीविका नष्ट हुए जा रही है. गंगा समेत
भारत की अधिकतर पवित्र नदियों को गंदे नालों में बदल दिया गया है जिनमें पानी से
ज्यादा औद्योगिक कचरा बह रहा है. शायद ही कोई ऐसी नदी बची है जो अपनी समूची यात्रा
पूरी कर के समुद्र में जाकर मिलती हो.
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सरकारी भंडार एक ओर जहां अनाजों से भरे पड़े हैं जो आखिकार सड़ जाता है, दूसरी ओर
भुखमरी और कुपोषण सब-सहारा अफ्रीका के स्तरों पर पहुंचने को बेताब है. |
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मनमाने तरीके से नदियों को आपस में जोड़ने का फैसला दे दिया
है. इसके पीछे यह अतार्किक प्रस्थापना है कि नदियों के समुद्र में मिलने से पानी
बरबाद होता है. नदियों के साथ यांत्रिक तरीके से सामान्य जलापूर्ति तंत्र जैसा
बरताव किया जा रहा है. इसे लागू करने का अर्थ होगा कि पहाड़ों में सुरंगें बना दी
जाएंगी, प्राकृतिक ड्रेनेज तंत्र और नदियों के रास्तों को बदल दिया जाएगा तथा डेल्टा
समाप्त हो जाएंगे. दूसरे शब्दों में यह समूचे उपमहाद्वीप की पारिस्थितिकी को तबाह
करने जैसा है. (यह फैसला देने वाले न्यायाधीश बी.एन. किरपाल रिटायर होने के बाद कोका
कोला के पर्यावरण बोर्ड के सदस्य हो गए. बहुत खूब!).
मुक्त बाजार की आर्थिक नीतियों को लागू करने वाले लोग इस बात से अनभिज्ञ हैं कि
कृत्रिम सिंचाई पर निर्भर सभ्यताओं का क्या हश्र हुआ है. इसने फसलों के पैदा होने
के चक्र को बदल डाला है. स्थानीय परिस्थितियों और जलवायु के मुताबिक पैदा होने वाली
फसलों का स्थान ज्यादा पानी की खपत करने वाली संकर और जैव संवर्ध्दित 'नकदी' फसलों
ने ले लिया है जो बाज़ार पर बड़े पैमाने पर निर्भर रहने के अलावा रासायनिक उर्वरकों,
कीटनाशकों, नहर सिंचाई और भूजल के अंधाधुंध दोहन पर भी निर्भर होती हैं. रसायनों से
भरी हुई कृषि भूमि धीरे-धीरे अनुर्वर हो जाती है, कृषि लागत बढ़ने लगती है और छोटे
किसान धीरे-धीरे कर्ज के जाल में फंसते जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में 1,80,000 से
ज्यादा किसानों ने खुदकुशी की है. सरकारी भंडार एक ओर जहां अनाजों से भरे पड़े हैं
जो आखिकार सड़ जाता है, दूसरी ओर भुखमरी और कुपोषण सब-सहारा अफ्रीका के स्तरों पर
पहुंचने को बेताब है. वास्तव में ऐसा लगता है जैसे नौ फीसदी की वृध्दि दर अब हमें
नीचे की ओर ले जा रही है. इस किस्म की वृध्दि की दर जितनी ज्यादा होती है, उसके
परिणाम उतने ही घातक होते हैं. यकीन न हो तो आप किसी भी कैसर विशेषज्ञ से इसकी
पुष्टि कर सकते हैं.
यह कुछ ऐसे ही है जैसे कि सामंतवाद और जातिवाद के बोझ तले सड़ रहे एक प्राचीन समाज
को एक विशाल मशीन में मथ दिया गया हो. मंथन की इस प्रक्रिया ने एक ओर जहां पुराने
किस्म की कुछ असमानताओं को दूर किया है, वहीं कुछ को दोबारा स्थापित कर दिया है. अब
यह पुराना समाज दो हिस्सों में बंट गया है- क्रीम की एक मोटी परत और ढेर सारा पानी.
यह क्रीम दरअसल करोड़ों भारतीय उपभोक्ताओं का वह बाजार है (कारों का, सेलफोन,
कंप्यूटर, वैलेंटाइन डे के कार्ड का बाजार) जिससे अंतरराष्ट्रीय व्यापार को रश्क
है. पानी का ज्यादा महत्व नहीं है. इसे कहीं भी बहाया जा सकता है, तालाबों में जमा
किया जा सकता है या नालियों के रास्ते फेंक भी दिया जा सकता है. या फिर सूट पहने
अभिजात्य वर्ग के लोग जैसा सोचें, वैसा वे इस पानी के साथ कर सकते हैं.
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अब वापस 1989 में चलते हैं. जिस वक्त कांग्रेस की सरकार भारत के बाजार को
अंतरराष्ट्रीय वित्त के लिए खोल रही थी, ठीक उसी समय विपक्षी दक्षिणपंथी भारतीय जनता
पार्टी ने हिंदू राष्ट्रवाद का अपना जहरीला अभियान शुरू किया (जिसे लोकप्रिय शब्दों
में 'हिंदुत्व' कहते हैं). ऐसा लग रहा था जैसे कि यह 'संघ' और 'प्रगति' के बीच
सम्बन्ध दर्शाने जैसी बात थी. 1990 में भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने देश भर का
दौरा किया, मुस्लिमों के खिलाफ विद्वेष को भड़काया और अयोध्या में विवादित स्थल पर
खड़ी 16वीं शताब्दी की पुरानी बाबरी मस्जिद को ढहा कर उसकी जगह राम मंदिर बनाने की
मांग की. 1992 में आडवाणी द्वारा भड़काए गए एक समूह ने मस्जिद को ढहा दिया. जिस भाजपा
की 1984 में संसद में सिर्फ दो सीटें थीं, उसने साम्प्रदायिक उन्माद की पीठ पर चढ़कर
1998 में कांग्रेस को हरा दिया और केन्द्र की सत्ता में आ गई.
यह कोई संयोग नहीं है कि हिंदुत्व का उभार ठीक उसी ऐतिहासिक क्षण में हुआ जब अमेरिका
ने अपने महान शत्रु के रूप में साम्यवाद की जगह इस्लाम को बैठाया. जिन उग्र
इस्लामिक मुजाहिदीनों का राष्ट्रपति रीगन ने कभी व्हाइट हाउस में स्वागत किया था और
अमेरिका के संस्थापकों से तुलना की थी, उन्हें अचानक आतंकवादी कहा जाने लगा.
1990-91 में खाड़ी युध्द यानी ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म सीएनएन के सीधे प्रसारण के
माध्यम से भारतीय शहरों में अभिजात्य वर्ग के ड्राइंग रूम तक सैटेलाइट टीवी के
रास्ते पहुंच गया. तकरीबन इसी वक्त भारत की सरकार, जो कभी फलस्तीनियों की प्रगाढ़
मित्र हुआ करती थी, इजरायल की 'प्राकृतिक सहयोगी' बन गई. आज भारत और इजरायल संयुक्त
सैन्य अभ्यास करते हैं, गुप्तचर सूचनाएं बांटते हैं और कब्जाए गए इलाकों पर राज करने
के सबसे बेहतर तरीकों का एक-दूसरे से आदान-प्रदान करते हैं.
भाजपा ने 1998 में जब सत्ता संभाली, उस वक्त निजीकरण और उदारीकरण की 'प्रगतिशील'
परियोजना आठ साल पुरानी हो चुकी थी. भले ही इसने यह कहते हुए, कि आर्थिक सुधार की
प्रक्रिया 'उदारीकरण के रास्ते लूटने' की प्रक्रिया है इसका विरोध किया था, लेकिन
सत्ता में आते ही भाजपा ने काफी उत्साह से बाजार को गले लगा लिया और एनरॉन जैसे बड़े
निगमों के हाथों खुद को सौंप दिया (प्रातिनिधिक लोकतंत्र में एक बार चुने जाने पर
जनप्रतिनिधि अपने वादों को तोड़ने और अपना दिमाग बदलने के लिए स्वतंत्र होते हैं).
सत्ता संभालने के कुछ ही हफ्तों के भीतर भाजपा ने सिलसिलेवार परमाणु परीक्षण किए.
भारत ने भले ही 1974 में परमाणु परीक्षण के क्षेत्र में कदम रख दिया था, लेकिन 1998
के परीक्षण राजनीतिक रूप से निहायत ही भिन्न थे. जिस विजेता राष्ट्रवाद की भावना के
साथ इन परीक्षणों का स्वागत किया गया, उसने मुख्यधारा के सार्वजनिक विमर्श में
आक्रमण और विद्वेष की नई भाषा का संचार किया. ऐसा नहीं है कि जो कहा जा रहा था, वह
कोई नई बात थी. बात सिर्फ यह थी कि कभी जो अस्वीकार्य था, आज अचानक उसका उत्सव मनाया
जा रहा था. उसी वक्त से हिंदू साम्प्रदायिकता और नाभिकीय राष्ट्रवाद ने कॉरपोरेट
भूमंडलीकरण की तरह राजनीतिक दलों की घोषित विचारधाराओं पर कब्जा जमा लिया है. यह
जहर सीधे हमारी नसों में घोला जा रहा था. अपनी समूची हिंसा और पाशविकता के साथ अब
यह जहर हमारे भीतर है, कि हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में इससे निपटते रहे- भले ही
केन्द्र की सरकार खुद को 'धर्मनिरपेक्ष' कहती हो अथवा नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता.
मुस्लिम समुदाय काफी तेजी से बदकिस्मती का शिकार हुआ है और आज वह सामाजिक पिरामिड
की तलहटी में बिल्कुल दलितों और आदिवासियों की तरह है. एक राष्ट्र के जीवन में
कभी-कभार ऐसी घटनाएं होती हैं जो आंखों के सामने पड़े परदे को हटा देती हैं और आम
आदमी को भविष्य की एक झलक मिल जाती है. 1998 में परमाणु परीक्षण ऐसी ही एक घटना है.
तब यह बताने के लिए कि भारत किस दिशा में जा रहा है, आपको भविष्यवक्ता होने की कोई
जरूरत नहीं थी.
फरवरी 2002 में अयोध्या से 58 हिंदू तीर्थयात्रियों को लेकर आ रही एक ट्रेन के
डिब्बे में आग लगा दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में
गुजरात की भाजपा सरकार ने राज्य में काफी सतर्क और नियोजित तरीके से मुसलमानों का
कत्लेआम करवाया. 11 सितम्बर 2001 को अमेरिका में हुए हमले के बाद समूची दुनिया में
पैदा हुए इस्लाम के प्रति भय के भाव ने इनकी नावों के पाल में हवा भरी. गुजरात की
सरकार और राज्य मशीनरी मूक खड़ी रही और अपनी आंखों के सामने 2000 से ज्यादा लोगों को
कत्ल कर दिए जाने का खेल देखती रही. साम्प्रदायिक रूप से गुजरात हमेशा एक
तनावग्रस्त राज्य रहा है. दंगे इससे पहले भी हुए हैं, लेकिन इस बार यह दंगा नहीं
था. यह एक जनसंहार था. भले ही इसमें शिकार हुए लोगों की संख्या रवांडा, सूडान या
कांगो जितनी नहीं थी, लेकिन गुजरात जनसंहार को एक ऐसे सार्वजनिक दृश्य के रूप में
निर्मित किया गया जिसके उद्देश्य अचूक थे. दुनिया के सबसे दुलारे लोकतंत्र की एक
सरकार द्वारा यह मुस्लिम नागरिकों को जारी की गई खुली चेतावनी थी.
जनसंहार के बाद मोदी ने चुनाव जल्दी करवाने का आग्रह किया. गुजरात की जनता ने उन्हें
फिर से सत्ता में बिठा दिया. पांच साल बाद उन्होंने अपनी कामयाबी दोहराई. आज वह
मुख्यमंत्री के रूप में अपना तीसरा कार्यकाल चला रहे हैं. व्यापारिक प्रतिष्ठानों
से उन्हें खूब प्रशंसा मिल रही है- मुक्त बाजार में उनकी आस्था के लिए तथा 'संघ' और
'प्रगति' के बीच अन्योन्य सम्बन्ध का प्रदर्शन करने के लिए- या आप चाहें तो कह सकते
हैं कि फासीवाद और मुक्त बाजार के बीच सम्बन्धों का प्रदर्शन करने के लिए.
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जनवरी 2009 में इस सम्बन्ध पर एक सार्वजनिक कार्यक्रम में मुहर लगा दी गई. भारत के
दो बड़े निगमों के सीईओ रतन टाटा (टाटा समूह) और मुकेश अंबानी (रिलायंस इंडस्ट्रीज)
ने गुजरात गरिमा पुरस्कार स्वीकार करते हुए गुजरात जनसंहार के रचयिता मोदी की विकास
नीतियों का स्वागत किया और भविष्य के प्रधानमंत्री के रूप में उनका गर्मजोशी से
समर्थन किया.
यह पुस्तक अब जबकि प्रेस में छपने जा रही है, करीब दो अरब डॉलर के खर्च से आम चुनाव
अभी सम्पन्न हुए हैं. यह अमेरिकी चुनाव के बजट से कहीं ज्यादा है. कुछ मीडिया
रिपोर्टों के मुताबिक खर्च की गई वास्तविक राशि दस अरब डॉलर के करीब है. पूछा जा
सकता है कि इतना पैसा आखिर आता कहां से है?
कांग्रेस और उसका गठबंधन यूपीए बड़ी आसानी से चुनाव जीत चुका है. दिलचस्प बात यह है
कि चुनाव में खड़े हुए नब्बे फीसदी स्वतंत्र उम्मीदवार हार चुके हैं. जाहिर है कि
बगैर किसी प्रायोजक के चुनाव जीतना बहुत मुश्किल है और स्वतंत्र उम्मीदवार
सब्सिडीयुक्त चावल, मुफ्त टीवी और वोट के बदले नोट आदि अश्लील धर्मार्थकारी जैसे
कामों का वादा नहीं कर सकते, जिनमें हमारे यहां के चुनावों को तब्दील कर दिया गया
है.
एक बार आप चुनाव के नतीजों के पीछे की गणित पर करीबी नज़र डालें तो पाएंगे कि 'आसान'
और 'बहुमत' जैसे शब्द भले ही पूरी तरह गलत न हो चुके हों, लेकिन छलते जरूर हैं.
मसलन, इस देश की आबादी के अनुपात में यूपीए को जितने वोट मिले, उनका वास्तविक हिस्सा
महज
10.3 फीसदी है. यह देखना दिलचस्प है कि किस तरह चुनावी लोकतंत्र की चतुर गणिताई एक
मामूली अल्पमत को भारी बहुमत में तब्दील कर सकती है. खैर, चाहे इसे जैसे भी जोड़ा
जाए, असल बात यह है कि नफरत के दूत एल.के. आडवाणी नहीं, बल्कि बाजार सुधार के भले
निर्माता मनमोहन सिंह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के दूसरी बार प्रधानमंत्री बनेंगे,
एक ऐसा व्यक्ति जिसने जीवन में एक भी चुनाव नहीं जीता है.
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इलेक्टोरेट को बाजार में तब्दील कर दिया गया, मतदाताओं को उपभोक्ता में और
लोकतंत्र बन गया मुक्त बाजार. निष्कर्ष क्या निकलता है- जो उपभोग नहीं कर सकते,
उनसे हमें कोई मतलब नहीं. |
चुनावी दौड़ में राजनीतिक दलों के बीच आर्थिक 'सुधारों' को लेकर एक किस्म की आम सहमति
बनी हुई थी. भाजपा के पूर्व मुख्य रणनीतिकार और रामजन्म भूमि आंदोलन के प्रणेता
गोविंदाचार्य ने व्यंग्यात्मक लहजे में सलाह दी थी कि कांग्रेस और भाजपा मिल कर एक
गठबंधन बना लें. ठीक वैसे ही जैसे कि छत्तीसगढ़ में भाजपा सरकार चलाती है और
कांग्रेस के नेता सलवा जुड़ुम चलाते हैं, जिसे सरकार का समर्थन प्राप्त है. जुड़ुम और
सरकार ने मिल कर उन माओवादियों के खिलाफ यहां एक संयुक्त मोर्चा बना लिया है जो
जंगलों में स्टील फैक्टरियां लगाने, लौह अयस्क, टिन और अन्य प्राकृतिक संपदा को
लूटने की फिराक में बैठे बहुराष्ट्रीय निगमों द्वारा जमीन अधिग्रहण और विस्थापन के
खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में लगे हुए हैं. इस तरह हम देख सकते हैं कि छत्तीसगढ़ में
भारत की दो सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियां भारत के सबसे गरीब और अरक्षित लोगों यानी
दंतेवाड़ा के आदिवासियों के खिलाफ गठबंधन बनाए हुए हैं. अब तक 644 गांवों को खाली
कराया जा चुका है. पचास हजार लोगों को सलवा जुडुम के शिविरों में विस्थापित कर दिया
गया है. करीब तीन लाख आदिवासी जो जंगलों में छुपे हुए हैं, उन्हें माओवादी आतंकी या
उनका समर्थक बताया जा रहा है. यह लड़ाई और भीषण होती जा रही है. उधर, कंपनियां
इंतजार में हैं.
यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि भारत उन कुछ देशों में शामिल है जिसने श्रीलंका सरकार
द्वारा हाल ही में तमिल चीतों के खिलाफ किए गए संभावित युध्द अपराधों की संयुक्त
राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय जांच संबंधी यूरोपीय मांग को बाधित कर दिया था. दुनिया
के इस हिस्से की सरकारों ने दरअसल 'आंतकवाद' से निपटने में इजरायल की रणनीति को अपने
लिए आदर्श मान लिया है - कि मीडिया को दूर रखो और हत्याओं के लिए कमर कस लो. इस
तरीके से उन्हें इस बात की बहुत चिंता नहीं करनी पड़ती कि कौन 'आतंकवादी' है और कौन
नहीं. हो सकता है कि इस पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुठ सनसनी फैल जाए, लेकिन वह जल्द
ही छंट जाती है.
राजनीतिक दलों के बीच इस 'रचनात्मक' गठजोड़ को लेकर कुछ पार्टियां बेहद उत्साहित
थीं, लेकिन उनसे कहीं ज्यादा उत्साहित थे वे बड़े कारोबारी घराने जिन्होंने टीवी पर
विशाल प्रचार अभियान चलाए. इन अभियानों में बॉलीवुड के सितारे अमीर-गरीब व
बच्चे-बूढ़ों से अपील कर रहे थे कि वे अपने घरों से बाहर निकल कर वोट दें. दिल्ली के
सबसे अभिजात्य बाजार खान मार्केट में उन लोगों को दुकानों और रेस्त्रां में छूट दी
जा रही थी जिनकी तर्जनी अंगुली पर मतदान वाली स्याही लगी हुई थी. ऐसा लग रहा था जैसे
कॉरपोरेट घरानों को यह समझ में आ गया है कि उनके व्यापार के लिए लोकतांत्रिक चुनावों
से बेहतर और कोई रास्ता ही नहीं रह गया है. अचानक ही लोकतंत्र 'कूल' होने का पर्याय
बन गया था. यह कुछ ऐसे था जैसे कि चीनियों के लिए खेल, तभी तो उनके यहां ओलंपिक हुए.
ठीक वैसे ही भारतीयों के लिए लोकतंत्र, इसलिए हमारे यहां चुनाव हुए. दोनों ही आयोजन
बड़े पैमाने पर प्रायोजित थे. दोनों ही खेलों को टीवी पर देखा जा सकता था.
बीबीसी ने ट्रेन का एक डिब्बा खरीद लिया जिसे नाम दिया गया इंडिया इलेक्शन स्पेशल.
इस डिब्बे में दुनिया भर से पत्रकारों को भारतीय चुनावों के चमत्कार का नजारा लेने
के लिए यात्रा पर ले जाया गया. ट्रेन के डिब्बे पर एक नारा लिखा हुआ था, 'क्या भारत
का चुनाव दुनिया की किस्मत को बदल पाएगा?' मेरे घर के करीब एक कैफे में बीबीसी हिंदी
का पोस्टर लगा हुआ था जिसमें बेन फ्रैंकलिन की तस्वीर वाले 100 डॉलर के नोट को गांधी
की तस्वीर वाले 500 रुपये के नोट के साथ दिखाया गया था. नीचे लिखा था, 'क्या इंडिया
का वोट बचाएगा दुनिया का नोट?' इन तमाम अय्याश तरीकों से इलेक्टोरेट को बाजार में
तब्दील कर दिया गया, मतदाताओं को उपभोक्ता में और लोकतंत्र बन गया मुक्त बाजार.
निष्कर्ष क्या निकलता है- जो उपभोग नहीं कर सकते, उनसे हमें कोई मतलब नहीं.
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अब चाहे यह अच्छे के लिए हो या बुरे के लिए, लेकिन ऐसा लगता है कि 2009 के चुनावों
ने तय कर दिया है कि ''प्रोग्रेस'' प्रोजेक्ट अपने शबाब पर है और चालू रहेगा.
हालांकि, यह मान लेना कि ''यूनियन'' वाला प्रोजेक्ट अब किनारे लग गया है, गलत होगा.
2009 का चुनावी अभियान जैसे-जैसे आगे बढ़ता गया, दो चीजों को मीडिया में भरपूर कवरेज
मिली. पहली थी मोदी के गुजरात से निकलने वाली टाटा की एक लाख रुपये वाली जनता की
कार नैनो. (मोदी ने टाटा को जो रियायतें और सब्सिडी दी, उसी की वजह से उन्होंने मोदी
का इतना समर्थन किया). दूसरी चीज़ रही भाजपा के शैतानी नौनिहाल वरुण गांधी का घृणा
भरा भाषण (जो नेहरू खानदान का ही वंशज है), जिसे सुन कर नरेंद्र मोदी तक उदार लगने
लगें. एक सार्वजनिक भाषण में वरुण गांधी ने मुस्लिमों की जबरन नसबंदी कराने की बात
कही. उसने कहा, ''...कोई भी मुस्लिम फिर हिंदुओं के सामने अपना सिर नहीं उठा सकेगा.''
और उसने मुस्लिमों के लिए एक अपमानजनक शब्द का इस्तेमाल किया. उसने कहा, ''मुझे एक
भी मुस्लिम वोट नहीं चाहिए.''
वरुण गांधी ने भारी मतों से चुनाव जीता. आश्चर्य होता है कि क्या ''जनता'' हमेशा सही
होती है? भाजपा अब भी देश की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है, जिसकी देश में
मजबूत मौजूदगी है और जो कांग्रेस के लिए इकलौती चुनौती है. अगली बार वह फिर
कांग्रेस को टक्कर देगी.
भारतीय लोकतंत्र की चमकदार संस्थाएं- न्यायपालिका, पुलिस, ''स्वतंत्र'' प्रेस और
ज़ाहिर तौर पर चुनाव- ''चेक एंड बैलेंस'' की एक प्रणाली के रूप में काम करना तो दूर,
अक्सर इसकी उलटी भूमिका निभाती हैं. वे 'यूनियन' और 'प्रोग्रेस' के व्यापक हितों का
प्रचार करने के लिए एक-दूसरे के लिए ढाल का काम करती हैं. इस प्रक्रिया में वे ऐसा
भ्रम पैदा कर देती हैं कि चेतावनी के रूप में उठने वाली आवाजें शोरगुल का हिस्सा बन
जाती हैं. और इससे ज़ाहिर तौर पर एक ऐसे लोकतंत्र की छवि ही सुधरती है जो सहिष्णु,
रंग-बिरंगा और कुछ हद तक अराजक भी है. यह अराजकता वास्तविक है, लेकिन यही हाल आम
सहमति का भी है.
जब भी हम आम सहमति की बात करते हैं, हमारे सामने छोटा लेकिन हमेशा मौजूद रहने वाला
कश्मीर का मुद्दा आ जाता है. जब भी बात कश्मीर पर आती है, तो भारत में आम सहमति
कट्टरता की हद तक पहुंच जाती है. सत्ता प्रतिष्ठान के हर तबके में यह समान होती है,
चाहे वह मीडिया हो, अफसरशाही, बुध्दिजीवी या फिर बॉलीवुड.
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इस ग्लेशियर के पिघलने से इस उपमहाद्वीप में खतरनाक बाढ़ आ जाएगी, और इसके बाद
पड़ने वाला अकाल करोड़ों लोगों की जिंदगियों को तबाह कर डालेगा. फिर हमें लड़ने के लिए
और वजहें मिल जाएंगी. |
आज कश्मीर घाटी में चल रही लड़ाई 20 साल पुरानी हो चुकी है और इसने करीब 70,000 जानें
ले ली हैं. दसियों हजारों लोगों को प्रताड़ित किया गया, कई हज़ार ''लापता'' हो गए,
औरतों के साथ बलात्कार किया गया और हजारों औरतें विधवा हो गईं. कश्मीर घाटी में
पांच लाख सैनिक गश्त करते हैं. यह दुनिया में सबसे ज्यादा सैन्य उपस्थिति वाला
क्षेत्र बन चुका है. (इराक पर अपने कब्जे के चरम पर अमेरिका के 1,65,000 सैनिक वहां
सक्रिय थे). भारतीय सेना दावा करती है कि उसने कश्मीर के अधिकतर हिस्सों में
आतंकवाद को कुचल दिया है. हो सकता है यह सही हो, लेकिन क्या सैन्य वर्चस्व का अर्थ
विजय होता है?
कश्मीर आज वह प्रवेश द्वार बन रहा है जहां से अफगानिस्तान और पाकिस्तान में हो रहा
विनाश भारत आ सकता है, जहां उसे बड़ी आसानी से भारत के 15 लाख मुस्लिमों के बीच
युवाओं का आक्रोश सौदे के लिए तैयार मिल जाएगा जिनके साथ बर्बरता की गई है, जिन्हें
शर्मिंदा किया गया है और हाशिये पर डाल दिया गया है. इसका पता हमें उन सिलसिलेवार
आतंकी हमलों से लगता है जिसकी परिणति 2008 के मुबई हमलों के रूप में हुई.
कश्मीर में जारी असंतोष के तात्कालिक समाधानों ने समस्या को और बढ़ाया है और यह अब
इतने गहरे उतर चुकी है कि जड़ों में जहर घोल रही है.
शायद दुनिया के सबसे ऊंचे युध्द क्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर की कहानी हमारे दौर के इस
पागलपन के लिए सबसे उपयुक्त मुहावरा साबित हो. यहां हजारों भारतीय और पाकिस्तानी
सैनिक तैनात हैं, जो शून्य से 40 डिग्री तक नीचे चले जाने वाले तापमान और हड्डियों
को भेदने वाली बर्फीली हवाओं को झेल रहे हैं. सैकड़ों सैनिक जो वहां मारे गए हैं,
उनमें अधिकतर की मौत ठंड, पाले से हुई है. यह ग्लेशियर आज कचरे का ढेर बन चुका है,
जिसमें युध्द सामग्री का मलबा, हजारों खाली गोले, ईंधन के खाली ड्रम, बर्फ काटने
वाली कुल्हाड़ी, पुराने बूट, तंबू और अन्य किस्म का सामान दफन है जिसे युध्द करने
वाले हजारों इंसान पैदा करते हैं. इतनी ठंड में यह कचरा सड़ता नहीं है, जस का तस बना
रहता है. यह इंसानी मूर्खताओं और गलतियों का बहुमूल्य स्मारक है.
इतनी ऊंची जगह पर युध्द करने के लिए एक ओर जहां भारत और पाकिस्तान की सरकारें अरबों
डॉलर हथियारों और अन्य सामग्रियों पर बहा देती हैं, वहीं युध्द क्षेत्र अब पिघलने
लगा है. फिलहाल यह पिघल कर आधा रह गया है. इस पिघलन का सैन्य तैनाती से उतना
लेना-देना नहीं, जितना कि यहां से दूर दुनिया के दूसरे हिस्से में बेहतर जीवन बिता
रहे लोगों से संबंध है. ये भले लोग हैं जो शांति, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और
मानवाधिकार में विश्वास करते हैं. ये लोग उन फलते-फूलते लोकतांत्रिक देशों में रहते
हैं जहां की सरकारें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की सदस्य हैं और जहां की
अर्थव्यवस्थाएं भारत और पाकिस्तान (और रवांडा, सूडान, सोमालिया, कांगो, इराक,
अफगानिस्तान... काफी लंबी फेहरिस्त है) जैसे देशों को हथियार बेचने और युध्दक़
सामग्री के निर्यात पर निर्भर हैं. इस ग्लेशियर के पिघलने से इस उपमहाद्वीप में
खतरनाक बाढ़ आ जाएगी, और इसके बाद पड़ने वाला अकाल करोड़ों लोगों की जिंदगियों को
तबाह कर डालेगा. फिर हमें लड़ने के लिए और वजहें मिल जाएंगी. उसके लिए हमें और हथियारों
की जरूरत पड़ेगी. कौन जानता है कि कहीं इसी की जरूरत तो मौजूदा मंदी से निकलने के
लिए नहीं हो! तब फलते-फूलते लोकतंत्रों में रहने वाले हर व्यक्ति का जीवन और बेहतर
होगा- फिर ग्लेशियर कहीं और ज्यादा तेजी से पिघलेंगे.
साभार: दी न्यू स्टेट्समैन
01.08.2009, 01.32 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | Abhijeet Sen Raigarh | | | | One have to think about his country's foreign, economic and environmental policies as well as industrial,health and banking policies along with fighting for food, employment and shelter. | | | | | |
| | suresh chandra parekh Toranto | | | | देश में जिस तरह से विकास के पैमाने बनाए गए हैं और असमानता जिस तेज़ी से बढ़ रही है, उसमें किसी तरह की बदलाव की बात संभव नहीं है. हम लोग एक भ्रष्ट व्यवस्था के अंग हैं और अपने देश से दूर बैठ कर जब मैं भारत के बारे में सोचता हूं तो मुझे अपने देश पर शर्म आती है. तोगड़िया जी, सिंघल जी, अडवाणी जी, मुझे क्षमा करें. मुझे तो एक ही वाक्य सुझ रहा है- शर्म से कहो हम हिंदू हैं, शर्म से कहो हम भारतीय हैं. | | | | | |
| | दीपक (deepakrajim@gmail.com) दुबई | | | | पहली बात यह कि लोकतंत्र उस देश कि व्यवस्था है जहा लोग पढे-लिखे समॄद्ध और जागरुक हो इसलिये भारत मे यह इतनी जल्दी और आदर्श रुप मे संभव नही ....याद रखिये मानवाधिकार कि दुहाई दे दे के आप समाजवाद नही ला सकते समाजवाद तभी आयेगा जब पूंजीवाद परिपक्व होगा....दर-असल पूंजीवाद कि निष्पत्ती का नाम ही समाजवाद होगा ....क्योकि जब उद्योग और पैसा आयेगा तब वह पैसा किसी पुंजीवादी के खीसे मे हमेशा नही भरे रहेगा जाहिर है वह पैसा घुमफ़िरकर फ़िर समाज के हिस्से मे आयेगा ....
पुंजीपति उसका दुरुपयोग भी करेंगे और अपनी तिजौरी पहले भरेंगे यह बात सही है मगर यह भी सही है कि आप को भी कुछ ना कुछ जरुर मिलेगा और वह कोई डाका नही डाल रहा है उसने पूंजी पैदा की है जाहिर है उसमें देश कि संपत्ति लगेगी और उस लिहाज से उस पर सभी का बराबर हक होगा ....मगर अभी बराबरी से क्या बाटेंगे हमारे पास गरीबी के सिवा क्या है ? इसलिये पुंजी के समान वितरण के लिये ज्यादा जरुरी है कि पुंजी पहले पैदा तो हो !!मसलन आज अगर किसी उद्योगपति के पास ५०० रु है और आसपास के लोग २ रुपये मे गुजर-बसर कर रहे है तब कल अगर वहा उद्योग लग गये तब उद्योगपति के पास १००० हो गये तो आपके पास भी २ रु, से ५० रु हो जायेंगे आपने भी कुछ कमाया है !!
मगर मै फ़िर भी यह कहुंगा कि यह फ़र्क इतना ज्यादा नही होना चाहिये और इस फ़र्क के लिये उद्योगपति या नेता जिम्मेदार नही यह सिस्टम जिम्मेदार है... आपका तंत्र जिम्मेदार है इसलिये नेता बदलने या सरकार बदलने से काम नही चलेगा इस व्यस्था को बदलना होगा अमीर गरिब इस तंत्र के हिस्से है तंत्र इसी ढंग से काम करेगा तब चेहरे भले बदले स्थिती नही बदलेगी !!और यह भी सोचने कि बात है कि दो आदमी कभी भी समान नही हो सकते इसलिये उन्हे समान बनाना ही गलत धारणा है समाजवाद का मतलब होगा कि प्रयेक आदमी को असमान होने के लिये समान अवसर मिलना चाहिए सबके पास शिक्षा स्वास्थ्य और भोजन करियर के अवसर समानतापुर्वक उपलब्ध होने चाहिए !!
इन सबके लिये भारत को गाल बजाने वाला लोकतंत्र नही बल्कि लोकतांत्रिक तानाशाही चाहिये.... इसके बगैर यह सब संभव नही ...अब आप सब बुद्दीजीवी ही देखे आप सब नेता अफ़सर सिस्टम को कोसते है मगर क्या किसी ने सोचा कि इसका जड़ कहा है इसका जड़ है आपकी चुनाव प्रणाली आप चिल्ला रहे है वोट डालो मगर किसको ?क्या जनता को अधिकार है कि वह सब नेताऒ को खारिज कर सके ? क्या सच्चे लोकतंत्र के लिये यह जरुरी नही ? फ़िर क्या एक शिक्षित और गैर शिक्षीत को आप बराबर मान लेंगे इसलिये यदि एक शिक्षित अगर वोट डाले तब उसके वोट को एक अनपढ के वोट से दो गुना ज्यादा महत्व देना चाहिये ....निरक्षर होने का यह अपमान आपके शिक्षा के स्तर मे क्रांति करेगा ....
ये आपके रैली और जनजगरण अब काम नही आने वाले !! फ़िर शिक्षा भी आपके ज्ञान कि परीक्षा होनी चाहिये ना कि आपके स्मृति कि ....रट्टा लगाना कोई ज्ञान का लक्षण नही ! हमे अपने सारे सिस्टम मसलन न्याय व्यवस्था,चुनाव व्यवस्था, शिक्षा ,उद्योग सबको खंगालने कि जरुरत है वरना जब जब तक यह तंत्र ऐसा है अमीर गरीब का फ़ासला बढता रहेगा ,चेहरो को कब तक बदलोगे? चेहरो को बदलने से काम नही चलेगा !! और अब ये लोकतांत्रिक शब्द खोखले हो गये इसका जिम्मा इन नेताओ पर नही इन बुद्धीजीवीयो पर जाता है क्योकि इन्होने इनको कभी रिफ़ाईन ही नही किया कि ये २१ सदी के साथ चल सके .....ये बुद्धिजीवी खुद तो कार मे घुम रहे है मगर विचार अभी बैलगाडी मे ही सफ़र कर रहे है !! | | | | | |
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