पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

शोषण का खेल चालू है

मुस्लिम पर्सनल लॉ के संहिताबद्ध होने से डर कैसा

पीपली लाइव का सीधा प्रसारण

ब्रिटिश कंपनी से लड़ाई अभी जारी है

सामुदायिक समीकरण बनाम विकासीय समीकरण

विचारहीन प्राथमिकताओं से आजादी

अब तक नौ

हिज़ाब पर हंगामा क्यों

पिया मेंहदी लिआय दा मोतीझील से...

किसानों के अंत की शुरुआत

छत्तीसगढ़, जीडीपी और कुल्हाड़ीघाट

भगवा, हरा और काला आतंकवाद

पत्थरबाजी में कुछ टूट गया है

डा. सुभाष राय

असलियत

रणेन्द्र

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > झारखंडPrint | Send to Friend | Share This 

एक अंधेर गांव की सैर

मुद्दा

 

एक अंधेर गांव की सैर

संदीप कुमार, गिरिडीह से लौटकर

 

आइए आपको एक गांव की कहानी सुनाएं. भारत के किसी दूसरे गांव से अलग नहीं है ये गांव लेकिन कई मामलों में अजब तो है ही. यहां की एक पीढ़ी बिजली देखे बगैर जवान हो गई. इस गांव के जो लोग आज अधेड़ावस्था में हैं, उन्होंने अपनी जवानी के दिनों में गांव को जगमगाते देखा था. इस गांव में अपनी बेटी को ब्याहने से बचते हैं लोग. गांव की कई विवाहिताएं गर्मी के दिनों में मायके चली जाती हैं. इस गांव में ब्यूटी पार्लर से लेकर ट्रैक्टर तक के कल-पुर्जे बेचने वाली दुकानें हैं लेकिन एक अदद बल्ब की दुकान नजर नहीं आएगी. यहां के दवा दुकानदार फ्रिज का इस्तेमाल आलमारी की तरह करते हैं. यहां लोग मोबाइल चार्ज करने में सालाना जितने रुपये फूंक देते हैं उतने में तो एक नया मोबाइल ही आ जाएगा.

लालटेन युग


ये गांव है मनकडीहा, जो बिरनी प्रखंड के भरकट्टा बाजार के बिलकुल पीछे बसा है. ना तो भरकट्टा बाजार में बिजली है ना ही मनकडीहा बस्ती में और ना ही इसके आसपास के दर्जनों गांवों में.

झारखंड के गिरिडीह जिले का मनकडीहा गांव जिला मुख्यालय से महज 30 किलोमीटर दूर है लेकिन विकास की किरणों से कई प्रकाश वर्ष दूर. गांव में आज भी पोल खड़े हैं, बिजली के तार भी कई जगह सही-सलामत हैं. लेकिन महज शोभा की वस्तु हैं ये सब और ये पोल-तार गांववालों को शोले की तरह चुभते हैं.

मिलिए 28 साल के मुहम्मद अशफाक से. जनाब ने जमशेदपुर (झारखंड) से बीटेक किया है और इन दिनों दुबई में अच्छी तनख्वाह पर इलेक्ट्रिकल इंजीनियर हैं. मनकडीहा बस्ती में बड़ा-सा मकान है और खेती की जमीनें भी हैं. लोगों का मानना है कि इतनी ‘खूबियों’ वाले किसी शख्स के घर तो रिश्ते लेकर आने वालों की लाइन ही लग जानी चाहिए! लेकिन आप ये जानकर हैरत में पड़ जाएंगे कि अशफाक के साथ अपनी बहन-बेटी ब्याहने को कोई तैयार नहीं. और इसकी इकलौती वजह है गांव में बिजली का नहीं होना.

हाल ही में अशफाक दुबई से अपने गांव इस उम्मीद के साथ आए थे कि इस बार कहीं रिश्ता फाइनल हो जाएगा. लेकिन अफसोस के साथ अशफाक कहते हैं- ‘कुछ लोग रिश्ते लेकर आए और उन्हें सब कुछ पसंद आया. लेकिन जब उन्हें पता चला कि गांव में बिजली नहीं है तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए. कहने लगे कि हमारी बेटी बगैर बिजली के नहीं रह पाएगी.’

ये कहानी जब अशफाक सुना रहे थे तो उनके चेहरे पर पसरे दर्द को आसानी से पढ़ा जा सकता था. और ऐसी कहानी सिर्फ अशफाक की नहीं है. 22 साल के संजर इमाम मुंबई में नौकरी करते हैं लेकिन उनके रिश्ते में भी रोड़ा बना है गांव में बिजली का ना होना.

अशफाक कहते हैं कि इस गांव में ज्यादातर वैसी ही लड़कियां ब्याहकर आती हैं जिसके अपने गांव में बिजली नहीं होती और उनके दिल में बिजली ना होने की कोई कसक नहीं रहती. लेकिन स्थिति उलटी हो तो फिर दिक्कतें बढ़ जाती हैं. ऐसे में अफताब आलम की कहानी सुननी जरूरी हो जाती है.

अफताब आलम की पत्नी शहरी इलाके की हैं. बरसात और जाड़े के मौसम तक तो ठीक है लेकिन गर्मी का सीजन आते ही उनकी पत्नी मायके जाने की जिद ठान लेती हैं. और ऐसी जिद पालने वाली महिलाओं की कमी भी नहीं. इनका कहना है कि टीवी-लाइट के बगैर तो रहा जा सकता है लेकिन गर्मी में बगैर पंखा के तो जान ही निकल जाती है.

भरकट्टा बाजार के सुदामा नाथ गोस्वामी से बात कीजिए तो वो साल 1991 में चले जाते हैं. कहने लगे कि टीवी में राजीव गांधी की हत्या की खबर और उनकी अंत्येष्टि लाइव देखी थी. राजीव गांधी गये और फिर उसके बाद जो बिजली गई वो आजतक इस गांव में नहीं आई.

हैरत की बात देखिए कि गांवों में बिजली पहुंचाने के लिए केंद्र सरकार का जो फ्लैगशिप प्रोजेक्ट है वो राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के नाम से है लेकिन ये गांव अभी तक इस योजना में शामिल नहीं हुए हैं. सिर्फ ये गांव ही नहीं पूरा बिरनी प्रखंड ही एक तरह से अंधेरे की आगोश में है. बिरनी प्रखंड में 28 पंचायतें हैं और 181 राजस्व गांव लेकिन इनमें से केवल चार गांवों में ही बिजली है. बिरनी प्रखंड मुख्यालय के अलावा सिमराढाब, विराजपुर और बरमसिया में तो दशकों की खामोशी के बाद दो साल पहले ही बिजली ने दस्तक दी है.

दवा की दुकान चलाने वाले महमूद आलम फ्रिज में तो रूई वगैरह रखते हैं. वो फ्रिज को आलमारी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.


सुदामा नाथ गोस्वामी कहते हैं कि गांव में कभी भी अगर बिजली नहीं आई होती तो संतोष रहता लेकिन जिस तरह से बिजली दिखाकर उसे हमसे दूर कर दिया गया उससे कलेजा हर वक्त कचोटता रहता है.

कस्बे के एक प्राइवेट कॉलेज में पढ़ाने वाले स्थानीय निवासी अनिल कुमार शर्मा कहते हैं कि हमने तो अपनी पढ़ाई-लिखाई बिजली के बल्ब में की लेकिन नई पीढ़ी के बच्चों को ढिबरी और लालटेन युग में जीना-पढ़ना पड़ रहा है.

भरकट्टा बाजार में स्टूडियो, जेरोक्स मशीनें सबकुछ हैं और ये सब चल रहे हैं जेनरेटर की दुआ से. लेकिन स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता मकसूद अंसारी कहते हैं कि जेनरेटर की वजह से पूरा इलाका वायु और ध्वनि प्रदूषण की चपेट में है. मकसूद की आशंका को खारिज नहीं किया जा सकता लेकिन मुहम्मद शमीम कहते हैं कि जेनरेटर की वजह से ही तो मोबाइल चार्ज हो पाता है. ये और बात है कि हर रोज एक मोबाइल की बैटरी चार्ज करने के लिए लोगों को पांच रुपये खर्च करते पड़ते हैं.

मकसूद हंसते हुए कहते हैं कि एक साल में मोबाइल चार्जिंग में हम जितना उड़ा देते हैं उतने में एक कामचलाऊ मोबाइल ही आ जाएगा. दवा की दुकान चलाने वाले महमूद आलम फ्रिज में तो रूई वगैरह रखते हैं. वो फ्रिज को आलमारी की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. महमूद कहते हैं कि बिजली नहीं है तो हम करें भी तो क्या करें.

ऐसा नहीं है कि बिजली के बिना नर्क बनी जिंदगी के खिलाफ लोगों ने आवाज नहीं उठाई लेकिन अफसोस की बात ये रही कि स्थानीय जनप्रतिनिधि से लेकर अधिकारियों तक ने चुप्पी साध ली है. क्या पता मनकडीहा बस्ती का दर्द कोई सुनेगा भी कि नहीं? और सुनेगा भी तो कब?


05.08.2009, 12.20 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

bharti sah (sahbharti@yahoo.com) mumbai

 
 यह बहुत ही सराहनीय काम किया है आपने ऐसा मुद्दा उठाकर. आज का युग इतना शहरीकरण हो गया है लोग टीवी इत्यादि इलेक्ट्रानिक वस्तुओं के बगैर नहीं रह सकते लेकिन अफसोस की बात है कि मानकडिहा गांव में आज के समय में बिजली नहीं है. हम तो इस न्यूज़ को पड़ सकते हैं मगर यह गांव तो कई सालों से यह पीड़ा भुगत रहा है.

आपकी ये खबर सरकार तक पहुँचे और इस समस्या के निवारण कर इन्हें बिजली उपलब्ध कराए. यह सरकार का कर्तव्य है अन्यथा सरकार किस काम की है केवल वोट पाने के लिए ही है क्या ?
 
   
 

Shashi (shashi.iimc09@gmail.com) delhi

 
 सर अगर ऐसे मुद्दों को रिपोर्ट की शक्ल दिलवा कर चैनल पर दिखवा सकें तो जरूर कुछ सुधार होगा.

 
   
 

mukesh tiwari (mukeshjournalist@gmail.com) katni mp

 
 खबर बहुत अच्छी है. बधाई. खबर में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं है कि बिजली बंद क्यों की गई है. 
   
 

Kanika Gupta () Gurgaon

 
 First of all i would like to appreciate your work. Not every one can think of writing about this topic. Secondly i would say that if anyone can has the solution of this problem then it is the people themselves who are suffering with this problem. Till they don't speak OUT and don't take some harsh action against it, this problem won't solve. We are living in a democratic country, where a common man chooses the govt. If we pay taxes to that govt then we also have the right to ask for facilities in return. And if not even facilities then too atleast the basic necessites of a common man should be fulfilled. 
   
 

sunny () auraiya

 
 In this condition only government can play a important role and the people can also report to any officer for this. But electricity is more important for our daily life. But this state is not so forward.

But for solving this problem the people should reject the election and can also demand for supply of electricity. This is only a way to solve this problem.
 
   
 

Abhijeet Sen Raigarh

 
 Right for electricity is necessary as it is like rights of food ,employment and education as well as like rights of information, justice and vote and who knows it is like right of (obviously one) bride.  
   
 

smita delhi

 
 इस तरह के मुद्दे उठा कर आप एक साहसिक काम कर रहे हैं. 
   
 

Karuna (karuna.tanwar@yahoo.in) new delhi

 
 इस विषय पर मेरी प्रतिक्रिया है कि हाथ पर हाथ रखने से कुछ नहीं होगा. सरकार की भागीदारी औऱ हम लोग कुछ कर सकें तो हमें ही कुछ करना होगा, इस समस्या के निवारण के लिए. आपको बधाई कि आपने इस मुद्दे से वाकिफ कराया. 
   
 

Kumar Sambhav Patna

 
 बिहार और झारखंड में ऐसे गांवों की संख्या बहुत बड़ी है. खेदजनक बात ये है कि न तो सरकार और न ही दूसरी संस्थाएं इसकी ओर ध्यान देती हैं. मीडिया भी ऐसे मुद्दों को छोड़ देता है क्योंकि ये हॉट मुद्दे नहीं हैं. आपको बधाई कि आपने इस मुद्दे को उठाया. 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in